निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!
निष्ठा
बहुत ही कठिन है। धूमिल को याद करें, वे पूछते हैं —
क्या मैं व्याकरण की नाक पर
रूमाल लपेटकर
निष्ठा का तुक
विष्ठा से मिला दूँ?
(साभार: धूमिल: संसद से सड़क तक)
निष्ठा का सवाल सिर्फ लेखकों कवियों तक सीमित
नहीं है — यह समस्त नागरिक, सामाजिक और राजनीतिक जमात से जुड़ा है। अधिकतर का जवाब
क्या होगा?
वाणी में नहीं, आचरण में! निष्ठा को
समझना, तय करना और टिकाये रखना सचमुच बहुत कठिन, बहुत कठिन है।
अज्ञेय
की कहानी को याद करते हैं। द्रोही का पात्र कहता है :-
निष्ठा
क्या है? जिसका
हम पालन करें। कर्तव्य क्या है? जिसके
लिए हम कष्ट झेलें। प्रतिज्ञा क्या है? जिसे हम निभाएँ! पर यह सब उस अखंड निष्ठा, उस प्रकीर्ण कर्तव्य, उस उग्र प्रतिज्ञा के आगे क्या है?
उस व्रत के आगे जिसमें माता-पिता,
बन्धु-बान्धव, घर-बार, प्रतिष्ठा, कलंक, सब भूल जाने पड़ते हैं? उस आदर्श के आगे जिसका अनुसरण
करनेवाला पतित होकर भी दिव्य पुरुष होता है? जानती हो कमला! वह क्या है?
प्रेम!
(साभार
: अज्ञेय : कहानी – द्रोही)
निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!
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