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अस्पताल

कैंसर अस्पताल

कैंसर भयानक बीमारी है। किसी भी परिवार में इसकी आशंका से ही दिल दहल उठता है। वैसे संवेदनशील लोगों का दिल तो विश्व में इसके होने से ही दहला रहता है। आज तक इसका सही इलाज नहीं मिल पाया है। इस बीमारी का असली कारण बड़े डॉक्टर लोग जानते होंगे। आम आदमी की जानकारी तो इतनी ही होती है कि अनियंत्रित और असंतुलित वृद्धि से यह बीमारी होती है। यह असंतुलन किसी भी क्षेत्र में हो सकता है।

कैंसर अस्पताल का जिक्र आते ही मन कसैला हो जाता है। यह स्वाभाविक ही है। कैंसर लग जाने पर अस्पताल तो जाना ही होता है। रोगी के ठीक होने की उम्मीद बिल्कुल ही कम होती है। फिर भी थोड़ी-बहुत उम्मीद तो होती है। उम्मीद कभी खत्म नहीं होती है। ढेर सारे खर्च के बाद भी रोगी ठीक हो जाये, बड़ी बात। इस बड़ी बात की होनी को संभव करने के लिए लोग कैंसर अस्पताल का चक्कर लगाते हैं। इस या उस कारण से इसका या उसका चक्कर लगाते रहना तो नियति है। चक्कर लगानेवाले जानते हैं कि इसमें एक बात पक्की होती है, यह कि खर्च का बहुत बड़ा बोझ उसके माथे पड़नेवाला है। चक्कर एक बार शुरू हो जाये तो फिर उसके व्यूह से निकलना मुश्किल होता है।

मेरा परिवार पहले भी कैंसर की चपेट में आया है। इस बार तो दिल दहलने के साथ ही चिंता और घबराहट दोनों बहुत बढ़ गई। पहले जैसी ताकत और पहले का हौसला अपने अंदर अब कहाँ! परिवार के अन्य सदस्य जूझने के लिए तैयार थे। फिर भी मन तो मन है। मन नहीं माना। दूसरों को न भानेवाली जिद करके मैं भी साथ लग गया। अस्पताल की लॉबी में बैठने की व्यवस्था थी। व्यवस्था चाहे जितनी हो वह कम पड़ ही जाती है। समय और स्थान को घेरा तो जा सकता है कुछ हद तक, बढ़ाने-घटाने की अनुमति प्रकृति हमें बिल्कुल नहीं देती है। बैठने की जगह तलाशती हुई नजर कोने में स्थापित एक आवक्ष प्रतिमा पर टिक गई। पास जा करके देखा। प्रतिमा के नीचे लिखा था :-

JAMSETJI NUSSEERWANJI TATA

FOUNDER

3RD MARCH 1839 – 19TH MAY 1904

 

19 मई 1904! लेकिन यह अस्पताल तो बाद में बना है, तो इसके संस्थापक ये कैसे हो सकते हैं? उमड़-घुमड़ कर बात समझ में आई ऐसे लोग तो अमर होते हैं। अमरता क्या है! अमरता अपनी संततियों में खुद की यात्रा को जारी रखने की प्रक्रिया है। प्रतिमा पर कोई फूल-माला नहीं थी। नजर घुमाकर देखा तो किसी की नजर उस प्रतिमा पर किसी की नजर नहीं थी। अलबत्ता, नजरों में कुर्सी की तलाश जरूर थी। पहली नजर में प्रतिमा उदास लगी। गौर से देखने पर मुद्रा गंभीर लगी। आँख निस्तेज लगी। गौर से देखने पर दृष्टि सपनीली लगी। अंकित तारीखों से पता चला कुल जमा पैंसठ वर्ष का दैहिक जीवन। मैंने बोलती प्रतिमा की बात सुन रखी है। कभी किसी प्रतिमा की आवाज या वाणी सुनने के प्रति गंभीर नहीं रहा। इस प्रतिमा को देख कर लगा कि कुछ कहना चाहती है। इस बार जाने क्यों मेरा भी मन कुछ सुनने की हो रहा था। लेकिन कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। जवानी के दिनों सुने खिलाफी नारों की अनुगूँजें मन को घेरे रही। इस प्रतिमा को सुनने की बेचैनी महसूस कर रहा था। शायद यह उम्र का असर हो। शायद, समय के बदले हुए मिजाज का असर हो।  

चिंतित मुख मुद्रा में लोगों की आवाजाही जारी थी। मेरे परिवार के लोग भी इसी आवाजाही में शामिल थे। मैं इस आवाजाही से फिलहाल बरी था। 1857 इसकी मसें भीग रही होगी। पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। मन 1839 और 1904 के टाइम-स्केल पर दौड़ता रहा। सदी के आर-पार मन की आवाजाही तेज हो गई। पिछली सदी यानी आजादी हासिल करने की सदी। जारी सदी आजादी की उपलब्धियों को महसूसने की सदी। मन आजादी के संघर्ष का बयान करनेवाली किताबों के बीच से गुजर रहा था। अब किताबें चाहे जितनी निष्पक्षता से लिखी जायें, कुछ-न-कुछ इधर या उधर के झुकाव की गुंजाइश तो रह जाती ही है। खासकर जब भारत की आजादी के दर्द को बयान करने का मामला हो। यह इसलिए कि इस आजादी को पाने के लिए जितना खून बहा था, उससे कहीं ज्यादा इस आजादी के बाँट-बखरा में बहा था। यह बाँट-बखरा हिंदू और मुसलमान के बीच का था। आजादी का हासिल होना अधिकांश में युक्तियों से संभव हो रहा था। आजादी का विभाजन शक्तियों के खेल का नतीजा था। युक्ति की शक्ति का दौर पीछे चला गया था। सामने शक्ति की युक्ति का दौर था। अपनी विविधता, बहु-धार्मिकता पर गर्व करनेवली भारतीयता के अन्य समुदायों का इस बाँट-बखरा में क्या हुआ?   

पंजाब में सांप्रदायिक दंगों का भयानक दौर जारी था। हिंदू-मुसलमान-सिख खून के प्यासे गली-मुहल्ले घूम रहे थे। लोगों में अपनी पहचान जाहिर करने और छिपाने की होड़ लगी थी। अपनी पहचान को जाहिर करने या छिपाने की तरह-तरह की युक्तियाँ इस्तेमाल की जा रही थी। लोग अपने घर के बाहर हिंदू, सिख या मुसलमान का पट्टा लगा रहे थे। एक घर के बाहर बोर्ड लगा था, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई तो भाई-भाई हैं, यह घर पारसी परिवार का है। प्रतिमा के पास बैठा था, जिसे अपने अमरत्व में इस अस्पताल का फाउंडर बताया गया है। यह प्रतिमा पारसी सज्जन का है। इन्होंने मंदिर, मस्जिद, गुरु द्वारा नहीं बनवाया। मुझे लगा प्रतिमा बोल उठी है। जो हमने  बनवाया उसमें सभी आते हैं। दुख से निजात पाने आते हैं। मैं आने-जानेवाले लोगों को पहचानने कि कोशिश करने लगा, पाया कि प्रतिमा सच कह रही है।

डाक्टर ने देख लिया है। दवा लाने के बाद केमो चालू होगा। इस बीच बारी-बारी से कुछ खा पी लेना होगा। प्रतिमा की आवाज के ऊपर यह मेरे बेटे की आवाज है। उसकी आवाज में उम्मीद है। इस उम्मीद ने मेरी मुरझाती हुई उम्मीद को सहारा दिया। दवा आ गई। हमने कुछ खा पी लिया। मेरा बेटा अपनी चाची को साथ लेकर केमो के लिए चला गया। भीड़ भी कुछ छँट गई। मैं फिर इंतजार में कि प्रतिमा के मन से कोई आवाज आये। कोई आवाज नहीं। शायद प्रतिमा का मन आराम कर रहा है। तभी एक आवाज आई अमरता में आराम नहीं। मन ने कहा आराम में कोई अमरता नहीं। प्रतिमा हँस पड़ी। इतना जानते हो! सभ्यता कैंसर ग्रस्त हो चुकी है। नहीं जानते! तन हो या वतन कैंसर ग्रस्त हो जाये तो इलाज मुश्किल होता है। तन का कैंसर ठीक हो भी जाये, वतन के कैंसर का क्या? कुछ सोचा है कभी! कुछ सोच पाता इसके पहले बगल में एक नौजवान जोड़ी आ कर बैठ गई। मैं उनका संवाद सुनने लगा।

-      तुम बहुत इमोशनल हो जाती हो।

-      तुम नहीं होते!

-      नहीं।

-      होना पड़ता है। उन्हें बल मिलता है। जीने का बल। किसी को उनके होने की कद्र है। इतना वे भी जान गये होंगे कि किसी के जीने मरने की कोई कद्र कहीं नहीं। फिर भी करना पड़ता है जानू। दुनिया इसी झूठ के बल पर चलती है।

केमो हो गया। आज का काम खतम। अब कैब देखते हैं।  यह मेरे बेटे की आवाज है। उसकी आँख में खुशी के कुछ कण चमक उठे। उसने अपना एप मेरी नजरों के सामने कर दिया। मैंने पढ़ा, टाटा-इंडिका, ह्वाइट कलर। बेटे ने समझाया कम भाड़ा पर ही ले जाने के लिए ड्राइवर राजी हो गया है। मरे मन में आया कह दूँ कि उसकी कोई मजबूरी होगी कम भाड़ा पर जाने की। हमारी क्या मजबूरी है कम भाड़ा पर जाने की। कुछ कहता इसके पहले मन के एक कोने से अपने एक मैनेजर की आवाज टपक गई। किसी की मजबूरी किसी की अपरट्युनिटी होती है। अपनी अपरट्युनिटी के लिए किसी की मजबूरी तलाशो, न हो तो मजबूरी पैदा करो। ससटेन करने का यही एक तरीका है। कैब आ चुका था। मेरे मन टाटा-इंडिका के टाटा पर लटका हुआ था।

रास्ते में चारों तरफ विकास की कहानियाँ बिखरी पड़ी थी। टाटा की बस, टाटा की कार, टाटा का ट्रक। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी के काम  रहा था। लगा पूरा हिंदुस्तान टाटा पर लदा हुआ है। मेरे असंतुलित होते मन को ड्राइवर की आवाज ने सम्हाला। वह कुछ कह रहा था। बहुत मुश्किल से सुनने में आ रहा था। हो यह भी सकता है कि कुछ और कह रहा हो वह, मैं कुछ और सुन रहा होऊँ। ऐसा तो होता ही है जीवन में। हम कहते कुछ और हैं, सामनेवाला सुनता कुछ और है। घर अदालत कोट कचहरी सभी जगह थोड़ा-बहुत ऐसा ही होता है। वह कह रहा था :-

-      इतना कम भाड़ा पर कोई उधर नहीं जाता। इतना तो आप भी जानते हैं। मेरा घर भी उसी साइड में है। मेरी मजबूरी कि घर से फोन आया। पापा को अटैक आया है। इस बार शायद ही बचें। लौटने की जल्दी मची है। आप लोग भी घर परिवारवाले हो। आगे जो भी मुनासिब लगे देख लेना।

मेरे मन में एक नैतिक मरोड़ उठी। मन किया सहानुभूति के दो बोल कहूँ। मगर नहीं। कैब बेटा ने किया था। पैसा वही देगा। सिर्फ बोल-भरोस दे सकता हूँ। बोल-भरोस का क्या मोल! उसके साथ बात-चीत में उलझना बेटा को बुरा भी लग सकता था। इसका बोझ मैं उठा नहीं सकता था। मेरा बोझ तो बेटा उठा रहा था। सुन तो बेटा भी रहा ही होगा, पर खामोश बना रहा।

घर पहुँचा तो छोटी-सी पोती ने पूछा। शायद उसकी मॉम ने पुछवाया हो।

-      दादा जी कैसा रहा सफर!

