आप की राय सदैव महत्त्वपूर्ण है और लेखक को बनाने में इसकी कारगर भूमिका है।
सीविल सोसाइटी साहित्य और साहित्यकार
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खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन
खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन
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जब कभी
अत्याचार की घटनाओं की खबरों से
टूटता है मन, परत-दर-परत
खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन
जीने के लिए बेहद जरूरी
और न्यूनतम जो खुशियाँ
आँख की कोर में सहेजकर रखता हूँ
जैसे पोखरिया सहेज कर रखती है जीरा
तपत नोर में
मछलियों की तरह
तड़फड़ाती है खुशियाँ
तड़पती है खुशियाँ
पोखरिया सिकुड़कर
कराही में तबदील हो गई जैसे
और तुम्हारी मुसकान उग्र भट्ठी में
मन तड़पता है कि
क्यों नहीं मुसलमान हुआ
क्यों नहीं दलित हुआ
औरत ही क्यों नहीं हुआ
आदि, आदि इत्यादि
कम-से-कम
अत्याचारियों के समूह में
गिने जाने से खुद को बचा ले जाता
अंधेरे के सच और उजाले के झूठ में फँसकर
मन ही बौड़म बना है, मालिक
अत्याचार पीड़ित को मेरा मन इंसान नहीं मानता
अत्याचार पीड़ित का मन मुझे इंसान नहीं मानता
आग में घिरे गऊ-गृह के बीच
खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन
भाषा और पेशागत व्यवहार पेशा के परिसर में भाषा लाचार
भाषा और पेशागत व्यवहार
पेशा के परिसर में भाषा लाचार!
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जीवन में भाषा का बड़ा महत्त्व है। हम किस
तरह की भाषा में और कैसे लोगों से बात करते हैं। लोगों से हमारा संबंध इस बात पर
निर्भर करता है। पेशागत लोगों से जैसे वकील, पुलिस,
डाक्टर, अध्यापक या अफसर बाबू से हम किसी
प्रयोजन से बात करते हैं तो उनका भाषागत व्यवहार या तेवर कुछ इस तरह का होता है,
जैसे सामनेवाला निरा मूरख है। मूरख है, लाचार
भी है। मूरख या लाचार होना चरित्र की दुर्बलता का सूचक नहीं हो सकता और न ही इस
बिना पर किसी के साथ हीन व्यवहार करने का किसी को कोई हक मिलता है। यह संभव है कि
उपस्थित संदर्भ में वह निरा अज्ञानी हो, जैसे बहुत बड़ा
अध्यापक, बिजली तार जोड़ने के मामले में अज्ञानी हो या कोई
डाक्टर अपने देश के इतिहास की बारीकियों को नहीं जानता हो। यह हम कब समझ पायेंगे
कि कोई मूरख, लाचार, निर्धन भले हो वह
मनुष्य है। भारत के संदर्भ में कहें तो भारतीय है, उसी तरह
से और उतना ही जिस तरह से ज्ञानी गुनी, समर्थ और धनवान होते
हैं। एक ही संविधान से शासित हैं हम, एक ही हमारा आधार है एक
ही हमारा आकाश है, एक ही क्षितिज है एक ही विरासत है। हो
सकता है मैं गलत होऊँ, लेकिन मुझे लगता है कि अपढ़ या अनपढ़
लोग इस देश की उतनी बड़ी समस्या नहीं हैं जितनी बड़ी समस्या पढ़े लिखे लोगों
निरक्षराचारण है, समाज के प्रति, उपलब्ध
संसाधनों के प्रति। निरक्षरता और मूर्खता में कोई अनिवार्य या जिसे कहते हैं
अन्योनाश्रित संबंध नहीं होता है।
बहरहाल, हम
साहित्य के संदर्भ में सोचें। आज साहित्य पर भी पेशेदारी का कोई कम दबाव नहीं है।
अच्छा है, या नहीं इस पर अलग से बात हो सकती है, लेकिन
पेशागत विशेषज्ञता, कई बार दंभ और भ्रम से भरी विशेषज्ञता के
भी दबाव में साहित्यकार भी आ गये हैं, इससे इनकार नहीं किया
जा सकता है। कई बार अपने पाठकों से, अगर कभी जीवन में उससे
मुलाकात हो जाये तो, हमारा पेशागत दुर्दमाीय बरताव पाठक को हम
से पिंड छुड़ाने में ही अपना भला होने के निष्कर्ष तक अविलंब पहुँचने की प्रक्रिया
में जुटा देता है। अन्य पेशादारों को झेलना उसकी दैनंदिन जरूरतों को पूरा करने की
मजबूरी होती है, तो उसे झेल लेता है। साहित्य उसकी किसी दैनंदिन जरूरत से जुड़ा
हुआ नहीं होता है। हाँ, कोई साहित्य का कक्षा विद्यार्थी या
फिर परीक्षार्थी हो तो बात और है। तो, क्या हमें अपने पाठकों और श्रोताओं पर
