नई गुलामी और प्रेमचंद

नई गुलामी और प्रेमचंद


प्रेमचंद और आज के कुछ सवालों पर विचार करने का सबसे महत्त्वपूर्ण और कारगर आधार यह भी है कि प्रेमचंद का जीवन आजादी के लिए संघर्षरत गुलाम भारत में हुआ था। इस गुलामी का स्वरूप राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक औपनिवेश के संदर्भों से विनिर्मित था और आजादी का संघर्ष उन से मुक्ति की आकांक्षा में अभिव्यक्त हो रहा था। इस बाहरी उपनिवेश के समानांतर और उससे भी अधिक खतरनाक एक और उपनिवेश भारत में सक्रिय रहा है और वह है आंतरिक उपनिवेश। मेरी अपनी भी यह दृढ़ मान्यता है कि संस्कृति कर्म अपने स्वभाव में ही सामाजिक और जातीय कर्म हुआ करता है। कोई महत्त्वपूर्ण लेखक जीवन को अनुपस्थित कर बनाये गये किसी प्रकार के एकांत में रहकर लेखन कार्य नहीं करता है, और न ही कर सकता है। प्रेमचंद जैसे महत्त्वपूर्ण लेखक के संदर्भ में तो ऐसा होने का कोई सवाल ही उत्पन्न नहीं होता है।अपने समय के और उससे पहले हो चुके महत्त्वपूर्ण और आम लोगों की भी संवेदना के वैचारिक सूत्रों से सर्जनात्मक स्तर पर जुड़े बिना समय का सकर्मक लेखन संभव ही नहीं होता है। प्रेमचंद और उनके पहले के समय के बड़े लोगों में कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों के कृतित्वों को अपने वैचारिक विश्लेषण के आधार रूप में स्वीकृत करना चाहिए। आधुनिक हिंदी का प्रत्येक बड़ा लेखक उस राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक उपनिवेश और आंतरिक उपनिवेश से अपने स्तर पर जूझ रहा था। इस दृष्टि से आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बौद्धिक उपनिवेशवाद में किये गये डॉ. शंभुनाथ के महत्त्वपूर्ण विश्लेषण को ध्यान से पढ़ा जाना जरूरी है। डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध में आये विश्लेषण को भी घ्यान में रखा जाना चाहिए।

प्रेमचंद के लेखन का महत्त्व इस बात में है कि वे उस राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक एवं आंतरिक उपनिवेश और उन उपनिवेशों से उत्पन्न समसयाओं से जूझते हुए अपना सांस्कृतिक कर्म कर रहे थे। इस आंतरिक और बाहरी दोनों ही प्रकार के उपनिवेश से उत्पन्न समसयाओं के विरूद्ध लड़नेवाले हमारे सब से महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक योद्धा का नाम प्रेमचंद है। प्रेमचंद और महात्मा गाँधी दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में काम करते हुए इस आंतरिक उपनिवेश की असली चुनौती और उसके खतरों को गहराई से समझ रहे थे। बाहरी उपनिवेश से तो राजनीतिक औजारों से निपटा जा सकता है लेकिन आंतरिक उपनिवेश से निपटने के लिए अपनी जातीय संस्कृति के स्मृतिकोश से चयनित तत्त्वों से विनिर्मित कारगर सांस्कृतिक औजार की ही जरूरत हुआ करती है। हमारे जातीय संस्कृति के स्मृतिकोश में वैसे भी आत्मविरोधी तत्त्वों की भरमार है ऊपर से उस कोश में औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा फैलाये गये प्रदूषणों के कारण उस समय आंतरिक उपनिवेश की चुनौती और भी बढ़ गई थी। यह भी कि आंतरिक उपनिवेश की स्थिति बाहरी उपनिवेश के लिए प्रभावी जगह बना रही थी। महात्मा गाँधी और प्रेमचंद दोनों ही इससे अच्छी तरह से अवगत थे। प्रेमचंद के भौतिक और सर्जनात्मक जीवन काल में ही मुख्य रूप से महत्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता के लिए महान ऐतिहासिक जनसंग्राम हुआ। यह जनस्वतंत्रता संग्राम आंतरिक और बाहरी दोनों ही प्रकार के उपनिवेश के विरूद्ध था। स्वराज से किसका हित होगा इस पर प्रेमचंद ने हंस के अप्रैल 1930 के अंक में लिखा : इसमें संदेह नहीं कि स्वराज का आंदोलन गरीब, किसानों का आंदोलन है। लेकिन इस जनस्वतंत्रता संग्राम की कतिपय सीमाओं को खुद महात्मा गाँधी भी अच्छी तरह समझ रहे थे और प्रेमचंद भी समझ रहे थे। दोनों को ही भय था कि कहीं मि. जॅान की जगह सेठ गोबिंदी के आ जाने तक का ही आधार बनकर यह जनसंग्राम न रह जाये। और हम पाते हैं कि दुर्भाग्य से लगभग घटित भी यही हुआ।

इधर अंतर्राष्ट्रीय आवारा पूँजीवाद के गर्भ से निकले बाजारवाद के संपोषण के लिए नई आर्थिक नीति के नाम पर जारी तथाकथित उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की खतरनाक प्रक्रिया ने हमारे दुर्भाग्य को और बढ़ा दिया है। हम फिर नये सिरे से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उपनिवेश में बदलते जा रहे हैं और आंतरिक उपनिवेश की भी नई प्रक्रिया बड़ी तेजी से जारी है। दस-बीस करोड़ भारतीय शेष अस्सी-नब्बे करोड़ भारतीयों का अपना उपनिवेश बनाने पर आमदा हैं। इस तरह से प्रेमचंद के समय के सवाल और हमारे समय के सवाल के बुनियादी चरित्र में कोई बहुत वस्तुगत अंतर प्रतीत नहीं होता है। जो अंतर है वह कुछ तो संरचनागत कारणों से है और कुछ उन में विकसित हो गये नये परिप्रेक्ष्य के कारणों से है और कुछ विकास के नये संदर्भों से नये सिरे से जनमी समस्याओं से है। बहरहाल, ये सवाल क्या हैं? और प्रेमचंद ने इसे किस रूप में देखा था और रचनात्मक स्तर पर उससे निपटने की कैसी कोशिश प्रेमचंद ने की थी यह जानना न सिर्फ दिलचस्प ही होगा बल्कि शिक्षाप्रद भी हो सकता है। प्रेमचंद जैसे महान सांस्कृतिक व्यक्तित्व के संदर्भ से अपने समय के सवालों पर विमर्श करना कोई आसान काम नहीं है। यद्यपि यहाँ विस्तार में जाने की बहुत गुंजाइश भी नहीं है और मुझ जैसे उनके साधारण पाठक में न तो इसके लिए क्षमता ही है तथापि कुछ सवालों पर विचार किया ही जा सकता है और आगे अपेक्षित गंभीरता एवं विस्तार से अधिकारी विद्वानों द्वारा विचार किये जाने की जरूरत को यहाँ रेखांकित करने की पाठकीय कोशिश तो अवश्य ही की जा सकती है। इसी कोशिश के प्रस्ताव के रूप में इस प्रयास को देखा जाना चाहिए।

नारी अस्मिता और मुक्ति का सवाल प्रेमचंद के समय का भी महत्त्वपूर्ण सवाल था और हमारे समय का भी महत्त्वपूर्ण सवाल है । प्रेमचंद नारी अस्मिता के सवालों से पूरी तरह वाकिफ थे यह कहने की जरूरत नहीं है।प्रेमचंद नारी मुक्ति के आकांक्षी थे यह कोई कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है; और भी महत्त्वपूर्ण यह है कि प्रेमचंद नारी को और उसकी अस्मिता से जुड़े सामाजिक सवालों को जीवन और परिवार के साथ जोड़कर देखने और उसी की परिधि में उन सवालों के जवाब तलाशे जाने के महत्त्व को जानते थे। प्रेमचंद समझते थे और ठीक ही समझते थे कि नारी मुक्ति का सवाल कोई अलग सवाल नहीं है बल्कि समग्र सामाजिक मुक्ति के स्वप्न से जुड़ा हुआ सवाल है। बड़े घर की बेटी में पारिवारिक द्वंद्व का जिस प्रकार समाधान होता है, उसे ध्यान में रखा जा सकता है। अलग्योझा, पूस की एक रात, पंच परमेश्वर, जुलूस आदि कहानियों और उनके उपन्यासों के नारी चरित्रों के गठन को ध्यान में रखा जा सकता है। उनके नारी चरित्र पुरूष चरित्र की अपेक्षा अधिक प्रखर, प्रभावी, प्रगतिशील, केंद्रीय और मुखर है। प्रसंगवश, हमारे समय में इस सवाल के संदर्भ में प्रेमचंद की विरासत के असली दावेदारों का ख्याल आज अवश्य ही उन से बहुत ही भिन्न है। अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता के नाम पर वे अपने जनवाद को महाजनवाद में तब्दील करते हुए खूबसूरत दुश्मन के साथ होने सोने में नारी अस्मिता और मुक्ति के सवाल का हल तलाश करते रहते हैं और हमारे जैसे साधारण पाठक इस पूरे प्रसंग में अपने आपको अजनबी और छला हुआ महसूस करने लगता है। छल यह कि इस प्रकार के आचरण से असली सवाल ही गायब हो जाते हैं। छल यह कि जब पाश्चात्य जगत में परिवार के बिखरे हुए तंतुओं को फिर से जोड़ने के लिए आंदोलन हो रहे हैं हमारे परिवार के अब तक बचे हुए तंतुओं को फिर से सँजोने की कोशिश करने के बदले उन्हें उलझाया और विनष्ट किया जा रहा है। ऐसे में पाठकों को प्रेमचंद की बहुत याद आती है। प्रेमचंद का महत्त्व याद आने के इस निहितार्थ को समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार, दलित संदर्भ से प्रेमचंद साहित्य पर विचार किये जाने पर हम सहज ही लक्षित कर सकते हैं कि प्रेमचंद दलितों और पिछड़ों के सवाल को भी उतने ही महत्त्वपूर्ण ढंग से समझ रहे थे और उसके रचनात्मक वितान का संवेदनात्मक आधार तैयार कर रहे थे। प्रेमचंद दलितों और पिछड़ों के सवाल को भी शेष समाज से अलग मानकर नहीं चलते थे। उनके दलित और पिछड़े चरित्र गैर दलित और अगड़े चरित्रों की तुलना में अधिक मानवीय, कारुणिक और तार्किक हैं, प्रतिरोधी और मुखर भी। डॉ. रामविलास शर्मा ने ध्यान दिलाया है कि यद्यपि विभिन्न पेशा के आधार पर जाति के गठन की सामाजिक जाति व्यवस्था रही है लेकिन किसानी जैसे महत्त्वपूर्ण काम को किसी एक जाति से नहीं जोड़ा गया है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि जिसे वास्तव में जमींदारी और जिसे किसानी कहते हैं उस जमींदारी और उस किसानी से समाज के किस-किस तबके और जाति के लोग व्यावहारिक और कार्मिक स्तर पर जुड़े रहे हैं। अब अगर प्रेमचंद जमींदारों से अधिक किसानों को अपनी संवेदना से सींचते हैं तो क्या यह अलग से कहने की जगह बची ही रह जाती है कि वे दलितों और पिछड़ों के सामाजिक विकास के पक्षधर और किसी भी स्तर पर उनके शोषण के प्रखर विरोधी थे। सद्गति, मुक्तिमार्ग, ठाकुर का कुआँ, पूस की एक रात, कफन आदि कहानियाँ और होरी, हीरा, गोबर, धनिया, सिलिया, सूरदास, घीसू, माधो जैसे अगणित चरित्र का गठन क्या कहता है? एक कुलीन स्त्री कुएँ पर पानी भरने गई थी। संयोगवश वह कुएँ में गिर पड़ी। वहाँ खड़ी भीड़ में इतना साहस नहीं था कि कि कोई कुएँ में उतर पाता। हरिजन के कुएँ में उतरने से पानी अपवित्र हो जाता! परिणामत: वह महिला कुएँ में ही डूब कर मर गई।14 मई 1933 को प्रेमचंद ने इस पर हिमाकत की हद शीर्षक छोटी-सी टिप्पणी लिखी, ठाकुर का कुआँ के साथ इस टिप्पणी को पढ़ने से उनकी दृष्टि का पता चलता है। अपने समय में हम पाते हैं कि भारतीय संविधान में प्रदत्त कतिपय प्रतिश्रुतियाँ जनता को हासिल नहीं हो पाई है और समग्र रूप से आम आदमी अपने को इस व्यवस्था में ठगा हुआ महसूस करता है, लेकिन इसका कारण वही है जिसका डर महात्मा गाँधी और प्रेमचंद दोनो को था। मि. जॉन की जगह सेठ गोबिंदी का बैठ जाना ।