-      कैंसर अस्पताल से लौटकर आया हूँ।

मैं जानता हूँ यह सच नहीं था। चारों ओर कैंसर फैला है। अपने मन को खुटरी पर टाँग कर हल्का हुआ। जानते हुए भी कि यह सच नहीं है, मैंने फिर दोहराया :-

-      कैंसर अस्पताल से लौटकर आया हूँ।

 

रिपोर्ट

रिपोर्ट
(कहानी)
➖ ➖ ➖ ➖
मिस्टर गोयल बोलने के लिए खड़ा हुए तो सभा में गहरी खामोशी छा गयी। मैनजमेंट की उच्च स्तरीय मीटिंगों में वैसे भी सबसे मुखर खामोशी होती है। मैनजमेंट के निचले पायदान पर संघर्ष कर रहे अधिकारियों में कानाफूसी का सिलसिला थम चुका था। एक तेज उत्सुकता सब के मन में थी। इस सभा में मिस्टर गोयल के अलावा और बारह लोग थे। मुख्य रूप से गोयल को ही बोलना था। मिडटर्म एप्राइजल मिटिंग यह नहीं थी। लेकिन इसके मिडटर्म एप्राइजल में बदल जाने की पुरजोर स्थितियाँ थी। सभी महत्त्वपूर्ण लोग आ चुके थे। इनमें चार तो बहुत ही प्रभावशाली थे। जरूरत पड़ने पर इस तरह की किसी मिटिंग के निष्कर्षों को कभी भी अपने अनुकूल कर लेने में इन्हें महारत हासिल है। मिटिंग के तनावों की दिशा को इनके दबावों से बदल जाने पर सभा का काम उनके विचारों को जायज और सुग्राह्य बनाने के उपायों के बारे में विचार करना भर रह जाता है। किसी स्वतंत्र विचार को सामने लाना बाकी सदस्यों की सीमा के बाहर की बात है। इन लोगों के विचार की फाँक से अपने कुछ सुझावों को निकाल ले जाने की सहूलियत रहती है। ऐसे अवसर आते ही रहते हैं। बिना किसी को आहत किये ऐसे अवसरों का उपयोग करनेवाले को मैनेजमेंट की टीम में आगे बढ़ने का रास्ता मिलता है। एमसी यानी मैनजमेंट कमिटी के अदब को जानना और अपने हिसाब से बरतना सदस्यों की योग्यता की पहली सीढ़ी है। मिस्टर गोयल पिछले कई अवसरों पर अपनी योग्यता प्रमाणित कर चुके हैं। आज उनके लिए एक कठिन घड़ी है। आज उन्हें मीटिंग में जाँच रिपोर्ट पेश करनी है।
मिस्टर गोयल ने बोलना शुरू किया तो पहले वे खुद थोड़ा घबराये हुए थे। लेकिन जल्दी ही वे सम्हल गये। उन्होंने बिना किसी भूमिका के बोलना शुरू किया। उन्होंने डॉयस पर बैठे मिस्टर दुरानी की ओर इजाजत माँगने की भंगिमा में देखकर कहना शुरू किया, ‘मैं अपनी बात शुरू करने के पहले आप से अनुरोध करूँ कि मेरी इस रिपोर्ट में ऐसी कुछ बातें हो सकती हैं, जिन पर आप असहमत या क्षणिक रूप से उत्तेजित हो जायें। लेकिन मैं आप से प्रार्थना करूँगा कि हर हाल में आप पहले रिपोर्ट को पूरी तौर पर सुन लें। मुझ से सवाल करें। सफाई माँगें। इतना ही नहीं, हो सकता है कि कुछ सवाल आपको खुद से भी पूछने की जरूरत पड़ सकती है। मेरी गुजारिश है कि यदि आप ऐसी कोई जरूरत महसूस करते हैं तो उसे नजरअंदाज न करें। इस रिपोर्ट को धारदार बनाने में और कनविंसिंग बनाने के साथ ही आगे होनेवाली कार्रवाइयों में इसके दस्तावेजी महत्त्व को बढ़ाने में अपना योगदान करें। लेकिन मेरी निष्ठा पर रंच मात्र भी संदेह न करें।' मेज पर रखे मिनरल वाटर के बोतल से पानी ढालते हुए, एक उड़ती नजर उन्होंने सदस्यों पर दौड़ाई। ‘आपके ध्यान में यह बात होगी कि घटना के एक दिन पहले एडमिनिस्ट्रेटिव कमिटी की मिटिंग हुई थी। उस मिटिंग में मिस्टर लोनावाला ने बहुत ही जोरदार और प्रेरक भाषण किया था।’
लोनावाला का नाम आते ही मिस्टर रुँगटा ने हस्तक्षेप किया, ‘मिस्टर गोयल आप अपनी रिपोर्ट पढ़िये। यह एमसी मिटिंग है, सत्य नारायण कथा का आयोजन नहीं है। आप जो कहना चाहते हैं, यह मिटिंग उसे सुनना नहीं चाहती है। हमें रिजल्ट चाहिए। रिजल्ट।’ अपने हस्तक्षेप पर किसी दूसरे सदस्य की कोई प्रतिक्रिया न होने पर मिस्टर रुँगटा की आवाज धीरे-धीरे मंद होती गई और वे अपनी सीट पर बैठ गये। जैसे माल लदा हुआ ट्रक का टायर हवा निकलने पर धीरे-धीरे बैठ जाता है। मिस्टर गोयल प्रबंध दक्षता में अपने वाक-चातुर्य का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। .ह तो हर कोई मानता है कि मिस्टर गोयल कुशल वक्ता हैं। अब यह कहने की तो जरूरत नहीं है कि अपने विरोधी स्वर को गला लगाते हुए उसका दम घोंटने में कुशल वक्ता माहिर होता है।
यह पहली बिल्ली है। इसे मारना बहुत जरूरी है। मिस्टर गोयल ने मन-ही-मन सोचा। बड़े शांत चित्त से दुरानी की तरफ नजर घुमाकर उन्होंने कहना शुरू किया, ‘मैं जानता हूँ यह एमसी मिटिंग है। टीवी चैनल पर चलनेवाला डिस्कशन्स नहीं। इसलिए फिर गुजारिश करता हूँ कि धैर्य से सुनने की कृपा करें। बिना सुने किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दबाजी न करें। कोई घटना जब भाषा में बयान की जाती है, वह कहानी लगने लगती है। महाभारत आज कहानी लगती है, क्या पता यह एक समय की सच्ची घटना ही हो। लोग इसे घटना ही मानते हैं। जो घटना भाषा में बयान होकर भी कहानी नहीं बन पाती है या बनने से परहेज करती है वह हमें सबक सिखाने में कामयाब नहीं होती है। आप जानते हैं कि मुझ से इसकी जाँच करने के लिए जो कहा गया, उसका मुख्य उ­द्देश्य ही सबक है। महानुभावों एक बात शुरू में ही साफ कर दूँ, जो आप सुनना नहीं चाहते वह मैं भी कहना नहीं चाहता हूँ। किंतु कहना मेरी मजबूरी है, सुनना आपकी मजबूरी। हम मिलकर इस मजबूरी से बाहर निकलने का प्रयास कर सकते हैं। एक बात और, सत्य नारायण कथा का आयोजन यह न भी हो तो भी सत्य कथन का आयोजन जरूर है। जहाँ तक रिजल्ट की बात है तो वह तो आप देख ही रहे हैं! मैं उम्मीद कर सकता हूँ कि आप में सत्य को सुनने और समझने का साहस है। इस काम के लिए ही एमसी को साहस की जरूरत होती है।’ इतना कहकर मिस्टर गोयल कुछ क्षण के लिए चुप हो गये। सभा सन्नाटा को सह नहीं पाई। सन्नाटा को तोड़ने का साहस भी कोई नहीं कर पा रहा था। चेयरमेन ने चुप्पी तोड़ी, ‘मिस्टर गोयल प्लीज केरी ऑन ... आप अपनी रिपोर्ट रखें।’
वहाँ चार आदमी होते है, वहाँ कम-से-कम पाँच गुट का बन जाना हमारा समय का सच है। जो बाहर से एक साथ दिखते हैं, वे भीतर से एक साथ नहीं होते है। लोनावला का नाम आने पर रुँगटा का बीच में ही चिल्ला पड़ना इसी का नतीजा था। लोनावाला और रुँगटा के रिश्तों में एक अंदरूनी समझ थी। इस समझ का तकाजा था कि उनके रहते लोनावाला पर कोई आँच न आये, खासकर जब पहले ही इस बात की आशंका हो। गोयल की हैसियत नौकर से ज्यादा नहीं थी, लेकिन मालिकों का काम उनके बिना नहीं चलता था। एक बार वे कंपनी को छोड़कर चले गये थे। बीच में ही कंपनी की नैया डगमगाने लगी थी। बहुत मुश्किल से उन्हें फिर से वापस बुलाया जा सका था, और पहले की तुलना में अधिक सम्मान तथा सुविधाओं के आश्वासन के साथ। गोयल की पुलिस प्रशासन में गहरी पैठ थी। सभी राजनीतिक दलों के महत्त्वपूर्ण लोगों से उनका लगाव था। उनके कई मित्र मीडिया में प्रभावशाली जगहों पर थे। सरकारी स्तर पर होनेवाली गतिविधियों की ही नहीं, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की जरूरतों, परेशानियों और इच्छाओं की जानकारी उन्हें रहती थी। उनके समाधान का रास्ता भी उन्हें अमूमन मालूम रहता था। गहरी सूझ-बूझवाले गोयल के संपर्क सूत्र उनकी योग्यता और अपरिहार्यता को एक साथ कई आयाम से जोड़ देते थे। यह तो उनके संपर्क का ही कमाल था कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद लोनावाला अपने घर में बैठकर आराम फरमा रहे थे। लेकिन कब तक! कानून कब तक खामोश रह सकता है। हुआ यह था कि कारखाना में चारों तरफ अराजकता फैली हुई थी। मजदूरों में अशांति थी। युनियन नेताओं के बार-बार के अनुरोध के बावजूद मैनेजमेंट कमिटी समय पर उनके पीएफ आदि का पैसा नहीं जमा करवा रही थी। उनके मिल के कई बीमार मजदूर वहाँ से वापस भेज दिये गये थे। कुछ दिनों तक मजदूरों को इस बात का पता ही नहीं था कि उनका पैसा जमा नहीं हो रहा है। पता भी कैसे चलता। उन्हें थोड़ी बहुत सुविधा वहाँ मिल जाती थी। अब डाक्टर जो बोलें बीमार को तो वही सुनना पड़ता है। यह काम भीतर ही भीतर हो रहा था। श्रम कल्याण के नये डायरेक्टर के आने के बाद यह भीतरी बात बाहर आ गई। जब बात खुलती है तो खुलती ही चली जाती है।
मिस्टर गोयल ने बोलना जारी रखा। ‘हाँ, तो मैं एडमिनिस्ट्रेटिव कमिटी की बात कर रहा था। अब, यह कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे मामलों में मालिकान की इच्छा लगभग भगवान की इच्छा के बराबर होती है। वेतन-जीवी की हैसियत भक्त से अधिक की नहीं होती है। विडंबना यह कि अपने किसी भी फैसले पर भगवान हस्ताक्षर नहीं करते और मालिकान भी नहीं करते। जवाबदेही तो उनकी ही होती है जिनका हस्ताक्षर होता है। बाघ की बलि नहीं होती है, मालिकान की भी नहीं। ऐसे में इसके अलावा उपाय ही क्या रह जाता है किसी रिपोर्ट के लिए कि वह मालिकान की इच्छा के अनुसार तैयार हो, माने मालिक की मेधा को संतुष्ट करे। मुश्किल तब पेश आती है जब मालिक न अपनी इच्छा को समझे न संतुष्टि को। मिस्टर लोनावाला ने मालिकान की इच्छा को समझते हुए उसके पक्ष में जो भाषण किया उसे सराहा बहुत गया। जाहिर है मिस्टर रुँगटा ने बहुत तेजी से लागू भी किया।’
अब मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ही एक साथ चीख पड़े। ‘तो आपकी रिपोर्ट हमें जवाबदेह ठहरा रही है!’
अब बारी मिस्टर गोयल की थी उन्होंने चेयरमेन को कड़े लहजे में संबंधित करते हुए कहा कि इन्हें कहा जाये कि खामोशी से पूरी बात सुनें। जो कहना हो आप से कहें। निस्संदेह ये दोनों परोक्ष और अ-परोक्ष रूप से इस अपराध में शामिल हैं। ये अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि मामला एक मजदूर की आत्म-हत्या का है। यह कितना गंभीर मामला है ये समझ भी नहीं पा रहे। यह एक आजाद मुल्क है। इसके अपने नियम, कानून और कायदे हैं। बात कहाँ तक जा सकती है, इसका इन्हें गुमान भी नहीं है। बीच में इस तरह उत्तेजित होकर इन्होंने इस मामले के निपटारे के रास्ते में बाधा ही खड़ी है। 
मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ही एक साथ जितनी उत्तेजना के साथ चीख पड़े थे, उतने ही निरुत्साह मन से एक सात सॉरी कहा। चेयरमेन के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ी। मिस्टर गोयल ने फिर कहना शुरू किया। ‘मैं भी कर्मचारी होने के नाते मालिक की इच्छा से बँधा हूँ। मालिक नहीं चाहते इन दोनों महानुभावों को कोई खरोच आये। इसलिए मेरा कर्तव्य है कि मालिक की इच्छा पूरी करने की मैं कोशिश करूँ। लेकिन यह आप के सहयोग के बिना संभव नहीं है। आप लोगों को व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर पूरा सहयोग करना होगा।’
इतना कहकर मिस्टर गोयल  खामोश हो गये। बिना देरी किये मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ने सहयोग का वचन दिया। चेयरमेन और दूसरे लोगों ने भी सहमति दी।
अब मिस्टर गोयल ने कहा कि ऑपरेटिव पार्ट पर विचार हो। तदनुसार, जाँच पूरी होने तक  मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ही सेवा से निलंबित रहेंगे। मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ही फिर चीख पड़े। इस बार मिस्टर गोयल ने कहना जारी रखा। भीतरी बात, ये पहले की तरह काम करते रहेंगे। इन्हें कोई वित्तीय हानि नहीं होगी। इन्होंने जो भी किया मालिकान के हित में किया और मालिकान इनके हित की रक्षा करेंगे।
दूसरे दिन अख़बार में बड़ी-सी रिपोर्ट छपी। मिस्टर लोनावाला और मिस्टर रुँगटा दोनों ही निलंबित। विभागीय जाँच शुरू। युनियन के नेता के हवाले से कहा गया था कंपनी प्रभावित मजदूर को क्षतिपूर्त्ति देने की माँग पर गहराई से विचार कर रही है। जाँच रिपोर्ट आने तक हर किसी को सब्र का इंतजार करना होगा। और भी बहुत कुछ घटा इस बीच। जैसे, अगले एक सप्ताह में श्रम-कल्याण के नये डायरेक्टर का चुपचाप तबादला हो गया। श्रम-कल्याण और सीएसआर पर एक बड़ा आयोजन हुआ जिसमें जिला के आला अफसर,  पत्रकार, जनसेवक की प्रशंसनीय भागीदारी रही। और भी बहुत कुछ।
यह तो ‘रिपोर्ट’ नाम की कहानी है। इस कहानी के लिखे जाने तक जाँच रिपोर्ट नहीं आई है। जाँच प्रगति पर है।

