अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत

अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत

पहले होती थी बहुत
अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत
न रूबल से, न डॉलर से
हाँ, तुम से भी नहीं और आप से भी नहीं

दिल बहुत बोझिल हो जाता था
पायताना ढीला पड़ जाता था
मन सावे की खाट की तरह
तबेले की झलंगी खाट में बदल जाता था
रीढ़ टेढ़ी हो जाती थी
देह निढाल हो जाता था
पहले बहुत होती थी शिकायत
अब नहीं होती है

इंतजार रहता था बेसब्री से बहुत
और बस मन में दुहराता रहता था
सब्र का फल मीठा होता है
पहले इंतजार रहता था बहुत
अब नहीं रहता किसी आहट का

पहले रहती थी चिंता बहुत कि
अनजाने में कोई द्वार बंद न हो जाये
किसी उत्ताल हवा के बहकावे में आकर
अब नहीं रहती कोई चिंता कि कोई लौट न जाये
चिंता कि दिशाएँ कहीं बंद द्वार में न बदल जाये

जब से माननीय न्यायमूर्त्ति ने मुझे देखकर कलम तोड़ दी
जब से डाक्टर ने अपना सिर झुका लिया
जब से पुलिस ने अपनी टोपी उतार दी
जब से करीबियों ने फूल की बढ़ी कीमत का रोना शुरू किया
तब से नहीं होती किसी से कोई शिकायत

फगुनवाँ में हो, फगुनवाँ में

फगुनवाँ में हो, फगुनवाँ में

बुढ़वा देवर लागे हो, देवर लागे 
फगुनवाँ में, काँचे-कचनार लागे

फगुनवाँ में, पोरे-पोर गुलाल लागे
बुढ़िया के अजगुत श्रृँगार लागे हो
फगुनवाँ में, सब के गाते बयार लागे

है लागे-लागे, बतहा बयार लागे हो
पियवा बहकल अन-चिन्हार लागे
फगुनवाँ में, घरैतिन झमार लागे

हो, राति इजोरिया, झम-झम नाचे
औ दिनौ में घरवा के किवाड़ लागे हो
फगुनवाँ में, दुलरहु के बाजार लागे हो

घर में नाहिं पैसा, पियवा उधार लागे
ननदो, बहकल पियवा अ-चिन्हार लागे
हय बुढ़वा देवर लागे हो, देवर लागे

हाँ फगुनवाँ में, काँचे-कचनार लागे
फागुन में, अ-नारियो होशियार लागे
हाँ फगुनवाँ में हो, फगुनवाँ में, फगुनवाँ में
...... ...... ...... ......... ......... 

पहिले फगुनवाँ हो

पहिले फगुनवाँ हो

पहिले फगुनवाँ हो, पहिले फगुनवाँ
पवनवाँ करे झीका झोरी
ना माने, ना माने करे बरजोरी

ननद चेतावे, देवर लहकावे
ना माने पवनवाँ, करे झीका झोरी
पिया याद सतावे, कैसे कटे फगुनवाँ हो

टवरो रहे डाउन, मुनिया करे टीपाटीपी
ना बोले कागा अँगनवाँ में हो
ना बाजे, बजर मोबाइलवा में टुनटनी

पिया सपनवो सतावे, कैसे कटे फगुनवाँ हो
बहकल बतास आर उमड़ल आकास हो
मन में हलचल, सितायल जोबनवो उदास हो
फगुनवाँ में हो, लगे-लगे अगिन अँचरवा में
दगधल मन, पियासल परान पिया फगुनवाँ में

गड़िया बजावे सीटी, उड़ि जाये नीनिया
चुपा गेलै मोबाइलवा फगुनवाँ में
ननद चेतावे, देवर लहकावे
ना माने पवनवाँ, करे झीका झोरी
पिया याद सतावे, कैसे कटे फगुनवाँ हो

पहिले फगुनवाँ हो, पहिले फगुनवाँ हो






गठरिया तोर, कि मोर

गठरिया तोर, कि मोर
कल (09 फरवरी 2014) शब्दकर्म विमर्श की ओर से बंगीय हिन्दी परिषद सभाकक्ष में आयोजित अनय स्मरण सभा में शामिल हुआ। प्रोफेसर अनय हमारे बीच नहीं हैं, यह टीस ताजा हो गई। लेकिन, सभा में शामिल होना अच्छा लगा। डॉ. हितेंद्र पटेल (Hitendra Patel) खुद प्रोफेसर हैं, अच्छा बोलते हैं। कल अनय जी पर बोलते हुए भावुक हो गये। कहा कि अनय जी मेरे लिए हमेशा जीवित हैं, उनके बारे में इस तरह बोलना मेरे लिए संभव नहीं है। आँख भर आई, गला भर्रा गया और बैठ गये। कभी-कभी आदमी न बोलकर भी बहुत कुछ कह जाता है और कभी-कभी बहुत बोलकर भी कुछ नहीं कह पाता है। यह महसूस करना अच्छा लगा। इतनी-सी भावुकता बची रहनी चाहिए। डॉ. हितेंद्र पटेल इतिहास के सक्रिय प्रोफेसर हैं। आज वे बहुत कुछ जानते हैं लेकिन अनय जी उन्हें और अनय जी को वे तब से जानते हैं जब डॉ. पटेल ने प्रसिद्ध पिल्मकार सत्यजित रे का नाम भी नहीं सुना था। अनय जी हिंदी के प्रोफेसर थे, हितेंद्र इतिहास के प्रोफेसर हैं। इतिहास का प्रोफेसर किसी हिंदी प्रोफेसर को अपना गुरू मानकर इतना भावुक हो जाये तो इसे भी ऐतिहासिक घटना मानना चाहिए। इसे सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों की तरह न मानकर, सक्रिय ज्ञान के अंतर-अनुशासनिक गति-मति के लिए शुभ लक्षण मानना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि भावुकता से बाहर निकलकर अनय जी के बारे में सोचना चाहिए। इतिहास के बनने-बिगड़ने, इतिहासदेव की चमक और मलीनताओं की गति-प्रकृति को हम सभी थोड़ा-बहुत जानते हैं, हितेंद्र पटेल तो खैर विशेषज्ञ ही हैं। अनय जी के रचना विकास को ठीक से समझने पर यह बात भाषा में समा सकती है कि विभिन्न हिंदी इलाकों से आकर कोलकाता में रहनेवालों/ आकर रहनेवालों का जीवन संघर्ष कैसा होता है। किस तरह वह यहाँ की सामाजिक-नागरिक कार्रवाइयों का हिस्सा और अंततः राजनीतिक प्रक्रिया का अंशीदार बनता है और यह भी कि कैसे इस प्रक्रिया की मूल प्रेरणा वह रचनात्मक प्रवृत्ति और शक्ति होती है, जो साहित्य लिखने की प्राथमिक शर्त्त है। अनय जी प्रोफेसर थे, लिखते थे लेकिन प्रोफेसनल लेखक नहीं थे। जो लिखा वह भाषिक बुनावट और बारीकियों के कारण महत्त्वपूर्ण तो हो सकता है, लेकिन उसका अधिक महत्त्व उसमें निहित समय के साक्ष्य के कारण है। मुझे लगता है कि अनय जी के मोनोग्राफ के बारे में सोचा जाना चाहिए। हितेंद्र पटेल की भावुकता ने यह एहसास कराया कि बिना बोले भी आदमी बहुत कुछ कह सकता है तो प्रियंकर पालीवाल (Priyankar Paliwal) की अनुपस्थिति ने यह एहसास कराया कि अनुपस्थिति में उपस्थिति कैसे बनती है। अच्छा लगा... शहर के कई महत्तवपूर्ण साहित्यिक लोगों को बहुत दिन बात करीब से देखा...


लेकिन यह अच्छा नहीं लगा कि वहाँ उपस्थित युवाओं को सुनने का अवसर नहीं बन पाया... बहरहाल यह जिंदगी है.. लाख समेटो कुछ-न-कुछ गठरी के बाहर छूट ही जाता है... और बिरासत की लड़ाई में झिका-झोरी शुरू होती है... गठरिया तोर, कि मोर... 