आजादी की लड़ाई के नतीजे को लेकर प्रेमचंद क्यों आशंकित थे? यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल हो सकता है।अप्रैल 1930 की उनकी टिप्पणी आजादी की लड़ाई गौर करने लायक है। अजादी की लड़ाई में कौन लोग आगे हैं? इस पर विचार करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं : इस लड़ाई ने हमारे कॉलेजों और युनिवर्सिटियों की कलई खोल दी। हमने आशा की थी कि जैसे अन्य देशों में ऐसी लड़ाइयों में छात्रवर्ग प्रमुख भाग लिया करते हैं, वैसे यहाँ भी होगा; पर ऐसा नहीं हुआ। हमारा शिक्षित समुदाय, चाहे वह सरकारी नौकर हो, या वकील, या पोफेसर, या छात्र, सभी अंग्रेजी सरकार को अपना इष्ट समझते हैं और उनकी हडि्डयों पर दौड़ने को तैयार रहते हैं। प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि निन्यानबे सैकड़े ग्रेजुएटों के लिए सभी द्वार बंद हैं; पर निराशा में भी आशा लगाये बैठे हैं कि शायद हमारी ही तकदीर जग जाये। देख रहे हैं, कि काँग्रेस के आंदोलन से ही अब थोड़े-से ऊँचे ओहदे हिंदुस्तानियों को मिलने लगे हैं, फिर भी राजनीति को हौआ समझ बैठे हुए हैं। या तो उनमें साहस नहीं, या शक्ति नहीं, या आत्म-गौरव नहीं, उत्साह नहीं। जिस देश के शिक्षित युवक इतने मंदोत्साह हों, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं कहा जा सकता। आज के शिक्षित लोगों के रवैये से इसे मिलाकर देखने से कैसा दृश्य उभरता है? कैसा दीखता है भविष्य?

आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बजारवाद का घमासान छिड़ा हुआ है। तरह-तरह के विचार हैं इस को लेकर। इस प्रसंग में प्रेमचंद के क्या विचार हो सकते हैं? देखये 28 अगस्त 1933 की उनकी टिप्पणी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बंद कर दो : फोर्टनाइटली रिविउ विलायत का प्रतिष्ठित पाक्षिक पत्र है। उसमें एक अंग्रेज अर्थशास्त्री ने यह विचार प्रकट किया है कि वर्तमान मंदी का मुख्य कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार है। फोर्टनाइटली रिविउ में एक अंग्रेज अर्थशास्त्री के इस लेख पर प्रेमचंद की टिप्पणी गौर करने लायक है कहीं ऐसा हो जाये, तो भारत मूसलों ढोल बजायवे। हाँ इंग्लैंड के लिए यह पतन का दिन होगा। लेकिन प्रेमचंद जानते थे कि ऐसा होने नहीं जा रहा है क्योंकि उन्हें (अंग्रेजों को ) तो घन चाहिए, धन के लिए माल की खपत होना जरूरी है, और माल की खपत के लिए निर्बल देशों का होना लाजिमी है। मात्रात्मक प्रतिबंध हट जाने के बाद डंपिंग की आनेवाली समस्या से प्रेमचंद की इस राय को मिला कर पढ़ने से क्या यह आज भी उतना ही प्रासंगिक नहीं लगता है!

सांप्रदायिकता हमारे समय का मारक सवाल है, प्रेमचंद के समय में यह समस्या और भी जटिल थी। प्रेमचंद क्या सोचते थे? देखना चाहिए 18 दिसंबर 1933 की उनकी टिप्पणी सांप्रदायिक समस्या का राष्ट्रीय समन्वय। डॉ. इकबाल और नेहरू जी के संबंधित बहस में हस्तक्षेप करते हुए प्रेमचंद संस्कृति क्या है पर विचार करते हैं। और कहते हैं कि हमारे इस ख्याल में संस्कृति के दो रूप हैं, एक बाह्य जगत से संबंध रखनेवाली, दूसरीअंतर्जगत से। बाह्य संस्कृति का संबंध भाषा, पहनावा, शिष्टाचार , शादी-व्यवहार आदि से है आंतरिक संबंध धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों से है। इस कसौटी पर मुसलिम संस्कृति को कसिये तो मालूम होगा कि प्रत्येक प्रांत में हिंदू और मुसलिम जनता की भाषा एक है, पहनावा एक है, शादी-ब्याह की परिपाटी भी एक है। अवध या बुंदेलखंड के किसी मुसलिम या हिंदू किसान में ऐसा कोई अंतर न मिलेगा, जो एक को दूसरे से अलग कर सके। और आंतरिक विभिन्नता तो इससे भी कम है। जीवन के विषय में दोनों का दृष्टिकोण एक है, दोनों धार्मिक हैं, दोनों ही भाग्यवादी हैं, दोनों ही शांतिप्रिय हैं, दोनों ही संतोषी हैं। आगे वे लिखते हैं हाँ इधर कुछ दिनों से दोनों ओर से मौलवी और पंडित सांप्रदायिक मनोवृत्तियों को जगाने की चेष्टा कर रहे हैं।

आजादी की लड़ाई में पाकिस्तान का संदर्भ उभर आया था। इस महाविपत्ति की परिणति देश के विभाजन में हुई। इस विभाजन के दंश से हम आज भी उबर नहीं पाये हैं। इस ऐतिहासिक प्रसंग पर 14 मई 1933 की प्रेमचंद की टिप्पणह याद किये जाने लायक है। पाकिस्तान की नई उपज : डॉ. सर मुहम्मद इकबाल पच्छिम में मुसलिम राज्य का स्वप्न देख रहे हैं। अब उनके भी उस्ताद निकल आये हैं वह पाकिस्तान के नाम से एक मुसलिम साम्राज्य का स्वप्न देख र हे हैं। इस पाकिस्तान में कश्मीर, पंजाब, बलोचिस्तान, सीमाप्रांत और अफगानिस्तान आदि सम्मिलित होंगे और वह भारतवर्ष से बिल्कुल पृथक होगा। आविष्कारक महोदय का कथन है कि इन पांतों में तीन करोड़ मुसलमान आबाद हैं, जो हालैंड, स्पेन, बेलजियम आदि देशों से अधिक है। उधर ईरान, तुर्किस्तान, शाम, इराक, मिस्र, तुर्की मुसलिम रियासतें पहले से हैं। यह पाकिस्तान सूबा उनके साथ मिल गया, तो एक महान मुसलिम साम्राज्य का उदय हो जायेगा और इसलाम के इतिहास में जो बात पहले कभी नहीं हुई थी, वह हो जायेगी! बात तो बहुत अच्छी है; पर कुछ कारण ही तो है कि अभी तक तुर्की और ईरान में मेल नहीं हो सका। मेल का जिक्र ही क्या अभी थोड़े दिन पहले वैमनस्य हो गया था। फिर अफगानिस्तान क्यों नहीं तुर्की से जा मिला! र्अैर तुर्किस्तान को अफगानिस्तान से मिलने में कौन बाधक हो रहा है! अगर धर्म ही राष्ट्रों को मिला दिया करता तो जर्मनी और फ्रांस और इटली आदि राष्ट्र कब के मिल चुके होते।

प्रेमचंद के दृष्टिकोण में सराहनीय संतुलन का समावेश मिलता है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की किताब साहित्य मंडल देहली ने इसलाम का विष-वृक्ष नाम से प्रकाशित की थी । प्रेमचंद ने उस पर 24 जुलाई 1933 को तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा श्री चतुरसेन जी हमारे मित्र हैं। वह विद्वान हैं, मनस्वी हैं, उदार हैं, हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि ऐसी जटिल और द्रोहभरी रचनाएँ लिखकर, अपनी प्रतिभा को और हिंदी भाषा को कलंकित न करें और राष्ट्र में जो द्वेष और दोष पहले से ही फैला हुआ है, उस बारूद में आग नलगावें। हिंदी भाषा को कलंक से बचाने के लिए प्रेमचंद की चिंता उत्प्रेरक होनी चाहिए। हमारे समय के हिंदी प्रेमी आचार्य और शास्त्री क्या हिंदी भाषा के कलंक और गौरव के संदर्भ में क्या सोचते है, विचार करना चाहिए।

सूचना विस्फोट और शताधिक दरदर्शन चैनलों के साथ इक्कीसवीं सदी में हम आये हैं। प्रेमचंद के समय न तो सूचना का विस्फोट था और न ही जनता के मनोरंजन के लिए इतने सारे चैनल थे, तो भला इसमामले में प्रेमचंद के क्या विचार हो सकते हैं? लेकिन प्रेमचंद के विचार हैं और बड़े गंभीर हैं! देखिये 22 जनवरी 1934 की टिप्पणी देहातों पर दया-दृष्टि। कर्नल हार्डिंग गाँवों में ब्रॉडकास्टिंग के प्रचार का प्रयास कर रहे थे। इसी संदर्भ में प्रेमचंद की यह टिप्पणी है। मिलाइये अपने समय के दूरदर्शन चैनलों के वर्तमान और आशंकित प्रचार-प्रसार की नीति से। टिप्पणी का एक अंश : बिल्ली बख्शे, मुर्गा लंडूरा ही रहेगा। जिनके पास न खाने को अन्न है और न पहनने को वस्त्र, वह बाडकास्टिंग सुनकर अपना मनोरंजन न करेंगे तो कौन करेगा? व्यापार चलाने की कितनी बढ़िया नीति है। यह व्यापारी मानवी प्रकृति की दुर्बलताओं को खूब समझते हैं और खूब अपना मतलब गाँठते हैं। मनोविज्ञान उनकी व्यवसाय-बुद्धि का मुख्य साधन है। कल्लोंच से कल्लोंच आदमी में भी आमोद-विनोद की प्रवृत्ति होती है। यह व्यवसायी उसी स्थल पर अपना निशाना लगाता है और शिकार मार लेता है। हम जानते हैं कि अमेरीका जैसे देश की राष्ट्रीय आय का बड़ा जरिया यह मनोरंजन उद्योग ही है।