एक बार हुआ यों कि



एक बार हुआ यों कि
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उस दिन भोला बाबू मिल गये। बिल्कुल अचानक। जरा जल्दी में दिखे। मैंने लपक कर पूछ लिया कि भोला बाबू एक चाय हो जाये, बहुत दिन के बाद दिखे हैं। उन्होंने छूटते ही कहा कि जरा जल्दी में हूँ, चाय किसी और दिन के लिए रहने दीजिये। मेरी शंका बिल्कुल सही निकली। अब मेरी उत्सुकता काफी बढ़ चुकी थी कि आखिर इस जल्दी का रहस्य क्या है। इस रहस्य के लिए उनको चाय में उलझाना जरूरी था। मैंने कहा कि अरे भोला बाबू इतने दिनों के बाद तो दिखे हैं। आजकल आप दिखते ही कहाँ हैं! एक चाय हो जाये। फिर चले जाइयेगा। मैं भी जल्दी में ही हूँ, लेकिन आपके साथ चाय के आनंद का लोभ छोड़ नहीं पा रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि चाय भोला बाबू की कमजोरी है। हम बात करते हुए चाय की गुमती तक पहुँच गये थे। मैंने दो प्याली बढ़िया चाय के लिए चाय वाले को कहा। बढ़िया चाय यानी बनी-बनी चाय नहीं, बल्कि अलग से बनाकर दी जानेवाली चाय। गरज यह कि इससे थोड़ा और समय मिल जाता। भोला बाबू ने चाय स्टाल पर रखे पानी के जग को उठाया और पानी पीने के बाद पास के बेंच पर बैठ गये। मैं अब आश्वस्त था कि भोला बाबू जल्दबाजी के दबाव से बाहर निकल आये थे।

बात आगे बढ़े इसके पहले भोला बाबू के बारे में थोड़ा बताना जरूरी है। भोला बाबू, हम यानी मुहल्ले को लोग इसी नाम से पुकारते हैं। भोला बाबू अब फूल टाइम साहित्यकार हैं। पहले वे सरकारी दफ्तर में काम करते थे। उस समय भी वे अपने हिसाब से फूल टाइम साहित्यकार ही थे, लेकिन अब तो सच में वे साहित्य के फूलटाइमर हो गये हैं। पतली-सी काया। दरम्याना कद। तितिर-बितिर खिचड़ी दाढ़ी। हाफ कुर्त्ता, फूल पायजामा और कंधे पर झोला। झोला में ढेर सारा लिखा-अधलिखा कागज। हाँ तो, भोला बाबू अपने को फूल टाइमर साहित्यकार मानते थे। हकीकत यह है कि वे जितना लिखने में वक्त लगाते थे उससे ज्यादा वक्त लिखने की योजना तैयार करने में लगाते थे। लिख तो बहुत कम ही पाता थे। जो लिख लेते थे उसे फाइनल रूप नहीं दे पाते थे। वे संपादकों के पास डाक से अपनी रचनाएँ नहीं भेजते थे। इस मामले में वे डाक विभाग पर बिल्कुल ही भरोसा नहीं कर पाते थे। उन्हें लगता था कि इस मामले में डाक विभाग पर बिल्कुल ही भरोसा नहीं किया जा सकता है। संपादकों के पास वे अपनी रचना लेकर खुद जाते थे। वे यह भी चाहते थे कि संपादक उनके सामने ही उनकी रचना को पूरे मनोयोग से बाँच ले। रचना की साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्ता के प्रति पूरी तरह आश्वस्त होकर अपना फैसला भी तत्काल सुना दे। इसके लिए वे संपादक की रुचि के अनुसार पान-सिगरेट साथ लेकर जाते थे। शुरु-शुरू में संपादकों ने उनको उतना महत्त्व नहीं दिया। लेकिन जैसा कि होता है पंद्रह-बीस दिन के फेरे के बाद किसी एक दिन जब संपादक पर दबाव उतना नहीं होता तो उनको मौका मिल जाता। संपादकों ने महसूस किया कि उनकी कहानियाँ चाहे जैसी भी हों, उनकी बातें बहुत रसदार और लच्छेदार होती हैं। भोला बाबू बात रसाने में माहिर बहुत ही मजेदार आदमी हैं। कहानी का पहला पन्ना खोलते ही भोला बाबू संपादक की ओर पान या सिगरेट बढ़ा देते थे। बिना निगाह उठाये संपादक उसे ग्रहण करता। संपादक कहानी पढ़ रहा होता और वे संपादक के चेहरे को। दूसरा पन्ना पलटते-न-पलटते भोला बाबू संपादक के चेहरे पर उभर आये भाव को ताड़ते हुए कह बैठते कि असल में यह फाइनल स्क्रिप्ट नहीं है। अभी इसमें बहुत कुछ जोड़ना घटाना बाकी है। भोला बाबू का इतना कहते ही संपादक कागज को मोड़ देता और भोला बाबू कहानी के जन्म की कहानी सुनाने लगते, एक बार हुआ यों कि। फिर संपादक के पास उपलब्ध समय के अनुसार कहानी के बाहर खड़ी कहानी को संपादक के सामने वे पसारते रहते ▬▬ एक घटना, दूसरी और तीसरी घटना, ना जाने कितनी घटनाएँ जुटती चली जाती। संपादक की भाव-भंगिमा को देखकर वे फिर कहानी के बाहर पसरी कहानी को समेटने लगते। संपादक कहता कि हाँ यह सब तो एक अच्छी कहानी में पिरोयी जा सकती है। इन्हें कहानी में पिरोकर लाइये। फिर देखते हैं कि कहानी कैसी बनती है। भोला बाबू लौटकर कहानी में कहानी के बाहर खड़ी कहानी को पिरोने की योजना बनाते। दो-चार-दस दिन उनके अंदर कहानी के बाहर खड़ी नई-नई कहानियाँ उमड़ती-घुमड़ती रहती। फिर वे एक दिन कागज पर लिखना शुरू कर देते। आधा पन्ना लिख लेने के बाद फिर उसमें काटने-पीटने का और अंत में उसे फाड़े जाने का काम संपन्न होता। फिर शुरू करते। तीन-चार पन्ना उतरते-न-उतरते फिर संपादक के पास। फिर वही सिलसिला, फिर वही कहानी। इसी तरह बहुत ही गंभीरता से भोला बाबू का लेखन चलता रहा है। बताने की बात यह है कि भोला बाबू लेखन को बहुत ही गंभीरता से लेते रहे हैं। शुरू-शुरू में उनकी कुछ रचनाएँ लघुपत्रिकाओं में छपी जरूर थीं, लेकिन जैसा कि होता ही है वे पत्रिकाएँ अपने दूसरे-तीसर अंक के लोकार्पित होते-न-होते अनियतकालीन हो गईं। लेकिन इससे क्या लिखने का काम ब-दस्तूर जारी रहा। संपादकों के साथ उठने-बैठने का सिलसिला जारी रहा। रिटायर करने के बाद इस सिलसिला के और भी जीवंत रूप से जारी रहने तथा बार-बार आने-जाने का सुफल यह हुआ कि पाँच साल के अंदर दो कहानियाँ छपी जरूर। इन कहानियों के छपने के बाद एक नई बीमारी का जन्म उनके अंदर हो गया। बिना जान-पहचान के लोगों की ओर ताकते हुए मुस्कुराने की बीमारी। अब आदमी भले ही अन-जान हो लेकिन किसी को अपनी ओर मुस्कुराते हुए देखे तो उसकी मुस्कान भी उछल ही जाती ही न है। अब इस तरह से अन-जान लोगों की मुस्कान के उछलने के साथ एक और बात शुरू हो गई। शुरू-शुरू में वहम होता था कि सामनेवाला उन्हें पहचान रहा है, उम्मीद भी रहती थी कि पहचान रहा है तो वैसा ही व्यवहार भी करेगा। लेकिन निराशा ही हाथ लगती थी। दो-बार तो ऐसे ही किसी अन-जान महिला की और आदतन मुस्कारते हुए ताकने के चक्कर में पिटते-पिटते बचे। उम्र की दुहाई देकर आस-पास के समझदार लोगों ने पिटने से बचाया। इसके बावजूद वहम तो बना हुआ है अब भी। लेकिन वह जाग्रत होता है जब सामनेवाला मुस्कुराये भले नहीं पर इन्हें मुस्कुराता हुआ दिखे। भोला बाबू के साथ सुविधा यह थी कि आगे न कोई नाथ, न पीछे कोई पगहा ▬▬ परम स्वतंत्र, सिर पर नहिं कोऊ!