बौद्धिक अतिक्रमण से बचने की सावधान कोशिश नहीं करनी चाहिए! करनी चाहिए, बहुत सावधानी से यह सतर्क कोशिश करनी चाहिए। एक संदर्भ देता हूँ। तथाकथित,
हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन में जो श्रोता जाते हैं, वे अधिकतर मामले में समाज के समर्थ लोग होते हैं। उन कवियों के अर्थ-भार
को उठाने में कुछ हद तक सक्षम भी होते हैं, कई बार उठाते भी हैं। इसलिए उनके प्रति
उनका व्यवहार चारण जैसा होता है। इस चारण वृत्ति से उनकी कोई बुनियादी वृत्ति
संतुष्ट होती है। प्रसंगवश, भाषा में भाट और चारण इतनी बार
साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं, तो उस का कोई तो कारण होगा। हम जैसे खुद को गंभीर और
प्रगतिशील माननेवाले लोगों के जो श्रोता होते हैं वे भिन्न प्रकार के होते हैं और
हम उनकी उस तरह की बुनियादी वृत्ति को संतुष्ट नहीं करते हैं। ऊपर से बौद्धिक
अतिक्रमणवाला आपत्तिजनक आचरण, हर बार नहीं भी तो अधिकतर बार,
उन्हें हम से दूर कर देता है। हमें अन्य पेशादारों, यदि हम खुद को भी पेशादार मानते हों तो खासकर, अपने
पाठक (जिसे हम अचेतन रूप से ही सही हम अपना क्लाइंट मानने लगे हैं, हालाँकि वह
इसके निकृष्टतम अर्थ में भी क्लाइंट होता नहीं है) जैसे व्यवहार से बचना चाहिए।
पेशा के परिसर में भाषा के लाचार हो जाने की स्थिति से
अपना मन खिन्न है, दूसरे की खिन्नता की थोड़ी परवाह जरूर है! इसलिए, ये सारी बातें
मैं अपने जन-व्यवहार के लिए सोच रहा हूँ, किसी
अन्य के लिए नहीं। किसी अन्य के या आप के भी काम आ जाये तो क्या कहने!
एक
बात और। पढ़-पढ़कर बोलता नहीं हूँ, बोल-बोलकर लिखता नहीं हूँ। हमेशा भवानीप्रसाद
की चुनौती की याद रहती है कि जैसा बोलता है, वैसा लिखकर देख,
जैसा लिखता है वैसा बोलकर देख। वैसा कर के देख। मुझे मानने में कोई
संकोच नहीं कि मैं अक्सर इस कसौटी पर खुद को खोटा साबित होता हुआ पाता हूँ।
राजा को तुरंता सपना आया
राजा को तुरंता सपना आया
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यह एक कहानी है। कहानी में एक राजा है। सपना किसी को आ सकता है। तो, राजा को सपना आया। सपना सचमुच का आया। तुरंता सपना। सपना आया कि वह अपना हुलिया बदलकर प्रजा का हाल चाल और माल मलाल का जायजा लेने निकल पड़ा है। वह एक बगीचे में खड़ा है। देखता क्या है कि एक आदमी ऊपर से गिरा और धम्म की आवाज हुई। इस आवाज से सपना थोड़ा डोल गया, लेकिन रुका नहीं। वह सपना में करुणा से भीग गया। ध्यान रहे, यह कहानी है। सपना कहानी का हिस्सा है। इसका मिलान सच से करना बचकाना है। तो, करुणा से भीगा हुआ राजा आदमी के पास पहुँचा। राजा ने आदमी से पूछा, अबे क्या हुआ! आदमी चुप। गुस्ताख के चुप रहने से राजा को गुस्सा तो बहुत या लेकिन क्या करता। हुलिया बदल कर हाल जानने निकला था सो बेबस था। उसके अचरज का ठिकाना नहीं रहा जब उसने गौर किया कि वह रो भी नहीं रहा था। ऐसा तो होता ही है कि कोई किसी चीज पर गौर करने से अचरज से भर जाये। तो, राजा भी अचरज से भर गया। करुणा जब अचरज से भर जाये तो क्या होता है, आप जानते हैं। यह मियादी बात है। उसने आदमी से पूछा तू रो क्यों नहीं रहा है बे। आखिर तू इतने ऊपर से गिरा है। अब उस आदमी ने चुप्पी तोड़ी, कहानी में। उसने कहा, मैं रोऊंगा तो राजा की बदनामी होगी। लोग कहेंगे इस राजा के राज में आदमी रोता है। कुत्ता रोने से दूसरे का अशुभ होता है, आदमी के रोने से उसके खुद का अशुभ होता है।
राजा ने सोचा। सपना में सोचा। आदमी समझदार है। इस राज में समझदार लोग कम हैं। नहीं रोने से भी तो राजा की बदनामी होगी। लोग कहेंगे इस राजा के राज में रोने पर भी बंदिश है। आदमी फिर चुप। राजा को फिर गुस्सा आया। हुलिया बदलने से क्या होता है, गुस्सा तो राजा को आता ही है, बात-बात में। बहुत डराने पर आदमी ने कहा मैं कुछ भी बोलूंगा तो उसे राजा के पक्ष में याा फिर विपक्ष में घसीट ले जायेंगे। इस घसीटा-घसीटी में मेरा पक्ष तो खो ही जाता है। मेरा भी कोई पक्ष हो सकता है, यह कोई मानता ही नहीं है। मेरा पक्ष खो गया है। जिसका पक्ष खो जाये उसके लिए खामोशी ही एक मात्र सहारा है। इतने में राजा की आँख खुल गई। आँख खुल जाने के बाद सपने रफूचक्कर हो ही जाते हैं। कभी-कभी नींद भी उड़ जाती है।
