उत्साह से भरे नए दोस्तों के लिए
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सच्ची कविता लिखने के उत्साह से भरे नए दोस्त जब कोई सलाह मांगते हैं तो मैं बहुत विचित्र स्थिति में पड़ जाता हूं! क्या सलाह दूं? आज का समय बड़ा कठिन है, दोस्त। जिंदगी में, जिधर भी देखो अफरा-तफरी है। फिर कोई मददगार भी तो नहीं। मदद यानी संवेदनात्मक मदद। भावनात्मक मदद। दिल से साथ रोने और हंसने की मदद ! रोने की मदद! जी रोने की भी मदद! मददगार नहीं ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए ? इसका फैसला बहुत आसान नहीं होता है। मेरी जिंदगी का अनुभव यह है कि सच्चा आदमी अपने किए का फल जरूर भोगता है!इसे अपने ज्ञान से जानता था। इसे मेरे अनुभव ने भी पुष्ट किया है। ऐसी स्थिति में मैं किसी को कोई सलाह कैसे दूं! यह तो उचित नहीं है। अपनी जिंदगी को जब मुड़ कर देखता हूं, तो मुझे बड़ी परेशानी होती है। अरे, यह गलतियां मैंने की! काश कि मुझे पहले से पता होता इन गलतियों का नतीजा ऐसा भी हो सकता है। सच तो यह है कि किसी को मालूम नहीं होता और फिर जब मालूम होता है तब काफी देर हो चुकी होती है। कविता मेरी जिंदगी की कमजोरी रही है। कविता को लेकर मैं बहुत ही आशान्वित रहा। जब कि आम जिंदगी एक दुखद कविता में तब्दील होती चली गई और मुझे इसका एहसास तब हुआ जब वक्त बहुत बीत चुका था। आजकल अक्सर लोग प्रश्न करते हैं अब आप क्यों नहीं लिखते हकीकत यह है कि मैं आज भी लिखता हूं। लेकिन कहीं उसे छपने देने के पहले बहुत संकोच होता है। इसलिए मैं लिखता हूं और रोता हूं! बिलखता हूं। इसके सिवा और मैं कुछ कर नहीं सकता। जो तस्वीर आज बनी है ऐसी तो हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी! मामला इतना बिगड़ सकता है सोचा भी न था। जो भी हो आज की स्थिति में मुक्तिबोध याद आते हैं जिंदगी में। मुक्तिबोध यूं ही नहीं भावधारा की बात करते थे, सिर्फ विचारधारा पर्याप्त नहीं होती है यह तो साबित हो गया। लिया बहुत बहुत बहुत बहुत ज्यादा और दिया बहुत बहुत बहुत कम। अरे मर गया देश और बच गए तुम! तुम ,यानी हम, यानी मैं!
यह सच है कि 2, 4 , 10, 20 या 100, 200 पाठकों (अगर हों तो) के लाइक्स के बल पर करोड़ों का समर्थन पानेवालों के सामने डटकर खड़े होने का साहस कविता ही कर सकती है। वह साहस कहाँ गाया कवि? काश कि पुरस्कार के साथ थोड़ा ही सही, साहस भी बटोर लेते तुम! संस्थाओं के भीतर लेखकों के बीच पुरस्कार के बनरबांट में जितनी दिलचस्पी होती है, उसका लाखवां हिस्सा अपने लेखकों के भीतर साहस पैदा करने में भी होती ! बाबा नागार्जुन के मन ने यों ही नहीं सवाल किया होगा कि क्या राजनीति के सामने कविता की हैसियत फटी जूती कि भी नहीं!