अब तक चाय आ चुकी थी और भोला बाबू भी मूड में आ चुके थे। जब भोला बाबू मूड में होते हैं तो लाजिमी तौर पर वही बोलते हैं, बाकी सभी सुनते हैं। मैं भी सुनता ही हूँ। आप भी सुनिये, भोला बाबू के मुँह से▬▬

▬▬▬ अरे, हुआ यूँ कि पिछले दिनों एक कहानी के सिलसिले में मैं शहर से बाहर था। अंजान नंबर से मेरे मोबाइल पर फोन आया ▬▬ हलो मैं रुद्रशंकर बोल रहा हूँ। जी कोलकाता से आप मुझे पहचानेंगे नहीं। क्या मैं आप से थोड़ी देर बात कर सकता हूँ। असल में मैंने आज आपकी एक कहानी पढ़ी है। कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। नीचे आपके घर का पता और फोन नंबर भी छपा है। मैं अपने को रोक नहीं पाया।

▬▬▬ मेरी कहानी! अच्छा! कौन-सी। ऐसा है कि मैं इस समय मैं शहर से बाहर हूँ। मैं लौटकर आप से बात करता हूँ।

▬▬▬ देखिये, मैं आपका पाठक हूँ। आप मुझे टाल नहीं सकते। मेरी उम्र हो गई है। ठीक से चल फिर नहीं सकता, नहीं मैं आपके घर पर ही दर्शन कर आता।

▬▬▬ नहीं-नहीं टालने जैसी बात बिल्कुल ही नहीं है। मैं लौटकर आप से संपर्क करता हूँ।

चाय की चुस्की लेते हुए भोला बाबू ने कहा कि वे इस बात से इतने खुश हुए कि यात्रा बीच में ही छोड़कर वापस आने पर सोचने लगे। खैर यह तो संभव नहीं हुआ। हाँ आते ही मैं ने उन से संपर्क किया। उनके आग्रह पर उन से मिलने उनके घर पहुँचा। दो बेडरूमवाले मकान में रुद्रशंकर अकेले रहते हैं। लड़का डॉक्टर है, बहू भी। एक पोती भी है, हालाँकि वह बाहर हॉस्टल में रहती है। आठ साल की हो गई है। उसे वे आखिरी बार बहुत पहले जब वह चार साल की रही होगी देखा था। उसके बाद से छुट्टी होने पर उसके माँ-बाप जाकर उसे हॉस्टल में ही मिल लेते हैं। और फिर छुट्टी का मौसम रहा तो उधर से ही उसे लेकर घूमने फिरने निकल जाते हैं। उसे यहाँ लाने का कोई ठोस कारण नहीं है। रुद्रशंकर ने कहा कि के बेटे और बहू बहुत काबिल और नेक हैं। बस साथ नहीं रहते हैं। उनके पेंसन से एक पैसा नहीं लेते। बस साथ नहीं रहते। वैसे यहाँ का सारा इंतजाम कर दिया है। उनको कोई तकलीफ नहीं है। बस एक ही बात है कि बात करनेवाला कोई नहीं है। रुद्रशंकर ने यह भी कहा कि उनका असली नाम कुछ और है। वे इस नाम से लिखते रहे हैं। मैं लेखक हूँ इसलिए उन्होंने अपना लेखकीय नाम ही बताया है। बहुत कहने पर रुद्रशंकर ने छपी हुई कहानी का पन्ना दिखलाया। मैं चौंक गया। कहानी तो लगभग मेरी ही लगती है। वैसे तो, हर कहानी मुझे अपनी ही लगती है और वह कहानी तो बहुत ही खास तौर पर अपनी लग रही थी। लेखक के रूप में नाम किसी और का था, हाँ फोन नंबर जरूर मेरा ही था। अब माजरा समझ में आया। ये मुझे दिवा कहकर क्यों बुलाते हैं। इस छपी हुई कहानी में कहानीकार का नाम तो दिवाकर छपा है। अब मैं रुद्रशंकर से यह कैसे कहूँ कि मैं दिवाकर नहीं हूँ। सो मैं आजकल दिवाकर बना घूम रहा हूँ। वैसे भी बड़े लोगों ने कहा है, नाम में क्या रखा है।

चाय का कुल्हड़ एक तरफ फेकते हुए दिवाकर बन चुके भोला बाबू ने कहा, देर हो गई, चाय के चक्कर में। आजकल मेरा एक टाइम का खाना वहीं होता है। बदले में रुद्रशंकर की एक ही कहानी रोज सुननी पड़ती है। यहाँ तक तो गनीमत है। रुद्रशंकर को कहानी सुनाने का वेग निकास के वेग की तरह आता है। वेग आने पर वह रुक नहीं पाता है। खुद को जरा भी सम्हाल नहीं पाता है। मैं ठहरा बतरस लोभी। देखो न अभी तुम्हारे चक्कर में लेट हो गया। लेकिन एक ही बात है कि उसे भरोसा है कि मेरा संपादकों में बड़ा रसूख है, सो एक दिन उसकी कहानी उसके नाम से जरूर छपेगी। थोड़ा रुककर भोला बाबू ने कहा, जानते हो असल में कहानी तो दूसरों की ही होती है, छपती लेखक के नाम से है। भोला बाबू ने अनुरोध किया कि दिवाकर नाम से कहीं कुछ छपा दिखे तो बताना, उसे देखकर रुद्रशंकर बाबू को अच्छा लगेगा और मेरे प्रति उनका स्नेह थोड़ा और टिकाऊ होगा।

इतना कहकर भोला बाबू तो बस पकड़कर हवा हो गये और मैं चायवाले से चेंज पैसे को लेकर उलझ रहा था। तो बात यूँ है कि कहानी तो हमेशा दूसरों की ही होती है, छपती लेखक के नाम से है।

एकटा गप्प कहै छी

एकटा गप्प कहै छी

जँ सुनी अहाँ त, एक टा गप्प कहै छी
जँ धरी कान त, एक टा गप्प कहै छी
जँ नञ बाजब त, एक टा गप्प कहै छी
जँ नञ पूछब त, एक टा गप्प कहै छी
जँ नीक लागै त, एक टा गप्प कहै छी
जँ नञ दोहराबी त, एहि बेर कहै छी
हँ इएह कहै छी जे एकटा गप्प कहै छी!! 

तेरह कठवा


तेरह कठवा
सच क्या है? 
बेचन जगे हुए में सपना देख रहा है या यह कि बेचन सपने में जाग रहा है!

रात लगभग आधी से अधिक बीत चुकी है। बाहर सबकुछ लगभग शांत है। यों तो झींगुर की आवाज के साथ कभी-कभी कुत्तों की भौंक सुनाई पड़ जाती है, मगर यह नहीं कहा जा सकता कि बाहर अशांति फैली हुई है। सब कुछ यथा-रीति है।  चौथ का चाँद वैसे भी पूरी रात साथ कहाँ देता है। बाहर आसमान पर चाँद नहीं है। अँधेरा है, मगर इतना नहीं कि एक हाथ को दूसरा हाथ एकदम सूझे ही नहीं। सभ्य समाज में कोई भला आदमी अँधेरे को अच्छा नहीं कहता है। लेकिन आदमी के मिजाज का क्या कहना। आदमी की खासियत ही यह है कि उसे परस्पर विरोधी चीजें एक साथ अच्छी लगती हैं। वह अक्सर इन विरोधी चीजों को एक साथ ही हासिल कर लेने की जुगत करता रहता है। कभी वह खुद को पूरी तरह खोलकर अपना रेशा-रेशा उजागर कर देना चाहता है। कभी रोम-रोम को छुपाये रखना चाहता है। कभी-कभी अँधेरा भी अच्छा लगने लगता है। अँधेरे में अच्छी-बुरी सारी चीजें छिप जाती है। आदमी अच्छे और बुरे के बोझ से मुक्त हो जाता है। आदमी अँधेरे को तौलनेवाली एक जोड़ी आँख बन कर रह जाता है। सिर्फ एक एहसास, शुद्ध चेतना मात्र।
बेचन लगातार करवटें बदल रहा है। एक बार उचट जाने के बाद दुबारा उसे नींद नहीं आ रही है। यह न तो सपनों भरी नींद को पसीने से नहा देनेवाली, चिपचिपाहट से दम फुला देनेवाली, उमस भरी बेकल करनेवाली रात ही है और न ही दाँत से दाँत बजा देनेवाली हाड़तोड़ ठंढी पूस की ही रात है। वैसे भी बेचन तो प्रचंड धूप में काम करने का आदी है, गर्मी से उसे कैसी परेशानी! ठंढ की रात में खरपतवार की धुआंती धधक के सामने अपने-आप में सिमट कर रात काट लेने में भी उसे कभी कोई कठिनाई नहीं हुई। नींद की उचाट का कारण कुछ दूसरा ही है बहुत मुश्किल से अब चुल्हे के लिए ही खरपतवार जुगाड़ पाती है मुंगिया।
हाँ जाग तो मुंगिया भी रही है लेकिन बेचन की तरह कच्छ-मच्छा नहीं रही है। उसके पास औरत का मन है। काफी धीरज और साहसवाला मन। बर्दाश्त करनेनेवाला दुखसह मन। उसे बेचन की इस कच्छ-मच्छी से बड़ी कोफ्त होती है। ऐब ही तो है मगर करे भी तो का करे। मरद तो मरद है। निबाहना तो उसको ही है। माथा तो तो उसका वैसे ही गरम रहता है। कुछ कहो तो शुरू हो जाता है, दे दनादन... दे दनादन! इस वक्त चाहती तो वह भी है कि करवट बदल ले  मगर कैसे? बिल्कुल बाप पर गया है भेटना। दो पूर होकर तीन चढ़े हुए भी चार महीना हो गया है। मगर जोंक की तरह चिपका रहता है। मुंगिया की छाती से। रानी बड़ी है अब वह आठ साल की है। अब तक दो और हो गये होते। भला हो फैमिली पलानीवाले डागदर बाबू का डागदर बाबू का। डागदर बाबू का चेहरा मन में तैरते ही उस गहन रात में किसी को न दिखनेवाली मुस्कान उसके चेहरे पर खेल गई। रनिया बीमार पर गई थी। उसी समय गाँव में फैमिली पलानीवाले डागदर बाबू आये थे। गाँव में पैसा नहीं था सो डागदर बाबू ने ही राह निकाली थी। कहा था, फैमिली पलानी करवा लो  बीमारी के इलाज का पैसा भी माफ कर देंगे और हमेशा के लिए झंझट भी खतम हो जायेगा। पैसा ऊ सरकार से बूझ लेंगे। मुंगिया को चीर-फाड़ से बहुत डर लग रहा था। वैसे भी, ऐसे मामले में मरद ही फैसला करे तो भला। सो बहुत समझाया मरद को। मगर बेचना ने उसकी बात पर कभी कान ही नहीं धरा। आखिर अपनी मर्दानगी को कुछ हो जाये तो। रिस्क कौन लेगा। बाबू लोग तो हर बात में कहते हैं, सब ठीक है। घबराने की कोई बात नहीं है, मगर भोगना तो बाद में उन लोगों को ही होता है। बाबू लोगों पर तो एक पैसा का भरोसा ही नहीं रह गया है बेचना को। सो वह किसी भी तरह से राजी नहीं हुआ। इधर रनिया का बुखार था कि कमने का नाम ही नहीं ले रहा था। हार कर पैर पटकते हुए निकल गई थी। मर भी जाये तो क्या? औरत जात की जिनगी का क्या? डागदर बाबू ने ऑपरेशन करते समय कहा था, अब तुम सब झंझट से आजाद हो आजादी समझती हो न! बम्हनटोली की कुमिया रानी को देखो कैसी दनदनाती फिरती है, निर्भय होकर। कुमुद इस गाँव की बेटी है। जाने क्या हुआ कि बियाह के दूसरे साल ही एक रात उसके पति ने एल्ड्रीन भख लिया। ससुराल से लतियाकर बिदा कर दी गई। बाम्हन की बेटी कहाँ जाती। सो चली आई बाप के कल्ला पर मस्सला पीसने। दुख बर्दाश्त नहीं होने के कारण पाँचवें महीने बाप ने भी खटिया धर लिया। उसका भाई दमोदर, जवान जोरू को घर में छोड़कर चला गया परदेश कमाने। घर में दो-दो जवान औरत। एक विधवा, दूसरी अकेली। उसका बाप रह गया था। बुझे हुए चुल्हे की दबी हुई आग का क्या भरोसा। कब हवा चले और खढ़-अगिन संजोग लग जाये। शुरू-शुरू में तो बहुत हाय-तोबा मचा। पर बाद में गाँव का सोना गाँव की आग में तप कर कुंदन बनने लगा। कुमिया का नाम डागदर के मुँह से सुनते हुए मुंगिया डागदर की आँख में तैरती कूटलिपि को पढ़ने लगी। इस कूट लिपि को औरत हुए बिना कोई पढ़ ही नहीं सकता है। इस कूट संदेश पर मुंगिया का मन कटैया के फूल की तरह हो गया था। आपरेशन के बाद उसके मन में बात बैठ गई। बात यह कि उसने अपने भीतर की औरत को मार दिया। बुढ़वा-बुढ़िया भी जब देखो घुड़क देते हैं कि उसने उनके खानदान के अंकुर को जड़ से उखाड़ दिया, कि उनके खानदान में आज तक ऐसा नहीं हुआ था कभी। बुढ़वा-बुढ़िया की परवाह नहीं करती है मुंगिया। लेकिन बेचन भी तो उसी पर शक करता है।  हलाकि इस बारे में कभी कुछ बोलता नहीं है। यह नहीं बोलना ही अखरनेवाली बात है। जो बात हो सो आदमी चिल्ला-चिल्ला कर कह दे तो बात खतम। नहीं मन में गाँठ पड़ जाती है। गाँठ  मुंगिया को गाँठ बर्दाश्त नहीं है।
बेचन ने फिर करवट बदली इस बार रहा नहीं गया मुंगिया से। सोया हुआ मरद उसे एकदम बच्चा जैसा लगता है। एकदम कोख जाया बच्चा जैसा। धीरे से पूछ बैठी--- 
----''नीन नहीं  होता है का...? ''