दूसरे दिन राजा को फिर सपना आया। सपना में राजा ने दरबारियों को सपना का सच बताया। किसी दरबारी ने मुंह नहीं खोला। राजा ने पूछा कि क्या तुम लोगों का भी पक्ष खो गया है। जवाब कोई नहीं था। लेकिन राजा को गुस्सा नहीं आया। राजा के कान में अपनी ही आवाज आती रही। दरबारी अपनी मुंडी धुनते रहे। उधर, अपनी प्रतिध्वनि से राजा को लगता रहा कि सभी बोल रहे हैं। बोल ही नहीं रहे हैं, खुशी से झूम भी रहे हैं। अगले दिन राजा को क्या सपना आयेगा यह बाद की बात है। जब आयेगा, तब आयेगा। फिलहाल, अपनी मुंडी धुनते रहिये। ध्यान रहे, राजा को सपना आया। सपना में यह सब हुआ। यह तुरंता सपना में सच की कहानी है, सच में तुरंता सपना की कहानी।
बहुत घुटन है
बहुत घुटन है
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बहुत घुटन महसूस कर रहा हूँ, इन दिनों। बात दिल्ली की है, लेकिन दिल्ली तक सीमित नहीं है। जीवन के व्यापक धरातल पर इसे देखने की कोशिश की जानी चाहिए। हम साहित्य से जुड़े लोग हैं। हमारे पास इनपुट तो बहुत सारे स्रोत से मिलते रहते हैं, लेकिन साहित्य में उसका समावेश या निवेश एक भिन्न तरह से होता है। मैं पत्रकारिता पर बात करने की स्थिति में नहीं हूँ, हैसियत भी नहीं है। इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि पत्रकारिता को अपने स्रोत से जिस तरह का इनपुट मिलता है, उसे हू-ब-हू न भी तो प्रस्तुति की शैली और संपादन में थोड़े-से बदलाव के साथ पत्रकारिता उसे प्रस्तुत कर सकती है। साहित्य ऐसा नहीं कर सकता है। साहित्य सूचित करने तक सीमित नहीं रह सकता है, बल्कि संवेदित करने के दायित्व से बंधा होता है। भाषा के जानकार बताते हैं, सूचना शब्द सूई चुभोने से विकसित हुआ है और आज एक नितांत स्वायत्त अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है। लेकिन इसके मूलार्थ को एकदम से भूला ही न दिया जाये तो कहना चाहता हूँ कि सूई चुभोने का असर तो तभी हो सकता है न जब वह संवेदनशील या जीवंत जगह पर चुभोई जाये। संवेदनहीनता की पहचान है, सूचना में सूच्यता का न बच पाना। सूच्यता पर गौर करना होगा, शुचिता पर भी गौर किया जाना चाहिए। घुटन इसलिए महसूस होती है कि संवाद के माध्यम जितने विकसित और बढ़ते जा रहे हैं, व्यापक होते जा रहे हैं, संवाद के अवसर उतने ही कम होते जा रहे हैं। संवाद में असर, या कहें संवाद का असर उतना ही कम होता जा रहा है। विश्वास और भरोसा के अभाव में संवाद हो नहीं सकता और संवाद माध्यम, इसे मात्र पत्रकारिता से ही सीमीत कर न समझा जाये, विश्वास की रक्षा कर नहीं पा रहे हैं। विश्वास और भरोसा को सिर्फ और सिर्फ व्यवहार ही बहाल कर सकता है। हमारे नागरिक व्यवहार में क्या कुछ कमी रह गई है या रह जाती है इस पर जरूर गौर करना चाहिए कि विश्वास का कच्चा घागा कमजोर होता चाला जा रहा है। यह काम खुद ही कर सकते हैं, हमारे एवज में कोई अन्य इस काम को कर ही नहीं सकता है। साहित्य तो आज हास्यास्पद हो जाने की हद और शर्त्त तक हँसने-हँसाने तक सीमित होकर रह गया प्रतीत होता है। विदूषक में भी विद्वता तो होती है, लेकिन वह अपने विदूषण से अन्य का दोष दिखलाकर रुक जाता है, चुक जाता है। साहित्य सिर्फ विदूषण नहीं होता, न साहित्यकार विदूषक होता है। वह जय-पराजय, गुण-दोष के पार जाकर अपने श्रोता को आत्मावलोकन की स्थिति में ला खड़ा करता है। बाहर शोर बहुत है, आत्मावलोकन की जिस स्थिति तक श्रोता या पाठक को ले जाने की उम्मीद साहित्य से