प्रेम में द्रोह!
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प्रेम कभी भूतपूर्व नहीं होता। प्रेम में कोई द्रोह नहीं होता। प्रेम में कोई 'ब्रेकअप' भी नहीं है होता है। जहाँ यह सब होता है और जिसमें यह सब होता है वहाँ और वह सब प्रेम नहीं कुछ और होता है। प्रेम एकनिष्ठ भी नहीं होता। प्रेम प्रकाश है। प्रकाश में कोई अंधकार नहीं होता। प्रेम पोशाक नहीं है। प्रेम रौशनी है। रौशनी में पोशिदगी नहीं होती। ऐसी कोई रौशनी नहीं जिसमें कोई एक ही चीज नजर आये और बाकी चीजें नजरअंदाज हो जाये। नजरशनाशी प्रेम का करिश्मा है। इसलिए फिर कहूँ, प्रेम एकनिष्ठ नहीं होता। मुहब्बत चाँद से भी होती है और सितारों से भी, फूल से भी और काँटों से भी, मुहब्बत पूरी कायनात से होती है। यह सब तो कह रहा लेकिन यह एहसास है और बहुत शिद्दत से है कि प्रेम को समझना आसान नहीं, प्रेम एहसास है एहसान नहीं! तो मैं किसी वायवीयता में फँस रहा, किसी अधि-आत्मिकता में! नहीं, बिल्कुल ही नहीं। प्रेम एक तरंग है और इसका अपना रंग है। रंग जो महबूब के वजूद के पनाह में होता है उसका रिश्ता आँख से तो है, सूरज से भी है और ज्यादा है। इसे समझना कठिन है और जरूरी उससे भी ज्यादा। यह ठीक है कि जार जार रोना, बगैर मुड़े आगे बढ़ जाना, बगैर सोचे पीछे लौट आना, और इस दुःख को जानना यह सब मुहब्बत की फसल है। फसल है, फैसला नहीं। यह सब लगता है, होता नहीं। न आगे बढ़ना इतना आसान न पीछे लौटना! मुहब्बत के बारे में ये कुछ कयास हैं जो अपनी अदा में दिल और जुबान से टकराकर और एक दूसरे की सोहबत में कविता के शक्ल में हासिल होती है। "आज कल तो बहुत सारे प्रबंध पाठ और शास्त्र हैं, होटल मैनेजमेंट से ह्यूमेन मैनेजमेंट तक। किंतु संभवत:, दुनिया का सबसे पुराना प्रबंध प्रेमप्रबंध ही है। प्रेम पोषण के लिए भी चाहिए और शोषण के लिए भी। प्रेम साधू को भी चाहिए और कामी को भी चाहिए। दानी को भी चाहिए और डाकू को भी।"
प्रेम का होना हो या फिर राग-द्वेष का होना यह मनुष्य की ऐच्छिक क्रिया नहीं है। अनुभूतियाँ ऐच्छिकता पर निर्भरशील नहीं होती हैं। समझा जा सकता है कि जैसे ठंडा-गर्म या भूख का लगना प्राणी की ऐच्छिकता पर निर्भर नहीं करती वैसे ही प्रेम-पदार्थ के प्रभाव में व्यक्ति के होने का सर्वांश व्यक्ति पर निर्भर नहीं करता। हाँ, प्रभाव की व्याप्ति और गहनता में भिन्नता होती है।
प्रेम में द्रोह नहीं होता प्रेम कभी भूतपूर्व नहीं होता। कई बार हम समझते ही नहीं कि जिसे जीत समझ रहे वह असल में हमारी हार है और जिसे हार समझ रहे जीत उसके भीतर मुस्कुरा रहा है। मेरे दोस्त जो हार और जीत से बाहर है, जो भव और पराभव से परे है वही है जिंदगी।
आप की राय सदैव महत्त्वपूर्ण है और लेखक को बनाने में इसकी कारगर भूमिका है।
प्रेम में द्रोह!