लंबी साँस छोड़ते हुए बेचन ने कहा—
--- ''तुम्मौ तो जगै हुई हो!''
अंधेरे में मुंगिया बिहँस उठी थी। बिल्कुल पौ फटने की तरह। मन में गुदगुदी दौड़ गई थी। मुंगिया के लिए अब तक का जाना-सुना उत्तर था तुम को मतलब हम से...?
आगे बेचन कुछ बोला नहीं तो भीतर से सकपका गई मुंगिया। कभी-कभी बात करना भी कितना मुश्किल हो जाता है। पिछले चार-पाँच दिन से बेचन एकदम गुम्मा हो गया है। कुछ बोलता ही नहीं न रोटी काँच रहने पर, न दाल अनोन रहने पर। एकदम गुम्मा। बतियाता है, मगर बात में कोई लस-फस नहीं। चार-पाँच दिन से घर में कोई कलह नहीं मचा। दो-चार दिन बीच घर में कोई कलह न हो तो मुंगिया का मन कैसा तो हराया-हराया लगने लगता है। बेचन चित्तंग लेटा है। मुंगिया भेटना को दूध पिला रही है। भेटना का चभर-चभर कर दूध पीना मुंगिया को अच्छा लगता है। चभर-चभर की लय पर भेटना की पीठ पर थपकी देते-देते मुंगिया सोचती है। सोचते-सोचते सो जाती है। लेकिन नींद में भी उसे एक दूसरी ही चिंता खाये जा रही है। आखिर हुआ क्या है मरदुआ को। मुआ है भी तो बड़ा शक्की। न जाने किसी से हँसते-बतियाते देख लिया का? राम जाने का सोचता रहता है। 
-''हम चाहते हैं अब इस गाँव में न रहें। कहीं और चले जायें। क्या है इस गाँव में? तुमरा का विचार है?'' 
मुंगिया बेचना की बात सुन कर भीतर से सिहर गई। पहली बार उससे विचार देने को कह रहा था बेचन--
--''अरे हमरा विचार का होगा कवनो पंचायत बैठी है कि विचार बाँचै हम? कि कवनो मुखिया, सरपंच हैं हम? अरे बहिरा कर कौनो देखा नहीं है का? सारी जवानी हम यहाँ माघ की रात में विदापद गावते काट लिये अब बुढ़ापा दलान पर डेरा डाल रही है तो फिर वही धुन! हाय रे दैय्या  कहाँ जायेंगे? कहीं नहीं जायेंगे।''
मुंगिया की ई सबसे बुरी आदत है ससुरी बेर-कुबेर कुछ नहीं देखती है। बोलती है तो लगता है कौआ उड़ा रही है-
-- ''अरे धुर स्साली खूब मजा देखा है दुनिया का।... तू यहाँ माघ में बिदापद गाती थी तो हम ही कौन ऊहाँ चैत में फगुआ गाते थे... जाना कहाँ है? बस ऐसे ही सोच रहे हैं.. ''
बेचन भीतर से बेचैन था। चैन मुंगिया को भी कहॉं। दूध पीते हुए भेटना को लेकर बेचन की ओर पलटी दोनो एक दूसरे से लिपट गये। बीच में भेटना! जैसे पँखुरियों के बीच पराग।
बेचैनी में कही गई बात मरछुलाई होती है। जनमते ही मर जाती है। लेकिन जब आदमी घूम-फिर कर एक ही बात पर पहुँचे तो बात गंभीर हो जाती है। कलकत्ते के झमेले से अब वह बचना चाहता है। वहीं कितनी इज्जत है? जब नहीं गया था, तब नहीं गया था। खटुआ... मेड़ुआ... हिंदुस्तानी... बोका...और न जाने क्या-क्या कहते हैं.... ससुरे टोन मारते हैं। ये लोग सारा जीवन तो रहते हैं यहाँ। तो फिर इन लोगों को इतना लड़का-बच्चा कैसे होता है! फिर खुद ही जवाब देते हैं कि इन लोगों का बाल-बच्चा चिटि्ठये से हो जाता है...। संसार का सारा ज्ञान इन्हीं के पास है...। दूसरे का मजाक उड़ाना तो कोई इन से सीखे...। कुछ कहो तो फिस्स से हँस देते हैं...। नहीं अब कहीं नहीं जायेगा...। भाग कर कहाँ जायेगा भाई...। सब जगह ऐसा ही है...। कहीं भैय्या, तो कहीं... और कुछ...। न... अब कहीं नहीं जायेगा...। बेचन खुद को ही समझा रहा था। खुद को समझाना कितना कठिन काम है!
जब बेचन कलकत्ता गया था कमाने। तब कलकत्ता जाने की बीमारी थी इस इलाके में। जैसे भिंड-मुरैना के आदमी को कुछ भी हो तो खिसियाकर तुरंत बीहड़ में उतर जाता था। इस इलाके से भाग कर लोग अभी भी कलकत्ता आते हैं। मगर अब यह बीमारी नहीं है। पहले बात दूसरी थी। भद्र बंगाली समाज में इज्जत तो क्या थी... हाँ, सत्कार न सही। मगर एक तरह का स्वीकार था। और फिर सबसे बड़ी बात अपने इलाके के लोगों में भी एक तरह का अपनापन था। जो मदद करने की हैसियत में थे उन में सभी तो नहीं पर अधिकांश भाग-भाग कर ही आये थे सो मदद भी करते थे। अब जो मदद करने की हैसियत में हैं उन में से अधिकांश के मन में भगमभाग का कोई दर्द नहीं है। वे यहीं बस-बसा गये हैं। ये लोग किसी की मदद नहीं करते अब। ये लोग ही अधिक मारूख हैं। सच बात यह भी है कि मदद कोई किसी की करे भी तो क्या करे, जब काम ही नहीं है। काम से बेशी आदमी हैं। बड़े-बड़े लोगों ने काम ही खा लिया। नंगा नहाओ तो निचोड़ो क्या! इसको दो। उसको दो। इसका दो। उसका दो। ले-दे कर वही ढाक के तीन पात। बेचन ने सब से पहले मोटिया का काम पकड़ा था। हट्टा-कट्टा तो था मगर यह काम भी ताकत से नहीं होता है। इल्म से होता है। पहले तो काम सीखने में ही टाइम लग गया। जब कुछ कमाने लगा तो मुंशी-दलाल का पेट भरते-भरते सब बराबर। जब कुछ प्रपंच सीख गया, प्रपंच यानी कमाकर बचाने का तरीका, तो बाप की बीमारी की खबर आ गई। बाप की बीमारी का तो बहाना ही था। गाँव तो वह भी लौटना चाहता था। कुछ दिन के लिए ही सही। रनिया भी चार-पाँच बरस से जादा की ही हो गई होगी। नाम तो वही धरा कर गया था। मगर पता नहीं उसी नाम से लोग उसे पुकारते हैं या दे दिया कोई और नाम। फिर बेटा को तो उसने देखा भी नहीं था अब तक  चाहता था मंगला हाट से कुछ खरीद ले, उसके लिए। मगर नहीं हो सका। मुंगिया का बंधक रक्खा करघनी उसके दिमाग में झूलने लगा। फिर रनिया के लिए लो, तो मुंगिया के लिए कैसे नहीं  मुंगिया के लिए लो, तो बुढ़िया के लिए कैसे नहीं। फिर बचता है बुढ़वा। बीमार ही सही, कब हंसा उड़ जाये क्या पता! फिर किना-किनाया सब बेकार! मगर जब तक है, छोड़ा तो जा नहीं सकता। और फिर उसी की बीमारी की खबर पर तो जा रहा है। सो न राधा को नौ मन घी हुआ न राधा नाची।
 बुढ़वा बीमार जरूर था, मगर इतना नहीं कि आदमी कलकत्ता से दौड़ा चला आये। वैसे भी कोई न कोई बीमारी तो उसके साथ हमेशा लगी ही रहती थी।   संतोष सिर्फ इतना ही था कि किसी बहाने चला आया। बिना बहाना के आने से अच्छा तो बहाने से आना था। बुढ़वा भी खुश और उसकी अपनी इच्छा भी पूरी हुई---  जो रोगी को भावै, सो बैदा फरमावै! मगर रामकिशुन बाबू को देखते ही जैसे उसका गुस्सा उठ खड़ा हुआ। चिट्ठी रामकिशुन बाबू ने ही लिखवाई थी।  मगर चिट्ठी पाने के बाद से लेकर इसके पहले तक उसे रामकिशुन बाबू का खयाल भी नहीं आया था। उनको देखते ही उसका मन ऐसे बिदक गया। जैसे कुकुरमाछी काटने पर नया बछड़ा बिदक जाता है। एकदम से बिफर पड़ा---
---''का पंड्डी जी केउ वोइसे भी पाती लिखता है कि परदेश में पराने कंठ में आ जाये... बीमार तो बच जाए और अच्छा सिधार जाये.. ''
पंडी जी का स्वार्थ रोक रहा था  लेकिन कुसंस्कार का क्या करें जब स्वार्थ और कुसंस्कार में टकराव होता है तो बोधवान का स्वार्थ और अबोध का कुसंस्कार जीतता है।
'--- 'अरे ससूर न राम न सलाम...अब तुम हम को सिखलायेगा पाती लिखना...दस दिन में हालत सुधर गया तो खुश न होना चाहिए... कि उलटे रिसिया रहा है... जो पूत परदेश गया ऊ ससूरे जब देव की ही परवाह नहीं करते तो पितर की कौन पूछे...''
दोनो ऐसे गुजर गये जैसे विपरीत दिशा से आती ट्रक तेज हार्न के साथ एक दूसरे को बचाती हुई गुजर जाती है। 
बेचन का बाप बड़े गर्व से कहा करता है। रामकिशुन पंडी जी के बाबूजी, बुढ़वा मालिक बड़ा अच्छा आदमी थे। अक्सर कहा करते थे---
---"हमरा दू बेटा है ... एग्गो रामकिशुन और एग्गो कुंतलवा ...''
इतना कहकर लंबी उसाँस लिया करता था कुंतलवा, यानी बेचन का बाप कुंतल मुखिया। अपनी पूरी जवानी मय बीवी-बच्चे , खटिया-पटिया लगा दिया पंडी जी की सेवा में। गाँव में कभी किसी के यहाँ चाकरी नहीं की। जो मिला अपने दरबार में उसी पर संतोष किया। जीवन भर अब तो जीवन की साँझ है। मगर बेचन को यह सब बहुत बुरा लगता है। कई बार इस बात पर कहा-सुनी हो जाती थी बाप से। जिस दिन वह कलकत्ता रवाना हुआ था उस दिन भी इसी बात पर ले-दे हो गयी थी। बात यह थी कि बेचन हरखू चौधरी का खेत जोतने चला गया था। रामकिशुन बाबू के यहाँ कभी सीधे मुहँ मजूरी मिलती नहीं थी। जबकि हरखू चौधरी, दो छटाक कम ही दे मगर देता था टटका। मुंगिया पेट से थी और गरम जलेबी खाने का उसका मन बहुत भरछता था। सो भीतरी बात यह थी कि  उस शाम वह किसी भी कीमत पर पाव भर जलेबी का जुगाड़ कर लेना चाहता था। नगद देकर, उधार नहीं। हरखू चौधरी के यहाँ एक दिन काम कर लेने से ही यह संभव हो सकता था। पंडी जी तो अपनी आदत के अनुसार टरका ही देते। अब यह बात वह बुढ़वा को कैसे समझाता। इधर रामकिशुन बाबू अपने काम के बिथुत हो जाने से उतने परेशान नहीं थे, जितने बेचन के इस आचरण में छिपी अपनी अवहेलना से। सो कुंतल मुखिया को उलाहना दे गये थे। यह बात बुढ़वा को लग गई थी। वह बेचन के लौटते ही उस पर झपट पड़ा था---
''अरे सस्सूर... कुत्ता भी एक मालिक का पोस मानता है... और तू पंडी जी का नागा कर चला गया हरखू चौधरी का खेत जोतने...''
कहते हैं, खेत से छुटे हलवाहे और बैल को नहीं टोकना चाहिए। लेकिन कहने से क्या होता है। बाबू-भैय्या ही नहीं मानते। कुंतल मुखिया तो ठहरे बाप। बेचन पैना को चार की ओलती में खोंसते हुए भभक उठा था।
''कुत्ता पोस मानता है तो तू पोस मान ...'' 
बस इत्ती-सी बात थी। पर बुढ़वा ने रो-धो कर दस समाज इकट्ठा कर लिया, रो-रोकर सब को बता रहा था। हम को आने-माने लगा कर कुत्ता कहता है... हलांकि यह कोई अनहोनी घटना नहीं थी वहाँ के लिए। मगर लोगों को तो मौका मिलना चाहिए। इतना भला-बुरा कहा कि आखिर में उसका मन टूट ही गया। और चल पड़ा था कलकत्ता की ओर...
कुंतल मुखिया ने तब सगही को कहा। कहा क्या अपने-आप बड़बड़ा रहा था।
--''अच्छा हुआ चला गया हिंया से...ऊ ई गाँव में मन मार कर रहे से मुश्किल बात...ससूर भरल पेट मौगी को छोड़ गया हमरे कपारे... जाने क्या होगा... आखिर पहलौट है... आदमी ऊ जो बूझे... आज साठ बरस से बुझिये तो रहे हैं भैय्या... मगर सब बुझौनी तो कंचा पर होता है... कंचा पर... बूझ जायेंगे ससूर... आज अगर हमरा जनमा होता तो का ई दशा करके चला जाता हमरा...''
मुंगिया न चीख पा रही थी, न रो पा रही थी। लछमिनियां पहले तो कुछ बोली नहीं। बेचन को गोद में लाई थी। बेचन मुखिया का अपना जनमा नहीं था तो क्या हुआ। बुढ़वा को मानता तो अपने सगे बाप से अधिक था। आज पहली बार मुखिया के मुँह से ऐसी बानी सुनकर लछमिनियां को अपनी कोख में काँटा उगने जैसा मारक एहसास हुआ। मन में बात तो हवा गोला की तरह उठी कि कह देवे दम ठोककर कि अपन खास मौगी से जनमल कोनो अपने होता है का... उसे भी इसी गाँव में बसते-बसते बीस बरिस हो गये... किस जाति और किस बरन के बारे में... किसके बारे में क्या नहीं जानती है वह। मगर जो कह देती तो कितनी बड़ी बात होती! सो उसने बस इतना ही कहा----''भीखना तो अपने जनमल है फुलेसरा के तो काहे बपै को लतियाते रहता है गेन की तरह ... ''
मुखिया समझ गये कि बात भीतर तक लग गई है लछमिनियां को, सो चुपा गये।
खाँटी डेढ़ कोस पक्की जमीन है टेसन। नौ बजिया पकड़नी है। इसके पहले एक बार बस एक बार कलकत्ता गया था घूमने-फिरने। तब की बात और थी लंबा-लंबा डेग भरते हुए बेचन चला जा रहा है। उसकी चाल में निश्चय और संकल्प का बल है। दिमाग उससे भी तेज चल रहा है उसका। ऊ गाड़ी है कि रोड धर कर ही चलेगा... शाटकट से चलेगा तो कम-से-कम पाव भर जमीन तो जरूरे कम हो जायेगा...। फिर सेठ के यहाँ भी समय लगेगा... वह भी तो देखेगा... कुल तीन सौ रूपल्ली भी देदे तो वह कलकत्ता पहुँचकर मजे में टिक सकता है... बल्कि आराम से पहुँच जायेगा... बस नंबर तो याद नहीं लेकिन किसी से पूछ लेगा राजाबाजार ....फिर फूलबागान... उसके बाद तो वह पैदल भी रपेट देगा... लेकिन अगर जो सेठ माल  रखने और पैसा देने में आनाकानी करे। याकि भेटैबे नहीं करे तो क्या होगा...। बस यहीं से उसके मन की गति में फिर एक पेंचदार मोड़ आ जाती है और सबकुछ गडमडाने लग जाता है। बीच-बीच में कुरता की जेब टटोलकर देख लेता है। मन थिर होता है तो फिर तरह-तरह के विचार। माँगते तो का मुंगिया ना कर देती...। बाप ने दिया है चाँदी है, तो का... वह कोई उसे बेचने-बिकिनने जा रहा है...। बंधक ही तो रखेगा बैजनाथ सेठ के यहाँ...। बड़े-बड़े बाबू लोग चुपके से बंधक रख आते हैं ...और जिनिस होता किसलिए है...। घर के बाकस में नहीं रहा सेठ की तिजोरी में रहा...। क्या फर्क है...। लेकिन माँग के लेना चाहिए था। मगर होश कहाँ था उसको और नहीं तो क्या कोई इस अवस्था में वोइसे धकियाता है। जो होगा सो होगा... ई एग्गो बड़ा जुलूम हो गया उससे... उसे मुंगिया के पेट की याद आ गई तो उसका मन अलग तरह के एहसास से भर गया। वह लौट जाना चाहता है। मुंगिया के पास। मगर वह हार मानना नहीं चाहता है। वह अब कलकत्ता जायेगा जरूर। अरे बेटा और लोटा तो बाहरे जने पर चमकता है। संतोष की बात यही है कि आते समय चिल्ला-चिल्लाकर सब के सामने कह दिया था कि वह कलकत्ता जा रहा है....
इधर गाँव में मजदूरों की कितनी कमी होती गई है। है न मजे की बात। देश में बेरोजगारी बढ़ रही है। गाँव में मजदूर कम हो रहे हैं। किसानी के समय तो एकदम अखरने लगता है। कलकत्ता तो पहले ही इनके लिए मामा गाँव था अब नयी बीमारी बंबई-दिल्ली-पंजाब की लग गई है। एक जत्था आता है। दस-पाँच उसमें से रह जाते हैं। नया जत्था जाता है। दस-बीस नये लोग संग हो लेते हैं। आने-जाने का यह खेल चलता रहता है। जो बच जाते हैं सो ऐंठरोप इतने कि पूछिये मत। कानून तो इतने जान जाते हैं कि वकालत कर लें। वहाँ जा कर पता नहीं क्या-क्या करते हैं। मगर यहाँ कानून ऐसा बघारते हैं कि... बड़े-बड़े फेल कर जाएँ इनके सामने। यही सब गुन-धुन करते हुए चले जा रहे थे रामकिशुन बाबू। सामने से आते हुए दीख गये कुंतल मुखिया। एक सकेंड में रामकिशुन बाबू के दिमाग में एक योजना कौंध गई। दुआ सलाम के बाद उन्होंने मन को दुखी बनाते हुए अपनेपन की चासनी में लपेटकर कहना शुरू किया—
''अब कैसन  मन रहता है कुंतल मुखिया... जवान लरिका रनबन भटक रहा है तो कइसन मन रहेगा... ई हम समझ सकते हैं... मगर करें तो करें का...। अब बच्चा रूठ कर गया है तो वोइसे ही तो आ नहीं जायेगा। मनाना तो होगा ही। लरिका तो हीरा है। बस जमाना ही बदल गया। तुम कहो तुमरा बीमारी के नाम पर एग्गो पाती भेज दें तो लरिका तो अइसन हीरा है कि दौरा चला आयेगा---"