द्वंद्व और दुविधा

द्वंद्व और दुविधा
मन द्वंद्व और दुविधा से घिरा हुआ है। वैसे, काँग्रेस की कई नीतियों, और कई मामलों में नीयत का भी, प्रशंसक मैं नहीं रहा हूँ। सुशासन की कमियों, बेलगाम महगाई, बेकाबू भ्रष्टाचार, रोजगार वंचना आदि के प्रति काँग्रेस की राजनीतिक उदासीनताओं से भी कम आहत नहीं हूँ। लेकिन कोई कारगर विकल्प दिख नहीं रहा है। इसलिए, बावजूद कई भयावह कमियों के लग यही रहा है कि देश के सामने उपस्थित आंतरिक विघटन और ढाँचागत विसर्जन के खतरों से बचने का संसदीय रास्ता काँग्रेस ही निकाल सकती है, शर्त्त यह कि राजनीतिक बरताव में कामचलाऊ ईमानदारी को लागू करने का साहस कर सके। सामने उपस्थित खतरों से बचने के लिए देश अगर अ-संसदीय, गैर-संसदीय या वि-संसदीय रास्ता पर चल पड़ता है, तो यह बहुत उथल-पुथल भरा दौर होगा। इस उथल-पुथल में सबकुछ बुरा ही होगा ऐसा नहीं है, यदि देश इस उथल-पुथल की झंझा को बरदाश्त कर लेता है तो कुछ अच्छा भी हो ही सकता है...। बाद में क्या होगा यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन और कुछ हो न हो यथा-स्थिति और तदर्थता जरूर बहुत हद तक टूटेगी...। जो भी हो, फैसला देश को करना है...। मुझे देश के मतदाताओं की सामूहिक समझ के औसत पर पूरा भरोसा है, हाँ यह अलग बात है कि इधर मतदाताओं के एकांश पर नागरिक बोध से अधिक उभोक्ता मिजाज का वर्चस्व बढ़ रहा है..। इसे, द्वंद्व और दुविधा से घिरे मेरे नागरिक मन के एक स्तर पर चलनेवाली मुखरताओं के रूप में ही लिया जाना चाहिए किसी अपरिवर्त्तनीय विचार या प्रेरक अपील की तरह इसे नहीं लिया जाना चाहिए। 

चलना एक तमीज है

चलना एक तमीज है

वे भी बायें से चल रहे हैं
मैं भी बायें से चल रहा हूँ
हम एक दूसरे से दूर हैं
क्योंकि हमारी दिशाएँ विपरीत हैं

वे दायें से चल रहे हैं
उनके दोस्त भी दायें से चल रहे हैं
वे एक दूसरे के करीब हैं
हालाँकि उनकी भी दिशाएँ विपरीत हैं

मैं ने सीखा कि
चलना एक तमीज है

कोलख्यान परिचय

घोषणा और भाषण से घिरे लोग

घोषणा और भाषण से घिरे लोग

जब कभी
एहतियात के तौर पर
सारे इंतजाम कर लिये जाने की होती है घोषणा
स्याह होने लग जाती है धूप
बदहवाशी में एक दूसरे का चेहरा
देखने लग जाते हैं लोग
यह सोचकर कि
अब कुछ चेहरे गायब होनेवाले हैं बस्ती से
सदा के लिए

जब कभी
भाषणों में उमड़ता है
आवाम के प्रति प्यार का सागर
कूतने लग जाते हैं लोग अपने माँस का वजन
क्योंकि लोगों ने कई बार देखा है
कसाई को बड़े प्यार से
सहलाते हुए बकरे की खाल

घोषणा और भाषण के बीच जवान हुई भाषा में
उजाला के नोचे जाने की खबर अब छिपी नहीं है
यही भाषा जब घोषणा और भाषण के मुकाबिल
खड़ी होने की कोशिश में कविता में ढलती है
तब कविता सिर्फ सुंदर शब्दों का सुंदर सिलसिला नहीं रह जाती है
हाँ कविता, कविता नहीं रह जाती है
आदमी के अंदर
दहकते हुए गोलों के विस्फोट की शुरुआत होती है
बड़ी तेजी से खेत, खंदक में बदलने लग जाते हैं
जब कभी घोषणा और भाषण से घिरे लोग
सही कविता को अपने साथ पाते हैं

'स्वजन' और 'श्वजन'



'स्वजन' और 'श्वजन'


वैसे तो, बात पुराने जमाने की है लेकिन क्या पता आज के भी काम की हो। एक विद्वान का पुत्र पढ़ने से कतराता था। पिता बहुत निराश थे। अपने एक साथी विद्वान से सलाह करने पहुँचे कि इस वीरवान बालक का आखिर किया क्या जाये! सघन सलाह के बाद तय हुआ कि इसे भाषा संबंधी ज्ञान को अवश्य ही अर्जित करना चाहिए। अब समस्या यह थी कि इसके लिए साहित्य की राह पकड़ी जाये या व्याकरण की! जैसा कि विद्वानों के साथ होता ही है, फिर सघन-सलाह! अंत में फैसला व्याकरण के हक में गया। व्यकारण के हक में निर्णायक तर्क यह कि किसी तरह थोड़ा-सा भी व्याकरण पढ़ ले तो 'स्वजन' और 'श्वजन' में फर्क कर पायेगा। व्याकरण का बोध बिगड़ जाये तो 'स्वतंत्र' के 'श्वतंत्र' हो जाने में कितनी देर लगती है!! बहुत डर लगता है... भाइयो और बहनो... बहुत डर लगता है...

विवेक को प्राण-प्राण पुकारती पुस्तक




`थकी हुई औरत के चेहरे की सिकुड़नें
किसी एक परिवार की लंबी मुश्किलों की
आड़ी सतरें हैं
उनकी लिखावट कुछ अलग दूसरों से है
क्योंकि परिवार के पुरखों ने अलग-अलग
भाषाएँ लिख दी हैं।'
- रघुवीर सहाय
(अंतिम कविता : `एक समय था ': 25 दिसंबर 1990 से)