कह दूँ तेरी हँसी बहुत भाती है
कह दूँ! कि तेरी हँसी बहुत भाती है!!! ▬▬▬▬
गहन, घन अंधकार का गर्जन चतुर्दिक हाहाकर,
दर्द का नीरव निनाद
यह कैसा समय आ गिरा सर पर कोई घायल चीख
नंगे घावों को लेकर कर रहा नाच, भैरवी के सुर में अनाघात
चू पड़ता, बिना हवा के महुआ जंगल में चुपचाप सहमकर ग्राम, सड़क, बन, प्रांतर, बाग, विकार से भरे हुए सब, निर्विकार
ऐसे मौसम में कहाँ
लुप्त वे सारी पुरा कथाएँ,
माथे पर जिनके सजता था जीवन का हास-विलास, रंग-राग नहीं वैभव की स्मृति दूर
क्षितिज के आर-पार से लेकर गह्वर पाताल लोक तक मची हुई मार-काट, सत्ता के शिखर से
जन के पद तक,
हर कहीं अन-चिन्हार आघात के पार कोमल भाव, सीमांत के अंतिम क्षण पर खड़ा निर्जन में अवाक सिर्फ, बोल रहा है जो शब्द-हीन, जो वंचित संचित शोणित राग फफक कर प्रतिपल उत्ताल भू-धराकार रौशनी में सबसे अधिक चमकता है झूठ
यह दुर्लभ समय का चमत्कार सच अँधेरे में है, है मगर जिंदा अब भी, कटे हुए तरु की जिंदा जड़ से लिपटकर, स्वप्न-मग्न
वह भग्न-मनोरथ है जिंदा अब भी उनकी साँसों में साँस मिलाकर जिनका जीवन घोषित व्यर्थ अर्थ जिनके नहीं काम का रह गया किसी अर्थ में, सब अर्थों में असमर्थ भयानक समय, फूल में डंक, पूजा में भी प्रसाद में भी कलंक
कंथा के आर-पार कंधे पर ढोता, जिसके सब अनुगामी, प्रेमी, साधक, राजा, रंक
ऐसे में कह दूँ कि तेरी हँसी बहुत भाती है, तू मेरे साँस-साँस में गाती है तो यह झूठ, समझ
जब तक ग्राम, सड़क, वन, प्रांतर, बाग नहीं लगें झूमने फिर से
तब तक यह चमक झूठ,
यह राग झूठ, अनुराग झूठ, व्यवहार झूठ
यह कब होगा, यह होगा भी
यह कौन कहे
तब तक सब कुछ मौन रहे,
प्रश्न अनुत्तरित, साधना लीन !!! कह दूँ! कि तेरी हँसी बहुत भाती है!!!
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(पाठकीय संदर्भ-संकेतः यह प्रथमतः अपने महबूब जनतंत्र को संबोधित और उसी को समर्पित है)
समाज, सत्ता और संस्कृति
आज संस्कृति का नेतृत्व उच्च वर्ग के हाथ में है -- जिनमें उच्च मध्यवर्ग भी शामिल है।किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह परिस्थिति स्थायी रहे,अनिवार्यत:।यह बदल सकती है।और, जब बदलेगी,तब इतनी तेजी से बदलेगी कि होश फ़ाख्ता हो जायेंगें। संस्कृति का नेतृत्व करना जिस वर्ग के हाथ में होता है,वह समाज और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी भावधारा और अपनी जीवन-दृष्टि का इतना अधिक प्रचार करता है कि उसकी एक परंपरा बन जाती है। शायद वह जमाना जल्दी ही आ रहा है जब वे स्वयं संस्कृति का नेतृत्व करेंगी, और वर्तमान नेतृत्व अध:पतित होकर धराशायी हो जायेगा। इस बात से वे डरें जो समाज के उत्पीड़क हैं, या उनके साथ हैं हम नहीं क्योंकि हम पद-दलित हैं और अविनाशाय हैं-- हम चाहे जहाँ उग आते हैं। गरीब, उत्पीड़ित, शोषित मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर मैं यह बात कह रहा हूँ।
काँटों से नहीं, बटन होल से डर