होती है, इस उम्मीद पर खुद बहु-प्रचारित, बहु-मान्यता प्राप्त या बहु-पुरस्कृत साहित्यकार भी कम ही खरा उतर पाते हैं। संकट यह भी है। साहित्य तो रोने और रुलाने तक विस्तृत होता है, हँसने-हँसाने तक उसका सीमित होते जाना साहित्य का दुखद प्रसंग है। इसलिए, घुटन का असर बढ़ता जा रहा है। भू-पर्यावरण के असंतुलन के कारण घुटन के बढ़ते हुए दायरे से कम घातक नहीं है, सभ्यता और संस्कृति के पर्यावरण में बढ़ते असंतुलन के कारण घुटन का यह बढ़ता हुआ दायरा। यह नागरिक जीवन-चर्या की बात है, इसे राजनीतिक दायरे में समेट कर देखना इस बात को अपटी खेत में मार देने के बराबर है।
अल्फाज थोड़े इधर-उधर हो सकते हैं, लेकिन भावार्थ नहीं, (Noor Mohammad Noor) नूर मुहम्मद नूर का एक शेर य़ाद आ रहा आज बहुत आपको भी सुनाता हूँः
बहुत घुटन है, मकीनो तुम्हारी बस्ती में
कोई राह निकालो, इक जरा सी हवा के लिए
जिंदगी इन दिनों, जीवन के अंदर, जीवन के बाहर
इन दिनों जिंदगी के लिए
नया ककहरा बन रहा है
अद्भुत है इसकी सिसकी
इसकी बारह-खड़ी
जितनी जोर से
चीख निकलती है बाहर
उतनी ही खामोशी से
सन्नाटा पसर जाता है अंदर
किसी संवाद में नहीं है
बाहर भीतर
जिनके हाथ में झंडे हैं,
किसी भी रंग के
उनके पास कान नहीं हैं साबूत
जिनके पास कान हैं बचे हुए थोड़े भी
उनकी जुबान नहीं
भाषा की चौहद्दी में
भाषा जय जय में सिमटकर रह गई है
जीवन जय के वेष में
क्षय की शंकाओं से ग्रस्त
ऐसे में
कविता कैसे
पढ़ी-पढ़ाई जाती होगी
कक्षाओं के अंदर,
बाहर पढ़ाये जाने का
रिवाज नहीं रहा!
कविता
न चीख में बची है
न सन्नाटा में
इस ककहरा को सीखने
इस बारह-खड़ी को सीखने
लायक बचा क्या है!
जीवन के अंदर
जीवन के बाहर!
साहित्यकार का सपना और राजनीति का भ्रम
साहित्यकार का सपना और राजनीति का भ्रम
प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan
प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan
साहित्यकार का सपना और राजनीति का भ्रम
साहित्यकार का सपना और राजनीति का भ्रम
प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan
प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan
संवाद जरूरी है
जिंदगी को हर पल जीना होता है। संघर्ष और कर्तव्यबोध से भरी हुई जिंदगी हमेशा सक्रिय प्रेरणा हैं। कई बार आदमी अपने अनजाने भी ऐसा कुछ कर जाता है जिसके दूसरे के लिए महत्त्व का पता उसे खुद भी नहीं होता है। जब पीछे मुड़कर, थोड़ा
ठहर कर सोचता है तो कभी-कभी खुद भी अचरज से भर जाता है कि यह मैंने किया है। हाँ यह मुड़ना, थोड़ा ठहरना, थोड़ा सोचना थोड़े मुश्किल से होता है।
जिंदगी को अपने तरह से जीना चाहिए। संवाद जरूरी है उससे जिससे हम अपना सुख-दुख बाँट सकें। छोटी-छोटी खुशियाँ जिंदगी को मनोरम बनाती हैं छोटे-छोटे दुख जीवन को दुर्भर बना देते हैं। मैं जानता हूँ कि दिल में उमंग हो, भाव हों तो पेड़-पौधे, फूल-पत्ती, पूरबा-पछबा, सूरज-चाँद, रंग-पाखी सभी संवाद करने लगते हैं आपस में और हमारे संवाद के सहयोगी, संवाहक बनते हैं। याद है वो दिन जब हम मेघ से अपना मन कहते थे और मेघ तुम से मेरा ... हम से हमारा मन कहता था गरज-बरसकर... हम चाँद से कुछ कहते थे और चाँद आधी बात कहकर बादलों में छुपकर हमें सताता था.. बहुत मनुहार के बाद सामने आता था... बहुत मनाने पर पूरी बात बताता था... हवा का एक झोंका आता था और मन को सँवार जाता था... और बरखा रानी दूब को हरियाने के पहले हमारे मन को हरित-क्रांति की संभावनाओं से भर देती थी... याद है कैसे सारी-सारी रात तारों से हम बतियाते थे ... उनकी बातें गुप-चुप सुन लेते थे... और तारे कभी-कभी तो हम पर टूट भी पड़ते थे... आज मगर थोड़ा कठिन हो गया है... दिल के उमंग को इन सबसे जोड़े रखना.. मगर असंभव नहीं यह आज भी...तब हमारे पास नेट और फेस बुक नहीं था... अब तो यह भी है... संवाद का नया साधन...