आप की राय सदैव महत्त्वपूर्ण है और लेखक को बनाने में इसकी कारगर भूमिका है।
उत्साह से भरे नए दोस्तों के लिए
अगरचे हिंदोस्तान न था
सफलता की सूचियों में, कोई निशान न था
अगरचे नाम था, मगर वह हिंदोस्तान न था
गलतफहमियों की शागिर्दी से परेशान न था
मुहब्बत थी, किरदार-ए-मुहब्बत हैरान न था
कुछ सवाल थे खुदमुख्तारी का ऐलान न था
फूल मुस्कुराये जब चमन में बागवान न था
गले मिले बधाइयाँ दी कोई मगर इंसान न था
थूकते चले गए मुँह था कोई पीकदान न था
रोजमर्रा था बस बचा कोई भी अरमान न था
झांकते भी तो किधर जब कोई गरेबान न था
मूस्तैद हुजूरी में था ऐसा कोई फरमान न था
कहूं कि रवायत में शामिल कोलख्यान न था
कविता कहानी
जब कोई दर्द बेजुबान हो जाता है तो भाषा के पार चला जाता है। जब किसी भाषा की साँस फूलने लगती है तब वह अपनी छटपटाहट में अपने अस्तित्व के पनाह को अतिक्रमित करने लगती है। बेजुबान दर्द और बेपनाह जुबान के मिलने से अभिव्यक्ति जिन रूपाकारों को ग्रहण करने लगती है उन्हें हम कविता कहते हैं। इस प्रक्रिया के इतर जब भाषा अपना श्रृंगार रचती है तब भाषा का वैभव जिन रूपाकारों में प्रकट होता है वह वाक् विलास होता है। दोनों की अपनी प्रक्रियाएं हैं। दोनों का अपना महत्व है।
जब कोई घटना इतिहास में दर्ज होने का हौसला खो देती है और जन प्रेरणा बनने की सीधी राह नहीं पकड़ पाती है तब उस घटना की व्यथा और वेदना कहानी के रूप में प्रकट होती है। इससे इतर बात रसाने की कला भी नई कहानी को जन्म देती है। दोनों का अपना महत्व है।
खौआ छौ, बझौआ छौ
एकर ओकर मिठ बोली पर नै
नोरक पोसुआ नोनछराइन के सुआस चिन्ह
मेह बना क दाऊन क बरद जका जे घुमे छौ
एहि सब लोकक कात चिन्ह, कतवाहि चिन्ह
चिन्ह की ई सब त खौआ आर बझौआ छौ।
गाम ठाम सब गरदा, गरदा
कोनो लाज ने कोनो परदा
ने एकरा ओकरा सुख दुःख स लेना देना
झुठहि खाट छै, झूठहि बिछौना
झूठहि ठाठ छै आ झूठहि पाठ छै
हाटे द क गाम क बाट छै त की कीनना
लुग्गा लत्ता की दिल्ली, कीं कोलिकाता
इएह निकास आ इएह बिकस,
झटपट बूझें त इएह बेसहना
सोचि सोचि क की पछिताना
की पछिताना!
ई सब खौआ आर बझौआ छौ!
नोरक पोसुआ नोनछराइन के सुआस चिन्ह!
सोना एक धातु है, क्रिया भी
सोना एक धातु है, क्रिया भी
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पुरखे कवियों से सीखा
रिश्तों की पहचान
बार-बार टूटकर जुट जाने में होती है
पड़ जाये गाँठ तो धागा
बिन गाँठ जुड़ जाये तो सोना
सोना एक धातु है, क्रिया भी
गुनाह बेपरदा होगा चमन मुस्कुरायेगा
गुनाह बेपरदा होगा
चमन मुस्कुरायेगा
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दिखाकर ख्व़ाब जो लूट ले चमन
बेपरवाह कि
कैसे मुल्कियों में कायम रहे अमन
मुल्क का नहीं वह खैरख्वाह
उसका साया भी पुरगुनाह
वह मेरा रहनुमा नहीं, हरगिज़ नहीं
लोभ लालच का फंदा
सुलह या सौगात नहीं
वो लूटते रहें वैखौफ
यह तो खुशनुमा मंजर नहीं है
जो दिखता है बाहर
यकीनन वह अंदर नहीं है
अल्फाज़ हैं भटके हुए-से
नीयत भी साफ नहीं है