सुभाषिनी अली की पुस्तक `खबर लहरिया' में विभिन्न समय पर लिखे उनके लेख संकलित हैं। हालाँकि, इस पुस्तक में दूसरे विषयों पर लिखे लेख भी संकलित हैं, लेकिन इस पुस्तक का महत्त्व महिलाओं की समस्याओं पर घटनाओं के आइने में किये गये विचार विश्लेषण से बनता है। `स्त्री विमर्श' को महिला जीवन के जिन संदर्भों को खासकर ध्यान में रखा जाना चाहिए, उन्हें इस पुस्तक के लेखों में बड़ी हमदर्दी के साथ सामने लाने का प्रयास किया गया है।
सुभाषिनी अली का कानपुर से बहुत आत्मीय संबंध रहा है। `स्त्री विमर्श' पर उनकी पुस्तक `खबर लहरिया' को देखते ही, उसी कानपुर में कहे डॉ. भीमराव अंबेडकर की बात रखना प्रासंगिक लगता है। बाबासाहब ने कहा था, `इस अधिवेशन (कानपुर) में हिंदुस्तान के अधिकांश प्रांतों से प्रतिनिधि उपस्थित हुए हैं। विशाल जनसमुदाय को देखकर मुझे बहुत राहत महसूस हो रही है। परंतु इस समुदाय में स्त्रियाँ बहुत कम हैं। हमारे महाराष्ट्र में स्त्रियाँ सभी सभाओं में हाजिर रहती हैं। हमारी ओर स्त्रियाँ परदा नहीं रखतीं। पति एवं पत्नी दोनों ही समान रूप से सामाजिक कार्यों में भाग लेते हैं। आप लोगों को भी ऐसे ही भाग लेना चाहिए, वरना हमारे समाज का उद्धार संभव नहीं।'1(सामाजिक क्रांति के दस्तावेज -2 : संपादक शंभुनाथ)। जहाँ तक `स्त्री विमर्श' की बात है, कहाँ नहीं है, `कानपुर'! यह बहुत ही दुखद स्थिति है कि आजादी के इतने दिनों के बाद भी, `हमारे समाज का उद्धार संभव नहीं' हुआ है। इतना ही नहीं आजादी के बाद, दिन-प्रतिदिन महिलाओं की सामजिक-राजनीतिक भागीदरी कम ही होती गई है। ऐसा क्यों हुआ? यह एक कठिन सवाल है। `स्त्री मुक्ति' के संदर्भ को ठीक से समझने के लिए इस कठिन सवाल का उत्तर ढूढ़ना ही होगा, कि क्यों महिलाओं की सामजिक-राजनीतिक भागीदरी कम होती गई है। मधु किश्वर अपनी पुस्तक `ऑफ द बिटेन ट्रैक' में दर्ज करती हैं कि `महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुए स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीति में महिलाओं की भागीदारी आज से कहीं अधिक थी। गुंडा और अपराधी तत्त्वों के राजनीति में बढ़ते वर्चस्व के कारण यौन हिंसा, परेशानियों, कलंक का भय समय के साथ बढ़ता ही गया है। असुरक्षा के माहौल में महिलाएँ आज राजनीतिक दलों में खतरा महसूस करती हैं। इससे, यह बात स्पष्ट होती है कि जो थोड़ी बहुत महिलाएँ राजनीति में आज सक्रिय हैं, या जो राज्य विधान सभाओं या संसद के लिए चुनी गई हैं, वे पुरुषों के बीच किसी प्रभावशली राजनेता की पत्नी, बेटी या बहन के रूप में ही खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। .... राजनीति में सक्रिय महिलाएँ आसान शिकार होती हैं क्योंकि राजनीतिक जरूरतों के कारण उन्हें निरंतर जनसंपर्क में रहना पड़ता है। राजनीति में शामिल होनेवाली महिलाएँ चाहे वे पंचायत, जिला परिषद, राज्य विधान सभा या संसद के स्तर की हों, या छात्र संगठन और श्रमिक संगठनों के स्तर की ही क्यों न हों, `कलंक' से बच नहीं पाती हैं।'2 दिक्कतें दूसरी भी हैं। राजनीतिक दलों में ही नहीं महिलाएँ परिवार में ही पूरी तरह कहाँ सुरक्षित हैं। `घरेलू हिंसा की पक्षधरता' में सुभाषिनी अली `घर के अंदर' की सचाई समने रखते हुए कहती हें कि `घर के अंदर होनेवाली हिंसा हमारे समाज की ढकी-छिपी सबसे बड़ी सचाई बनी रही। भारत सरकार के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 1999 में पारिवारिक हिंसा की तस्वीर कुछ इस प्रकार थी: दहेज हत्या के दर्ज मामलों में 17.1 मामलों का निबटारा हुआ, 82.9 लंबित रहे। इसके अलावा पति और परिजनों द्वारा क्रूरता के 1 लाख 92 हजार 5 सौ 75 मामलों में कुल 3416 मामलों में सजा हुई बाकी 14,556 अभियुक्त छूट गये। 1 लाख 20 हजार 9 सौ 22 मुकदमे लंबित ही रहे। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश में (अप्राकृतिक) मौत का सबसे बड़ा कारण घरेलू हिंसा है। सबसे अधिक लोग (और ये औरतें ही होती हैं) इसी के कारण मरते हैं। आतंकवाद, रेल दुर्घटना, सबको मात दिया है घरेलू हिंसा ने।'3 स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है। इस भयावह स्थिति के लिए जिम्मेवार कौन है? धर्म, परंपरा और नैतिकता की दुहाई देते जो लोग थकते नहीं हैं उनके जवाब समझने के लिए सुभाषिनी अली याद दिलाते हुए कहती हैं, `एक वाक्य का मैं जिक्र करूँगी जो 1991 में उत्तर प्रदेश में बनी भाजपा सरकार ने समाज शास्त्र के पाठ्यक्रम की पुस्तक में जुड़वाया था। वह वाक्य था, ``जबसे महिलाओं को कानूनी अधिकार मिले हैं तब से घर की कलह बढ़ गई है।'' अधिकार वापस ले लो तो घर की कलह भी शांत हो जायेगी।'4 ऐसे लोगों के धर्म, परंपरा और नैतिकता की चौहद्दी में ही नहीं, उनके `भारत बोध' में भी कमजोरों, चाहे वह दलित हों, पिछड़े हों, अल्पसंख्यक हों या फिर उनके परिवार की महिलाएँ ही क्यों न हों, के लिए कोई जगह नहीं है!

आजादी के बाद साक्षरता-दर एवं अन्य स्थितियों में सकारत्मक बदलाव भी हुए हैं, इनकी गति भले ही बहुत संतोषजनक न हो, मगर बदलाव से एकदम इनकार करना सचाई से मुँह मोड़ना है। महिलाओं आर्थिक स्थिति भी पहले से अच्छी हुई प्रतीत होती है, फिर महिलाओं के साथ ऐसा क्या हुआ उनकी सामाजिक राजनीतिक भागीदारी कम होती चली गई। `A status Report on participation of women in Panchayatiraj, Institute of social Sciences, New delhi,1995' के संदर्भ से मधु किश्वर केरल और राजस्थान की स्थितियों पर तुलनात्मक विचार करते हुए कहती हैं, `हमारे विधायी निकायों में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारणों को समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि साक्षरता और इसी तरह के तार्किक आधारों से इसका संबंध बिठाना कठिन है। केरल और राजस्थान में साक्षरता दर की स्थिति एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत है। इनके तुलानात्मक विश्लेषण के निष्कर्ष से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है। बताया जाता है कि केरल में सकल साक्षरता दर 90 है और महिला साक्षरता दर 86 है। इसके ठीक उलट राजस्थान में महिला साक्षरता दर 20 है ओर ग्रामीण क्षेत्र में तो सिर्फ 12 महिलाएँ ही साक्षर हैं। केरल में मातृमूलक परंपराओं के कारण महिलाओं को सक्रिय होने की अधिक सवायत्तता और आजादी है। दूसरे राज्यों की तुलना में केरल में महिलाओं की शादी भी अधिक उम्र में होती है। राजस्थान में पितृ-सत्तात्मकता के वर्चस्व के कारण महिलाओं का जीवन अधिक प्रतिबंधित है, बहुत सारे समुदायों में महिलाएँ परदा में रहती हैं, उनकी शादी भी कम उम्र में होती है, बालविवाह भी प्रचलन में है। फिर भी केरल में महिलाओं को हासिल सांस्कृतिक और शैक्षणिक बढ़त से उनकी राजनीतिक भागीदारी नहीं बढ़ पाई है। केरल की विधान सभा में महिलाओं का प्रतिशत 1967 में 1 था जो 1991 में बढ़कर 6 हो गया। राजस्थान में महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 1967 में 4 था जो 1985-90 में 8 हो गया। ... उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश, जहाँ शैक्षणिक स्तर नीचे है, जहाँ महिलाओं पर अधिक दबाव है, लोकसभा में उनका अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है, वे अधिक संख्या में विधायक भी हैं।'5
महिलाओं की भागीदारी का अधिक प्रतिशत महिलाओं की समस्याओं को दूर करने या कम करने का कोई राजनीतिक सामाजिक आधार मुहैय्या नहीं करता है। यह एक ऐसी सचाई है जो किसी भी सरलीकृत समझ से विकृत हो सकती है। राजनीति में `महिलाओं की भागीदारी' का सवाल तो महत्त्वपूर्ण है ही, लेकिन महिलाओं के मुद्दों का सार्वजनिक और राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाना ही असली सवाल है। सुभाषिनी अली इस सवाल को उठाते हुए कहती हैं, `आखिर ऐसा क्यों है कि आधी आबादी होने के बावजूद हम महिलाएँ अपने मुद्दों को सार्वजनिक और राजनैतिक मुद्दा नहीं बना पाये हैं? शायद इसलिए कि हमारे अपने लिए भी अपनी पहचान एक महिला के रूप में नहीं है। हमारे अपने लिए भी हमारी अपनी पहचान किसी जाति या समुदाय के सदस्य के रूप में ही है या फिर किसी परिवार के एक सदस्य के रूप में – माँ, बहन, बेटी, ननद, भाभी – ही है। अगर हमारी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान महिला के रूप में, अपने लिए होती तो अपने हितों के बारे में भी सामूहिक तौर पर सोच पाते और उनको मनवाने के लिए एक दूसरे के साथ जुड़कर हम अपनी ताकत को एकत्रित कर पाती।'6 कुछ लोगों की धारणा यह भी रही है कि `स्त्री मुक्ति' पर अलग से विचार करना गैर-जरूरी है। `सब की मुक्ति' के साथ `स्त्री मुक्ति' के सवाल भी स्वत: हल हो जायेंगे। `सब की मुक्ति' का मुहावरा बड़ा आकर्षक है। भारतीय आजादी के संघर्ष के दौरान भी `सब की मुक्ति' के मुहावरे का प्रयोग हुआ था। इतिहास गवाह है कि यह आजादी के आंदोन के दौरान ऊपजी समता की मानवीय आकांक्षा इतिहास का सबसे क्रूर परिहास साबित हुई। इस परिहास की क्रूरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सुनामी में बचे हुए लोग, जिन्होंने मृत्यु को इतने नजदीक से देखा है, उनके बीच राहत वितरण में भी दलित और गैर-दलित की भेदभावमूलक भावनाओं की `सांस्कृतिक सुनामी लहरों' के सक्रिय होने की बात सामने आ रही रही है। यह एक ऐसा दुखद प्रसंग है जो, आजादी के इतने दिनों बाद भी हमारे जातीय दिमाग में बना हुआ है। जाहिर है कि `स्त्री मुक्ति' के संदर्भ में जो लोग `सब की मुक्ति' के मुहावरे का हवाला देते हैं, उन्हें इस मुहावरे में छिपे छल को पहचानना चाहिए। जीवन के दूसरे प्रसंगों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जैसा कि `महिला आरक्षण से खिलवाड़' में सुभाषिनी अली कहती हैं, `बड़े पैमाने से घरों से औरतों का निकलना, उनका सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करना, प्रभावशाली पदों को सम्हालना – इन सारी बातों ने घरों के अंदर और घरों के बाहर महिलाओं के स्थान और स्तर में परिवर्त्तन लाने का काम किया है। पल्ला केवल बिहार की मुख्यमंत्री के सर से ही नहीं सरका है, हजारों-लाखों महिलाओं के माथे से धीरे-धीरे सरकने लगा है।'7 लेकिन जब तक सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी का मान नहीं बढ़ता है, जब तक महिलाओं के मुद्दे सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के केंद्र में नहीं आते हैं तब तक समता के संकल्पों का पूरा होना असंभव ही बना रहेगा। राजनीति में शोषितों, पीड़ितों की भागादारी बढ़ाने के उपाय के रूप में आरक्षण नीति का कोई सकारत्मक योगदान नहीं रहा है, ऐसा मानना गुनाह है। हाँ, यह तो कहा जा सकता है कि आरक्षण की नीति से जितना लाभ होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया है। दूसरी तरफ सोचने की बात यह भी है कि यदि आरक्षण की नीति नहीं होती तो समाज के मनोभाव में जो थोड़ा बहुत बदलाव हुआ है, वह भी नहीं होता। राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ाने के उपाय के संदर्भ में महिला आरक्षण विधेयक की स्थिति पर गौर करते हुए `महिला आरक्षण से खिलवाड़' शीर्षक से संकलित लेख में सुभाषिनी अली कहती है, `यह कैसी विडंबना है कि जनतांत्रिक अधिकारों का हनन करनेवाले `पोटा' को परित करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है, लेकिन महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के लिए हिम्मत नहीं जुटाई जा सकती है। एक बात तय है कि जब-जब महिला आरक्षण विधेयक संसद के पटल पर लाया जाता है, तब-तब महिलाओं के रानैतिक और अन्य अधिकारों की चर्चा इसी बहाने होने लगती है। इस विधेयक की वजह से यह तो पता चलता है कि महिलाओं के इन अधिकारों का भी कोई महत्त्व है। असल में महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई कहीं भी आसानी से नहीं लड़ी गई है।'8