कृपया निम्नलिखित लिंक देखें :
1.नई गुलामी और प्रेमचंद



सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़ि

सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़िः किरणजीक प्रगतिशीलता
प्रगतिशीलता आ किरणजी/ प्रितमान, पटना'क आयोजन दिनांक 25-26 नवंबर 2006 मे पढ़ल आलेख
प्रगतिशीलता: किछु सामान्य प्रसंग 

सभ्यताक मूल्यबोध
सभ्यता मानव जीवनक निरंतर विकसनशील आधारशिला होइ छै। सभ्यताक विकास सामाजिक विकासक रूप मे प्रकट होइ छै। सामाजिक विकासक क्रम मे संबंध तंतु बदलैत रहै छै। समाजक संघटन में अनुस्यूत संबंध-तंतु मे भ रहल बदलाव के संभव करवा मे  सांस्कृतिक आर दार्शनिक मूल्यक रूप मे प्रगतिशीलताक अपन महत्त्व छै। सामान्य रूप सँ कहल जा सकैत अछि जे कोनो समाज में प्रगतिगामी एवं प्रतिगामी, दुनू प्रवृत्ति सक्रिय रहै छै। सभ्यताक इतिहास एहि बातक साक्षी अछि जे सभ्यता विकासक प्रत्येक चरण मे प्रगतिशील शक्ति के, पूर्ण विजय त नहिं, मुदा सक्षम बढ़त अवश्ये हासिल होइत रहल छै। मानि लेबा में कोनो आपैत नहिं जे पारंपरिक रूप सँ ई दुनू प्रवृत्ति अपन सक्रियताक अधिकांश मे सचेतन नहिं होइ छै। सामाजिक सचेतनताक सही दिशा मे संप्रसारक लेल प्रगतिशील प्रवृत्तिक लोक सक्रिय रहैत छैथ। जत सँ एहि मे सचेतनता क प्रवेश होइ छै आ जाहि मात्रा मे होइ छै, ओतहिं सँ आ ओहि अनुपात मे द्वंद्व सामाजिक चिंतनक फरीक बनै छै। एहि द्वंद्वक तीव्रताक अनुपाते प्रगतिशीलता क तत्त्व एवं अंतर्वस्तु मे गुणात्मक बदलाव लक्षित हुअ लगै छै। ई बदलाव सामाजिक बदलावक रूप मे चिन्हार होइ छै।

चेतन आ अचेतनक आनुपातिक क्रम चाहे जे होइ, समाज बदलावक प्रक्रिया हरदम जारी रहै छै। समाज बदलावक एहि प्रक्रिया मे राजनीति प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूप सँ निश्चिते सक्रिय रहै छै। सामाजिक बदलावक रूप के चिन्हक ओकरा आकांक्षित रूप आ गति देनाइ मुख्यत: राजनीतिक प्रक्रिया होइ छै। ताञ, सामाजिक बदलाव आर्थात मानवीय संबंध आ सरोकार में सकरात्मक बदलावक मूल्य समुच्चयक रूप मे प्रगतिशीलताक राजनीतिक रूप के बुझनाइ जरूरी भ जाइ छै। राजनीति निरपेक्ष सांस्कृतिक स्वायत्तताक सवाल उदात्त एवं अपन भावना प्रधान उच्चाशय एवं तेजस्विताक संग बेर-बेर उपस्थित होइ छै। रोजी-रोटी समेत जीवनक समस्त आधारभूत प्रसंग मे स्वायत्तताक दर्शन कें स्थगित एवं राजनीतिक परिप्रेक्ष्य सँ नियमित होइत देखि सांस्कृतिक स्वायत्तताक सवाल आ तर्क स्वत: निस्तेज भ जाइ छै। स्वभावत: प्रगतिशीलताक राजनीतिक आयामकेँ अस्वीकारक धूर्त्तताकेँ एक दोसर तरहक राजनीतिक प्रसंगक  रूप मे बूझल जा सकैत अछि। तात्पर्य ई जे वास्तव मे सांस्कृतिक प्रवाह, सामाजिक यथार्थ, संघर्ष आ स्वप्नक संश्लेष सँ राजनीति के सावधानीपूर्वक जोड़िक प्रगतिशीलताकेँ बुझनाइ जरूरी। संक्षेपे मे सही मुदा, ई साफ करैक दरकार बुझना जाइत अछि जे प्रगतिशीलता समाजक अन्य उद्यमशीलता एवं वास्तविकता के अन-अन्य एवं अविच्छेद्य रूपमे स्वीकार करै छै आ एकरा बीच मे अंत:सक्रिय अंतनिर्भरताक आधार एवं तत्त्व के पोसैत छै। समाज विकासक मूलाधारक नवोन्मेष के मुख्य रूप सँ सचेत राजनीति पुनर्संयोजित करैत अछि आ सचेत साहित्य एहि पुनर्संयोजनक सामाजिक स्वीकृति लेल समाजक मन मे नव जगह बनबैत अछि। प्रगतिशीलताक मूल आशयकेँ देशकालक राजनीति एवं संस्कृति सँ निरपेक्ष स्वायत्तता मे नहिं, बरन राजनीति आ संस्कृतिकक सापेक्ष अंतर्निर्भरता के स्वीकार कइएक हासिल कएल जा सकै छै। 
समाज, स्वप्न, संघर्ष आ संघात
प्रत्येक समाजक विकास भिन्न ऐतिहासिक परिस्थति मे होइ छै। ऐतिहासिक परिस्थितिक भिन्नता प्रथमत: समाजक बाह्य यथार्थ के आ अंतत: किछु दूर तक ओकर आंतरिक चरित्रकेँ भिन्न-भिन्न स्वरूप प्रदान क दै छै। बाह्य यथार्थ आ आंतरिक चरित्रक भिन्नता कइएक बेर समाजक अपन वैशिष्ट्यक रूप मे स्वीकृति पबै छै। एहि वैशिष्ट्य मे समाजक अस्मिताक आधार बनवाक तीव्र प्रवणता होइ छै। अस्मिताक आधारक रूप मे स्वीकृति पाबिक ई वैशिष्ट्य कइएक बेर सामाजिक स्वप्नक हिस्सा बनि जाइ छै। एहि स्वप्न मे समाजक सब अवयवक लेल समुचित स्थानक अभाव सँ सामाजिक संघर्ष आ संघात तकक वातावरण बनि जाइ छै। अंतरविभंजित समाज मे सामाजिक संघर्ष आ संघातक वातावरण अपेक्षाकृत अधिक आसानी सँ बनि जाइ छै। सभ्यता संघर्ष आ संघातक ई प्रक्रिया समाजक बाह्य-भूमिक निषेघ त करिते छै सामाजिक अंत:करणमे एहेन अनिवार्य दुर्घर्ष संकोचन उत्पन्न करैत छै जे अंतत: `सामाजिक ब्लैक' होल के रूप मे प्रकट होइ छै। समाजक प्रगतिशील चेतना आ मूल्यबोधक अधिकांश एहि `सामाजिक ब्लैक होल' मे समाहित भ निरर्थक भ जाइ छै। ताञ, प्रगतिशील चेतना आ मूल्यबोध सभ्यताक आधारशिलाक संघाती रेखा (Fault Line) आ  सामाजिक ब्लैक होलक खतरा के नीक जकाँ चिन्हैक कोशिश करै छै। अंत:करण केँ रणभूमि मे बदलि गेनाइ सँ पैघ दोसर कोनो दुर्घटना सामाजिक जीवनमे नहिं भ सकै छै! स्वभावत: प्रगतिशील मूल्यबोध अपन संघात-समंजन (Conflict Management) क आंतरिक शक्तिक आधार पर स्वप्न, संघर्ष आ संघातमे सामंजस्यक संधान करै छै। एहि संधानक क्रममे प्रगतिशीलता समाजक बाह्य-भूमि सँ निषेधक संबंधकेँ बदलि सहकारक संबंध विकसित करैत सामाजिक अंत:करणकेँ अंतर्बाधित रणभूमि  सँ बदलि वास्तविक रूपेँ निर्बाध जनभूमि (Public Sphere) मे बदलवाक चेष्टा करै छै। रणभूमिकेँ जनभूमि मे बदलनाइ प्रगतिशीलताक प्राथमिक दायित्व होइ छै। ई गप्प दोसर जे शोषण पर आधारित समाज मे रणभूमिकेँ जनभूमि मे बदलबाक प्रक्रिया कइएक बेर दुनिर्वार रणप्रक्रियाक अनिवार्य रूप मे प्रकट होइ छै।

ध्यान देबाक कथा ई जे प्रत्येक समाजमे सामाजिक यथार्थ आ मूल्यबोधक भिन्नताक आधार पर प्रगतिशीलताक अंतर्वस्तुमे सेहो गुणात्मक अंतर होइ छै। हम ई विशेष रूप सँ ध्यान मे लाब चाहै छी जे व्यवहारत: मैथिल समाजक, आ ताञ मैथिली साहित्योक, प्रगतिशीलताक गुणात्मकता कोनो अन्य समाज आ साहित्यक प्रगतिशीलताक गुणात्मकता सँ तुलनीय त निश्चिते भ सकै छै मुदा कोनो हालतमे अन्य समाज आ साहित्यक प्रगतिशीलताक गुणात्मकता एकरा लेल अनिवार्य निकष नहिं भ सकै छै। दोहराक आ फरिछाक कह चाहै छी जे, अन्य समाज आ साहित्यक प्रगतिशीलताक गुणात्मकता मैथिल समाज आ मैथिली साहित्यक प्रगतिशीलताक गुणात्मकताक मान निर्धारणक निकष नहिं भ सकै छै। प्रगतिशील चिंता आ चेतना सँ संपन्न विद्वान लोकनि द्वारा अतीत मे एहि तरहक कएल आर बेर-बेर दोहराओल गेल गलती के बुझबाक आ ओहि सँ साग्रह बचबाक रास्ता तकबाक चाही। प्रगतिशीलताक मैथिल संस्करणक संधान एक तरहक सांस्कृतिक दायित्व अछि। ध्यानमे इहो रखनाइ जरूरी जे प्रगतिशीलतामे वैज्ञानिकताक तत्त्व सक्रिय रहै छै। ई वैज्ञानिक युग थिक। एहि बात के हम अधिक साफ-साफ बुझि सकै छी जे साहित्यमे वैज्ञानिकता आ वैज्ञानिक सिद्धांत निर्धारणक प्रक्रिया भौतिक विज्ञान सँ मौलिक रूपेँ भिन्न होइत छैक। हमरा ई कहबाक जोखिम उठाब दिअ जे आइ जीवन विज्ञान सँ खाली समृद्धे नहिं अछि अपितु वैज्ञानिक समृद्धि सँ शतश: आक्रांत सेहो अछि। हमरा मन मे बेर-बेर ई प्रश्न उठैत अछि जे सामाजिक जीवनक प्रत्येक क्षेत्रमे विज्ञानक संपूर्ण दखल किए हेबाक चाही ! शेष सृष्टि आ समतमूलक सामाजिकता सँ मानव संबंधक मधुरता एवं दृढ़ताक विकासमे जते दूर तक सहायक ओते दूर तक वैज्ञानिकता निश्चिते स्वीकार्य। मुदा जीवनक आनंद सब समय वैज्ञानिक मनोभाव सँ उपलब्ध नहियो भ सकै छै। ई बूझबा आ मानबा मे कोनो आइ भाँगठ नहिं होएबाक चाही जे वैज्ञानिक दृष्टि सँ कमला-बलान आन छैथ, साहित्यिक आ संस्कृतिक दृष्टि सँ आन छैथ!