वह दिन भी आयेगा
गुनाह बेपरदा होगा
चमन मुस्कुरायेगा
इस रात की हुस्न को मयस्सर कोई चाँद सितारा नहीं
इस रात की हुस्न को मयस्सर कोई चाँद सितारा नहीं
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हजार बाहों से पानी
मुझे पुकारता रहा
हमारी जमीन को मंजूर नहीं
हवा को भी यह गवारा नहीं।
उलझे हुए रहे
आखिर तक मेरे खयालात
और ख्वाव भी कुछ बेतरतीब-से
मगर आवारा नहीं।
यतीम तो थे कभी नहीं,
अगरचे गोद लिए गये
फिर यतीमी का आलम
रूह पर सवार हो गया
हुस्न वीराना हुआ तो
किसी ने सवारा नहीं।
बेवजह तो मौत होती नहीं
जिंदगी के सबब को
किसी ने सही ढंग से
पुकारा नहीं।
ये जो खतो किताबत थे
मुकद्दस हर्फों का था
इनमें कोई गुजारा नहीं।
हजार बाहों से
पानी मुझे पुकारता रहा
मैरी जमीन को यह गवारा नहीं
हवा को भी यह मंजूर नहीं।
वात तो बस इतनी-सी कि
ठोकरें मुस्कुराती रहीं
घायल कदमों का
कोई सहारा नहीं।
ऐतबार की बात अपनी जगह
इस रात की हुस्न को मयस्सर
कोई चाँद सितारा नहीं।
पेन-ड्राइव में पृथ्वी: अजित आजाद: लोकार्पण क अवसर पर दूबि-धान
अजित आजाद पेन ड्राइव मे पृथ्वी :
लोकार्पणक अवसर पर दुबि-धान
-प्रफुल्ल कोलख्यान
कवि आ कविताकेँ भिन्न-भिन्न बुझबाक चाही। कविक आकांक्षा आ कविताक आकांक्षा नहि खाली भिन्न होइत छै, परस्पर संघाती सेहो होइत छैक। एहि समयमे कवि आ कविताक आकांक्षा भयावह संघातमे अछि। अजुकाक कार्यक्रममे एहि भयावह संघात पर गप केनाइ कार्यक्रम क आकांक्षाक संघातमे शामिल भेनाइ स कम नहि, ताञ एहि पर फेर कखनो। तखन कविताक आकांक्षाक किछुओ संकेत नहि केनाइ कविता पर चर्चाक एहि अवसरकेँ होहकार दिश ल जा सकैत अछि। आब, संकेत त संकेते होइत छै। खैर।
कविता क बहुत रास आकांक्षा होइत छै। ई आकांक्षा सब समय एक रंग-रूप मे नै रहैत छै। जेना जीवन बदलैत रहै छै तहिना ई आकांक्षा सेहो अपन रंग-रूप बदलैत रहै छै, जे सौभाविक। त की कविता क कोनो सार्वकालिक आकांक्षा नै होइत छैक! होइत छै। एक टा मूल आकांक्षा होइत छै। एहि मूल आकांक्षा क परिप्रेक्ष्य मे कविता क अन्य आकांक्षा अपन रुपाकार लैत रहैत छै। ई मूल आकांक्षा की होइत छै! की सब कवि क कविता मे ई मूल आकांक्षा एकहि रंग-रूप मे अनिवार्यतः होइत छै! नै। सब कवि स्वतंत्रतापूर्वक एहि मूल आकांक्षा के अपना तरहे थिर करैत छैथ, दुर्निवार स्थितिमे बदैलतो रहैत छैथ। जाबे तक कविता लिखनहार क भेट व परिचय अपन कविता क मूल आकांक्षा स नै होइत छैन,ताबे धरि ओ कवित त लिखैत रहैत छैथ मुदा ओ कवि क तरजा आ हौसला के नै गहिया पबैत छैथ, खाहे ततखनात कतेको नीक आ भावविमुगद्ध कविता लिखबा मे सफल किएक ने भ जाइथ। वचन प्रवीण भेनाइ आ कवि भेनाइ भिन्न-भिन्न गप छै। से ज नहि होइतै त तुलसीदास किएक लिखितैथ जे,
‘राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥’
किएक लिखितथिन जे हम कवि नहि छी, नहि वचन प्रवीण छी, सब कला आ विद्या स हीन छी! तैयो अहाँकेँ हमर सराहना लोक करैत अछि त बस एहि द्वारे जे हमर उक्ति राम भक्ति स समृद्ध अछि। अर्थात, संक्षेपमे ई जे कविताकेँ स्वीकार आ सराहक लेल कविताक आकांक्षा स जुड़ाव पहिल शर्त्त होइत छैक। कविताक बहुत रास गुण होइत छैक। तुलसीदासक शब्द मे कही त,