वैश्वीकरण के बढ़ते दबाव के बीच धर्म और बाजारवाद का संश्रय नये सिरे से मजबूत हो रहा है। इस संश्रय में भटकाने के तमाम गुर हैं। एक खास तरह का `स्त्री विमर्श' वैश्वीकरण की उच्छृँखलताओं में ही `स्त्री मुक्ति' की संभावनाओं को टटोलता है। शंभुनाथ `स्त्री विमर्श की मुश्किलों' को समझने की कोशिश करते हुए कहते हैं, `स्त्री विमर्श के एक बड़े हिस्से में वैश्वीकरण को स्त्री-मुक्ति के महाद्वार के रूप में देखा जा रहा है। उत्तर-आधुनिक स्त्री विमर्श में जिस तरह नवजागरण के सुधारों से संतोष नहीं है, उसी तरह आरक्षणों और कल्याणकारी योजनाओं से भी नहीं है। ... एक खास दुनिया का स्त्री विमर्श मामले को पितृसत्ता को चुनौती से आगे मर्द से विद्रोह तक ले जाता है।'9 धर्म और बाजारवाद आज मनुष्यता की एकता के लिए जितना बड़ा आधार बनाता है, उसे कहीं अधिक बड़ा-बड़ा कारण मनुष्य को बाँटने का बनाता है। मनुष्यता के लिए धर्म और बाजारवाद के संश्रय से ऊपजे विषाणु सबसे अधिक खतरनाक हैं। भारत इस विषाणु के दुष्प्रभाव में सबसे अधिक है। सुभाषिनी अली ठीक ही रेखांकित करती हैं कि `चाहे `इस्लामी राष्ट्रवाद' हो या `हिंदू राष्ट्र' – महिलाओं को ना हिंदू माना जाता है ना मुसलमान। इन राष्ट्रों की नींव ही महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों की असमानता और उत्पीड़न है। यह संयोग नहीं है। यह दोनों तरह के तथाकथित धार्मिक राष्ट्र समानता ओर जनवाद के दुश्मन हैं, इसलिए दोनों में ही सबसे कमजोर का सबसे अधिक सताया जाना स्वाभाविक है।'10 यही कारण है कि वे इस बात को ठीक तरह से समझती हैं कि भारत में `स्त्री मुक्ति' का संघर्ष प्राथमिक तौर पर अनिवार्यत: `हिंदू राष्ट्र' और `बाजारवद' की किसी भी कुचेष्टा से टकराकर ही आगे बढ़ सकता है। भारत में `हिंदू राष्ट्र' और `बाजारवद' से टकराव `सब की मुक्ति' के लिए भी अनिवार्य है और `स्त्री मुक्ति' के लिए भी अनिवार्य है। टकराव की यही संयुक्त अनिवार्यता `सब की मुक्ति' के संघर्ष और `स्त्री मुक्ति' के संघर्ष को आपस में जोड़ देती है। इस बात को पूरी गंभीरता से सभी महिला संगठन या तो समझ नहीं पाती हैं, या फिर अपने वर्गीय हितों की मिथ्या समझ उन्हें ऐसा समझने से सायास रोक देती हैं। शंभुनाथ `स्त्री विमर्श' की मुश्किलों पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद को याद करते हैं, `स्त्रियों में वर्ग का अस्तित्व है, फिर भी इस मामले पर गौर नहीं किया जाता। स्त्रीवाद उच्च या उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का मामला है। उच्च और मध्यवर्गीय स्त्रियों की जिंदगी में दासता के पुराने और नए दोनों रूप मौजूद हैं। वे स्वच्छंदता और दासता के फेंस पर होती हैं। यह कम बड़ी विडंबना नहीं है कि ये स्त्रियाँ `स्वतंत्रता' और `सुरक्षा' दोनों एक साथ चाहती हैं। प्रेमचंद के एक आरंभिक उपन्यास `वरदान' में का एक दृश्य है, जिसमें एक मध्यवर्गीय स्त्री विरजन अपने घरेलू कैदखाने की खिड़की से उन स्वच्छंद मजदूर औरतों को निहारती है, जो अल्लसुबह काम पर जा रही थीं, ``स्त्रियाँ अनाज का खेत काटने जा रही थीं। झाँक कर देखा तो दस-बारह स्त्रियों का एक गोल था। सबके हाथों में हँसिया, कंधों पर गठियाँ बाँधने की रस्सी और सिर पर भुने हुए हुए मटर की छबड़ी थी। ये इस समय जाती थीं, कहीं बारह बजे लौटेंगी। आपस में गाती चुहलें करती चली जाती थीं।'' इस वर्ग की स्त्रियों का स्त्री विमर्श वही नहीं होगा, जो बौद्धिक महत्त्वाकांक्षाओं, वाग्विलास और किटी पार्टी तक सीमित संपन्न महिलाओं का स्त्री विमर्श है।'11 सुभाषिनी अली भी अपने लेख `हिंदी प्रेम' में प्रेमचंद का संदर्भ उठाती हैं, विश्लेषण करती हैं और निष्कर्ष निकालती हैं, उन्हीं के शबदों में, ``निर्मला' में कहीं भी महिला पात्रों को केवल आदर्श भारतीय नारियों के रूप में नहीं पेश किया गया है। उनके व्यवहार के द्वारा अन्य महिलाओं को पहुँचाया गया कष्ट बहुत ही तफसील के साथ रेखांकित किया गया है, लेकिन यह समझ उस उपन्यास के हर शब्द से टपकती है कि पुरुष-प्रधान समाज-व्यवस्था और असमान समाज पर हावी प्रलोभन की भावना मूल रूप से व्यक्तियों – यानी महिलाओं और पुरुषों – दोनों के व्यवहार को पूरी तरह से प्रभावित करती है और उनकी जिंदगी को तबाह कर देती है। इतना ही नहीं, अंधविश्वास और पोंगापंथी समझ पर भी उपन्यास में लगातार प्रहार होते हैं। ... अफसोस की बात तो यह है कि `निर्मला' को हटाये जाने का विरोध अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के अलावा किसी महिला संगठन ने नहीं किया जबकि इसका विरोध सुधार की पक्षधर तमाम महिलाओं को करना चाहिए था। यह चुप्पी इस बात की परिचायक है कि हमें अपनी ही, अपने ही देश ओर प्रदेश की, सुधारवादी महिला परंपराओं को समझने की और उनके साथ अपने आपको जोड़ने की कितनी आवश्यकता है!'12 अपने ही देश ओर प्रदेश की, सुधारवादी महिला परंपराओं को समझने की और उनक साथ अपने आपको जोड़ने की आवश्यकता की यही समझ सुभाषिनी अली के `स्त्री विमर्श' को `नारीवाद' की कतिपय संकीर्णताओं से बाहर निकालकर उसे `स्त्री मुक्ति' की सही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष की वास्तविक जमीन पर ला खड़ी करती है। शंभुनाथ सही सवाल उठाते हैं कि, `जिस देश में हर रोज 60 महिलाएँ खुदकुशी करती हैं, हर साल लगभग 16 हजार लड़कियों का अपहरण होता है, 7 हजार दहेज हत्याएँ होती हैं एवं जिस समाज में बलात्कार, छेड़खानी, देह-वयापार, यौन उत्पीड़न, घरेलू यातना आदि का ग्राफ बढ़ता जा रहा है, उस समाज में कुछ अल्ट्रा मॉड स्त्रीवादियों का अति-स्वायत्त संसार अंतत: उन्हें कहाँ ले जाता है।'13 `स्त्री मुक्ति' का सही संघर्ष परिवार के मूल्यों को विघटित नहीं करता है, उसे अधिक जनतांत्रिक, कुंठा मुक्त और मानवीय चेतना से संपन्न करता है। `स्त्री मुक्ति' का संघर्ष दरअसल, किसी स्वैराचारी अति स्वायत्त संसार की तलाश नहीं करता है बल्कि परिवार को जनतांत्रिक मूल्यों से संपन्न करने के लिए पारिवारिक और मानवीय अंतर्निभरताओं के महत्त्व पर अमल करने का सांस्कृतिक आधार रचता है। प्रेमचंद को याद करते हुए शंभुनाथ कहते हैं, `उस जमाने में प्रेमचंद जेसे व्यक्ति भी परिवार और विवाह के परंपरागत अजनतांत्रिक रूप के विरोधी थे, न कि उनके लिए परिवार और विवाह ही अप्रासंगिक थे। प्रेमचंद लिखते हैं, ``जो विद्या पढ़कर पुरुष रोटी कमाता है और इसीलिए स्त्री को अपनी लौंडी समझता है, वही विद्या स्त्रियाँ भी सीखना चाहती हैं !'' (विविध प्रसंग-3)। ... वे स्त्री-पुरुष संबंध का एक-दूसरे से मुक्ति या `स्त्रीवाद' के रूप में नहीं, बल्कि `दो बराबरों की अंतर्निर्भरता' के रूप में देखते हैं। भारतीय नवजागरण का निष्कर्ष यही है।14 कहना न होगा कि नवजागरण की परियोजनाएँ अधूरी हैं, मगर मरी नहीं हैं; अभी भी जीवित हैं।