फेसबुक पर
फेसबुक पर
साथ से नहीं, सेल्फी से परफूल!
साथ से नहीं,
सेल्फी से परफूल!
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सुबह-सुबह पास-पास
तुहिन-कणों से लदे-फदे
खिले-खिले दो फूल!
सेल्फी से परफूल!
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सुबह-सुबह पास-पास
तुहिन-कणों से लदे-फदे
खिले-खिले दो फूल!
मैं ने पूछा फूलों से
सुबह-सुबह!
इतने खिले-खिले कैसे!
सुबह-सुबह!
इतने खिले-खिले कैसे!
फूल ने कहा,
सच फूल ने कहा!
- देखते नहीं परफूल!
हम दोनों हैं!
कितने पास-पास हैं!
साथ-साथ हैं!
सच फूल ने कहा!
- देखते नहीं परफूल!
हम दोनों हैं!
कितने पास-पास हैं!
साथ-साथ हैं!
मैं ने कहा,
- चल पगले!
हो जाये
तुम दोनों के साथ
मेरी भी एक सेल्फी!
- चल पगले!
हो जाये
तुम दोनों के साथ
मेरी भी एक सेल्फी!
फूल ने कहा -
चल ठीक है!
तू भी खिल जा!
आजकल
आदमी का मन!
साथ से नहीं
सेल्फी से खिलता है!
चल ठीक है!
तू भी खिल जा!
आजकल
आदमी का मन!
साथ से नहीं
सेल्फी से खिलता है!
चट बना, पट खाया!
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अपने हाथ से
बने खाना
का मजा
कुछ और ही होता है।
क्यों मुरली, है न!
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अपने हाथ से
बने खाना
का मजा
कुछ और ही होता है।
क्यों मुरली, है न!
जितना भात तरकारी
जिस मजा से खाये
अभी उसका चवन्नी भी
बड़े बड़े होटलों में
नसीब नहीं भाई!
जिस मजा से खाये
अभी उसका चवन्नी भी
बड़े बड़े होटलों में
नसीब नहीं भाई!
हाँ, बिल्कुल
चट बना
पट खाया
गरमागरम!
चट बना
पट खाया
गरमागरम!
हाथ मुँह बरतन
साथ धो लिया
किचेन बरतन
स्वच्छ इंडिया
सब हो गया!
अपने सिवा
किसी को
पता नहीं चला -
क्या मजा लिया!
क्या मजा लिया!
साथ धो लिया
किचेन बरतन
स्वच्छ इंडिया
सब हो गया!
अपने सिवा
किसी को
पता नहीं चला -
क्या मजा लिया!
क्या मजा लिया!
सूचना और संवेदना
सूचना और संवेदना
दिन काल अच्छे नहीं हैं। पुराने दिनों को याद करना चाहिए। बहुत पुराने दिनों
की बात नहीं भी तो, आजादी के आंदोलन के समय की बात करनी चाहिए। आजादी के आंदोलन की
आकांक्षा और बनक पर बात करनी चाहिए। आंदोलन के गर्भ में एक आकांक्षा थी। एक स्वप्न
था। कुछ के कुछ स्वप्न पूरे हुए। कुछ की कुछ आकांक्षा पूरी हुई। यह सच है कि बहुजन के स्वप्न, बहुजन की आकांक्षा पीछे छूट गई और छूटती चली गई। और इक्कीसवीं सदी
के दूसरे दशक के समापन सब कुछ बिखरा-बिखरा प्रतीत हो रहा है। यहाँ आजादी के आंदोलन
के दौरान हिंदी पटल पर सूचना और संवेदना माध्यम पर बात करने का इरादा है। सूचना से
आशय यहाँ समाचार माध्यम या मीडिया से है और संवेदना से आशय साहित्य से है।
जब मीडिया नहीं थी, साहित्य तब भी था। मीडिया के आने के बाद सूचना की गति में
अद्भुत तेजी आई। सूचना से संवेदना को जोड़ने के लिए मीडिया ने साहित्य को साथ
लिया। देखा जा सकता है कि उस समय के साहित्यकार ही मीडिया का काम करने लगे। कवि
कहानीकार आदि ही संपादन का जिम्मा सम्हाल रहे थे। कहना न होगा कि इन दोनों के साथ
निरपेक्ष राजनीति का दृष्टिकोण भी सक्रिय था या जन राजनीति सक्रिय थी। धीरे-धीरे
मीडिया की मुख्य संचालिका शक्ति सत्ता राजनीति से प्राण पाने लगी और उसने अपने साथ
लिया सत्ता साहित्य को। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में उन यथाकथित (तथाकथित नहीं) बड़े
साहित्यकारों को जगह मिलने लगी। यथाकथित जन पक्षधर साहित्य को खाते-पीते लोगों के
स्वप्न का अवरोधक माना जाने लगा। धन पक्षधर को जन पक्षधर फूटी आँख नहीं सुहाया। इस
तरह साहित्यिक या लघु पत्रिकाओं का जन्म हुआ। अचंभा नहीं होनी चाहिए कि क्यों जन
पक्षधर साहित्य खाते-पीते लोगों से दूर होता गया और जिनकी पक्ष धरता की बात करता था