साहित्यक अपन एकटा भिन्न विज्ञान होइत छैक। एहि वक्तव्यकेँ अहाँ सभक समक्ष रखैत हम नीक जकाँ बूझि रहल छी जे एहि संदर्भ मे बहुत रास एहनो प्रश्न उठि सकै छै जेकर त्वरित समाधान एहि सभामे संभव नहिं। हमरा विश्वास अछि जे कोनो सभाक सार्थकता प्रश्नक समाधान हासिल होएबा पर त निर्भर करिते छै, नव समाधानक माँग करैत हासिल होबवाला अनुत्तरित सन रहि गेल प्रश्नो पर सेहो कनेमने निर्भर करै छै। एहि संदर्भ मे एतबा आँकि रखनाइ जरूरी जे विज्ञानक सत्य अपना आपमे ब्रह्मांडीय (Genaral आ Universal) होइत छैक साहित्यक सत्य पींडीय (Individual आ Unique) होइत छैक। विज्ञानक मौलिक प्रक्रिया वि-अवयवीकरणक (Exclusionक) होइ छै जखैन कि साहित्यक मौलिक प्रक्रिया अवयवीकरणक (Inclusionक) होइ छै। सोचबाक गप्प जे, भूखक, शोषणक अर्थ, हत्या, अन्यायक जे अर्थ विज्ञानमे होइ छै उएह आर ओतबे अर्थ की साहित्यो मे होइ छै? जाबे तक प्रगतिशील मूल्यबोध अपन संघात-समंजनक (Conflict Management) आंतरिक शक्तिक आधार पर स्वप्न, संघर्ष आ संघातमे सामंजस्यक संधान आ संस्थापन नहिं क लैत अछि ताबे तक प्रगतिशीलताक ऊपर वैज्ञनिकताक जानमारा लदनी करैत चलि गेनाई कतेक उचित से अवश्ये विचारणीय। एत एकटा भयंकर दुश्चक्र छै। दुश्चक्र ई जे वैज्ञानिकताक बिना संघात-समंजन संभव नहिं आ संघात-समंजन भेने बिना प्रगतिशीलतामे वैज्ञानिकताक आत्मिक विकासक समायोजन संभव नहिं। एहि दुश्चक्र के शुभचक्र मे बदलल जा सकै छै। कोना? एहि पर विचार आवश्यक; अखन नहिं त कखनो। अनुभवमे हेबे करत जे जाबे नीक विचार अपन डाँड़ सोझ करै छै, ताबे अधलाह विचार भरि गाम बुलि बैन द अबै छै।
मूल्य, बासन आ वस्तु
प्रगतिशीलताक अंतर्वस्तु समाज विकासक विभिन्न चरण मे भिन्न-भिन्न बासन मे हासिल होइ छै। विद्यापतिक साहित्यकेँ प्रगतिशील अंतर्वस्तुक लेल जे बासन उपलब्ध छलै उएह बासन डा. काञ्चीनाथ झा `किरण'जी क साहित्यक लेल उपयुक्त नहिं भ सकै छलै। स्वभावत: प्रगतिशीलताक जे बासन किरणजीक लेल उपयुक्त छलनि उएह बासनकेँ हुनक समकालीन वा परवर्त्ती साहित्यकार सभक लेल उपुक्त नहिंयो भ सकबाक गुंजाइश सदिखन बाँचल रहि जाइत अछि। प्रश्न उठि सकै छै जे प्रगतिशीलता वैयक्तिक मूल्य होइ छै आकि सामाजिक ? संक्षेप मे कह चाहै छी जे शास्त्रीय रूप सँ प्रगतिशीलता सामाजिक आ सामान्य मूल्य होइ छै मुदा जीवन मे ओकर प्रतिफलन वैयक्तिक होइ छै। समाज सँ व्यक्ति तकक यात्रा करैत प्रगतिशीलता मे सामाजिकक संगहिं वैयक्तिकताक प्रवेश होइ छै। साहित्य सँ जुड़ल लोककेँ ई बुझ पड़तै जे साहित्य विचार संचालित होइतो मुख्यत: भाव प्रेरित होइत छै। हिंदी कवि मुक्तिबोधक संदर्भ लैत कह चाहै छी जे साहित्यकेँ `विचारधाराक' संगहिं `भावधाराक' सम्मान करबाके चाही। मध्यकाल में भावनाक अनुरूपेँ भगवानक मूरत देखैक अवसर छलै। प्रगतिशील विचारकेँ भावनाक लेल एतेक जगह सुरक्षित रखबाके चाही। बासनक भिन्नता सँ वस्तु नहिं बदलि जाइ छै मुदा ई सभक अनुभव मे अछि जे भावना मे अंतर वस्तुक ग्रहणीयता मे अंतर आनि दैत छै। एकटा आरो तथ्यक ध्यान रखनाइ आवश्यक जे प्रगतिशीलताक पाट बड़ चौड़ा और चंचल होइ छै। जेना कमला अपन पाट आ बाट बदलैत एलीहे तहिना प्रगतिशीलताक पाट आ बाट सेहो बदलैत रहल छै। ताञ, प्रगतिशीलताक कोनो एकहि संस्करण के प्रामाणिक मानिक साहित्यक मूल्यांकन वा प्रगतिशील मूल्यक अन्वेषण ठीक नहिं। ई ठीक जे क्रंाति किस्त मे नहिं होइत छै, मुदा सर्वोच्च सामाजिक मूल्यक रूपमेँ प्रारंभे मे प्रगतिशीलताक साहित्य मे उपलब्धि कठिन आ कखनो समाज मे अंतर्घातक सेहो भ जाइ छै। समाज घोड़ा सँ बेसी ताँगाक कुदनाइ केँ कखनो नीक दृष्टि सँ नहिं देखैत छैक --- व्यंग्य करैत छैक जे घोड़ा नञ, कूदे ताँगा! सामाजिक उपलब्धि सँ बहुत बेसी मात्रा आ गुणत्मकता मे प्रगतिशीलताक साहित्य मे उपलब्धि साहित्यक सामाजिक स्वीकार्यता के अंतत: बाधिते करैत छै।

किरणजीक साहित्यमे प्रगतिशीलताक संधान मे ई ध्यानमे रखनाइ जरूरी जे विद्यापति साहित्यकेँ किरणजी उचिते मूल्यवान मानैत छलाह। परंपरा सँ संवाद करबाक किरणजीक कौशल सँ हुनकर प्रगतिशीलताक किछु आयाम अवश्ये स्पष्ट होइत अछि। किरणजी परंपराक पानि मे `परसल माए पाय तुअ पानि' क सावधानी आ क्षमायाची मुद्राक संग उतरैत छथि। विद्यापतिक संबंध मे बेसी किछु कहबाक ई अवसर नहिं तैयो कहबाक अनुमति चाहब जे विद्यापति नवजागरणक पहिल उत्तर-भारतीय स्वर छलाह। भारतीय नवजागरणकेँ अंग्रेजक शासन आ प्रभाव सँ जोड़िक देखल जाइ छै। तखन विद्यापति मे नवजागरणक तत्त्व के तकनाइ कि अगिया बेतालक काज? औपनिवेशिक मानसिकता सँ मुक्त भ नवजागरणक धाराक उत्सकेँ, चाहे ओ अपना गोमुख पर कतबो क्षीण वा अस्पष्ट किएक नहिं होइ, फेर सँ तकबाक चाही। ई ताकुत एहि दुआरे जरूरी जे विद्यापति सँ नावजागरणक जे आकांक्षा फूटल छलै ओकर विस्तार आ विस्फोटकेँ 1857क सामुदायिक एकता आ सक्रियता सँ जोड़िक देखल जा सकै छै। 1857क बाद नवजागरणक ओहि आकांक्षा पर औपनिवेशिक शक्ति अपन कब्जा जमा लेलक। एहि कब्जाक बाद, सुनियोजित ढंग सँ एकटा एहेन नवजागरणकेँ प्रोत्साहित कएल गेलै जाहि मे पुनर्जागरणक तत्त्व अधिक प्रमुखता सँ विकसित भेलै। नतीजाकेँ देश-विभाजनक रूप मे देखल जा सकै छै। देखल जा सकै छै जे जहिना असली राष्ट्रवादकेँ स्थानापन्न, अर्थात कुत्सित, राष्ट्रवाद सँ बदलि देल गेलै,  तहिना असली नवजागरणकेँ स्थानापन्न, अर्थात कुत्सित, नवजागरण सँ बदलि देल गेलै। औपनिवेशिकता सँ अभिप्रेरित स्थानापन्न राष्ट्रवादक लेल ई स्थानापन्न नवजागरण बहुत सहायक भेलै। प्रसंगवश, अखन तक आलोचना भक्तिकेँ धर्म क पसिरक भीतरक घटना मानैत एबाक गलतीकेँ दोहरबैत आयल अछि। धर्मकेँ रहितौँ जँ भक्तिक सामाजिक आवश्यकता उपस्थित भेलै त निश्चिते रूप सँ भक्ति धर्मक परिसर सँ बाहरक एवं बाहर होइत जेबाक घटना थीक। एत, विद्यापतिक संदर्भ में ई कहनाइ जरूरी जे ओ अपन इष्ट के पतिभाव सँ कबीर, सखाभाव सँ सूरदास, दासभाव सँ तुलसीदास जकाँ नहिं बरन, सेवकभाव सँ उगना रूप मे सुमिरैत छथि। उग्रनाथक उग्रता के सैंतक उगना मे तत्त्वांतरण ओहि युगक एक क्रांतिकारी दुस्साहस के रूप मे चिन्हल जा सकैत अछि। बूझल जा सकैत अछि जे भक्तिक बासन मे विद्यापतिक वस्तु कोन रूपे प्रगतिशील छल। भक्ति साहित्य मूलत: सामंतवाद आ ताञ पुरोहितवाद सँ टकराक प्रस्फुटित भेल छल, मुदा आगाँ चलिक सामंतवाद आ ओकर पुरोहितवाद भक्तिकेँ अपना कब्जा मे ललेलक। एहि सांस्कृतिक संघर्ष आ वर्चस्वकेँ बुझ पड़त। मिथकक विनियोग मे विद्यापतिक काव्य-भंगिमा किरणजीक सामाजिक दृष्टिकेँ आकार दैत अछि। 