काँटों से नहीं गुलों को तो शिकायत किसी और से ही है
सचमुच बेखबर कि वह गुलों का आखिर क्या करता है
कोई भाई नहीं था
और भतीजा भतीजी
पूरा हिंदुस्तान
सारे गुलाब
बटन होल में घुसेड़ दिये गये थे
गुलाब कह रहा है
काँटों से नहीं
बटन होल से
डर लगता रहा है
मैं जो लिखता हूँ
मैं अपने लिखे बारे में कहता हूँ। मेरे लिखे को सहमति या सहमतियों या असहमतियों की कोई तलाश नहीं होती है और न होती है किसी को अपने लिखे के निष्कर्ष तक ले जाने की कोई आकांक्षा। तलाश होती है तो बस संवाद, संवेदना और संभवानाओं (potential) के साझापन की। लेकिन विमर्श विचार आदि की प्रक्रिया का अधिकांश सहमति और निष्कर्षमुखी होता है। चर्चा तो बहुत कम ही हो पाती है और हुई भी तो लिखा हुआ प्रसंग संवाद, संवेदना और संभावना की तलाश में तड़पता हुआ कहीं बहुत पीछे छूट जाता है। मेरे लिखे की हालत मंदिर की सीढ़ियों के पायदानों की तरह जिसे लतियाते हुए लोग अपना-अपना फूल चंदन लिये अपने-अपने देव की पूजा-अर्चना कर प्रसाद समेटने में लग जाते हैं। भिन्न संदर्भ में लिखा था शृंगार ही इतना भव्य कि सौंदर्य तक पहुंचने का रास्ता ढक जाता है और दुल्हन के धड़कते दिल तक पहुंचने की तो उम्मीद ही क्या!हमारा लिखा दुल्हन के धड़कते दिल की तरह तड़पता रह जाता है। अफसोस, मगर यह सच है! और हाँ, मैं पढ़ता भी इसी नजरिये से हूँ। बुद्ध कबीर गालिब रवींद्र प्रेमचंद गांधी अंबेदकर मार्क्स नजरुल निराला नागार्जुन राजेंद्र यादव कमलेश्वर .... या संजीव शिवमूर्त्ति उदय प्रकाश ये सभी मेरे लिए पठनीय बहुत हैं पूजनीय नहीं। ऐसा सोचना पूजनीयताओं के माहौल में कठिन तो है, मगर मेरे लिए कुछ भी कभी आसान नहीं रहा।
हम चुप रहते हैं, इस तरह भी
क्योंकि, प्यास एक घटना है और नदी एक संभावना
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मैं जिस नदी के किनारे तक पहुँच कर ठिठक गया
वह बहुत लंबी थी, लंबी इतनी कि
धारा की दिशा में चलते जाओ तो भी समुद्र दूर ही रह जाये
धारा की दिशा के विपरीत चलते जाओ तो भी उद्गम नजर न आये
एक मुश्किल यह भी थी कि
जितनी लंबी नदी थी, उससे कहीं लंबी प्यास लिये मैं उसके किनारे पहुँचा था
यह प्यास भी दरअसल एक मछली से मिली थी, जो अब मेरी अपनी थी
न मुझे नदी में तैरना था, न नदी की गहराई नापनी थी
मुझे तो बस अपनी प्यास की लंबाई नापनी थी
यह मेरी समझ में आया और वह भी नदी की मदद से ही कि
नदी कुछ और है और मेरी प्यास कुछ और ही है
नदी और प्यास को नापने का यह तरीका ठीक नहीं
नदी और मैंने मिलकर यह समझ कायम की
प्यास हमारे समय की एक घटना है और नदी हमारे समय की एक संभावना
और यह भी स्थिर किया कि जैसे रह लेती है एक साथ ही
हमारे समय की सबसे बड़ी घटना और हमारे समय की सबसे बड़ी संभावना
बिना कलह के, हमने मिलकर यह समझ भी कायम की, हम भी साथ रह सकते हैं
हम भी साथ रह सकते हैं, क्योंकि अंततः
प्यास हमारे समय की एक घटना है और नदी हमारे समय की एक संभावना
दुनिया तो बस, दुनिया है!