यह साहित्य, उन में बड़े-बड़े का ही प्रभाव बढ़ता चला गया। लघु पत्रिकाओं की अपनी
सीमा थी-- संसाधनगत भी, उद्देश्यगत भी। अपने
और अपनों के बाहर के किसी को स्थान देने की गुंजाइश धीरे-धीरे खतम हो गई। अंततः लघु
पत्रिकाओं के भी विशाल-विशाल अंक निकलने लगे। कह सकते हैं कि साहित्य के क्षेत्र
में लघु पत्रिकाओं की जगह ठगु पत्रिकाओं ने ले लिया। ऐसा इस लिए हुआ कि इन में
बड़ा बनने की चाह हिलोरें मार रही थी। बड़ा बनने की चाह कहाँ ले जाकर क्या गति
करती है यह जानने महसूस करने के बावजूद बड़े लोगों ने इस गति को ही प्रगति मानने
बताने का काम किया। धनी और बड़ा होना किसे अच्छा नहीं लगता है, भला! मुख्तसर यह कि मीडिया और साहित्य का
तथाकथित बड़े हिस्से का रुझान बची हुई जन पक्षधरता से बदलकर धन पक्षधरता की तरफ
होने लगा। मीडिया में सक्रिय कुछ संवेदनशील लोग धन पक्षधरता और धन पक्षधरता में
संतुलन बनाये रखने की कोशिश में लगे रहे। इस कोशिश में अपनी बढ़ती हुई मुख परिचिति
को इन संवेदनशील लोगों ने अपनी योग्यता और लोकप्रियता मानते हुए धन पक्षधरता के
परिसर में अनिवार्य मानने की गलती की। स्थिति की आक्रामकता बढ़ती गई। अंततः धन
पक्षधर ने इन संवेदनशील मीडिया कर्मियों के अपने को अनिवार्य मानने के भ्रम को
तोड़ दिया। इसी का नतीजा था कि चैनलों की सेवा से ऐसे लोग निकाल बाहर किये गये।
जाहिर है समाचार की गुणवत्ता में उन मुद्दों को जोड़ने का इरादा ही प्रमुख था
जिन्हें कई बार जन सरोकारों के मामले से ध्यान भटकानेवाला कहा जाता है। यह सब आ
उच्च तकनीक के सर्वसुलभ होने के वातावरण में नेट की सुलभता ने एक हद तक इस मामले
में बड़े-छोटे के अंतर को मिटा दिया है। अभी नेट-निष्क्षता बची हुई है। है, कब तक
बची रहेगी कहना मुश्किल है। स्थिति यह है कि नेट-निष्पक्षता दोनों तरफ की सुविधा
देती है – ध्यान भटकाने की भी और ध्यान दिलाने की भी। ध्यान दिलाने की प्रक्रिया
को सीमित करने के लिए नेट-निष्पक्षता को कमजोर किया जाता है तो ध्यान भटकाने की प्रक्रिया
भी उसी अनुपात में सीमित होती चली जायेगी। नेट-निष्पक्षता को खतम करने में यह एक
मुश्किल है। इस मुश्किल का कोई हल निकल जाने पर नेट-निष्पक्षता बहुत दिन तक टिकी
रहेगी, इस में वाजिब संदेह है।
नेट-निष्पक्षता के माहौल में संवेदनशील पत्रकारों ने अपना काम बखूबी करना शुरू
किया है। वे आयासपूर्वक मीडिया की जन पक्षधरता में जन मुद्दों का संतुलन कामयाबी
से बनाये रख पा रहे हैं। सूचनाएँ लगातार आ रही हैं। उन्हें संवेदना यानी साहित्य
से जोड़ने का काम नहीं हो पा रहा है। जितनी मेहनत कर वे सूचनाओं और संदर्भों को खोजकर
ले आते हैं और पूरी दक्षता के साथ परोस देते हैं और उसमें अपनी बात कहते हैं वह
निश्चित ही सराहनीय है। इस खोज-बीन में वे चाहें तो और न चाहने का कोई कारण नहीं
है, साहित्य में उनके कथ्य से जुड़े साहित्यिक अभिव्यक्ति के उपलब्ध संदर्भ का भी
उतनी ही दक्षता से समायोजन कर सकते हैं। इस समायोजन के लाभ को वे बेहतर जानते हैं
यहाँ तो सिर्फ ध्यान दिलाया जा रहा है। यह ध्यान दिलाये जाने की आवश्यकता मुझे इस
लिए पड़ी कि पुण्य प्रसून बाजपेयी की एक बहु-प्रभावी प्रस्तुति में बार-बार अंधेरे
का जिक्र आ रहा था लेकिन कहीं भी मुक्तिबोध की कविता अंधेरे किसी संदर्भ का कोई
जिक्र नहीं आया। मुझे तो 1990 के आस-पास लिखे नूर मुहम्मद नूर का एक शेर भी बहुत
याद आया जो पुण्य प्रसून बाजपेयी की उस बहु-प्रभावी प्रस्तुति के समापन पर उनके
शुक्रिया कहने के बाद मेरे मुँह से निकल गया। आप भी गौर कीजिए। ये
जो थोड़ा-सा उजाला है, गनीमत जानो,
दिन और अभी, और अभी काले होंगे।
समाज में हूँ, समाज में सब चलता है, बस .....