किरणजीक साहित्य आ समाजक दृष्टि मूलत: नवजागरणक अंतर्वस्तु सँ बनल छैन। सामाजिक संबंध मे बदलावक लेल समाजक संरचनागत मूल्यबोधक पुनर्निर्माण नवजागरणक मौलिक माँग के रूप मे चिन्हल जा सकै छै। प्रगतिशीलताक एक संस्करण, समाजक संरचनागत मूल्यबोधक पुनर्निर्माण मे नहिं संपूर्ण बदलाव मे विश्वास करै छै। ध्यान देब जोगरक बात ई जे `पुनर्निर्माणकेँ' अपनेआप मे `बदलाव'क दिशा मे उठाओल गेल महत्त्वपूर्ण डेग क रूप मे स्वीकार कयल जा सकै छै। हालाँकि, एहि स्वीकारमे प्रगतिशीलताक आधिकरिक संस्करण सदैव संकोची रहल अछि। असल मे, सामाजिक संरचनागत मूल्यबोधक `पुनर्निर्माण' आ `बदलाव' मे गंभीर आ सातत्यमूलक संबंध होइ छै। `पुनर्निर्माण' आ `बदलाव' मे कोनो अनिवार्य तत्त्वगत अंतर्विरोध नहिं होइ छै, कम-सँ-कम प्रारंभिक अवस्था मे नहिं होइ छै। किरणजीक प्रगतिशील चेतना के बरोबरि पुनर्निर्माणक आंतरिक दबाव सँ गुजर पड़लै। एहि दबावक कारणेँ किरणजी परंपराक प्रामाणिक पाठ तैयार करबा में अपन अनुसंधित्सु वृत्ति के सदिखन जोतने रह पड़लैन। प्रगतिशील चिंतनधारा सँ प्रतिबद्ध लोककेँ आइ एहि निश्च्छल आत्मस्वीकारक आवश्यकता महसूस हेबाक चाही जे प्रगतिशील चिंतनधाराक मुख्य ऊर्जाक अधिकांशकेँ  `पुनर्निर्माण' आ `बदलाव'क तत्त्वगत संबंध संस्थापन मे नहिं खरचि, संबंध-विच्छेद मे खरचबाक गलती दोहराएल गेल छै। सहजेँ लक्षित कएल जा सकै छै जे, जाहि समाज मे नवजागरणक अंतर्वस्तुक संस्थापन जते दूर तक भेनाई संभव भेलै ओहि समज मे प्रगतिशीलताक लेल ओहि अनुपात मे स्थान बनलै। किरणजी वस्तुत: विद्यापतिक साहित्य मे उठल नवजागरणक प्रश्न के अपना समय मे फेर सँ संबोधित छलाह। ई बात जरूर जे विद्यापतिक समय मे एहि प्रश्नक जे जटिलता छलै ताहि सँ बहुत बेसी जटिलता किरणजीक समय मे आबि गेल छलै। जाहि सामाजक मूल प्रश्नक सुनवाईकेँ बहुत दिन तक स्थगन मे रह पड़ै छै ओहि समाजक प्रश्न-ग्रंथि त ओहिना चोटाएल भ जाइ छै। किरणजीकेँ मैथिल समाजक चोटायल प्रश्न-ग्रंथिक रूप मे चिन्हल जा सकै छैन्ह। कबीर साहित्य के `फोकट का माल' वा `घेलुआ' कहि हजारी प्रसाद द्विवेदी जे गलती कयलनि हम ओहि तरहक गलती करैत ई त नहिं कहि सकै छी जे किरणजीक साहित्य हुनकर क्षमता वा अवदानक लावादुआ अछि, तहन, ई जरूर कह चाहैत छी जे किरणजीक साहित्यक महत्त्व हुनकर सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्निर्माण क उद्यमक भाव-साक्ष्य हेबा मे छै। सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्निर्माणक उद्यम हुनकर मुख्य अवदान अछि। एहि उद्यमक भाव-साक्ष्य साहित्यक दृष्टि निर्माणक एक महत्त्वपूर्ण मैथिल आधार भ सकै छै। 

किरणजीक साहित्य मे प्रगतिशीलताक विनियोग

साहित्य मे शिव
मिथ जातीय स्वप्न आ चेतनाक संपुट होयबाक दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण होइ छै। सांस्कृतिक यथार्थ के अभिव्यक्त करबा लेल मिथ बहुत उपयोगी होइ छै। एहि उपयोग मे जोखिमो कम नहिं होइ छै। महादेव मैथिल चेतनाक अभिव्यक्तिक महत्त्वपूर्ण आलंबन छथि। भक्ति आ पूजाक अंतर के ध्यान मे रखबाक आग्रह करैत कह चाहब जे भक्तिकाल मे पाथर पूजन के बेर-बेर प्रश्न-बिद्ध कयल गेल छै। जाबे तक पाथर पूजनक पद्धति जारी रहतै ताबे तक ओ नाना प्रकार सँ प्रश्न-बिद्ध होइत रहत। किरणजी सेहो पूछनाइ नहिं बिसरैत छथि जे `बनैत छै, भोज्य पदार्थ / तै लोढ़ी सिलौटकेँ ओंघड़ाय / मंदिर मे पड़ल निरर्थक / पाषाण पिंडकेँ क्यो की करैत प्रणाम'1। एक स्तर पर ई प्रश्न अछि त दोसर स्तर पर ओ महादेवक मिथकीय रूप केँ मानवीयकरण एवं जन-एकताक साक्षात रूप मे सेहो स्थापित करै छथि, `हे नकुल! कुल मूलक अहंकारकेँ तोड़निहार / छी अहाँ जन-एकता सकार'2।

कलियुगक संताप सँ त्रस्त एवं सतयुगक गुणगान मे लागल मैथिल समाज मे किरणजी कलियुगक समर्थन करै छथि। ककरा कहल जाय छै कलियुग, की छै कलियुगक लक्षण! डॉ. रामशरण शर्मा कहै छथि जे `ईसाक बादक तेसर शताब्दीक अंतिम चतुर्थांश सँ चारिम शताब्दीक प्रथम चतुर्थांशक पौराणिक पाठ्यांश सब सँ पता चलै छै जे आंतरिक संकटक कारण वर्णव्यवस्था मे टूट होम लागल छलै। एहि अवस्थाकेँ कलियुगक संज्ञा देल गेलै। कलि सँ लोकक उद्धार केनाइ राजाक पुनीत कर्त्तव्य बनि गेलै। ईसाक बादक 4 सँ  6 शताब्दीक अभिलेख सबमे स्पष्ट रूप सँ आर बादक पुरा लेख सबमे पारंपरिक रूप सँ राजाके वर्णधर्मक पोषक मानल गेल छै। पल्लव राजा सिंहवर्मनकेँ `कलियुग दोषावसन्न – धर्मोद्धारेण सन्नद्ध' (कलियुगक दोख सँ अवसन्न धर्मक उद्धारक वास्ते सन्नद्ध) विशेषणक प्रयोग कएल गेल छै।'3 `वर्णधर्मक पोषक' यदि राजा छलाह त ई निश्चते जे `वर्णधर्मक पोषण' राजनीतिक काज छल। किरणजी एहि राजनीतिक कार्यकेँ बुझैत कलियुगक समर्थन करै छथि। `कलि' क अर्थ `वर्णधर्म' मुक्त जन लेबाक चाही आ ताञ `कलियुग'क अर्थ `जनयुग' लेबक चाही। एहेन जनयुग जाहि मे, `सभकेँ भेटत विकासक अवसर / हेतै असली गुणक समादर / क्यो नहि बनतै भूदेव न डोम / केवल मानव / अप्पन भाग्य विधाता मानव / जै युगमे से मानव युग / असली सतयुग आबि रहल अछि / ई मानव कवि अपन धर्म बुझि / ओकरे स्वागत गाबि रहल अछि।'4 एहि तरहेँ किरणजी असली सतयुग के जनयुगक रूपमे चिन्है छथि। ध्यान सँ देखला सँ नवजागरण क पीड़ा एहि मानव धर्मक जन्मक प्रसव पीड़ा सँ उपमित बुझायत। अपना समय मे चंडीदास, रवींन्द्रनाथ समेत नवजागरणक बुद्धि पर्व एहि मानव धर्मक मर्म के बुझने रहए। किरणजी सेहो अपना समय मे एहि मानव धर्मक जन्मक सोहर गबैत छथि। जाञ `वर्णधर्मक पोषण' राजनीतिक काज छल, ताञ मानव धर्मक जन्म सेहो राजनीतिके कार्य भ सकैत छल।

परंपराक समझ आ प्रगतिशील तत्त्वक नवोन्मेषण क उद्यम प्रमुख सांस्कृतिक दायित्व होइत छैक। संस्कृति मे पुनर्नवीकरणक आत्म-प्रक्रिया सतत जारी रहैत छैक। अपना समयमे विद्यापति नवताक आकांक्षा व्यक्त करैत पुनर्नवा संस्कृति के नित-नित नूतन होयबाक प्रक्रिया के चिन्हने रहैथ। किरणजीक साहित्य मे एहि नवताक प्रसार समाजमे होयबाक आकांक्षा अंतस्सलिला के रूपमे सर्वत्र भेट सकैत अछि। परंपराक जटायल सूत्र के सोझरबैत ओ प्रगतिकारी सामाजिक संरचना के महत्त्व के बूझि सकैत छलाह। 
खंडित समाज मे 
स्वतंत्रता-समानता-सहोदरता-प्रगतिशीलता
किरणजीक जन्म 1906 मे भेल छलैन। ई बात रेखांकित भेल अछि जे 1930 अर्थात 24 बरखक वयस मे बनारस प्रवासक दौरान हुनकर व्यक्तित्व मे एकटा पैघ परिवर्तन भेलैन। इएह परिवर्तन किरणजीक व्यक्तित्वक स्थाई आ मूल्यवान रूप के गठित केलकैन। 1930 तक भारतीय राजनीतिक स्वाधीनता आंदोलन जनआंदोलन में बदलि चुकल छल। प्रगतिशील आंदोलनक सुगठित वा संगठित रूप प्रकट नहिं भेल छल। मुदा, परंपरा आ आधुनिकता मे संवाद आ कखनो-कखनो संघात सेहो उपस्थित भेनाइ प्रारंभ भ चुकल छल। हिंदी मे जयशंकर प्रसादक `कामायनी' आ प्रेमचंदक `गोदान'क लेखन नहिं भेल छल। प्रगतिशील लेखक संघ वा PWA  क गठन नहिं भेल छल। स्वाधीनता आंदोलनक ऊपरी चरित्र गाँधीवादी विचार दर्शन सँ संघटित छल। गाँधी दर्शनक औजार-पाती मध्यकालक मूल्यबोध सँ बनल छलैक। मध्यकालक मूल्यबोध सेहो अपना समयक परंपरा सँ टकराक विकसित भेल छल आ गाँधी जीक समय मे अपने परंपरा बनि गेल छल। मुदा ई ध्यान मे रखनाइ आवश्यक जे स्वाधीनता आंदोलनक ऊपरी चरित्रक अंत:करण मे विकसित भेल मूल्यबोध अपन बनावट मे बहुत अधिक संश्लिष्ट छलैक। एहि संश्लेषक एक रूपकेँ नेहरूक उपस्थितिक आलोक मे पढ़ल जा सकैत अछि। रूपक मे अपन बात कहबा मे किछु सुविधा होइत छै, त किछु जोखिम सेहो रहै छै। जोखिम उठाक सुविधा लैत कह चाहै छी जे गाँधी जी भारतीय स्वाधानीता आंदोलनक परंपरा पक्ष, त नेहरू जी ओकर प्रगति पक्ष छलाह। 1930 तक पाकिस्तानक माँग उठि चुकल छल, दलित एवं पिछड़ल समाज आजाद होइत भारत मे अपन स्थितिक विषय मे चिंतित छल। गाँधीजीक हरिजन प्रेम अखन पूर्ण रूप सँ सामने नहिं आयल छल। आजाद भारत मे देसी राज-रजवाड़क होबवाला स्थिति बहुत साफ नहिं भेल छलै। औपनिवेशिकताक अंत आ जनतंत्रक आविर्भावक क्षीण संभावना इतिहासक सतह पर उभरि रहल छलै। किरणजी क लेल आजादीक अर्थ एक स्तरीय नहिं बहुस्तरीय रहैन। ओ ब्रिटिश शासन सँ आजादीक संगे मिथलाक राजतंत्र सँ मुक्तिकक मर्म के सेहो बुझैत छलाह, `विश्व के थर्रा रहल अछि, एक जर्मनकेर सिपाही / हस्तगत अछि एक व्यक्तिक, आइ रोमक बादशाही / कर्म्मबलसँ एक कुल्ली, ब्रिटिसकेर साम्राज्य साजल / तही ब्रिटिसक दास नृपतिक हम रहै छी पाछु लागल / धिक्धिगति ओहि बुद्धिकेँ जे लोककेँ कायर बनाबै / त्यागि उद्यम, पेट हेतुक, भीख खुस-आमद सिखाबै / उठू मैथिल युवक, युगमे कर्मयोगक शंख बाजल / विश्वविजयी संगठन बल पाबि जनता सैन्य साजल / रहि सकल नहिं जारसाही मूल सह सुलतान गेला / जनमतक प्रतिकूल चलि इंगलैंडपति पेरिस पड़ैला / नव युगोदय भेल अछि, नरनाथ छथि नर-नाथ लागल / एहू जनतातंत्र युगमे ``किरण'' की रहबे अभागल'5। 