कुंतल मुखिया चुप ही रहे।
मौन स्वीकृति लछनम का सिद्धांत लगाकर मन ही मन मुदित हो गये रामकिशुन बाबू---
---''गाँव-घर में कभी यह बीमारी थी ही नहीं...''
बसहा की तरह मूड़ी डुलाता रहा कुंतल मुखिया। आगे रामकिशुन बाबू ने भेदिये आवाज में कहना शुरू किया--- 

---"'गाँव में राति सब मजूरन की मिटिन है... वोह में जाना है न हो मुखिया''
खबर कुंतल मुखिया को थी। वह उसमें जाना भी चाहता था। मगर एक प्रकार का अचिन्हा डर भी उसके मन में कहीं-न-कहीं कुंडली जमाये बैठा था। सो उसने साफ स्वर में मना कर दिया---
---'' पंडीजी हम को तो कवनो खबर नहीं है। और खबर हो भी तो हम वहाँ जाकर क्या करेंगे। जो हवा है सो खतरनाक है मालिक...।''
मालिक शब्द पर रामकिशुन बाबू का ध्यान गये बिना नहीं रहा। आचरण में कभी कुंतल मुखिया रामकिशुन बाबू के प्रति मालिकपने से मुक्त नहीं हो सका था। मगर शब्द में यह संबोधन कम ही आकार पाता था। ऐसे संबोधन के बाद रामकिशुन बाबू सावधान और संयत हो जाते थे। माहौल भारी-भारी हो जाता था। क्षण की चुप्पी तोड़ते हुए कुंतल मुखिया ने कहा---
---''भोट के टैम आ गया है...सो अब मिटिन-सिटिन तो होएगा ही ...''
पंडी जी चाहते थे, कुंतलवा मिटिंग में न सिर्फ जाये बल्कि वहाँ से लौटकर पक्की खबर भी दे। आखिर वहाँ हुआ क्या और आगे क्या होना है। मगर कुंतल मुखिया के सावधान होने को भाँपकर यह बात कैसे उसे कहें। हवा चलती है तो हर किसी को लगती है। जिस खतरनाक हवा की ओर कुंतल मुखिया इशारा कर रहा है वह हवा तो तो अपने होने से ही कुंतल मुखिया और रामकिशुन पंडीजी दोनो को झकझोर रही है। उनके संबंध में भी एक प्रकार का नया आयाम जाने-अनजाने जुड़ ही गया है। संबंध धीरे-धीरे अनुमुखी की जगह प्रतिमुखी होने की ओर ही बढ़ रहा है। यह बढ़ना खतरनाक है। इस हवा को  झेलने के लिए मन से न तो कुंतल मुखिया जैसे लोग तैयार हो पा रहे हैं और न ही रामकिशुन पंडी जी जैसे लोग। मगर हवा चल रही है। कहीं हरदेपुरा की तरह इस बार यहाँ भी हुड़दंग मची तो बजाते रहिये झाल। जो हो रामकिशुन बाबू चाहते हैं कि कुंतल मुखिया उस मिटिंग में जाये जरूर। फिर एक बार में न सही धीरे-धीरे उसके मन से वहाँ हुई कार्रवाई का मर्म तो वे आँक ही लेंगे। इसलिए बड़े आग्रह के साथ प्रेमपूर्वक कहना शुरू किया---
---'' न हो मुखिया जाना जरूर चाहिए...। इन लोगो का तो माथा खराप हो गया है... जहाँ देखो तहाँ कनफुसकी... कुछ-न-कुछ खरजंत्र-खुराफात सोचते रहता है... एकदम हवा ही पलट गया मुखिया...''
लौटकर कुंतल मुखिया ने बताया---
--- ''पंडीजी हम को तो सब बात यादे नहीं रहती है...। मगर ऊ नन्हकुआ और उसके साथ एक और आये थे। कह रहे थे कि गाँव-गाँव से भाग-भाग के लोग पंजाब जाते हैं... बंगाल जाते हैं... कुछ काम करते हैं... और बेशी आदमी मारे-मारे फिरते हैं... मार दिये जाते हैं... अपना मुलुक छोड़कर काहे चले जाते हैं... यहाँ काम नहीं है...? मगर असल बात है कि इज्जत नहीं है... कुछ कहो... हक की बात तो जान से मुआ दिया जाता है...। अपनी बहु-बेटी पर तो सात ताला का पहरा बिठाये रहते हैं और दूसरे ....। करता है कोई भरता है कोई। पुलिस जाल में फँसा शंकरबा... तिलकबा... शनियां... बोधा... काहे का अपराध था उनका...! सब बाबू-भैय्या दबा के रखना चाहते हैं...। पैर के नीचे...। देश आजाद हो गया बहुत पहले। हमलोगन को लेकिन अभी भी गुलाम बना के रखा गया है। रामदयाल, सिधेसर बाबू का बड़का लड़का राँची में उनियन करता है। कहता है हम मजूर हैं। अपना हक लड़कर लेंगे। दुनिया के मजूरो एक हो। यहाँ उसका पूरा खानदान आँख दिखाता है। इनकी तरह हम यहाँ बराबरी में बैठें तो गजब हो जाय। इनकी इज्जत माटी में मिल जाये। हमारी बराबरी से इनकी हेंठी होती है...हेंठी... बराबरी बर्दाश्त नहीं होती है... ''
 रामदयाल का प्रसंग कुंतल मुखिया चबा जाना चाहता था। वह जानता था रामदयाल का नाम सुन कर पंडीजी भीतर से तड़तड़ा जायेंगे। मगर उसने कह दिया तिमिलाएँ जरा ऊ भी। हरदेपुरा में रामकिशुन की लड़की बसती है। सिद्धेश्वर बाबू उनके खास समधी तो नहीं हैं। मगर रसूखवाले आदमी हैं। परिवार का परिचय उन्हीं के नाम से चलता है। आगे रामकिशुन पंडीजी को कुछ सुनना बाकी नहीं रह गया था। तम-तमाकर उन्होंने जाते हुए फिकरा कसा---
---''बड़े-बड़े को लंगोट नहीं और कुत्ता माँगे पजामा....''