‘आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥’
नाना प्रकारक अर्थ, अलंकार, अनेक प्रकारक छंद रचना, भाव आ रस आदिस कवितामे तरह-तरहक गुण-दोष होइत छै। एहि दोष शब्द पर ध्यान दिऔ। अकारण नहि जे मैथिली समाज मे छंद क संगे एकटा आर शब्द क वेबहार होइत छै, जेना चाहक संगे ताह! छंदक संगे बेबहार होबवाला ओ शब्द थिक छल! सुच्चा कविकेँ पहिने ई स्वीकर क लेबाक चाही जे औ बाबू हमरा कवित्त विवेक नहि अछि। तुलसीदासक शब्दे कहि’त
‘कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥’
सुच्चा कविकेँ अपन कविताक मूल आकांक्षाकेँ सबस पहिने चिन्ब पड़ैत छै। अपन निजी आकांक्षा स कवित क आकांक्षा ज संघाती मुद्रामे उपस्थित होइत ओकरा कविताक आकांक्षा संग ठाढ़ हुअ पड़ैत छै। आ से अपनाकेँ कवि नहि मानल जेबाक जोखिमक शर्त्त पर ठाढ़ होब पड़ैत छै।
अजित आजाद एहि शर्त्तकेँ अपना ढंगस बुझैत छैथ। ओ बुझैत छैथ जे ‘गप बनायब, गप्पी होएब थिक, कवि होएब नहि।’ एकर कारण की! एकर कारण ई जे कवि क एक कविता हुनकर दोसर कविता क प्रसंगे अधिक आधिकारिक तौर पर अपन अस्तित्व क अर्थ पबैत अछि। से अर्थ पबैत छैथ कविताक मूल आकांक्षाक सातत्य मे। ई मूल आकांक्षा मालाक सूत जकाँ कवि क कविता के काव्य शृँखला मे जनमैत रह देबाक अवसर दैत छै।
आधुनिक, उत्तरआधुनिक वा पराधुनिककालमे कविता क मूल आकांक्षा प्रथमतः आ अंततः ओकर विचारधारा मे प्रगट होइत छै। कविताक संभवाना त भावधारामे सन्निहित रहैत छै, मुदा कविता क ई संभवाना अपन सार्थकता क संतोख त विचारधारा स जोग-लगन में पबैत अछि। संकेत मात्र स काज चलि जाएत जे दुनिया विचार संदर्भे जाहि पिच्छर जमीन पर पहुँचाओल गेल अछि ओहि मे मुख्य विवादक कारण विचार नै धारा छै। बहुतोक लेखे विचार आ विचारधारा मे कोनो अंतर नै। एहि बात पर ध्यान रखनाइ जरूरी जे सदखनि त नै, मुदा अधिकाँशतः भाव अपना केँ विचार क पोशाक मे उपस्थित करैत अछि। धारा ओहि पोशाक केँ छिन्न-भिन्न क भावक अनित्यता वा क्षणभंगुरताक पोल खोलि दैत अछि। ताञ, विचार स ततेक परहेज नै, विचारधारा स परहेज। प्रसंगे कही त आइ काल्हि त कोनो प्रसंग पर विचार पुछनिहार कतेको भेट जेताह, मुदा विचारधारा पुछनिहार शायदे संयोगे।
त! की होइत छै विचारधारा? संसार मे विचारधारा बहुतो रास छैक, असल मे ओकरा उपविचारधारा कहनाइ अधिक उचित। दू टा मूल विचार छै। वस्तुवादी आ भाववादी। अर्थात, वस्तु स भाव क जन्म होइत छै अथवा भाव स वस्तु क? एत एहि पर वेसी विवेचनक गुंजाइस नहि। तथकन ई कहब जे रोटी आ राम एक दोसरक विकल्प नहि भ सकैत अछि। निवेदन ई जे रोटियोकेँ कने वृहत्तर अर्थ मे लेल जाए आ रामकेँ सेहो वृहत्तर अर्थ मे लेल जाए। कने दृढ़तापूर्वक ई कहब जरूरी जे रामसँ बैर नहि मुदा, अजित आजादक कविता का मूल आकाँक्षा प्रथमतः आ अंततः रोटी छैन। जेना राम एकटा सुंदर भाव तहिना रोटी एकटा जरूरी विचार।