विद्यापतिक भूमिक भौतिक, राजनीतिक विपन्नता त अपना जगह सांस्कृतिक धरोहर आ बौद्धिक प्रखरताक निस्तेज भ गेनाइ किरणजीकेँ मर्माहत करैत छैन। जे संतति अपन वर्तमान के नहिं बचा सकैत अछि ओ अपन प्रांजल अतीतो सँ पे्ररणा नहिं लय सकैत अछि, किरणजी एहि सत्य के नीक जकाँ बुझैत छलाह। मुदा एतबा बुझनाई पर्याप्त नहिं, किरणजी एहि बात के सेहो बुझैत छलाह। से जँ नहिं बुझितैथ तँ ओहो इतिहासेक गली मे बौआइत रहितैथ। ओहि युग मे अतीतक पुनर्गठन एकटा सामान्य प्रवृति छल। बहुत रास लोक एहि अतीतक खोज मे अति प्राचीनकाल तकक यात्रा पर निकलला जाहि मे सँ बहुतोक वर्तमान मे वापसी संभव नहिं भेलनि। किरणजीक अपन चेतनाक संग विद्यापति तक पहुँचि अपन वर्तमान आ भविष्य तक निरंतर यात्रा करैत छथि। अतीत, वर्तमान आ भविष्य क ई त्वरित आवा-जाहीक क्षमता किरणजीक प्रगतिशीलताक पुष्ट प्रमाण अछि। ओ विद्यापति तक पहुँचै छैथ मुदा ओत बस लेल नहिं। बरन, विद्यापतिकेँ अपना देशकाल मे अयबाक नोत देबाक बास्ते ओ विद्यापति तक पहुँचै छैथ। विद्यापति के अपना एहि ठाम बजेबा मे हुनका मर्मांतक संकोच होइत छैन। एहि संकोचक मर्मकेँ उपलब्ध केनाई मैथिल समाजक लेल आइयो कठिनाह अछि, `अछि सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़ि बहय। / मधु-कानन के सुकुमार सखा कविकोकिल, हाय, बजाउ कतय? / ..../ मिथला-मृदु-भाषा-काननमे, अपने जे रोपल काव्यलता / छल, टूटि पड़ल बंगीय भ्रमर, जनि देखि मनोहर मंजुलता / अछि सूखि रहलि से भूमि खसलि, आसार बिना आधार बिना। / नव कोरक हाय, फलैत कोना ? जननी तनमे रसधार बिना?'6  

सामाजिक परिवर्त्तनक स्वाभाविक प्रक्रियाक अंतर्गत नव परिस्थति मे संवेदनात्मक आकांक्षाक संधान आ नव स्वप्नक सामाजिक संस्थापन किरणजीक साहित्यकेँ महत्त्वपूर्ण बनबैत छैन। किरणजीक साहित्य मे तत्कालीन भारत मे चलि रहल राजनीतिक संघर्षक सामाजिक प्रतिफलनक स्वप्न केँ सामाजिक संवेदना सँ जोड़बाक कौशल छैन। महत्त्वपूर्ण ई जे संगहि मैथिल अस्मिताक स्वायत्तताक प्रति संवेदनप्रवण सजगता सेहो छैन (`कतेक दिनक बाद / उगल छी हे मिहिर मिथिलाकेर / छलहुँ कतय नुकैल?/ ... अथवा धयले छलहुँ की राजनैतिक कोनो पार्टी / जाहिसँ पदलोभ रोगग्रस्त / छलहुँ की भय गेल ? आ ताञ छल भेल बाँतर / मिथलाक सङ सम्बन्ध ? / हम व्याकुलमना औनाइत / नोरायल नयने छलहुँ बाट तकैत चारुकात। / अछि अनेको सूर्य्य जगमे / बड़का टटा, बड़ तेज / मुदा हमर गोसाउनिक सीर लग घेंसिऐल / हृदयक ग्रहमे सन्हिऐल / जे अन्हार अछि तकरा / कय नहि सकैत दूर आन `प्रकाश' / व्यर्थ भय रहलैन, जीवन-यत्न / `योगी' महात्माकेर। / अहाँ छी अप्पन सहोदर। / एक जीवन स्रोत / एक लक्ष्य पुनीत / केहनो रहत तन / पुष्ट वा दुबरैल / मैल वा माजल सजावल / हमर शोणित-स्नेह / अहाँकेर पाथेय बनैक निमित्त / अछि सतत तैयार।'7 एहि भाव-सघन आ विचारपुष्ट काव्यांश के बेर-बेर ध्यान सँ पढ़नाइ आवश्यक अछि। राजनीतिक लोकक प्रति किरणजीक ई सोचनाई जे `अथवा धयले छलहुँ की राजनैतिक कोनो पार्टी / जाहिसँ पदलोभ रोगग्रस्त / छलहुँ की भय गेल ? आ तञ छल भेल बाँतर / मिथलाक सङ सम्बन्ध ?' पुनर्विचारक अपेक्षा रखैत अछि। ई अपेक्षा आर गंभीर बुझना जाएत यदि एकरे संगे इहो ध्यान मे राखि सकी जे, `अछि अनेको सूर्य्य जगमे / बड़का टटा, बड़ तेज / मुदा हमर गोसाउनिक सीर लग घेंसिऐल / हृदयक ग्रहमे सन्हिऐल / जे अन्हार अछि तकरा / कय नहि सकैत दूर आन `प्रकाश' '। एहि `आन प्रकाश' के चिन्ह पड़त। `आन प्रकाश'क अर्थकेँ `व्यर्थ भय रहलैन, जीवन-यत्न / `योगी' महात्माकेर।' के बुझने बिना खोलल, अर्थात डिकोड नहिं कएल जा सकैत अछि। `मिहिर मिथिलाकेर' के छलाह वा छैथ सेहो ठीक केनाई जरूरी। वर्ग विभाजित समाज मे नहिं त प्रगतिशीलता आ स्वतंत्रता अखंडित रहि सकैत अछि आ नञ समता आ सहोदरताक भावे अखंडित रहि सकैत अछि। किरणजी मैथिल समाजक पुनर्गठनक लेल स्वप्नशील छलाह। मैथिल समाज जाति-पाँति, जाति-पाँजि, सोति-भलमानुष-जबार, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, धर्म-संप्रदाय सँ घनघोर आत्म-विखंडनक अवस्था मे छल। आत्म-विखंडनक ई स्थिति सामाजिक पनुर्गठन मे पैघ बाधक छलै। आ ताञ किरणजी जाति-पाँतिक, जाति-पाँजिक, सोति-भलमानुष-जबारक, ऊँच-नीचक, धनी-निर्धनक, धर्म-संप्रदायक विरुद्ध छलाह। किरणजीक समाजिक समयक सीमाकेँ ध्यान मे नहिं रखनाई अन्याय होएत। हम आइ सर्वत्र हुनका सँ अनिवार्यत: सहमते होइ, से आवश्यक नहिं। कतौ-कतौ कोनो तात्कालिक दबाव हुनका इतिहासक गलत व्याख्या तक सेहो ल गेल छैन, हालाँकि एहेन अपवादे स्वरूप भेल छै, मुदा भेल छै, जेना, 1956 मे रचित आ कविता संग्रह `कतेक दिन बाद' मे संकलित कविता `ताजमहल'। तात्कालिकताक कोनो दुर्वह दबाव मे इतिहासक गलत समझ पर लिखल कविता क अपवादात्मक उदाहरण बुझना जाइत अछि। 

किरणजीक व्यक्तित्वक नाभिकीय बिंदु हुनकर आंदोलन धर्मिता में छैन। किरणजी सन आंदोलनधर्मी रचनाकारक प्रगतिशीलता साहित्यक गुणक रूप मे बाद मे पठनीय होइत छैक, पहिने पठनीय होइत छैक आंदोलन कर्म मे। आंदोलन आ रचनाक संबंध दू कोण सँ बूझल जा सकैत अछि। अधिसंख्य रचनाकरक प्रगतिशीलताकेँ रचना मे पढ़ल जा सकै छै। बहुत कम रचनाकरक प्रगतिशीलताकेँ आंदोलन कर्मक धधकैत आलोक मे पढ़ल जा सकै छै। किरणजीक प्रगतिशीलताकेँ धधकैत आलोके मे पढ़ल जा सकै छै। किरणजीक आंदोलन कर्म के बुझवा लेल हुनकर काव्य सँ पर्याप्त प्रकाश भेटनाइ संभव नहि। वस्तुत:, किरणजीक आंदोलनधर्मिता हुनक साहित्य के बुझवाक हुनर द सकैत अछि। एहि लेल किरणजीक प्रामाणिक जीवनी के तैयार केनाई जरूरी। एहि सँ हुनकर अवदानक त पता चलबे करत संगहिं बीसम सदी मे मिथिलांचल मे चलल सामाजिक आंदोलन आ मैथिल नवजागरण  आंदोलनक किछु सूत्र केँ सेहो पकड़ल जा सकैत अछि। `अछि सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़ि बहय' मैथिल जीवनक संगहिं किरणजीक व्यक्तिगतो जीवनक व्यथाक कथा कहैत अछि। एहेन व्यथाग्रस्त जीवन मे प्रगतिशीलताक रक्षा, प्राणरक्षे टा सँ समतुल्य भ संभव भ सकैत अछि।