चाँद को ऐतराज है बहुत
विकास पुरुष चाँदनी को
जेब में डाल लेने पर आमादा है
चाँद को इस बात पर ऐतराज है
ऐतराज चाँदनी को भी है
मुश्किल यह कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँद के बूते में नहीं है और
सच तो यह है कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँदनी के बूते में भी नहीं है
मजबूरी यह कि
विकास पुरुष की जेब के
फैलाव को
रोकना संभव नहीं
सच तो यह है कि
चाँद जेब में है, चाँदनी भी
और जुबान पर है देशभक्ति
यह सब है मेरी जान और
इस वक्त मैं बहुत परेशान
परेशान कि मैं घिर गया हूँ
उनके बीच जो माहिर हैं
आँख से आँसू
रगों से खून
जिस्म से पसीना
प्रतिभा से प्राण
दिल से अरमान
जीवन से पानी
चेहरे से मुस्कान
हौसले से हुलास
निचोड़ लेने में माहिर हैं
सितारों के बुझ जाने पर
जश्न में शामिल लोगों से
घिर गया है वक्त
वह फूल कहाँ से लाऊँ जो
जान और जिस्म को
खुशबू की चमक से भर दे
चाँद को ऐतराज़ है बहुत
अफसोस और सिर्फ़ अफसोस के बाहर आज कुछ नहीं
देशज
आलोचना वितंडा और पाठक
देशज पर कमल
कमल की कहानी--- प्रोजेक्ट ऑक्सिजन की पठनीयता निश्चित ही प्रवाहपूर्ण है। इस कहानी की पारिस्थितिकी भी प्रतीकात्मक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है। 90 के आसपास एक कविता लिखी थी; जब व्यवस्था बाजार के हवाले हो जाये और बाजार बाजीगर का अखाड़ा तो बाघ और बानर के अश्लील विकल्पों के बीच आदमी औंधे मुँह गिरा होता है। कमल जी की कहानी में व्यवस्था और व्यापार का जो रिश्ता खिला है उस में मुनाफा सर्वभक्षक की तरह कायम है। पैकेजिंग और प्रोपगैंडा का असर यह कि जनहित और जनसुरक्षा के नाम पर जन को भयाक्रांत कर लूट मचाना इनका किरदार बन गया है। सौंदर्य और शील का होना जीवन की नैसर्गिकता का मनोरम पक्ष है। इस मनोरम पक्ष की रक्षा शक्ति करती है, रक्षा तभी तक जब तक सौंदर्य और शील मिलकर शक्ति का नियंत्रण और नियमन करते हैं। हादसा यह कि सर्वभक्षी शक्ति के दुर्दांत ने सफलतापूर्वक शील और सौंदर्य को अपना दास बना लिया है। शील और सौंदर्य का इतने बड़े पैमाने पर तथा इतना और ऐसा कुत्सित इस्तेमाल सभ्यता ने इसके पहले कभी नहीं देखा।
व्यवस्था में रहकर व्यवस्था के माध्यम से न्याय सुनिश्चित करने के विश्वासवाले नौजवान अधिकारी अपने दुःस्वप्न में उभरनेवाले व्यवस्था के चरित पर अंगुली उठानेवाले नौजवान के सामने खुद को कितना लाचार पाता है! दुर्विपाक यह कि इसकी लाचारी को सौंदर्य अपने गार्हस्थिक शील से और बढ़ा देती है, यह कहते हुए कि खुद को इतना इन्वॉल्व न करो।
पूरे कथा प्रसंग में ये जो कनेक्टिविज्म का सवाल है कहानी की रूह है। मुझे संजीव की कहानी अपराध और ऑपरेशन जोनॉकी की भी बहुत याद आ रही है। यह कहानी एक बड़ी कहानी कि क्राउनिंग है! पूरी कहानी का जन्म होना बाकी है। हाँ, यह कहानी इतने पर भी अपने मुकम्मल होने का भ्रम रचने में सक्षम है। इस भ्रम को भेद कर उस कहानी को पाना रचनात्मक चुनौती भी है और चाहत भी। इस चुनौती को रचनाकार कैसे आत्मसात (इंटरनेलाइजेशन ऑफ रियलाइजेशन के अर्थ में) करता है और समय की चाहत को कैसे पूरा करता है यह तो बाद की बात है, फिलहाल तो देशज के प्रति आभार और कमल को बधाई। अभी तो इतना ही...
क्या करे कोई
इस गूंगी मुस्कान का क्या करे कोई
और कटी जुबान का क्या करे कोई
लटपटाते बयान का क्या करे कोई
मचलते हिंदुस्तान का क्या करे कोई
ढहते हुए मकान का क्या करे कोई
जी गुर्राते संविधान का क्या करे कोई
दिल-ए-नाबदान का क्या करे कोई
प्रफुल्ल कोलख्यान का क्या करे कोई
क्या निदान है
दुख-दर्द के सताये लोगों का हुजूम फिर पूछता आखिर क्या निदान है
ख्वाब के खलिहान में कोहराम है हर बात पर इशारा संविधान है
दुनिया में बहुत दुनिया है
दुनिया में बहुत समृद्धि है।
मेरे लिए नहीं है।
दुनिया में बहुत सौंदर्य है।
मेरे लिए नहीं है।
दुनिया में बहुत उदारता है।
मेरे लिए नहीं है।
दुनिया में बहुत भद्रता है।
मेरे लिए नहीं है।
दुनिया में बहुत कविता है।
मेरे लिए नहीं है।
दुनिया में बहुत सख्य है।
मेरे लिए नहीं है।
हे सखी!