भगवान कहलखिन त कहलखिन! आइ काल्हि त सब शक्ति-स्रोत स जुड़ल लोक सब त सब अबल-निबलकेँ इएह कहै छै ने जे भगवान कहलखिन्ह,
‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।’
सब धर्मक परित्याग करैत हमर शरण में आउ? हम अहाँकेँ सब पाप स मुक्त क देब। चिंता जुनि करी। शक्ति-स्रोत स जुड़ल लोक सब अपनाकेँ भगवान स कम की बुझैत छैथ! मनुखक क शरण मे मनुखकेँ जेबाक बाध्यता स बचेबाक संघर्षोकेँ सभ्यताक मूल संघर्ष के रूपमे चिन्हबाक चाही। चिन्हबाक चाही एहि संघर्ष केँ। सभ्यताक प्रांगण मे अनवरत चलि रहल एहि रण केँ। एहि रणकेँ ज नहि चिन्हि सकै त चारण होइ मे कतेक देरी! विकल्प कोनो नहि, रण चारण! अजित आजाद एहि संघर्षकेँ नीक जकाँ बुझैत, भने रेखांकित करैत छैथ, ‘वर्त्तमान मे कविताक नाम पर दू टा प्रवृत्ति मुख्य रहि गेल अछि – रण अथवा चारण। हम अपनाकेँ पहिल कोटि मे रखैत छी।’ ओ अपन पक्ष आ प्रवृत्तिकेँ बिछ लैत छैथ, बिछि छैथ अपन विकल्प। हुनकर कविताक मर्म के बुझबा लेल एहि विकल्पक महत्त्व आ एहि स्वीकारक मर्मकेँ बुझ पड़त! ओ अपन कवितामे एहि विकल्पक चयनक संदर्भमे विचार’क महत्त्वकेँ बुझैत छैथ आ समयक आँचर मे लागल अहगराहीक आँच काटिक कविताक मनोरम जगत दिश नहि बढ़ चाहैत छैथ। ताञ ओ कहि सकैत छैथ जे, ‘कवितामे ‘विचार’ एकटा विचारणीय (जरूरी) पक्ष थिक। किछु गोटे विचारकेँ कविता पर ‘भार’ (अनावश्यक लदनी) जकाँ बुझैत छथि आ एहिसँ अपनाकेँ कतियौने रहैत छथि।’
कतेक चाही? हम पूछै छी अपना के, अहाँ पूछू अपना के। अजित आजाद पुछलैन अपना के! ‘बेसी किछु नहि’ कविताकेँ देखल जाए-- ‘नहि, एतेक प्रशंसा नहि/ नहि, एतेक निंदो नहि/ / नहि, एतेक भूख नहि/ नहि, एतेक तृप्तियो नहि/ / एतेक आकुलता, एतेक निश्चिन्ति सेहो नहि किन्नहुँ/ / नहि, किछु नहि एतेक/ जतबे जीवन, ततबे किछु/ जीवनक अनुपातसँ बेसी किछु नहि/ अपन दुनू हाथसँ बेसी किछु नहि।’ ताइं, ‘अपेक्षा’ ‘साँस भरि/ श्रम// श्रम भरि/ आराम// आराम भरि/ निन्न// निन्न भरि/ अन्हार// इजोत भरि/ जीवन// जीवन भरि/ सुख// दुख ओतबे भरि/ जतबे भरि मोन रहय ई सभ।’
विडंबना ई जे आजादी क संग गठित नव भारत-राष्ट्र मे हमर सभक भाषा चिर स्थगन मे समा गेल। भाषा किछु शब्द आ वाक्य-विन्यास नहि होइत छै। भाषा सभ्यताक एकटा अध्याय होइत छै। जे भाषा संस्कृत सनक समृद्ध आ शक्तिशाली भाषा स भिन्न भ ओकर चुनौतीक मुकाबिला करैत जीबैत आ स्वयं-समृद्ध होइत चलि आयल ओ झाजाद भारत-राष्ट्र मे स्थगन आ कुपोषणक शिकार भ गेल! ओकरा जीवन व्यवहार स बाहिर क देबाक सबटा ब्यौंत भ गेल! जीवन व्यवहार स भाषाकेँ बाहिर केनाइक मतलब एकटा जीबैत समाज आ सामाजिकता केँ बहिष्कृत क देनाइ स कम की? ‘पितरकेँ अर्घ्य नहि/ भाषा चाहियनि/’ पितर के? पितर जिनका लेल बँसवारि एकटा कामना छलैन विचार छलैन वंश-वृद्धिक! गवाही अजित आजादक कविता, ‘कोहबरमे कोपड़ायल बाँसक/ चित्र बनबैत काल/ विधकरीक मोनमे अवश्ये हेतनि आयल/ वंश-वृद्धिक मंगल-विचार/ एकटा कामना थिक बँसबारि/ से बुझबामे भांगठ नहि अछि आइ’। पितर के? पितर जे आजाद भारत-राष्ट्र क स्वप्न देखलैन, जे ओहि सपना लेल रण केलैन! ज पितर केँ ठीक स चिन्हियैन त सते वाकहरणक शिकार भेल पितरकेँ अर्घ्य नहि, भाषा चाहियनि। मिथिलांचल दू राष्ट्रमे बँटि गेल! ओहू स बेसी दुखद आ कष्टकर ई जे मैथीली जातीयताक बोध नहि विकसित भ सकल ओहि फर फेर कहियो।