`स्त्री विमर्श' पर केंद्रित सुभाषिनी अली की पुस्तक `खबर लहरिया' इस अर्थ में भी एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है कि इसमें आये विचारों और अनुभवों को स्त्री मुक्ति के संघर्ष के बीच अर्जित किया गया है। स्त्री मुक्ति के इस विमर्श को सामाजिक-राजनीतिक विकास और इस विकास के अनुभव के साथ बौद्धिक हस्तक्षेप के संदर्भ में देखना दिलचस्प है। विचार और व्यवहार का मणिकांचन संयोग इस पुस्तक को अपने तरह की महत्त्वपूर्णता प्रदान करती है। यही कारण है कि विभिन्न अवसरों और विभिन्न संदर्भों में लिखे और प्रकाशित लेखों को `खबर लहरिया' में एक साथ पढ़ना एक भिन्न तरह के संघर्ष और दायित्वबोध को हासिल करने का अवसर उपलब्ध कराता है। सुभाषिनी अली का दृष्टिकोण मुख्य रूप से मार्क्सवाद के संदर्भ से विकसित हुआ है।`खबर लहरिया' के विचार पक्ष पर गौर करने से यह बात बिल्कुल साफ-साफ समझ आती है कि मार्क्सवाद दृष्टि का निर्माण करता है, दृश्य का निर्धारण नहीं। मार्क्सवाद शोषित-वंचित वर्गों की संवेदना को सही परिप्रेक्ष्य में समझने का विवेक देता है साथ ही जातीयता, समुदायिकता, लैंगिकता जैसी विभाजन की किसी भी लकीर से ऊपजनेवाले दर्द को समझने का व्याकरण भी रचता है। `सामंती समाज के खिलाफ संघर्ष' की जरूरत की तीब्रता कितनी बढ़ गई है, इसे इस संदर्भ से महसूस किया जा सकता है कि `उत्तर प्रदेश के जौनपुर में 18/19 अगस्त की रात में एक वृद्धा के साथ बलात्कार किया गया। वह रात को अपने खेत में पंपसेट के पास सो रही थी। वहीं नशे में धुत एक व्यक्ति पहुँचा जिसने उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसे अपनी लाठी से पीटा। वह अधमरी पड़ी रही। सुबह उसे गाँववालों ने अस्पताल पहुँचाया, जहाँ उसने अपना बयान दिया। उसके बाद वह मर गई। मुंबई के लोकल ट्रेन में 14/15 अगस्त की रात शायद उसी समय जब 55 वर्ष पहले भारत जाग उठा था, एक 13 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार हुआ। ट्रेन के उस डिब्बे में 3 अन्य लोग भी थे, जो मूक दर्शक बनकर पूरी घटना देखते रहे।'15 वह वृद्धा मर गई तो क्या बची रह गई हमारी तथाकथित महान संस्कृति! सवाल यह कि हम कब तक मूक दर्शक बने रहेंगे? ट्रेन के उस डिब्बे में जो तीन लोग थे सिर्फ वे ही मूक दर्शक नहीं थे। अपने आप से एक सवाल ईमानदारी से पूछना चाहिए कि क्या हम सब कहीं-न-कहीं मूक दर्शक बने हुए ही नहीं रह जाते हैं! यदि हम सही तरीके से संगठित नहीं होते हैं तो मूक दर्शक बने रहने के अलावा हम कर भी क्या सकते हैं! कहना न होगा कि इस तरह का अध्ययन मार्क्सवाद के जीवित और वैज्ञानिक दर्शन होने की भी सूचना करता है। विज्ञान सदैव नये अनुभवों के प्रति आग्रहशील बना रहता है, प्रामाणिक अनुभवों को अपने में शामिल करता हुआ जीवित और प्रासंगिक बना रहता है और मनुष्य को मनुष्यता की सामग्रिक जीत के लिए संगठित होने की प्रेरणा देता है। सुभाषिनी अली की इस पुस्तक में भी यह अंत:प्रेरणा है कि स्थिति भयावह है तो इस स्थिति का सामग्रिक प्रतिरोध किया जाना अनिवार्य दायित्व है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए संगठित होना जरूरी है; `विमर्श' जरूरी तो है, परंतु पर्याप्त नहीं है। क्या हुआ यदि `थकी हुई औरत के चेहरे की सिकुड़नें, किसी एक परिवार की लंबी मुश्किलों की आड़ी सतरें हैं। क्या हुआ, यदि परिवार के पुरखों ने उनक चेहरे पर अलग-अलग, भाषाएँ लिख दी हैं।' सब कुछ के बावजूद जितनी शीघ्रता से अपने चेहरे से झुर्रियों को उतार सकती हैं औरतें, उतार सकती हैं पूरी सभ्यता की सदियों की थकान वह किसी के भी मन में भरोसा और विश्वास पैदा कर सकता है। इसी भरोसे और विश्वास के साथ `खबर लहरिया' पाठक के विवेक को प्राण-प्राण पुकारती पुस्तक है।


