ऊँचाई के माथे पर, लिखी ढलान

तेरी मुस्कान में क्यों छलछलाई आँख होती है
तेरी आँख में भी मचलती हुई मुस्कान होती है

इस तो कभी उस बात से क्यों परेशान होती है
उड़ती है, हवा के रुख से नहीं पहचान होती है

खुशियाँ बदचलन है कि गम से अंजान होती है
बरसाती रात में, चाँदनी बस मेहमान होती है

सरकारें रहम दिल हों, अगरचे बेजान होती है
योजना, आवामी दुख का नहीं निदान होती है

हर ऊँचाई के माथे पर, लिखी ढलान होती है
किसे खबर है कि जिंदगी कैसे जियान होती है


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