कवि अपन समय आ समाजक सौंदर्यबोध आ आनंद संदर्भकेँ बुझैत बदलैत रहैथ छथि। कवि स्वानुभूतिकेँ अनकर तदानुभूति मे बदलैत ‘आनंद’ आ ‘मजा’ क छूटल वा ओझल क्षितिजक ईशारा करैत रहैत छै। बोध करबैत रहैत छै जे, बहुत कुछ पाबि गेलाक बादो एहि जीवनमे कते किछु स्पृहणीय छूटल रहि जाइत छै! सबूत! ‘यात्रा’ कविता! ‘दलिसगा संग/ उसना भदइक भात आ अल्लुक सन्ना/ खयने छी की अहाँ/ खेतक आड़िपर बैसिक’/ मरुआ रोटीक संग नून-तेल-मिरचाइ/ आ कि कोनो मेला मे गमछा पसारिक’ मुरही-लाइ/ खयने छी अहाँ/ / हम खयने छी’।
की हम सब सते पनिमरू भ गेल छी! नहि कोना! नहि ई त ई बाल किएक जे, ‘बिसलरी पिबैत जल-मन्त्री/ बोतलक पेनीमे छोड़ अइँठ पानि/ आस्वासनक मुद्रामे उछालि दैत छथि/ बोतलक ठेपी खोलैत जनता/ तृप्त-तृप्त होइत/ बिदा भ’ इत अछि धरिया बन्हैत’। एक समय उनिभू (उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण) क शुरुआती दौरमे ट्रिकिल डाउन क आर्थिकीक बड्ड चर्च-बर्च रहै। ट्रिकिल डाउन क आर्थिकीक आइ कोनो तेहेन चर्च-बर्च त नहि, मुदा हाल त उएह!
तखनि, ई कखनो संभव नहि जे कोनो कविक सब कविता समान रूपेँ महत्त्वपूर्ण आ स्वीकार्य हो। प्रकृत कवि आ उपकृत कविक फर्क पर फेर खनो, अखैनत ई कह चाहै छी, जेना प्रकृति मे उपलब्ध बहुत रास उपादान हमरा पहुँच आ अवगैत स बाहर रहि जाइत अछि. तहिना प्रकृत कविक बहुत रास कविताकेँ बुझाबाक चाही। ‘शारदा सिन्हा’ बहुत महत्त्वपूर्ण आ प्रभविष्णु कविता बनैत-बनैत अंत मे कविक अपन भावातिरेक मे अपरतिभ समाहारक शिकार भ जाइत छैक। कविता मे कवि हुसि कत जाइत अछि एहि दृष्टि-बोधक लेल एहि कविताकेँ बेर-बेर पढ़बाक चाही।
कहब, अनावश्यक जे हमरा साहित्य आ कविताक प्रगाढ़ बोध नहि। मैथिलीमे त एकदमे नहि। एक टा पाठकक रूपेँ जे बुझमे आएल से कहलौँ। एकरा बस लोकार्पणक अवसर पर बस दुबि-धान बूझि। कहबाक मौका दौलौं, आभार।
मेरी खामोशी और असूयापन
मेरी खामोशी और मेरा असूयापन!
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यकीन मानें मेरा
जब आप मेरा मर्सिया पढ़ रहे होंगे
मैं कुछ नहीं बोलूंगा
यकीन मानें मेरा
जब आप मेरा मर्सिया पढ़ रहे होंगे
मैं कुछ नहीं सुन रहा होउंगा
आप जानते हैं और
कवि ने भी पहले ही कहा है
मुर्दा कुछ नहीं बोलता
मुर्दा कुछ नहीं सुनता है
कुछ नहीं बोलना
कुछ नहीं सुनना
मरे हुए की खास पहचान है
यकीन मानें मेरा
मैं कुछ नहीं बोलूंगा उस वक्त
मैं कुछ नहीं सुनूंगा उस वक्त
यकीन मानें मेरा
वैसे इस वक्त भी मैं
कहाँ कुछ बोलता हूँ !
वैसे इस वक्त भी मैं
कहाँ कुछ सुनता हूँ!
मैं बिना कुछ बोले
बिना कुछ सुने
जीने की जुगत में लगा रहता हूँ!