पुस्तकः खबर लहरिया : सुभाषिनी अली का स्त्री विमर्श
अनामिका प्रकाशन, 52 तुलाराम बाग, इलाहाबाद
प्रथम संस्करण - 2005: मूल्य रु 50.00

1शंभुनाथः सामाजिक क्रांति के दस्तावेज 2: वाणी प्रकाशन, 2004
2Madhu Kishwar : off the beaten track rethinking gender justice for indian women : Women's Marginal role in Politics : Oxford University press 1999
3सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः घरेलू हिंसा की पक्षधरता
4सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः घरेलू हिंसा की पक्षधरता
5Madhu Kishwar : off beaten track rethinking gender justice for indian women : Women's Marginal role in Politics : Oxford University press 1999
6सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः महिलाओं की सुरक्षा और भविष्य
7सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः महिला आरक्षण से खिलवाड़
8सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः महिला आरक्षण से खिलवाड़
9शंभुनाथः हिंदी नवजागरण और संस्कृति: स्त्री विमर्श की मुश्किलें: आनंद प्रकाशन 2004
10सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः धर्म के नाम पर
11शंभुनाथः हिंदी नवजागरण और संस्कृति: स्त्री विमर्श की मुश्किलें: आनंद प्रकाशन 2004
12सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः हमारे देश में हिंदी प्रेम
13शंभुनाथः हिंदी नवजागरण और संस्कृति: स्त्री विमर्श की मुश्किलें: आनंद प्रकाशन 2004
14शंभुनाथः हिंदी नवजागरण और संस्कृति: स्त्री विमर्श की मुश्किलें: आनंद प्रकाशन 2004
15सुभाषिनी अलीः खबर लहरियाः सामंती समाज के खिलाफ संघर्ष

सामाजिक विकास और साहित्य का संदर्भ


सामाजिक भौतिक और संसाधनिक विकास का क्रम जिस तेजी से आगे बढ़ा है वह चमत्कृत कर देनेवाला है। आज का मनुष्य भौतिक रूप से जितना संपन्न और समृद्ध है उतना पहले कभी नहीं था। चिकित्सा विज्ञान से ले कर ज्ञान का हर क्षेत्र आज पहले से अधिक विकसित है। मनोरंजन के भी एक-से-एक साधन और तौर-तरीके विकसित हो गये हैं। अनुभूति के भी एक-से-एक साधन विकसित हो गये हैं। ज्ञान और मनोरंजन के अतिविकसित साधनवाले इस उत्तर-आधुनिक होते समय में अब साहित्य की क्या जरूरत? और किसे जरूरत है? इस क्या और किसे का उत्तर ढूढें तो तुरंत पता चलेगा कि एक तरफ यह सचाई है तो दूसरी तरफ इस सचाई का एक और चेहरा है जो अति भयानक है। इसका कारण यह है कि ज्ञान-विज्ञान-संसाधन जितनी तीब्रता से विकसित हुए हैं उतनी तत्परता से वितरित नहीं हो पाये हैं। विकास का चेहरा विषमता की आँच से झुलसा हुआ है। विकास के बड़े-बड़े आंकड़े पढनेवाले लोग भी विकास के इस झुलसे हुए चेहरे को देखकर डर जाते हैं। यह डर उन्हें विषमता बढ़ानेवाली प्रवृत्ति को रोकने के लिए बहुत उद्योगी या तत्पर नहीं बनाता है तो इसका कारण यह नहीं कि उनका डर नकली या नाटक है बल्कि इसका कारण उनका अपना वर्ग-चरित्र है। विकसित होने के बावजूद विषम समाज में जीने के लिए बाध्य है आज का मनुष्य। इसलिए आज का मनुष्य पहले के मनुष्य से अधिक संपन्न होने के बावजूद पहले के मनुष्य से कहीं अधिक दुखी और विपन्न है। संपन्नता उसके दुख को कम करने में किसी भी प्रकार से मददगार नहीं हो पा रही है। विपन्नता उसके जीवन का स्थाई भाव है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस दुख में वह बिल्कुल अकेला है। कोई उसका दुख बाँटने के लिए तैयार नहीं है। उसके दुख का कारण कस्तूरी की तरह उसीके नाभि-कुंड में विकसित होता रहता है। सुत-वित्त-नारी/नर-भवन-परिवार, सब बेकार। कोई उसके अकेलेपन को तोड़ पाने में उसका सहायक नहीं हो पाता है। इस अकेले पड़ते मनुष्य के संदर्भ में आज साहित्य की भूमिका परीक्षणीय है। उसे इस निरंतर अकेले पड़ते जा रहे हबोडकार मनुष्य से संवाद करना, उसका साथी बनना, उसकी आहत भावनाओं का आदर करना और अंतत: उसे अकेलेपन की अंधगुहा से बाहर निकालने की युक्ति करना है। यानी एक बेहतर साथी के रूप में साहित्य की जरूरत बनी हुई है। इस भूमिका के संदर्भ में ही उन सारे सवालों के उत्तर तलाशे जाने चाहिए जिनका संबंध साहित्य से है।

साहित्य का अपनी भाषा से गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हुआ करता है। अर्थात साहित्य का अपना सुनिर्दिष्ट भाषिक-समाज हुआ करता है। इस भाषिक-समाज को एक बनाये रखनेवाले सूत्र का एक सिरा उस समाज के सबसे निचले स्तर तक जाता है तो दूसरा सिरा सबसे ऊपर के स्तर तक भी जाता है। वृहत्तर मानव आबादी की चिंता करते हुए भी उसे उसकी भी उतनी ही चिंता करनी पड़ती है जिसके तात्कालिक हितों के खिलाफ साहित्य अपना संवेदनात्मक विस्तार सिरजता है। वर्ग साहित्य तात्कालिक दृष्टि से भले अधिक लोक हितकारी प्रतीत होता हो लेकिन अंतत: लोक हित के अपने महत्त्वपूर्ण उद्देश्य में सफल होना उसके लिए असंभव रहा है। वर्ग हित साधने के लिए भी साहित्य को वर्गातीत होना पड़ता है। एक अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय मान-समाज के परिगठन के लिए इस रणनीति के मर्म को समझा जाना चाहिए। तातपर्य यह कि साहित्य को अपना बाहरी वितान सबके लिए खुला रखना चाहिए। यदि वर्गबोध को साहित्य के लिए अनिवार्य माना लिया जाये तो बड़े और ख्यातिनामा साहित्यकार के साहित्य के बड़प्पन के मर्म के समझ ही नहीं पाएंगे। कालिदास से लेकर जयदेव, विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, जायसी, प्रेमचंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, निराला, प्रसाद आदि के साहित्य का वर्ग-पाठ किस प्रकार तैयार किया जा सकेगा? मुझे लगता है बाद के प्रगतिशील हिंदी साहित्य-विचारकों ने इस मामले में अपेक्षित सावधानी नहीं बरती। प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकार जिस भाषा में हो गये उस भाषा के साहित्य में इस दुर्विपाक का घटित होना विस्मयकारी भी है और दुखद भी। प्रेमचंद की सहानुभूति एक व्यक्ति और विचारक के रूप में चाहे होरी के प्रति ही क्यों न रही हो लेकिन एक उपन्यासकार के रूप में रायसाहब समेत सभी पात्रों के प्रति उनकी सचेष्टता का संतुलन गजब है। एक बात की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान जाना चाहिए कि प्रगतिशीलता के नाम पर हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा आग्रह रहा है, शोर की हद तक, और सच्चे अर्थों में हिंदी समाज में सबसे अधिक अनाग्रह भी इसी प्रगतिशीलता के नाम पर रहा है। भाषा-समाज और भाषा-साहित्य के इस भयंकर अंतर्विरोध का सबसे घातक नतीजा यह देखने में आ रहा है कि इस पूरे प्रकरण में साहित्य का पाठक ही उससे बिदक गया। इधर गंभीरता से ध्यान देना होगा।