दुनिया में बहुत दुनिया है।
यह मेरे लिए है।
फिलहाल शुक्रिया
फिलहाल शुक्रिया
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मैं जिंदगी को फूलों से सजाने के ख्वाब के हिफाजत में मशगूल
जिंदगी भर काँटे चुनता रहा,
मुगालता यह कि मैं कामयाबी की ओर बढ़ रहा हूँ
यह जानते हुए कि फूल चुनना
हिंदी का एक खतरनाक मुहावरा है
मैं जिंदगी भर काँटे चुनता रहा
और अब अपनी जिंदगी के उस मुकाम पर हूँ जहाँ
मुझे मुस्कान के बीच से झुर्रियों को एक-एक कर चुनना है
यह जानते हुए कि मुस्कान के बीच से झुर्रियों को चुनना
फूल चुनने से भी खतरनाक मुहावरा हो सकता है
मैं भीतर से सिहर जाता हूँ
सिहर जाता हूँ कि हमारे समय में
बना हुआ मुहावरा जितना भी खतरनाक क्यों न हो
बनते हुए मुहावरे के साथ जीना बहुत जोखिम भरा है
तय कर पाना मुश्किल है कि
फूल चुनना अधिक खतरनाक मुहावरा है या फिर
मुहावरों में काँटा या झुर्रियों को चुनने की कोशिश
मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को लिए यह बहुत आसान है
फिर भी बात यह ठहर जाती है कि
आसानी से हो जानेवाले काम में शुमार की गई बातें
हमारे समय के सब से कठिन प्रसंग हैं ▬▬
जैसे कि तुम्हारी मुस्कान जोखिम से भरा एक अंदाज,
हाँ, फिलहाल शुक्रिया
हिंदी अध्ययन-अध्यापन और तकनीक
साहित्य कला मंच हिंदी अध्ययन-अध्यापन और तकनीक
व्यक्तिगत तौर पर अध्ययन-अध्यापन से प्रत्यक्षतः जुड़ा नहीं हूँ
तकनीक की भी जानकारी नहीं है
हिंदी अध्ययन-अध्यापन का आशय हिंदी साहित्य के अध्ययन अध्ययन-अध्यापन से है
हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन का विशिष्ट पक्ष तो है लेकिन असल आशय साहित्य के अध्ययन-अध्यापन से है
अध्ययन-अध्यापन का मकसद
1. मनुष्य में ज्ञान को अंतरित (आयातित/ निर्यातित) करने की क्षमता होती है
2. ज्ञान को अंतरित करना अध्ययन-अध्यापन का मकसद होता है
3. अनुभव और अनुभूति या संवेदना का सीधा अंतरण संभव नहीं है
4. अनुभव और अनुभूति या संवेदना के अंतरण की दो पद्धति होती है
क. रसोद्रेक या रसानुभूति
ख. अनुभव और अनुभूति या संवेदना का ज्ञान में परावर्त्नन और फिर ज्ञान का अंतरण
रसोद्रेक या रसानुभूति सभ्यता और संस्कृति का अंतर साहित्य संस्कृति और सभ्यता के पुल के रूप में अध्येय है
सामान्य पाठक का जुड़ाव पाठ के आनंद के कारण होता है
रसोद्रेक या रसानुभूति पाठ के आनंद के प्राप्त होने की प्रविधि है
रसोद्रेक या रसानुभूति से आनंद की उपलब्धि मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है
नैसर्गिक प्रवृत्तियाँ बिना किसी बाहरी प्रशिक्षण के स्वतः सक्रिय रहती हैं
नैसर्गिक प्रवृत्तियों की संतुष्टि से सीमित रहकर स्वतः बोध का उदात्त होते जाना सामान्य पाठक का सहज प्राप्य है
1. साहित्य का अध्ययन-अध्यापन
रसानुभूति या रसोद्रेक की नैसर्गिक प्रक्रिया के पूरी होने के बाद :
पहला मकसद है अनुभव और अनुभूति या संवेदना का ज्ञान में परावर्त्नन और फिर ज्ञान का अंतरण
उदाहरण : प्रेमचंद के उपन्यास गोदान को पढ़ने के बाद
उस समाज की तत्कालीन आर्थिक व्यवहार, जातिगत प्रथा, लैंगिक आचरण सहित समस्त संरचना का अध्ययन