मेरा मर्सिया पढ़ रहे हों तो
ईश्वर से मेरी माफी की प्रार्थना करें
मेरा ईश्वर क्रोध में है
ईश्वर जिसने मुझ को कान दिया
ईश्वर जिसने मुझ को जुबान दिया
मेरे जीने की इस जुगत पर
मेरा ईश्वर क्रोध में है
फिर भी आप
जब आप मेरा मर्सिया पढ़ रहे हों
मेरी माफी के लिए प्रार्थना करना
सच कहता हूँ, डर लगता है
सच कहता हूँ, डर लगता है
जी! सच कहते हुए डर लगता है।
डर लगता है
उनको फूल देते हुए जो खडगहस्त हैं
डर लगता है
रंगों की बात चलने पर
एलर्जी का डर लगता है
डर लगता है
मचलते हुए देखकर
घर के चिराग से
घर को आग लग जाने का
डर लगता है
डर लगता है
उत्सव में उत्तेजना से
डर लगता है।
सच कहता हूँ, डर लगता है
जी! सच कहते हुए डर लगता है ।
ओ इक्कीसवीं सदी! सुन रही हो!
ओ इक्कीसवीं सदी!
सुन रही हो!
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यह काम्य तो नहीं था
मगर तीनों सीख बापू के।।
इस तरह जीना तो नहीं !
मगर रास्ता ही क्या
बचा रह गया है
ओ अन-अभिव्यक्ति की सदी
इक्कीसवीं सदी!
अश्रव्यता की सदी
इक्कीसवीं सदी!
अदृश्यता की सदी!
इक्कीसवीं सदी!
लेखन और आलोचन
आलोचक का दायित्व है कि अपनी पहल पर साहित्य को पढ़ने की कोशिश करे और नये पुराने के बीच तारतम्य की तलाश करे। लिखना एक कला है और पढ़ना भी। लेख लिखने के बाद उस रचना विशेष के लेखन के कला दायित्व से मुक्त हो जाता है और पाठक उस रचना विशेष से आनंद (कभी-कभी मजा) से तृप्त हो जाता है। हर तृप्ति अपने असर में अतृप्ति की गुंजाइश और ललक छोड़ जाती है। आलोचना इस अतृप्ति को साथ लेकर तृप्ति की नई संभावनाओं की तलाश में सृजन के ज्ञात परिप्रेक्ष्य के समकक्ष रचना को समुपस्थित करता है। बातें और भी हैं, संक्षेप में यह कि रचना की आलोचना कार्य तो है भी किसी तरह, लेकिन अनुकंपा तो कभी नहीं, कभी नहीं। संदर्भ महत्वपूर्ण है, विस्तार से लिख सकूँ तो धन्य कोई और लिखे तो कृतकत्य!
इसको भी सलाम! उसको भी सलाम!
क्या महान दृश्य है!
क्या महान दृश्य ॥
जाल में हिलोर मारती मछलियाँ
रसोइये की सलाहकार!
क्या महान दृश्य है!
इसको भी सलाम!
उसको भी सलाम!
जाने अब क्या देखता हूँ!
इनको भी देखा
उनको भी देखा
यह मुल्क अब करे तो क्या करे
तेरी रहनुमाइयों का यह कमाल कि
अब मसीहाई का कोई इंतजार नहीं
शहर सुंदर बनेगा बेदाना बनाकर
और गाँव रहेगा शहर से बेगाना होकर
ये हौसला तेरा और तेरा इकबाल
पिटकर मरेगा सिपाही
घर रह जायेगा कैदखाना होकर
इनको भी देखा
उनको भी देखा
यह मुल्क अब करे तो क्या करे
हिंदुस्तान भी बना लिया
पाकिस्तान भी बना लिया
तेरा रसूख कि मुल्क रह गया
सियासत का निशाना बनकर।
वे दिन जो अब यादों में बचे रहे
वे कुछ दिन थे
अच्छे या जैसे भी थे
थे मगर इस लायक कि बचे रह गये
बचे रह गये यादों में
जब कभी आघात लगता है
मन उन्हीं यादों के दरमियान होता है
चलती है हवा जैसा कि स्वभाव है
हरा भरा कर देती है
कहा था बहुत व्याकुल होकर
कान्हा ने राधा से
हालांकि सामने थी रुक्मिणी
ऐसा दादी ने कहा था
कहा था कान्हा ने
सर्ब सुवर्ण की बनि द्वारिका, गोकुल कि छवि नाहीं
ऐसी बात
सिर्फ राधा से ही कही जा सकती है
भले ही माध्यम रुक्मिणी हो
जब कहती है रुक्मिणी कि
जब इतना प्यारा था गोकुल
तो फिर डगरे क्यों कन्हैया!
