Vaclav Havel का 1978 का प्रसिद्ध
निबंध है — Power of the
Powerless। हावेल के अनुसार ऊपर से लोकतंत्र और अंदर से अधिनायकवादी व्यवस्था
में आम नागरिक व्यावहारिक अर्थ में राजनीतिक शक्ति से वंचित होता चला जाता है। जबकि
लोकतंत्र और संविधान के आश्वासन के मुताबिक वास्तव में हर प्रकार की गहन शक्ति इन्हीं
‘शक्तिहीनों’ के हाथ और साथ रहती है।
मूल तर्क यह है कि अधिनायकवादी व्यवस्था “झूठ” पर टिकी
होती है। अधिनायकवादी व्यवस्था नागरिकों को प्रजा में और अधिकार को कृपा से बदल देती
है। अधिनायकवादी व्यवस्था लोगों से उम्मीद करती है कि लोग उनके झूठ को चुप-चाप स्वीकृति
देते रहें। उसके झूठ का प्रचार करें, उस में भाग लें, उत्सव मनाएं और सब को इस अधिनायकवादी
सेलिब्रेशन में घसीट लें। मीडिया वातावरण बनाता है।
लेकिन जेनजी ने इस झूठ में शामिल होने से इनकार कर
दिया। जेनजी ने अपनी शिक्षा प्रकारांतर से जीवनयापन की संभावनाओं को व्यर्थता की
तरफ धकेले जाने के खिलाफ जंतर-मंतर पर अपना जलवा दिखला दिया है। अब लोकतंत्र के
रहनुमाओं के सामने चुनौती है निरर्थकता और व्यर्थता के चक्रव्यूह और दुश्चक्र में फंसे
लोगों के सभ्य और शिष्ट तरीके से जीवनयापन का संवैधानिक, लोकतांत्रिक रास्ता खोजे।
“Power of the Powerless” यह भी सिखाता
है कि राजनीतिक शक्ति केवल सत्ता के केंद्रों में नहीं रहती। वह उन लोगों में भी निहित
होती है जो शक्तिहीन-से प्रतीत होते हैं। जब ये लोग सत्ता और व्यवस्था के ‘माननीयों’ फैलाये झूठ
और मायावी संरचना को सामूहिक रूप से नकार देते हैं। शक्तिहीनों की शक्ति का स्रोत उनकी
नैतिक दायित्व, दृढ़ता और व्यक्ति की गरिमा में होता है।