इस समय समाज में प्रभावी आर्थिक व्यवहार, जातिगत प्रथा, लैंगिक आचरण सहित समस्त संरचना का अध्ययन
दूसरा मकसद है किसी भी स्रोत से प्राप्त ज्ञान का फिर से उन्नत और बौद्धक संवेदना में अंतरण
संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना : मुक्तिबोध कर्म का भोग और भोग का कर्म : गीता
टेक्नोलॉजी और टेकनिक का अंतर
टेक्नोलॉजी मुख्यतः हासिल औजारों को एक दूसरे को जोड़कर बांछित परिणाम पाने के लिए सहज व्यवहार के योग्य बनाती है, इसलिए प्रयुक्ति कहलाती है
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने की बुद्धि टेकनिक है जिसे हम तकनीक कहते हैं और पारंपरिक शब्द में तरकीब कह सकते हैं
साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में टेक्नोलॉजी का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल किये जाने की जरूरत है
नये तरकीब या तकनीक का अपनाव भी जरूरी है
ज्ञान की अन्य शाखाओं से जोड़ने की तरकीब
इतिहास समाजशास्त्र भूगोल आर्थिकी दर्शन धर्म समाजिकी समुदायिकी व्यक्तिगत और समाज मनोविज्ञान
सभ्यता और संस्कृति का अंतर साहित्य संस्कृति और सभ्यता के पुल के रूप में अध्येय है
मुझे मालूम है कि
मैं उनके निहितार्थों में जरूर होता हूँ
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हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर मुझे संबोधित नहीं होती हैं
फिर भी मैं उनके निहितार्थों में
खुद को तलाश रहा होता हूँ
मुझे पता भी नहीं होता कि
कितने सारे वनकटैया से
मेरा वजूद इन दिनों घिर रहा होता है
हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर तुम से संबोधित होती है
लेकिन वे बातें तुम तक पहुँच नहीं पाती है
और हवा में टँगा इंद्र धनु उदास हो जाता है
हे प्रिय! देखो न कि कैसे
वनकटैया और इंद्र धनु आपस में उलझ रहे हैं
और कितना क्रूर हो गया है आसमान इन दिनों
हे प्रिय! देखो न
जीवन अट्ठारह सौ सत्तावन हो रहा है इन दिनों
हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर मुझे संबोधित नहीं होती हैं
फिर भी मैं उनके निहितार्थों में जरूर होता हूँ
जादू टोना न आया
तू जो मुझ से करीब है, तेरी बात पे रोना आया
तू आया, तुझको बस मेरी आँख भिगोना आया
डूबता रहा, बहती गंगा में हाथ धोना न आया
मिहनत में कसर नहीं, फसल बोना ही न आया
मैं ने रिश्तों को जीना सीखा उसे ढोना न आया
खेलना जानता नहीं, न मेरे हाथ खिलौना आया
था तो माथे पर ही, मेरे काम डिठोना न आया
कोशिश की तो बहुत, मुझे तेरा होना न आया
थी कशिश बहुत, खुद को मुझे डुबोना न आया
आया कुछ-कुछ लेकिन मुझे जादू टोना न आया
तेरा कोई काबू नहीं
क्या गजब मेरे हिस्से में तेरी खामोशियाँ ही सही
जानता हूँ बोलती आँखों पर तेरा कोई काबू नहीं
ये जो सियासी बाँकपन है बाकी जम्हूरियत सही
है तभी तक महफूज आवाम जब तक बेकाबू नहीं
मुफीद नहीं वज्म में आकर तेरा कहना, नहीं नहीं
जनतंत्र में होता कोई चौधरी नहीं कोई साबू नहीं
यह फलसफा विकास है कोई जूआ नहीं जादू नहीं
उम्मीद थी जरूर पर तेरा, तुझ पर ही काबू नहीं
मेरे हिस्से टूटे ख्वाबों की तीखी किर्चियाँ ही सही
शीशे के टुकड़े को चुन लेता इस के आगे काबू नहीं