आज के भाषा-समाज पर ध्यान देने से जो बात सबसे पहले समझ में आती है वह यह कि आज भाषिक -समाज का स्वरूप काफी बदल चुका है। आज का पढ़ा-लिखा समाज अगर बहुभाषी नहीं भी हो गया हो तो उसके द्विभाषी होने में क्या संदेह है। यहीं पर इस बात पर विचार करना प्रासंगिक होगा कि भाषा और साहित्य का आपसी संबंध क्या होता है। क्या अंग्रेजी में हिंदी साहित्य का लेखन संभव नहीं है, यह भी कि क्या हिंदी में अंग्रेजी का साहित्य लिखना संभव है कि नहीं? यह सही है कि साहित्य का संबंध भाषा से बहुत गहरा है तथापि साहित्य को साहित्य बनानेवाले तत्त्व का नाम भावना, संवेदना, विचार, करूणा, आनंद, स्वप्न आदि से जुड़ता है। तो क्या हुआ? सामाज द्विभाषी हो या बहुभाषी लेकिन उसके सदस्यों की मूलभाषा (जरूरी नहीं कि मातृभाषा ही हो) अर्थात वह भाषा जिस भाषा के माहैल में उसके सामाजिक-जीवन का अधिकांश कारोबार संपन्न करता है, आत्मस्फूर्त ढंग से प्रेम करता है, घृणा करता है, क्रोध करता है, विरोध करता है, रोता और हंसता है वह एक ही हो सकती है। सहित्य के अलावे संस्कार से भी भाषा का बहुत गहरा लगाव हुआ करता है। सामान्यत: यकीन करना कठिन है कि तमाम कोशिशों के बावजूद फासीवाद और सांप्रदायिकता से लड़ना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है कि उसके लिए हमारे पास कोई अनुभव-सिद्ध देशज शब्द लोक में प्रचलित नहीं है जिसका इस्तेमाल सार्थक ढंग से किया जा सकता, नतीजा लोगों की नागरिक-संवेदना से इस समस्या को जोड़ने में हम नाकाम रहते आये हैं। अज्ञेय जब बर्त्तन के रूपक से शब्द के घिसने, मुलम्मा छूट जाने और देवता के कूच कर जाने की बात कहते हैं तो उसका व्यापक अर्थ है। उस व्यापक अर्थ का एक पहलू यह भी है कि अधिक व्यवहार से शब्द सिर्फ घिसते ही नहीं हैं बल्कि अधिक सुग्राह्य, संवेद्य, संप्रेष्य, विश्वसनीय और आत्मीय भी बनते हैं। फिर भी इस सवाल पर विचार करलेने का इतना भर कारण है कि आज हिंदी भाषा-साहित्य में हिंदी भाषा-समाज की कविता कम ही लिखी जा रही है। अन्य विधाओं की भी हालत थोड़ी बेहतर हो तो हो। साथ ही एक विचार यह भी सामने आ रहा है कि अंग्रेजी में लिखे साहित्य को भी भारतीय साहित्य क्यों नहीं माना जाये? इस तरह का विचार करनेवाले भारतीय का सहारा लेते हैं। कारण यह कि भारतीय भाषा नाम की कोई एक भाषा तो है नहीं इसलिए किसी एक भाषा-समाज के संदर्भ से साहित्य को जोड़कर देखने का प्रयास बेमानी हो जाता है। प्रत्येक भाषा का अपना भाषा-समाज होता ही है चाहे वह जैसा भी होता हो। जिस भाषा का कोई समाज नहीं होता है उस भाषा के अस्तित्व का आधार संस्थानिक होता है। भारत में अंग्रेजी संस्थानिक भाषा है सामाजिक भाषा नहीं। यह याद रखना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि भारत के संस्थानों का आर्थिक-बौद्धिक प्रभुत्व जिनके हाथ में है उनका अपना आर्थिक-बौद्धिक स्वार्थ अंग्रेजी के माध्यम से संतुष्ट होता है और उनके भीतर पक रही खिचड़ी की गंध बाहरवालों को कम ही लगती है। और लग भी जाए तो उनके पास काई चारा नहीं होता। जिन साहित्यकारों को वे निर्विवाद रूप से महान और विश्व स्तरीय बताते हुए थकते नहीं उनके बारे में कोई रूशदी कुछ भी कहकर निकल जाए वे हल्की-सी भी चुनौती नहीं दे पाते हैं। विडंबना यह कि हम उसी रूशदी की अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता सुनिश्चत करने के लिए सबसे अधिक आतुर होते हैं। जब कि उसकी अभिव्यिक्त की सार्थकता और सदाशयता पर विचार करने का न तो कारगर अधिकार रखते हैं और न तो सामर्थ्य ही रखते हैं। हम तो इसी बात पर ढेर हो जाते हैं कि राजकमल झा को करोड़ों की रॉयल्टी मिली है। अब यह देखने की फुर्सत किसे है कि राजकमल झा ने भला लिखा क्या है। कुल मिलाकर यह कि भाषा से विच्छिन्नता अंतत: समाज से विच्छिन्नता का ही आधार प्रस्तुत करती है। विश्व-भाषा का मुहावरा सुनने में बेहतर है लेकिन उसमें अंतर्निहित चालाकी को समझना ही चाहिए।

इसी प्रकार स्त्री-साहित्य के विमर्श को भी समझना होगा। स्त्री-साहित्य का उद्देश्य सामान्य अर्थात निर्विशिष्ट साहित्य के उद्देश्य से कतई भिन्न नहीं हो सकता है। यदि स्त्री-साहित्य कुछ अलग चीज हो तो बाकी बचे साहित्य को भी पुरूष साहित्य ही मानना होगा। असल बात यह है कि स्त्री-साहित्य हो या दलित साहित्य या प्रगतिशील साहित्य या सिर्फ साहित्य वह एक दूसरे का दुश्मन नहीं हो सकता है। एक दूसरे के पूरक भले हों। विडंबना यह कि स्त्री और दलित साहित्य के पैरोकार अक्सर शिकायत करते हैं कि बिना स्त्री और दलित हुए स्त्री और दलित पीड़ा को कोई समझ ही नहीं सकता है। हो सकता है यह बात बिल्कुल ही ठीक हो। लेकिन तब उन पर यह आरोप चस्पा नहीं किया जा सकता है कि वह स्त्री और दलित विरोधी है, समझने में अक्षमता उनके सारे पाप, अगर हों तो, को धेाकर रख देगी । लेकिन संभवत: ऐसा है नहीं। कुछ लेखकों के लेखन में सचमुच स्त्री और दलित विरोधी रूझान पाये जा सकते हैं। यह विरोध सीधे-सीधे नहीं हुआ करता है बल्कि किसी के पक्ष में अधिक झुकाव से महसूस किया जा सकता है। जरूरी नहीं कि ये लेखक सामान्यत: स्वयं स्त्री या दलित नहीं ही हों। रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी (माटी पानी ) का कोई पात्र अगर सामाजिक हैसियत बदल जाने पर दलित विरोधी आचरण कर सकता है तो उसका आचरण विश्वसनीय इसलिए पाया जाता है कि समाज में इसके उदाहरण मिल जाते हैं। इस प्रकार के आचरण किसी में भी पाये जा सकते हैं, लेखक में भी ।