असल बात तो कुंतल मुखिया ने कही ही नहीं। उसे भी बड़ा अच्छा लगा था। लड़कों के साथ-साथ वह भी जवान हो गया था। इजोरिया रात में गानाबजाना। गाना भी ऐइसन कि `कारी-कारी देहवा प लाले-लाले अँचरा कि केसवा नगिनिया से लटकल फूल~~~ उठान मारे नदिया के प्रान~~~ ।' ऐसा गाना कि आल्हा फेल। जैसा पहले सुराजी गाते थे। कुंतल एकदम झूम-झूम उठा था। आजादी के पहले की बातें याद हो आई थी। तब वह दस-बारह बरस का रहा होगा। गाँधी महात्मा खुद कभी इस गाँव में आये नहीं। पर नेता लोग आते ही रहते थे। सिर्फ अमरनाथ का नाम उसे याद है। जबारे के हैं। पहली बार इधर से भोट में वही नेता उखड़े थे। मंत्री भी हुए थे। पहले तो बराबर आना-जाना लगा रहता था। मगर सुराज के बाद आना-जाना वैसा नहीं रहा। धीरे-धीरे कम होता चला गया।
उस मिटिंग में कुंतल मुखिया का जाना वैसा ही था, जैसे कैद में जनमे बच्चे का बालिग होकर अपने समाज में आना।
इधर गाँव की हवा बदली। रामकिशुन बाबू ने कुंतल मुखिया की बीमारी का बहाना बनाकर बुला लिया बेचना को। तेवर ठीक नहीं है तो क्या हुआ। आ गया है तो फिर तुरंते चला तो नहीं जायेगा। थोड़ा मिठास देकर बात करेंगे। मजूरी देते तो हैं ही। समय पर टटके दे दिया करेंगे। असल में पिछले साल जो हरदेपुरा में हुआ, वह कम भयानक नहीं था। दोष सिद्धेश्वर बाबू का भी कम नहीं था। मगर खुले महाभारत में कोई उनको कहे भी तो कैसे! अपनी सनक में वे सुनते भी किसकी हैं...। अरे बड़े-बड़े को इन लोगों ने नाथ दिया है। अभी से होशियार न होएँ तो अपनी ही इज्जत खराब होनी है। होशियार रहना ही ठीक है। आदमी वही है जो हवा पहचाने। यही सब सोचते हुए रामकिशुन बाबू सड़क पर आ गये।
इस बीच बेचन की महतारी लछिमिनियां को साँप ने काट खाया। ओझा-गुनी हाथ पटकते-पटकते रह गये। मगर, हुआ कुछ नहीं। गाँव के डोका डाक्टर ससुराल गये तो दस दिन से शायद वहीं पड़े हुए थे। कहाँ थे किसी को मालूम नहीं। ससुराल भी कोई एक हो तो खोजे! कहाँ हैं किस को मालूम! बेचन चाहता था कि शहर के किसी बड़े डाक्टर के पास उसको ले जाये। चाहता था मगर पास में पैसा नहीं था। शहर के डाक्टर के पास जाने के लिए टेंट में जोर तो चाहिए ही! सो पैसा तो रामकिशुन पंडीजी से ले लेता। कितना मीठा-मीठा तो बतियाते रहते हैं हरदम। ऐसा तो होता नहीं कि उनकी संदूकची में पैसा धरा रह जाये और उसकी माई दू खुराक दवाई के लिए दुनिया ही त्याग दे। मगर लोगों ने अजनबिया के गुन का इतना बखान किया, इतने सारे उदाहरण दे डाले और यही बकते रहे कि जो होना होगा यहाँ भी होगा और शहर में भी होगा। विधना के विधान में कौन दखल दे सकता है। होनी हो सो होय। मुंगिया को छाती कूटने से ही फुरसत नहीं हुई। जैसे छाती कूटने से ही जहर उतर जायेगा। और इस कोलाहल के भँवर में मरल सुग्गा की तरह ऊभ-चुभ करता नि:शब्द खड़ा रहा उसका बाप कुंतल मुखिया। उसको कुछ करते नहीं बना। पसीना पोछते हुए अजनबिया ने एलान किया---
---“बुढ़िया को भुतसंप्पा घर लिया था... एकदम जबर्दस्त भुतसंप्पा... उसका मारा कोई बचता है का..“
किरिया-करम के दिन तक रोज एक बार रामकिशुन बाबू हाल-चाल पूछ जाते। कुंतल मुखिया को ढाढ़स बँधा जाते। बुढ़िया से बड़ा लाग तो कुंतल मुखिया को। नारायणपुर से सगाई करके लाया था। साथ में बित्ता भर का बेचना था। प्यार से लछिमिनिया कहने लगा तो आज तक बूढ़े-बच्चे सभी लछिमिनियां ही कहते हैं। किसी को माँ-बाप का दिया उसका असली नाम मालूम नहीं। कैसा सराप था कि कुंतल मुखिया से उसको हुई तो चार संतान मगर बची एक भी नहीं। सब समय से पहले कालकवलित।
किरिया-करम से फारिग हुआ तो बाढ़ आ गई। वर्षा तो कोई खास नहीं हुई थी। बाढ़ खूब जोरदार थी। इतनी जोरदार की ऊपर आसमान में हेलीकॉप्टर उड़ने लगे।  सड़कों-बाँधों के ऊपर से उड़ते हुए हेलीकॉप्टर को निहारते समय लोग इतने कुतूहल से भर जाते कि जमीन और अपनी दुर्दशा का कोई ख्याल ही नहीं रह जाता। सब जानते हैं, बाढ़ बनावटी है। नेपाल ने पानी छोड़ा है। कितने नेपालियों की लाशें बहकर बाढ़ में आई। कितने देसी बह गये। कितने तो भूख से मर गये  कोई हिसाब नहीं। ठीक ही है जब रोटी आकाश लगी हो, तो जिसकी जितनी ऊँचाई। बाबू-भैय्या अपने कोठे पर बैठकर समाचार सुनते कि कहीं उनके गाँव का नाम आ जाये। स्वयंसेवियों में ही नाम आ जाये। बीडिओ साहब को बड़े लोग सब मिलकर खबर तो भिजवाई है। बीडिओ है तो खानदानी, मगर सरकारी काम का तो अपना तरीका होता है।
बेचन ने बहुत काम किया। कई की जान बचाई। कई के सामान। फिर भी बहुत का बहुत कुछ बह-भसिया गया। सब से कठिन दृश्य था, कुमिया का बचना। बेचन की आँख में रह-रहकर लौट आता है। वह दृश्य  जैसे घर के पिछवाड़े बैठा रहता है। जब-तब मन में हुलकी मारने लगता है। हहाते हुए पानी में बही जा रही है कुमिया। ऊभ-चुभ उसको बचाना अपने को डुबाने जैसा ही था। नन्हकुआ का ध्यान उधर गया तो ऊ ऐसे छपाक से पानी में कूद गया जैसे आग लगी मकान से कोई कूद जाता है। अपना प्राण लेकर  पाँच-दस मिनट की जी तोड़ कोशिश के बाद ही तो कुमिया को गोद में उठाये लौट आया था खुशी से भरा हुआ नन्हकुआ। जैसे रामजी ने शिवधनु उठा लिया हो। उसकी गोद में ऐसी समाई थी कुमिया जैसे कोख में समाया रहता है बच्चा। एक तरफ बाढ़ का पानी और दूसरी तरफ कुमिया की अधखुली आँख के कोर से ढरकते आँसू। उस आँसू की भाखा कौन पढ़े। जो पढ़े सो ज्ञानी होए। जनम कृतार्थ हो जाये। दोनो तरफ पानी-ही-पानी। पानी से लड़कर पानी को बचा लिया था नन्हकुआ ने। नन्हकुआ वीर है। ज्ञानी है। उसका जनम कृतार्थ है। मान गया बेचन। नन्हकुआ... रमलोचना... कपिलेसरा... रधवा... जिन-जिन के बारे में सुनता था कि एक नंबर के लफंगे हैं, उन सब के साथ काम करते-करते बेचन एकदम उनमें घुल-मिल गया...। इस तरह कि कि उन्हीं में से एक होकर रह गया बेचन।
बाढ़ का पानी नीचे उतरा तो बाढ़ की कहानियाँ ऊपर चढ़ने लगी। नन्हकुआ कहता है---
''सब का हिसाब लिया जायेगा... अरे हम मरे नहीं हैं कि कौआ आँख निकाल ले जाये...''
ये बातें सुनने में तो बेचन को ठीक लगती है, मगर न जाने क्यों कलेजा धक-धकाने लगता है। उसे पहले की सुनी बातें याद आने लगती है। और वह एकदम डर जाता है मार-पीट, मानुष वह कोई भी क्यों न हो उसकी हत्या की सोच से भी वह बहुत घबड़ाता है।
रोपनी शुरू हो गई है। रामकिशुन बाबू ने एक दिन बड़े प्यार से पुचकारते हुए बेचन से कहा---
---'' परसों हल पकड़ने का मुहुरत है...हमरा पहला हल तुमरे खानदान के हाथ से खेत में जाता है और निबाहते भी तुम्हीलोग हो... ई तो तुमको सब मालूमे है... इस बार बुढ़वा माटी नहीं उठा पायेगा... तुम क्या करोगे सो तुम्हीं जानो... पहलेवाली बात नहीं है... नहीं तो हाथ पकड़ के कहता कि रे बेचना परसों आ जाना समय पर... तुमलोग नया सोच के हो... खैर, जो करना हो मन बता देना बाबू... सोच लो... कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं..''
बेचन एकदम से पन्हाई गाय की तरह शांत खड़ा रहा। बिना हिले-डुले। मन ही मन रामकिशुन बाबू खुश थे। वैसे इस गाँव में अभी तक कुछ हुआ नहीं है अब तक। हाँ, नन्हकुआ का आना-जाना काफी बढ़ गया है, सो पता नहीं कब क्या हो जाये...
मैया के मरने पर बड़ी मदद की रामकिशुन बाबू ने, बेचना को याद है। फिर पीछे से बुढ़वा यहीं रहेगा। मुंगिया रहेगी। दूग्गो बालबुतरू है। आखिर बेर-कुबेर के बास्ते कोई-न-कोई भरोसा तो चाहिए कि नहीं...। पंडीजी का मन खटा जाये उसकी ओर से यह किसी प्रकार से ठीक नहीं होगा---
---''नहीं मालिक पहले अपना काम है फिर दुनिया जहान है...हमरे खानदान का काम है सो ई तो हमरा हके है... हम परसों समय पर चले आयेंगे...''
शायद पहली बार, हाँ पहली बार बेचन ने रामकिशुन बाबू को मालिक कहा था। रामकिशुन बाबू क लिए यह विश्व विजय से कम आनंददायक नहीं था। यह आनंद छिपाये नहीं छिप रहा था। उनके आनंद विभोर मन को पढ़कर अपने इस व्यवहार पर अपने ही प्रति घृणा से भर गया था बेचन का मन। जैसे पहली बार शराब की गंध से आदमी को होता है। फिर शायद कृतज्ञता बोध ने उसे उबारा। और उसके मन पर गुलामी का नशा छाता चला गया।
जब से बुढ़िया मरी है बुढ़वा एकदम से गिर ही गया। खाना भी खाता है तो लगता है कुल्हाड़ी चला रहा है। इधर रोपनी पूरी चढ़ान पर थी। उधर दो-तीन दिन के ज्वर के बाद एक दिन बुढ़वा भी लुढ़क गया। रामकिशुन बाबू को इस समय बुढ़वा का मरना बहुत अखर गया।
‘अब ई सस्सूर किरियाकरम करेंगे... हमरा तो हो गया बंटाढार... '
तभी रामकिशुन बाबू के सामने बिजली कौंधी। अरे वाह एक पंथ दूई काज। काज भी छोटा-मोटा नहीं---