बीसम सदी मे प्रगतिशीलताक रक्षा मे सक्रिय संगठन आ विचारधाराक द्वंद्व के बुझबा मे सेहो किरणजीक संघर्ष सँ मददि भेट सकैत अछि आ एक्कैसम सदी मे एहि दिशा मे होमवाला संभावित प्रयासकेँ सेहो मददि भेट सकैत अछि। ध्यान मे अछि जे प्रगतिशील विचारधारा मे स्वभावत: वैज्ञानिकताक आग्रह रहै छै। धर्म आ विज्ञान मे एकटा अंतर ई कहल जाइत छैक जे धर्म मे पूर्व प्रमाण होइत छैक जखन कि विज्ञान मे उत्तर प्रमाण होइत छैक। प्रगतिशीलतोक संदर्भ मे पूर्व नहिं उत्तर प्रमाण होइ छै। किरणजीक प्रगतिशीलता के बूझब आ बचायब आ ताहू सँ बेसी आगू बढ़ायब आइ एक महत्त्वपूर्ण दायित्व अछि। किरणजीक प्रगतिशीलता केँ अजुका मैथिल समाजक आ टटका मैथिली साहित्यक प्रगतिशील अवस्थाक आलोक मे पढ़नाई अधिक जरूरी अछि। किछु शुभ छै, त किछु अशुभ छै, मुदा ई सत्य जे उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरणक समय मे जखन राजनीतिक राष्ट्र प्रत्याहार-सन्निपात (Withdrawal Syndrome)सँ ग्रस्त भ रहल अछि, दुनियाक सामाजिकता सब मे अपन पुनर्गठनक ललक फेर जोर पकड़ि रहल छै। मैथिल समाज मे अपन पुनर्गठनक कतेक ज्ञान, इच्छा आ क्रिया सक्रिय भ सकतैक से अवश्ये चिंता आ चिंतनक विषय। स्वतंत्रता-समानता-सहोदरता-प्रगतिशीलता अखंडित आ अविभाज्य मूल्य होइ छै। खंडित समाज मे त एकर सपनो अखंडित नहिं रहि पबैत छै। ताञ, आइ नहिं, काल्हि मैथिल समाजकेँ खत्तो उपछ पड़तै आ माछो मार पड़तै। विश्वास अछि, जे जहिया कहियो मैथिल समाज नवोन्मेषक आंतरिक प्रक्रिया सँ गुजरबाक बास्ते राजनीतिक रूप सँ अपन अस्मिता केँ पुनर्गठित करबा लेल डाँड़ कसत ओकरा किरणजीक सांस्कृतिक प्रगतिशीलता एक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप मे प्रतीक्षा करैत अवश्ये भेटतै। किरणजीक सांस्कृतिक प्रगतिशीलता महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप मे, सभा मे जँ नहिंयो भेटै त मार्ग मे अवश्ये भेटतै। 

कृपया, निम्नलिखित लिंक देखीः
1. अस्मिता क्या और क्यों pdf
2. कबीर साहित्य पर विचार pdf
3.धर्मनिरपेक्ष राज्य और धर्म पर आधारित समाज pdf
4.सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़ि

1.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः माटिक महादेव, 1956
2.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः जय महादेव, 1956
3.रामशरण शर्माः प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संसथाएँ : परिशिष्ट-2, गोपति से भूपतिः राजकमल प्रकाशन, 5वीं आवृत्ति 2001
3.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः सतयुग, 1955
4.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः , 1956
5.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः युवक सँ, 1939
6.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः विद्यापति, 1940
7.डॉ काञ्चीनाथ झा 'किरण': कतेक दिनक बादः कतेक दिनक बाद (रचनाकाल अनुल्लिखित)

असंतोष और आलोचना के बीच आम चुनाव


जनतंत्र में जनप्रतिनिधियों के चुनाव का अपना महत्त्व होता है। 2014 में लोक सभा का आमचुनाव होना है। सब की निगाह इस चुनाव पर लगी हुई है। चुनाव के माध्यम से ही जनता अपनी पसंद के उम्मीदवारों का चयन कर जनतंत्र में अपनी भागीदारी पूरा करता है। चुनाव में उसके किये फैसले का उसकी जिंदगी के बहुत सारे मसलों पर सीधा और प्रभावकारी असर पड़ता है। यह ठीक है कि चालू जनतांत्रिक व्यवस्था में असंतोष और आलोचना के कई जायज बिंदु हैं, फिर भी इसका कोई विकल्प नहीं है। इसलिए आम चुनाव के अवसर पर इस जनतांत्रिक व्यवस्था कि विभिन्न पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है।
 
भारतीय जनतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं। हालाँकि, यह भी सच है कि इसकी जड़ें जितनी गहरी हैं इसके फल भी उतनी ही ऊँचाई पर लगते हैं! कई बार वहाँ तक सब की पहुँच नहीं बन पाती है। जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, इस जनतांत्रिक व्यवस्था की कई सीमाएँ हैं, जिनके प्रति लोगों के मन में भारी असंतोष भी है और जिनकी कड़ी आलोचना भी की जा सकती है। बावजूद इसके हमारा जनतंत्र हमारे लिए सबसे बड़ा आश्वासन भी है। इसलिए किसी भी तरह से इसके महत्त्व को कम करके आँकना ठीक नहीं है। जो लोग इसी जनतंत्र की प्रक्रिया के सहारे सत्ता के शिखर पर पहुँचने की कोशिश करते और पहुँचते हैं, वे लोग भी कभी अनजाने और कभी जानबूझकर शरारतन, इसकी खिल्ली उड़ाते हैं। यह ठीक नहीं है। असल में, हमारा सत्ता समूह जनतंत्र की प्रक्रिया को सत्ता हासिल करने से सीमित करके देखने के बौद्धिक दिवालियेपन की तरफ बहुत तेजी से बढ़ रहा है। जनतंत्र की प्रक्रिया में सत्ता हासिल करने का माध्यम निर्वाचन होता है। जाहिर है, जब जनतंत्र की प्रक्रिया को सत्ता हासिल करने से सीमित कर दिया जायेगा तो जनतंत्र निर्वाचन की प्रक्रिया में सिमट कर रह जायेगा। ऐसे में स्वाभाविक रूप से वोटबैंक की राजनीति अपनी पूरी विद्रूपता के साथ चल निकलती है।

भारत गणराज्य की आंतरिक संरचना में परिलक्षित हो रहे परिवर्त्तन के संकेत और जनतंत्र के बदलते स्वरूप के कारण एक नई हलचल है। ऐसे में लोकसभा के लिए होनेवाली चुनावी प्रक्रिया के महत्त्व को समझे जाने की जरूरत है। इस पर बात करने के लिए जरूरी है कि भारत गणराज्य की आंतरिक संरचना में परिलक्षित हो रहे परिवर्त्तन के संकेत और जनतंत्र के बदलते स्वरूप को समझने की कोशिश की जाये। भारतीय गणराज्य का मूल स्वभाव संघात्मक है। इसकी नागरिकता भारतीय गणराज्य के द्वारा प्रदत्त और इसके नागरिक अधिकार की गारंटी भारतीय गणराज्य के द्वारा ही संरक्षित है। इसके साथ ही भारतीय गणराज्य संघात्मक भी है। नागरिक अधिकार समेत कानून व्यवस्था राज्यों के अधीन है। इधर यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है कि स्थानिकता के दबाव में अपने राज्य से बाहर रह कर छोटे-मोटे रोजगार और खुदरा कारोबार में लगे लोगों को निकृष्टतम अर्थों में अपने 'बाहरी' होने होने का भारी दबाव और दंश झेलना पड़ रहा है। राज्य सरकारें ऐसे ‘बाहरी’ लोगों की सामाजिक-आर्थिक समस्या से लगभग उदासीन रहती हैं या फिर स्थानीयता की ओर झुकी रहती हैं। इसका प्रमुख कारण चुनाव जीतने की तात्कालिकता का दबाव होता है। चुनाव जीतने की तात्कालिकता के भँवर में सारे राजनीतिक दल फँसे हुए हैं। जिनका दावा अपने राष्ट्रीय होने का है वे भी अपने चरित्र और व्यवहार में कोई भिन्न नहीं हैं। भारतीय गणराज्य के विन्यास को चुनाव जीतने की तात्कालिकता से गहरे झटके लग रहे हैं। इस बार के आम चुनाव में बदलाव की इस भाषा को पढ़ा जाना चाहिए। आज का हासिल भारत राष्ट्रवाद के उपकरणों से निर्मित है। बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद का जोर था जिसके तहत राष्ट्र एक संगठित इकाई की तरह आचरण करता था। इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रवाद को बाजारवाद बहुत तेजी से विस्थापित कर रहा है। जाहिर है राष्ट्र सिकुड़ रहा है और बाजार फैल रहा है। राष्ट्र के सिकुड़ने और बाजार के फैलने के इस संक्रमणकाल में राष्ट्रीय संरचना में अंदर-ही-अंदर बदलाव हो रहा है। यह माना जाना चाहिए कि राष्ट्र के सिकुड़ने और बाजार के फैलने से भारतीय गणराज्य की संघात्मकता में नये अंतर्विरोध और अंतर्घात की सक्रियता बढ़ रही है। अंतर्विरोध और अंतर्घात की इस बढ़ती हुई सक्रियता का ही नतीजा है कि दुनिया एक ध्रुवीय होती जा रही है और हमारा राष्ट्र अंदर से बहुध्रुवीय होता जा रहा है। किसी भी तरह के विभ्रम में पड़े बिना यह मानना ही होगा कि ऐतिहासिक रूप से बनी भारतीय बहुलात्मकता से यह नवविकासमान भारतीय बहुध्रुवीयता भिन्न प्रकार की ही नहीं, बल्कि विरोधी स्वभाव की भी है। ऐतिहासिक रूप से बनी भारतीय बहुलात्मकता में सांस्कृतिक और गहरे अर्थ में राजनीतिक प्रकृति की आंतरिक एकता और बाहरी अनेकात्मकता की स्थिति रही है, जबकि इस नवविकासमान भारतीय बहुध्रुवीयता में सांस्कृतिक और गहरे अर्थ में राजनीतिक प्रकृति की आंतरिक अनेकात्मकता और बाहरी एकता की स्थिति बन रही है। भारतीय गणराज्य ऊपर से एक दिखता हुआ भी तेजी से आंतरिक बिखराव की ओर बढ़ रहा है।




















