जरूरी है देश

मूसलधार वर्षा के बाद उगी धूप में
खिलखिला उठती है बरसाती पनाली
जब किसी बूढ़े वृक्ष के बिछे हुए तने पर
फुदकते हुए पार हो जाती है नन्ही गिलहरी

सहम उठता है वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
आदमी और आदमी के बीच, आदमी और प्रकृति के बीच
अविश्वास का धुँआ, होता चला गया है इतना घना
कि वह अब, जोड़ने की किसी तमीज तक
उसे पहुँचाने में असमर्थ है, कि प्रकृति का समर्थ संकेत भी
आदमी के लिए व्यर्थ है

स्तब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
अब कोई मरणासन्न बूढ़ा, अपने बेटों को एकता का
पाठ पढ़ाने के बहाने, उसकी सूखी टहनियों को
जोड़कर एक नहीं करता

क्षुब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
दुनिया के विश्वग्राम में बदलते जाने पर वे भी
नाच में शामिल हैं,जिनका अपना गाँव
उजड़ गया है इस आँधी में

दुखी है, बहुत दुखी है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
उसने आदमी और आदमी के बीच बढ़ती दूरियाँ देखी हैं
संततियों के लगातार दूर होते जाने की
बनती मजबूरियाँ देखी है

बहुत परेशान है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
कोई ईश्वर नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई ग्रंथ नहीं,
कोई ज्ञान नहीं, कोई विज्ञान नहीं, कोई विवेक नहीं
जो एहसास करा सके आदमी को कि जब नैया डूबती है
तब बचते वे भी नहीं, जिनके पैर में
खूबसूरत, चमकदार, कीमती जूते होते हैं

जब डूबता है देश, तब डूब जाते हैं, सारे महेश-गणेश-सुरेश
इसलिए जरूरी है देश -
नारे की शक्ल में, मगर पत्थर की तरह उछाल भर देने से
जरूरत की परवरिश नहीं हो जाती है

सहमा हुआ, स्तब्ध, दुखी, परेशान वृक्ष का बिछा हुआ तना
आज भी लुकाठी की तरह जलने को है तैयार
उसे बस कबीरायी साहस का है इंतजार

भारत भकोसवा



भारत भकोसवा ऐ रामा
चैत महीनवाँ ऐ रामा
लह, लह लहकावै, लहर-लहरिया उठावै
झर, झर, झहरावै लहरिया झरकौआ
भारत भकोसवा ऐ रामा
चैत महीनवाँ ऐ रामा
बह, बह. बहकावै भाषण, भूषणवाँ
भर, भड़, भर भड़कौआ ऐ रामा
भारत भकोसवा ऐ रामा
चैत महीनवाँ ऐ रामा
फट, फट, फटाफट फटकारै फुटौआ ऐ रामा
गाओ-बजाओ, भैया जोरावरन के जोर से
ललकार चलौ भाई, झट-झटकारिके ऐ रामा
झट झटौआ झूमे चैत महीनवाँ ऐ रामा
भारत भकोसवा ऐ रामा, भारत भकोसवा

स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है

स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है

शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर किसी उत्ताल नदी के किनारे खड़ी कुछ-कुछ नीहारती रहती हो
शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर हवा की तरंगों में चढ़कर फूलों की सुरभि को घोलती रहती हो
शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर हुलास में जमीन को आसमान की ऊँचाइयों से मिलाती रहती हो

मैं शायर, कवि या वैसा नहीं लेकिन पाया है
असल में तुम जहाँ खड़ी हो जाती हो, एक नदी वहाँ से बहनी शुरू हो जाती है
तुम को छूकर हवा तरंग बन जाती है और अपने अंदर सुरभि को समेट लेती है
तुम जब कभी आसमान से नजर मिलाती हो, आसमान जमीन पर उतर आता है
हाँ, तुम जब कभी मेरे सपनों में आ जाती हो, एक ब्रह्मांड आकार पाने लगता है
तुम्हारी कोख में रहकर मैंने जाना, कि स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है
सच है बिल्कुल मैं शायर, कवि या वैसा नहीं लेकिन दुनिया को ऐसा ही पाया है

तुम्हें पता भी नहीं

तुम्हें पता भी नहीं
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वह शुरुआत
सफलता की सार्थक संभावना से लैस होती है
जिसमें तुम्हारी बेखौफ मुस्कान की चपलताएँ
दिशा का संदेश होती है

तुम्हें पता भी नहीं होता
और यह हो जाता है
तुम्हारे होठ से निकलकर मुस्कान
अभी-अभी चटकी कली में पैठ जाती है
फूल बनकर काँटों को भी सहेज लेती है

तुम्हें पता भी नहीं लेकिन
सूरज जानता है, पता चाँद को भी है कि किस तरह
उसके अंतरंग में तुम्हारी मुस्कान की चपलताएँ
सृष्टि और सृजन के उल्लास का श्रृँगार रचती हैं

वह शुरुआत
सफलता की सार्थक संभावना से लैस होती है
जिसमें तुम्हारी बेखौफ मुस्कान की चपलताएँ
दिशा का संदेश होती है

सजा कबूल है

सजा कबूल है
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जाने क्यों लगता है कि
आप के मुस्कुराने से
दिन सँवर जाता है
मेरे मन का आकाश
सिमटकर मेरी जमीन को
छू लेता है

एक बार मुस्कुराओ न
यह गुजारिश
अगर गुनाह है तो
गुनाह सही
सजा कबूल है

हे सखी, सच-सच बतलाओ!

हे सखी, सच-सच बतलाओ!
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चाँदनी ने रात के बिखरे केश को समेटकर
कान में ये हौले से कुछ कहा
रात हँस पड़ी, चाँद मुस्कुरा पड़ा
सितारे उमग कर नाचने लग गये
आसमान दूध से नहा गया
हवा भी मौज में बहकने लगी
धरती ने झोंक में पैर पटकर पूछा --
ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है!
और फिर मन में धीरे से बिहँस पड़ी
हँसी थी कि रोके, न रुकी - न रुकी
और हँसते हुए फूलों से कहा--
सावधान! संचार बहुत तेज है
तेरी नींद में पल रहे सपने की खबर
मेरे आँचल से निकलकर
पूरे आकाश में फैल गई है कि
नींद को विदा कर सपनों को बचा लो
सावधान! संचार बहुत तेज है
हे सखी, सच-सच बतलाओ अब तो --
तुमने फूल से ऐसा क्या कहा कि
बात पूरी दुनिया में फैल गई
और मुझको ही खबर नहीं!
हे सखी, सच-सच बतलाओ!