समाज में हूँ
समाज में सब चलता है
सब चलता है समाज में
कीर्तन चलता है
भजन चलता है
दमन चलता है
मर्दन चलता है
बस मनन नहीं चलता है
मनन नहीं चलता है
समाज में हूँ
समाज में सब चलता है
चलता हो भले
आता जाता नहीं है
किसी को कुछ आता जाता नहीं है
समाज में हूँ
समाज में सब चलता है
समाज में सब छलता है
बनारस शहर नहीं, समास है
केदार नाथ सिंह की कविता बनारस
कविता में सामान्य
मनुष्य, स्थान का उल्लेख तो होता ही रहता है। किसी विशिष्ट या खास व्यक्ति या शहर
आदि पर कविता कम ही देखने को मिलती है। सामान्यतः, कविता सामान्य पर होती है। खास पर कविता लिखना तोड़ा मुश्किल
काम है। अभी केदारनाथ सिंह की कविता ‘माँझी का पुल’ पर कुछ काम किया है। वह भी तो एक खास पुल ही है। अब जबकि उनकी कविता ‘बनारस’ पर काम करने बैठा हूँ, मन में फिर
एक सवाल है कि आखिर किस तरह से उन्होंने इस कविता को हासिल किया होगा! पाठक ठीक उसी तरह
से इस कविता को कैसे हासिल करे! केदारनाथ सिंह की कविता में यह एक खास बात है कि वे ‘ठीक उस तरह से’ पर अतिरिक्त जोर देते हैं और इस तरह
से कविता में कुछ खास ऐसा जोड़ देते हैं जिस से उनकी पूरी कविता का अर्थ-लय बदल जाता
है। सिर्फ अर्थ-लय ही क्यों संवेदना का धरातल भी बदल जाता है।
बनारस के संदर्भ हिंदी साहित्य में कई तरह से आया है, लेकिन इस शहर में कैसे
आता है वसंत यह तो सिर्फ यह कविता बताती है। इस शहर में वसंत के आने के बाद क्या
होता है, यह भी केदारनाथ सिंह की कविता की नजर से ही समझा जा सकता है।
इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है
यानी शहर की खाँटी देसी बनारसी वाचालता बढ़ जाती है। शहर पुराना है, मगर बूढ़ा
नहीं है। वसंत आता है तो उस शहर का मिजाज भी अपने वसंती रंग का जीर्णोद्धार कर
लेता है। जो गुजर गया है वह भी जैसे अभी गुजरा नहीं है, वसंत के आगमन का स्वागत
अपनी खपचियों से करता जाता है। खपचियाँ फेंकते हुए किसी का इस तरह गुजर जाना दशाश्वशमेध
घाट के पहले पत्थर को नहीं, आखिरी पत्थर को मुलायम बना जाता है। न जाने कितने शव
के जाने का साक्षी बना यह दशाश्वशमेध घाट अपने आखिरी पत्थर को मुलायम बनाता आ रहा
है लेकिन न मेध रुकता है, न इस का आखिरी पत्थर कभी आखिरी हो पाता है। इस कारुणिक
दृश्य से नम हुए पूर्वजों, बंदरों की आँख की नमी केदारनाथ सिंह की कविता की आँख की
नमी से अदृश्य रह पाती है। भीखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन भी किसी चमक से भर
जाता है। गुजरा हुआ भी किसी-न-किसी के लिए एक आश्वासन छोड़ जाता है, इस तरह से। जो
शहर में आता है भीखारियों के कटोरों में उतरता है, वह वसंत कुछ इस तरह कि गुजरने
से शहर खाली होता है जितना, उतना ही भरता रहता है भीखारियों का कटोरा चमक से। इस
तरह से खाली कटोरियों में वसंत का उतरना देखती है, केदारनाथ सिंह की कविता।
जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है खपचियाँ
आदमी दशाश्वशमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
धीमापन इस शहर का स्वाभाविक छंद है। कोई लाख कहे, और कहनेवाला कोई कवि ही
क्यों न हो, लेकिन यह सच है इस शहर में भी
बदलाव होता तो है, परंतु होता है, धीरे-धीरे। अचानक और अचंभा की तरह नहीं होता है,
होता है बदलाव शाश्वत की तरह धीमे-धीमे। यह धीमापन ही है जिसने बचाया था बनारस में
उस पुरानेपन को और उसे भी जो पुराना होने पर भी बूढ़ा होने से बचाता रहता है सदैव।
यह धीमापन का ही छंद है जो उसे अछिंजल-सा पवित्र अस्तित्व को आधार देता है। और