ऐसे संरचनागत माहौल में 2014 में लोकसभा के लिए आम चुनाव होना है। हर बार के आम चुनाव का अपना महत्त्व होता है। इस बार के आम चुनाव का भी अपना महत्त्व है। निर्वाचन की राजनीतिक प्रक्रिया की गति तेज हो रही है। दल अपना-अपना कमान सम्हाल रहे हैं। गोटियाँ बिछाई जा रही है। संसदीय जनतंत्र के ढाँचे में राष्ट्रपति प्रणाली की आत्मा का प्रवेश इस चुनाव में साफ-साफ दिख रहा है। बहुदलीय व्यवस्था द्विदलीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है। ऐसा नहीं कि पहले कभी प्रधानमंत्री के मुद्दे पर चुनाव न हुए हों, लेकिन इतने जोर-शोर से पहली बार यह हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर ऐसा माहौल बनाया है जैसा माहौल अब तक शपथ ग्रहण समारोह के पहले हुआ करता था। उत्साह, युयुत्सा और उत्तेजना की पराकाष्ठा ऐसी कि जनमत के अभिव्यक्त होने देने के प्रति कोई सम्मान ही नहीं बच पा रहा है। प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार युद्धंदेहि की मुद्रा अपनाते हुए, पूरे देश में घूम-घूम कर भाषणों और घोषणाओं का निर्लज्ज तुमार इस तरह बाँध रहे हैं, जैसे किसी एक दल के द्वारा प्रधानमंत्री के घोषित उम्मीदवार नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री ही राष्ट्र को संबोधित कर रहे हों। सामूहिक नेतृत्व या संसदीय दल जैसी बातें निरर्थक हो गई प्रतीत होती हैं। यह सही है कि भारतीय जनतंत्र में व्यक्ति का महत्त्व हमेशा रहा है, लेकिन व्यक्ति ही सबकुछ है इसका इतना जबर्दस्त खुल्लम-खुल्ला आभास पहली बार दिया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी गुजरात नरसंहार और अपनी राजनीतिक अकड़ की पृष्ठभूमि को अपनी आभासी विजयी मुद्रा से ढकते हुए देश के सामने उपस्थित कठोर सवालों को बे-असर बना रहे हैं।
दूसरी तरफ, यह माहौल काँग्रेस के लिए भी राजनीतिक रूप से मुफीद ही है। क्योंकि, इस माहौल के कारण भ्रष्टाचार और आर्थिक मोर्चे पर काँग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में चल रही डॉ मनमोहन सिंह सरकार की गंभीर नाकामियों को ढक लेने की भरपूर गुंजाइश बन रही है। सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती हुई महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं तथा कमजोर नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा, नागरिक जीवन की आंतरिक व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दों पर बात करने का अवसर लगातार समाप्त होता जा रहा है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनानेवाले अध्यादेश और विधेयक को राहुल गाँधी के द्वारा अमान्य किये जाने के बाद सरकार का रवैया जिस तरह से सामने आया वह कुल मिलाकर भूल सुधार होने के बावजूद कुछ ऐसे सवाल भी छोड़ गया जिससे लोग हतप्रभ हैं। एक व्यक्ति की छवि चमकाने, उनकी समझ और पकड़ को झलकाने के लिए सरकार के सामूहिक निर्णय की पद्धति की संसदीय मार्यादा को इस तरह से नंगा किया जाना कोई शुभ संकेत नहीं है।
एक राज्य में प्रभाव रखनेवाले दल अखिल भारतीय दलों की राजनीतिक गतिविधियों को अपने ढंग से तौल रहे हैं। पिछले कई आम चुनावों के बाद सरकार चाहे जिस बड़े दल के नेतृत्व में गठित हुई हो, हर बार इनकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण रही है। इस बार, चुनाव नतीजों के सामने आने तक ऐसे दल अपनी स्थिति पर ही टिके रहेंगे। चुनाव के मैदान में आपसी समझऔर समझौता चाहे जो हो, औपचारिक रूप से भाजपा या काँग्रेस के नेतृत्ववाले किसी गठबंधन के साथ ये नहीं होंगे। ऐसी पूरी संभावना दिखती है कि ये दल अपने-अपने समीकरणों को दुरुस्त रखते हुए जिस भी गठबंधन के साथ हैं, वहाँ बने तो रहेंगे लेकिन इस राजनीतिक बोध के साथ कि सहयोगी हैं, अनुयायी नहीं। यानी, सत्ता की राजनीति में स्थायी दोस्त या स्थायी दुश्मन के बोध से मुक्त होकर राजनीतिक जरूरत के हिसाब से बेहिचक अपना पाला बदलने के लिए पूरी तरह से तैयार! स्वाभाविक है कि सरकार बनने की स्थिति साफ होगी नतीजे आने के बाद।


अभी तो बहुत सारे खेल होंगे। अभी चुनावी घोषणापत्र जारी किया जाना है। ऐसे मुद्दे भी सामने आ सकते हैं जो वोटरों के रुझान में थोड़ा-बहुत बदलाव ले आयें। फिर भी, एक बात तय है कि आपराधिक पृष्ठभूमि से मुक्त उम्मीदवारों की जो माँग भ्रष्टाचार विरोधी अण्णा आंदोलन से उभर कर जनभावना में परिणत हो गई है। कतिपय अदालती फैसलों तथा चुनाव में नकारात्मक वोट के विकल्प के लागू होने का प्रत्यक्ष से अधिक अप्रत्यक्ष असर अभी नवंबर-दिसंबर 2013 में होनेवाले पाँच राज्यों के चुनाव में तो होगा ही, 2014 के लोक सभा के आम चुनाव में भी होगा। राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों के चुनाव जीत सकने की संभावना का आकलन करते समय अपनी जीत को टिकाये रख पाने की उम्मीदवारों की योग्यता का भी आकलन जरूर करेंगे। आपराधिक पृष्ठभूमिवाले दलीय या निर्दलीय उम्मीदवार खुद भी अपनी जीत के बाद भी अयोग्य ठहरा दिये जाने के जोखिम के कारण चुनावी प्रक्रिया में होनेवाले भारी खर्च का जोखिम उठाने से बचेंगे।
यह ठीक है कि सरकार बनाने की स्थिति साफ होगी नतीजे आने के बाद, लेकिन जश्न का माहौल बिल्कुल साफ दिख रहा है। राजनीतिक विशलेषण से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर अनुमान लगाने से एक भिन्न प्रकार की ही तस्वीर उभर कर सामने आ रही है। भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। इसके बहुत ही क्षीण आसार हैं कि आम-चुनाव के नतीजों की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी अकेले बहुमत में आ जाये। सबसे बड़ा दल बनकर उभर सकने की संभावना भी बहुत ही क्षीण है। यह सच है कि मँहगाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता काँग्रेस के नेतृत्व में चल रही डॉ. मनमोहन सरकार से बहुत खुश नहीं है, लेकिन इन्हीं मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी से भी उसकी कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं है। दूसरी तरफ, आक्रामक हिंदुत्ववादी तेवर को ढीला करने पर वोटरों का एक वर्ग मतदान के पहले ही मोहभंग की स्थिति में पहुँच जायेगा। भारतीय जनता पार्टी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में यह जानती है कि आक्रामक हिंदुत्ववादी तेवर चुनाव के पहले के समीकरण को जो क्षति पहुँचाये लेकिन नतीजों के जाहिर होने के बाद वह अलग-थलग पड़ जायेगी। देवालय-शौचालय प्रसंग से साफ है कि नरेन्द्र मोदी भी इस बात को जानते और मानते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने मोदी पर अपना दाँव इसलिए लगाया है कि उसे अटलबिहारी बाजपेयी के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार या रमण सिंह और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्ववाली राज्य सरकारों जैसी नहीं बल्कि गुजरात मॉडलवाली नरेन्द्र मोदी सरकार जैसी केंद्र सरकार चाहिए। ऐसी केंद्र सरकार जो आक्रामक हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू कर सके। नहीं तो, लालकृष्ण आडवानी क्या बुरे थे! मोदी के सामने आक्रामक हिंदुत्ववादी तेवर को अपनाये रखने या छोड़कर आगे बढ़ने का भारी अंतर्घाती संकट है। आक्रामक हिंदुत्ववादी तेवर छोड़ते हैं तो चुनाव के पहले ही समर्थकों में शिथिलता आ जायेगी जिसकी भरपाई करने के लिए उनके पास मुट्ठी भर समर्थक तो हो सकते हैं, लेकिन कोई मेकेनिज्म नहीं है। आक्रामक हिंदुत्ववादी तेवर नहीं छोड़ते हैं तो चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में उनकी स्वीकार्यता के समीकरण गड़बड़ायेंगे। भारतीय जनता पार्टी के ही किसी दूसरे आदमी के नाम पर मोदी जैसी अकड़वाला आदमी कभी तैयार नहीं होगा। यह भी साफ है कि बहुमत होने के पुख्ता प्रमाण के बिना राष्ट्रपति सरकार गठन के लिए आमंत्रित करेंगे नहीं। नतीजा यह कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना बहुत क्षीण है।

काँग्रेस ने प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। उसे ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है। तीसरी बार डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के आसार बिल्कुल ही नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी से पाँच-दस सीट अधिक भले ही काँग्रेस जीत ले जाये लेकिन अकेले दम पर सरकार बनाने की बात इसके लिए भी उतनी ही अकल्पनीय है। ऐसे में काँग्रेस उन सहयोगियों की तलाश करेगी जो राहुल गाँधी के नाम पर तैयार हों। काँग्रेस राहुल गाँधी की छवि चाहे जितना चमकाये लेकिन उनके नाम पर सहयोगियों को जुटाना काँग्रेस के लिए बहुत टेढ़ी खीर साबित होगा। नेहरू-गाँधी परिवार की काँग्रेस में चाहे जितनी भी धाक हो, काँग्रेस के बाहर के राजनीतिक दल राहुल गाँधी के नाम पर शायद ही अपना समर्थन दें। अपने अप्रासंगिक होते चले जाने के खतरे से बचने के लिए पचमढ़ी अधिवेशन के फैसले को दरकिनार करते हुए भले ही गठबंधन की राजनीतिक बाध्यताओं को स्वीकारना काँग्रेस ने सीख लिया हो लेकिन इसके बावजूद, नेहरू-गाँधी परिवार के किसी सदस्य को गठबंधन की राजनीतिक संभावनाओं के द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में सहज ही स्वीकारना आसान नहीं लगता है। फिर क्या उपाय है! कठिन मगर एक संभावना तो यही दिखती है कि काँग्रेस एक बार फिर सत्ता की राजनीति में चरण सिंह, चंद्रशेखर प्रयोग को दुहराने की तरफ बढ़ेगी। ऐसे में मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, मायावती जैसे नेताओं की बढ़ी हुई महत्त्वाकांक्षाएँ काँग्रेस के काम आ सकती हैं। मुलायम सिंह और मायावती की महत्त्वाकांक्षाएँ अगर परस्पर टकराती हैं तो नीतीश कुमार का रास्ता साफ हो सकता है, अन्यथा मुलायम सिंह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं। यह सब अनुमान ही है! अभी तो पाँच राज्यों में चुनाव होने हैं, घोषित कार्यक्रम के अनुसार 8 दिसंबर को परिणाम घोषित होंगे इससे भी मतदाताओं के रुझान का कुछ पता चलेगा। इस रुझान को चुनावी प्रचार में लगाने और भुनाने की कोशिश होगी। इसके थोड़े-बहुत असर से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। राष्ट्र के सिकुड़ते जाने और बाजार के फैलते जाने के इस संक्रमणकाल में इस आम चुनाव में जनता का फैसला बहुत ही महत्त्वपूर्ण साबित होनेवाला है। जनता का फैसला जो भी हो उसे सम्मानपूर्वक स्वीकारना ही जनतंत्र की बुनियादी माँग है।

कृपया, निम्नलिखित लिंक भी देखें :