आधुनिक हिंदी साहित्य की शुरूआत से लेकर आज तक के समय में बहुत बदलाव घटित हो चुका है। यह बदलाव सामाजिक संरचना के ऊपरी स्तर से लेकर उत्पादन की शैली और लोगों की हैसियत में भी आया है। ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्र में बदलाव आया है। राजनीतिक संरचना में आया बदलाव तो और भी भयंकर है। अर्थ-संबंध का स्वरूप भी बहुत तेजी से बदला है। कला के विभिन्न माध्यमों की क्षमता और शैली में भी परिवर्तन आया है। पिछले बीस-पच्चीस साल में यह परिवर्तन और अधिक तीव्रता से घटित हुआ है। इस परिवर्तन का थोड़ा-सा प्रभाव थोड़े-से लोगों के लिए सकारात्मक रहा है तो बहुत सारे लोगों के लिए नकारात्मक ही रहा है। साहित्य ने इस थोड़े और बहुत के ऊपर पड़नेवाले प्रभाव को कैसे अभिव्यक्त किया है और इस अभिव्यिक्त के क्रम में खुद कितना परिवर्तित हुआ है इसका आकलन करना निश्चय ही दिलचस्प होगा। वास्तव में किसी भी समय में समकालीनता की पहचान निर्विवाद नहीं हुआ करती है। फिर आज न तो कोई प्रकट काव्यांदोलन ही है और न किसी मतवाद का कोई गहरा सामूहिक या सामाजिक असर ही। कुछ आलोचकों के निजी आग्रह भले ही कभी-कभी सक्रिय प्रतीत होते हों पर वह कोई मान्य काव्यसूत्र की रचना करने में सफल हो ऱहे हों ऐसा नहीं है। इसे कविता के लिए अच्छा माना भी जा सकता है और नहीं भी। यदि कविता इतनी स्वायत्त हो चुकी है कि उसे बाहर से निदेशित करना अब संभव नहीं ऱहा इसलिए दिनों-दिन कविता से किसी खास प्रकार की मांग करने की जरूरत कोई महसूस नहीं कर ऱहा अर्थात किसी बाहरी अनुशासन के हस्तक्षेप की कोई प्रासंगिकता नहीं बची तब तो ठीक है लेकिन यदि कविता में खुद किसी प्रकार की सामाजिक उपादेयता नहीं बचने के कारण या कविता से किसी प्रकार का आश्वासन न पाने के कारण कविता किसी वैचारिक उदासीनता के तात्कालिक भंवर में पड़ी है तो यह हम जैसे लोगों के लिए चिंता का कारण है। इस मामले में मुझे लगता है थोड़ी-थोड़ी सच्चाई दोनों प्रकार की सोच में है। कविता अपनी इस स्थिति से बेखबर नहीं है। आज हर समाज-सचेत हिंदी कवि इस इस बात को शिद्दत से महसूस कर ऱहा है। न सिर्फ महसूस कर ऱहा है बल्कि उसकी काव्याभिव्यिक्तयों में भी इसका प्रमाण दे रहा है। यहां आज की समकालीन हिंदी कविता की एक सामान्य चिंता को हम रेखांकित कर सकते हैं। निरर्थकताबोध के स्वर का इस या उस प्रकार से हिंदी कविता में प्रकट होना इस खास स्थिति को स्पष्ट करता है। राजेश जोशी, अरुणकमल जैसे कवियों की कविताओं में भी इसे बड़ी असानी रेखांकित किया जा सकता है। 
समकालीन समाज जिन संकटों से जूझ रहा है वे सारे संकट किसी-न-किसी रुप में समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियाँ भी निर्धारित कर रही हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों की तलाश करने का प्रत्येक उद्यम समाज के संदर्भों के बीच से ही अपना रास्ता बनाता है या आकार पाता है। अब अगर समकालीन समाज के संकटों पर ध्यान दिया जाये तो कुछ बातें निम्नलिखित रुप में उभर कर हमारे सामने आती हैं।
1) सार्वजनिक जीवन में जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान का अभाव
2) भ्रष्टाचार का नंगा स्वरुप और उसकी सामाजिक स्वीकृति का बनता हुआ माहैाल
3) जनांदोलनों या वास्तविक जनमुखी राजनीतिक पहल का घनघोर अभाव
4) व्यापक बेरोजगारी और शिक्षित समाज में घर करती सामाजिक उदासीनता
5) शिक्षा संसाधनों का अभाव और उपलब्ध संसाधनों का निर्मम दुरुपयोग
6) समाज का बचा हुआ सामंती मनोभाव और बरजोरी या बलगेंग का रवैया
7) समाज और परिवार में स्त्रियों , बच्चों ,खासकर बालिकाओं की दुर्दशा और बढती असुरक्षा
8) जानलेवा गरीबी, मंहगाई, जीवनयापन के संसाधनों और आय वृद्धि की संभावनाओं का अभाव
9) असंतुलित विकास की अंधी दौड़ और उसके कारण उत्पन्न होनेवाला पर्यावरण संकट
10) सांप्रदायिकता , जातिवाद और फासीवाद के बढते खतरों के साथ उन्माद का स्थाईभाव बनते जाना
11) दिनों दिन पारस्परिक सम्मान के भाव की कमी और अवहेलना भाव में हो रही वृद्धि
12) परदुखकातरता का बढता हुआ अभाव और परपीड़कता की बढती हुई प्रवृत्ति
13) घटती हुई सहिष्णुता और बढती हुई आक्रामकता में शौर्य की बनती प्रवृत्ति
14) सामाजिक संबंधों में बढ़ती हुई दरार की बाढ़ को रोकने की वास्तविक प्रक्रिया का अभाव
15) संपन्नता में विपन्नता की स्थिति और बढती हुई बेलगाम भयावह विषमता आदि

भारतीय समाजों का भूगोल भी बहुत बड़ा है और इतिहास भी। हिंदी समाजों और भाषा में इसके अनुभव युगों से संचित होते रहे हैं। हिंदी समाज और भाषा एक अर्थ में भारतीय स्मृति और संस्कृति का केंद्रीय कोष है। इसलिए उपरोक्त समस्याओं से जूझते हुए भी इस समाज में सिर्फ हताशा या पराजयबोध ही नहीं है बल्कि सहज उल्लास भी है और धैर्य भी है और है एक अद्भूत तथा स्पृहणीय जीवनशैली। एक भिन्न प्रकार का जीवन-बोध। समकालीन हिंदी कविता में समस्याओं से जूझते हुए इस विस्तृत भैगोलिक-ऐतिहासिक समाज की पीड़ाओं की काव्यात्मक अभिव्यिक्त की प्रचुरता है। इसे किसी वैचारिक दर्शन से जोड़कर भी देखा जा सकता है या सीधे सामाजिक परिप्रेक्ष्य के हवाले से भी समझा जा सकता है। लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस दुष्चक्र में फँसे समाज के साथ हिंदी की समकालीन कविता खड़ी है और पूरी ताकत, वह जितनी भी हो, के साथ खड़ी है। कुछ ऋषिनुमा लोग और भी हैं जो हिंदी कविता के पथ के दावेदार हैं और जो कालजयी कविता लिखने के व्यापक कारोबार में व्योम-व्यस्त हैं। उनकी कविताएँ कालजयी चाहे जितनी हो काल-सिद्ध और काल-बिद्ध तो बिल्कुल ही नहीं है। इसलिए ये चाहे तुमार जितना बांधें समकालीन हिंदी कविता की सामान्य प्रवृत्तियों को समझने में सहायक तो बिल्कुल ही नहीं हैं। यदि आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रमाण मानें (न मानने की कोई आवश्यकता नहीं दीखती है) तो किसी भी समय के साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियों को पहचानने का सबसे प्रामाणिक ढंग होता है जनता की चित्तवृत्तियों आ रहे बदलाव को स्वर देनेवाले साहित्य-रुपों का संगठित अध्ययन किया जाये। समकालीन हिंदी कविता की सामान्य प्रवृत्तियों को समझने के लिए भी इससे बड़ा, प्रामाणिक और महत्वपूर्ण कोई दूसरा सूत्र नहीं हो सकता है। हां, विभिन्न समकालीन हिंदी कवियों की कविताओं में इसके काव्यात्मक निभाव का स्वरुप अपना और अनोखा है।

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सादर, प्रफुल्ल कोलख्यान