शायद इसीलिए अपने आधे-अधूरे अस्तित्व में भी यह शहर जल में भी है मंत्र में भी है,
फूल में भी है, शव में भी है, नींद में भी है और शंख में भी है। सूर्य जो किसी को
भी लक्षित करने का बुनियादी आधार देता है, वही सूरज इस शहर में खुद अलक्षित होकर
अपना अर्घ्य ग्रहण करता है। यह शहर गंगा में अपनी एक टाँग पर खड़ा है। खड़ा है कुछ
इस तरह कि दूसरे टाँग से है बेखबर। परंपरा में जीता है यह शहर और प्रगति के लिए
उठाये गये दूसरे कदम की उसे कोई खबर ही नहीं है। बनारस में इतने पास-पास रहते आये
हैं परंपरा और प्रगति, दोनों बिना संवाद के। शहर कि मानें तो प्रगति एक दिन परंपरा
बन जाती है, लेकिन परंपरा कभी प्रगति नहीं बनती। परंपरा बहती है, जिधर जमीन अनुकूल
हो, ढलान हो; प्रगति चलती है जिधर जमीन
अनुकूल न भी हो मगर जिधर समय की उठान हो।
आज की स्थिति में देखें तो, आधा बनारस इस कविता में
है, आधा नहीं भी है। बनारस बदल रहा है। अच्छा है या है बुरा इसकी परवाह किये बिना
बनारस बदला है, बदल रहा है। और थोड़ी-सी तेजी से ही बदल रहा है। जितनी तेजी से बदल
रहा है उतनी ही तेजी से इसका स्वाभाविक छंद भी बदल रहा है। बनारस में आरती का आलोक
तेज हुआ है तो तेज़ भी हुआ है, तीखा हुआ है। श्रीकांत वर्मा को याद कर लें तो यह
सच है कि वह जो बनारस था जिसे हम मगध की तरह खोते जा रहे हैं वह बनारस बचा रह
जायेगा केदारनाथ सिंह की इस कविता में। बचा रह जायेगा वह बनारस इस कविता में ठीक
उसी तरह से जैसे बचा रह गया था बाघ कुम्हार की आँख में जैसा कि वह था टूटने के
पहले, खुद केदारनाथ सिंह की कविता ‘बाघ’ में। यह भरोसा इस कविता के मन में है।
इन दिनों की बदलाव की बयार नहीं, आँधी चल रही है।
हमारे रिश्ते बदल रहे हैं, सरोकार बदल रहे हैं, संबंध चाहे व्यक्ति से हों, समाज
से हों या फिर राष्ट्र-राज्य या ईश्वर से ही क्यों न हों बदल रहे हैं, कुछ अधिक
तेजी से ही बदल रहे हैं। इस बदलाव में सत्य तो है, शिवम और सुंदरम की बात तो
भविष्य की मोतियाबिंदी आँख में है। ऐसे में केदारनाथ सिंह की कविता में भी जो
भरोसा है वह तभी कामयाब हो सकता है जब उनकी कविता बसी-बची रहेगी हमारे मन में।
इसलिए जरूरी है इस कविता को अपने मन में जगह देने की और भरोसा को बचाने की। इस
कविता के लिए मन में जगह नहीं बनी रहे तो कुछ नहीं, बस भरोसा का एक रेशा और
टूटेगा। भरोसा का रेशा जब टूटता है तो क्या होता है, बतायेगी राजेश जोशी की कविता
जिसमें नट भरोसे की रस्सी पर चलता है। सिसक उठेगी अरुण कमल की कविता कि अरे यही तो
था हर हाल में जो टूट गया! क्योंकि यही वह भरोसा था जयशंकर प्रसाद की आँख में हिमाद्रि तुंग श्रृँग
से प्रबुद्ध शुद्ध भारती की ललकार बना था। न बचेगा भरोसा तो भीगे नयनों से प्रबल
प्रवाह देखना ही हमारी नियति बनकर रह जायेगी। पूछिये नजीर से इस तरह नहीं बचा पाये
हम बनारस को तो, कैसे मनेगी होली! उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम
सभी का समन्वय, संतुलन और समंजन का साक्षी यह बनारस ही तो है। हजारीप्रसाद
द्विवेदी से पूछिये उन्हें पोथा देनेवाला अनामदास का असल नाम बनारस नहीं था तो
क्या था! बनारस शहर नहीं समास है, भारतीय संस्कृति के सार का समास है बनारस। बनारस शहर नहीं, समास है। बनारस बदलकर भी बनारस ही रहेगा,
जैसे देवदत्त अंततः देवदत्त ही रहता है अपने हर बदलाव के साथ। जैसे बचे रह गये हैं
बाघ और बुद्ध दोनों अष्टाध्यायी और चर्यापद में। इस बचे रहने में केदारनाथ सिंह की
कविता ‘बनारस’ बची रहेगी, बसी रहेगी मन में।
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