कहे भले रुक्मिणी
मगर असल में उलाहना देती है राधा
उलाहना राधा का हक है
रुक्मिणी माध्यम
अब दादी रही नहीं
इस तरह
कहने सुनने का रिवाज भी नहीं रहा
वे कुछ थे जो यादों के दरमियान हैं!
इस ना-उम्मीद समय में प्रार्थना
भीड़ चाहे जितनी भी बड़ी हो
भीड़ का कोई कंधा नहीं होता
भीड़ के पास मार होती है
भीड़ के पास सम्हार नहीं होता है
राजा के पास
बेकाबू भीड़ न फटके
पूरा इंतजाम होता
राजा अपने बचाव में
प्रजा को भीड़ में बदल देता है
भीड़ में बदलने और भीड़ से बचने
को सियासत कहते हैं
हो सके तो भीड़ में बदले जाने से
खुद को बचाना
भीड़ में बदले जाने से खुद को बचाना
तुम जो नागरिक हो
आखिरी उम्मीद हो
उम्मीद हो मेरी जान
इस ना-उम्मीद समय में प्रार्थना!
सियासत और भी है, बगावत और भी है!
कभी-कभी ऐसा भी होता है! सुनो शोना... !
कभी-कभी ऐसा भी होता है!
सुनो शोना!
कल वल्लभ जी आये! बात-चीत होती रही। साहित्य, हिंदी साहित्य, से जुड़ी बात-चीत! जाते समय अपनी कविताओं की निहायत पतली-सी पुस्तिका दे गये --'सुनो शोना...!'
उलटने-पुलटने के लिहाज से उठाया तो बस इश्क के आकाश के एक अजाने-से क्षितिज के पार बढ़ता ही चला गया! इश्क की खोई हुई-सी जमीन जैसे बिछती चली गई! बाकी बातें विस्तार से तो फिर कभी, अभी तो इतना ही कि निस्संदेह ये कविताएँ हिंदी कविता के रकवा में एक नया एहसास है, कम-से-कम हिंदी कविता के मेरे अपने पाठानुभव के हासिल में तो जरूर। वल्लभ को धन्यवाद क्या कहूँ जिसने इश्क की टीस को एक लंबी पुकार से जगा दिया, पुनरुज्जीवित कर दिया। अलवत्ता, हरे प्रकाश उपाध्याय (संपादक, मंतव्य, लखनऊ) और गणेश गनी (साहित्यिक संपादक, हिमतररू, हिमाचल प्रदेश) के प्रति आभार प्रकट करना निहायत जरूरी है कि उन्होंने इस पतली-सी पुस्तिका का फ्लैप लिखकर इन कविताओं को पढ़ने की प्राथमिक प्रेरणा दी।
कभी-कभी ऐसा भी होता है शोना! 'सुनो शोना...!'
सुनो शोना!
चंद लम्हे उधार लेकर हयात से
कुछ हर्फ़ बोये थे तसव्वुर के..
अब, जब नज़्म खिलती है
तो तोड़ लेता हूँ
तुम्हारे सिरहाने छींटने के लिए।
नदी मिट्टी हो गई!
नदी मिट्टी हो गई!
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पुरखों ने उसी के सहारे जिंदगी काटी
कभी दिशा पकड़कर तो
कभी-कभी विपरीत जाने की कोशिश में भी
हो जो भी मगर सच है कि
पुरखों ने उसी के सहारे जिंदगी काटी
ऐसा पिता ने कहा था
नदी जो बाहर पानी की तरह बह रही है
जिस्म के भीतर वही खून बनकर बहा करती है
नदी पानी की तरह बहती रही
पानी की तरह बहना
एक खतरनाक मुहावरा बन गया
इस सभ्यता में
इतना खतरनाक कि
पानी का पानी की तरह बहना मंजूर नहीं रहा
इन दिनों जब सभ्यता शहरों में रहने लगी
एक दिन खबर आई
खबर में इस सभ्यता की जान है
खबर आई कि नदी मिट्टी हो गई
अचानक नहीं हुआ
मगर होते-होते यह हो गया कि
नदी मिट्टी हो गई
कुछ लोगों ने कहना शुरू किया कि
नदी मिट्टी हो गई यह सच नहीं है
सच है कि नदी हो गई मिट्टी
बहस चलती रही माध्यमों के सहारे
बहस में इस बात पर मिट्टी पड़ी रही कि
नदी जो पानी बनकर बहा करती है बाहर
वही खून बनकर बहा करती है जिस्म के अंदर
तो फिर उस खून का क्या हुआ
जो भी हो नदी मिट्टी हो गई!