फेल होती
राज-व्यवस्था में व्यक्ति पर खपत और बचत के द्वंद्व का बोझ
अर्थव्यवस्था के प्रति भरोसाहीनता में भविष्य के दुर्घटनाग्रस्त
होने से बचाव के लिए बचत
वास्तविक बोझ बन जाता है।
वित्तीय अस्थिरता और अनिश्चियता के दौर में कासा : CASA – चालू खाता, बचत
खाता
— में सामंजस्य का अभाव यानी वित्तीय प्रबंधन किसी-न-किसी स्तर पर बैंक प्रबंधन पंगुपन से ग्रस्त लगने लगता है। जब व्यक्ति
को अपनी मेहनत की कमाई डूबने का डर
होता है, तो वह करे तो करे क्या!
व्यवस्था पर भरोसाहीनता के चलते बचत का दबाव पहले व्यक्ति पर बोझ बन जाता है। आगे
चलकर व्यक्ति का बोझ अंततः व्यवस्था पर बोझ बनकर लौटता है। अर्थव्यवस्था बचत-व्यय
की चकरघिन्नी में फिर से जाती है। घर परिवार के मामले में कटौती की घरखर्च
व्यवस्था होती है, लगभग यही स्थिति सरकार के सामने घाटे
की राजस्व व्यवस्था की होती है।
जिस घर परिवार में आय का 90%-100% से भी अधिक दानापानी, रोटी के जुगाड़ में खर्च
करनी पड़ती हो और आमदनी स्रोत भी बहुत पतला हो वर्तमान के संकट से जूझे या भविष्य को
दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाव के लिए बचाव करे — असल में बचत में नहीं बदलाव में बचाव
होता है।
भविष्य के दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाव का मतलब क्या होता है? मतलब होता है यदि
हारीबीमारी गले की फांस बन जाये, कोई अदृश्य संकट या जरूरत आ खड़ी हो तो हाथ में बचाव
के लिए कुछ तो होना चाहिए। जब संकट की घड़ी में मुल्क पास खड़ा न हो पाये तो खुद
खड़ा होने की कोशिश करे! व्यवस्था के प्रति भरोसाहीनता के चलते खपत की गलफांस से पिंड
छुड़ाने के लिए जूझते लोग भला किस तरह से बचत का बोझ उठायें!
तो यह लगभग स्पष्ट ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा व दाल-नमक की
चिंताओं से जूझनेवाले लोगों के लिए नहीं कहा है। अर्थव्यवस्था के गर्त में जाने के
जमाने में उभरे और सरकारी नीतियों पर दखल जमाये 15% नव-धनाढ्यों के लिए कहा। यानी
जिस 15% कंज्यूमर क्लास की आबादी के बल पर भारत पूरी दुनिया में अपने बड़ा बाजार
कहता था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कहा है। प्रधानमंत्री के इस उदारवादी
हस्तक्षेप से कंज्यूमर क्लास बहुत तिल-मिलाया है लेकिन चुनावी और राजनीतिक मुंहबंदी
के चलते खामोश है या बचत का आकुल-व्याकुल व्याकरण बांच रहा है। न मन खोलने की
स्थिति में है और न मुंह खोलने की स्थिति में!
आम लोग दो तरह से घरखर्चा और बचत में संतुलन बनाते हैं। अपनी आमदनी में से बचत
के लिए निर्धारित राशि को अलग करते हैं। बचे हुए पैसे से घरखर्चा चलाने की कोशिश करते
हैं। घरखर्चा चलाने घरखर्चा बचत और खपत का
असंतुलन अर्थव्यवस्था के ढांचे को ढीला कर देता है। ढीली-ढाली और बेडोल अर्थव्यवस्था
के चलते देश की राजनीतिक व्यवस्था में आंतरिक असंतोष बढ़ता चला जाता है। इस आंतरिक
असंतोष से राज-व्यवस्था में भयंकर उपद्रव होने लगता है। उपद्रव के दौर में उपजी भरोसाहीनता
में व्यक्ति असहाय हो जाता है। इस असहाय मनःस्थिति और वस्तु-स्थिति में बचत का बोझ
बढ़ जाता है।
बचत व्यवस्था की भरोसाहीनता:
आधुनिक व्यक्ति पर एक मनोवैज्ञानिक और आर्थिक बोझ
समकालीन आर्थिक परिदृश्य
में 'बचत' केवल एक वित्तीय गतिविधि न रहकर एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। जब किसी समाज
में बचत की व्यवस्था के प्रति भरोसा कम होने लगता है, तो इसका सीधा असर व्यक्ति की कार्यक्षमता, भविष्य की योजना और
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
अर्थव्यवस्था के
प्रति भरोसाहीनता में भविष्य के दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाव के लिए बचत वास्तविक
बोझ बन जाता है।
समझ में आने लायक मतलब
की बात इतनी ही है कि जब बचत खाता और मियादी बचत या फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दर
बाजार की महंगाई दर से कम हो तो जमा राशि के वास्तविक मूल्यों में कह लीजिये क्रय-क्षमता
में गिरावट हो रही होती है। ऊपर से आमदनी का स्रोत यदि पतला होता जाये या सूखता
जाये तो फिर कहने ही क्या! और सुनने ही क्या! नंगा नहाये भी तो निचोड़े क्या!
वित्तीय अस्थिरता और अनिश्चियता के दौर में कासा : CASA – चालू खाता, बचत खाता — में सामंजस्य का अभाव यानी वित्तीय
प्रबंधन किसी-न-किसी स्तर पर बैंक प्रबंधन पंगुपन से ग्रस्त लगने लगता है। जब व्यक्ति
को अपनी मेहनत की कमाई डूबने का डर होता है, तो वह करे तो करे क्या!