---''अरे भाई बेचना तू कैसे किरिया-करम करेगा... धरम शास्त्र कुछ है कि सब बिला गया देस से... तू तो कुंतल मुखिया का बेटा नहीं है... यह सब जानते हैं... बित्ता भर का था जब तुमको ले कर लछिमिनियां आई थी इस गाँव में। तुम से भी छिपा नहीं है। ऐसा अनरथ कैसे होगा। कुंतल मुखिया तो निपूता था। मानने से क्या होता है! अपना आखिर अपना होता है। देखो बेचन... दुनिया आनी-जानी है... एक धरम ही इस अथिर संसार में थिर है... धरम के बल पर ही दुनिया टिकी हुई है... है कि नहीं...। कुंतल मुखिया ने अपने जिंदा रहते तुमको जितना लाड़-प्यार दिया। इसका बदला तुम उसका धरम रछा कर चुका सकते हो। अपना धरम भी बचा सकते हो। आगे तुम जानो और तुम्हार धरम जाने। हमरा काम है चेताना। चेता दिया''
पंडीजी को डर है कि कहीं जो नन्हकुआ को खबर लग गई तो कोई-न-कोई अड़ंगा अवश्य लगायेगा। उनके मन में ऐसे समय में संस्कृत के प्रति बड़ी श्रद्धा जग जाती है। भीतरी बात यह थी कि बुढ़वा के नाम से तेरह कट्ठवा खेत था। वैसे खेत में जमीन तो अब तीन कट्ठा ही है। मगर नाम उसका अभी भी तेरह कट्ठवा ही है। इस तीन कट्ठे की जमीन पर पंडीजी की नजर है। पंडी जी मन ही मन अति प्रसन्न हैं कि इधर बेचना वारिस नहीं है। और उधर प्रसिद्ध सूत्र भी है ` पिंडं दद्वा धनं हरेत' । डर है तो बस यही कि नन्हकुआ का आना-जाना बहुत बढ़ गया है...
दीनुआ जो कल ही पंजाब से लौटा है तीन हाथ कूद गया---
--- "पंडी जी अब हम लोगों को शास्तर मत पढ़ाइये...जिसे पढ़ने का हम को अधिकार ही नहीं है ...उसे मनवाने की जबर्दस्ती मत कीजिये..."
गाँव दो खेमे में बँट गया। एक तरफ दीनुआ है। दूसरी तरफ पंडित रामकिशुन। तनाव काफी बढ़ गया। पंडीजी को तो इसी का डर था। ऊपर से नन्हकुआ वैशाखी बतास की तरह आ गया। चतुर पंडी जी ने समझने में देर नहीं की। उन्होंने एलान कर दिया---
--- "हम न तो नन्हकू से कुछ कहेंगे न दीनुआ से ...और कहें भी क्यों ऊ हमरा है ही कौन... हम को जो कहना है सो हमने बेचना को कह दिया अपना आदमी जानकर आगे जैसा उसका धरम ... इससे बेशी और कुछ नहीं कहना है हमको..."
इधर बाप की लाश पड़ी है उधर शास्त्रार्थ हो रहा है। बेचन को याद है जब उसकी माई मरी थी तो सिरिफ रामकिशुन पंडीजी ही उसके पास खड़े हुए थे बाकी सब तो अजनबिया का तमाशा देख रहे थे। लेकिन रामकिशुन पंडीजी की आँख में एक बूँद ही सही मगर आँसू देखा था बेचन ने। अपनी आँख से। उसका पूरा मन ही बदल गया था। लेकिन पंडी जी का अभी का व्यवहार उसकी समझ से परे था। पंडी जी जब तुनक कर जाने लगे तो बेचना भोकासी पार कर रोने लगा---
--- "पंडी जी बीच भँवर में हम को छोड़कर मत जाइये... आप जो कहियेगा वही होगा... मगर अभी बुढ़वा का लहाश उठ जाने दीजिये... जमाना जो कहे, कहने दीजिये... बाप तो हमरा मरिये न गया पंडी जी... शासतर जो कहे लेकिन बाप के असथान पर तो हम कुंतले मुखिया को जीवन भर देखते रहे हैं... ई तो मनेंगे... और अब तो  अपना कहने के लिए आप ही बचे हैं... माई-बाप जो समझिये..."
इस बात से रामकिशुन बाबू का मन एकदम पानी की तरह हो गया।
यह सब हो ही रहा था कि कहीं से उड़ते-उड़ते नन्हकुआ आ गया। भीतर-भीतर तो उससे सब घबड़ाते हैं। सब फिराक में रहा करते हैं कि कैसे मौका पाकर उसको लुढ़का दिया जाये। मगर सामने सब सटक सीताराम। आखिरकार शास्त्रों के पन्ने बंद हुए और सभी इस बात पर सहमत हो गये कि कुंतल मुखिया का किरिया-करम करने का अधिकार बेचन को है। अब एकांत पा कर रामकिशुन बाबू बेचन को समझाया---
--- "देख बेचना धन-दौलत सब आनी-जानी है... मगर बाप का सराध करने का मौका फिर-फिर नहीं आता है जीवन में... अरे हमरा का है... हम कवनो एक मुट्ठी भात भी खायेंगे... खायेगा तो सब तुमरा जाते-बिरादर... तब है कि बुढ़वा की आतमा तिरपित होगी... पैसा-कौड़ी का चिंता नहीं करना है... जब कमाओगे तब देना... बस किसी से कहना नहीं कुछ... हमरे-तुमरे ईमान से बढ़कर कुछ नहीं है..."
सिर्फ कहा ही नहीं पंडी जी ने साढ़े तीन हजार दिया भी। बेचन पतित होने से बच गया। बुढ़वा का आतमा तिरपित हो गया। कोई कुछ कहे, पंडी जी का उपकार वह जीवन भर नहीं भूलेगा।
धान पकने पर आ गया। धान क्या है। सब मरी हो गया। जो भी है किसान की लछमी तो वही है। अब पंडी जी जब मिलते हैं बेचन को बड़े प्यार से समझाते हैं----
---"कहीं बहिराने का विचार त्यागो... यहीं रहो... भेटना की माई को अकेले असगर छोड़कर कहीं जाना उचित नहीं होगा... दूग्गो  छोटा-छोटा बुतरू है तुम्हारा... कौन देखेगा... और एक बात तगादा मत समझना मगर निआव का बात... कुछ इधर-उधर का मामला होता तो कोई बात नहीं लेकिन बुढ़वा के सराधवाला जो बकियौता है सो तो तुमको आज न कल चुकाना ही है... मान लो हम माफे कर दिये तो का हुआ, है तो देव-पित्तर का मामला... हम माफे करनेवाले कौन हैं... आखिर जब संसार से जाओगे तो उहाँ पितर को क्या मुँह दिखाओगे... और यह तुम्हारे पुरूसारथ पर भी तो कलंके होगा... सब से अच्छा रास्ता है ऊ तीन कट्ठा का जो तेरह कट्ठवा है चुपचाप हमरे नाम लिख दो... तुमरा करज भी चुक गया और समझो हमरा फरज भी पुर गया... और ऊ नन्हकुआ से बचके रहो ...ऊ सस्सूरे का कौन है आगे-पीछे... न जात न धरम... न कोई रोनेवाला न कोई धोनेवाला... उसके संघत में दिमाग खराप होने के अलावा कुछ नहीं होगा... आज न कल तो उनको बलि चढ़ना ही है... बुरा लगा हो तो माफ करना... कुंतल मुखिया को हम अपना सगा भाइये मानते थे... सो चेता दिया... आगे तुम जानो और तुम्हारा धरम जाने।"
बेचन का दिमाग भोथ रखा है। पंडी जी की और सब बात ठीक है। मगर तीन कट्ठा जमीन साढ़े तीन हजार में! यह बात उसको अखर रही है। वैसे भी जमीन तो जमीन है कोई साग-सब्जी तो है नहीं कि टोकरी में उठाये और चल दिये। इस बाजार नहीं, उस बाजार। जहाँ कीमत मिले वहीं बेचेंगे। इस अकाल में गरजू की जमीन की वाजिब कीमत देने की दयानतदारी कौन दिखायेगा! फिर किस में इतनी कुव्वत है। किसकी ऐसी नीयत होगी। बेचन के मन में बात धँस गई। आखिर में ई जमीन उससे सम्हलेगी नहीं। कहीं ऐसा न हो जमिनवो हाथ से निकल जाये और करजा भी सिर पर चढ़ा रह जाये। ई बतिया तो ठीके है कि सराध का पैसा अगर नहीं चुकाया तो बहुत बड़ा पाप होगा। ना-ना-ना ऐसा सोचना भी पाप है। महापाप। पंडी जी के सामने नत हो गया बेचन---
--- "पंडी जी किसी दिन चलिए। हम को इस बोझ से मुक्ति दे दीजिये...''
पंडी जी तो पहले एकदम घबड़ा ही गये पता नहीं क्या चाल हो। इन पर आँख मूँद कर विश्वास तो नहीं किया जा सकता है। आज करो सो अब करो का सुमिरन करते हुए भी पंडी जी  सावधान हैं---
--- "देखो बेचन कोई जल्दबाजी नहीं है ठंढ़ा दिमाग से सोच लो... लगे कि पंडी जी साढे तीने हजार में सोना का टुकड़ा हड़प रहे हैं तो  छोड़ दो भैय्या... हम संतोख कर लेंगे... हम सूद-ऊद की बात नहीं करते हैं... लेकिन सोचो ई जमीन तो कायदे से तुमरा है भी नहीं... कानून तो हम-तुम नहीं बनायेंगे न... मन में कोई बात हो तो रहने दो हमही संतोख कर लेंगे लेकिन किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहते हैं हम... जमाना ही खराब हो गया किसी का उपकार करो और ऊपर से झमेला मोल लो... सो क्या जरूरत है...''
पंडी जी की इस बात से बेचन का मन और बेचैन हो गया---
---"नहीं पंडी जी जाने बाबा बैदनाथ हमरा मन में कुछ नहीं है अब जैसे भी हो इस झमेले से हम को छुटकारा दीजिये... जिनगी का क्या भरोसा है..."
पंडी जी का मन तो फूल कर खेसारी हो गया।
नन्हकुआ की गोद में समाई कुमिया की अधखुली आँख के कोर से ढरकते आँसू। उस आँसू में भीतर तक भींगकर पवित्र हुआ नन्हकुआ का मन। बेचन के अंदर सुगबुगा रहा है। धीरे-धीरे उसे रह-रहकर बाप की याद आ रही है। ताड़ी के नशे में चूर हो जाने पर कहता था बुढ़वा---
--- "रे बेचना...रे जब तक मालिक मलिकार गरिआओत रहे तब तक समझो सब ठीके है... और जहाँ आदर से कहे कुंतल मुखिया... समझो भारी भीतरघात... होशियार एकदम होशियार... सावधान-सावधान कि अपटी खेत में फँसल परान..."
जैसे कुंतल मुखिया की आत्मा ही याद के दायरे से निकलकर सामने आ गई। वह धीरे-धीरे निष्कर्ष पर पहुँच गया---
--- "न चाहे चला जाये परान... रूठ जायें देवपित्तर भगवान... वह नहीं करेगा... नहीं करेगा घरती का अपमान... आखिर धरती भी माई ही तो है... वह सकेगा तो कमा कर चुका देगा सारा करजा... कोई पाप नहीं है उसके अंदर। वह तेरह कठवा की रक्षा जरूर करेगा। जरूर।"
जब आँख खुली तो सूरज डेढ़ हाथ ऊपर चढ़ आया है। वह रात के निष्कर्ष को मन ही मन दुहराते हुए झोल से भरे छान को देख रहा है। छान की भुरकी से आती हुई रोशनी में झूलता हुआ झोल किसी भयानक जंतु की तरह लग रहा है जिससे खेल रहा है भेटना। न सबसे पहले यह झोल झाड़ेगा। बुदबुदाते हुए उठ खड़ा हुआ बेचन। चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ। सामने खड़ी मुंगिया के लिए यह अद्भुत दृश्य है। वह अपने जीवन में आज पहली बार बेचन मुखिया का रूप-गंध-एहसास को महसूस कर रही है। महसूस कर रही है और धीरे-धीरे उस रूप-गंध-एहसास की तरफ बढ़ रही है। उधर जैसे नन्हकुआ की गोद में समाई कुमिया की अधखुली आँख के कोर से ढरकते में भीतर तक भींगकर पवित्र हुआ था नन्हकुआ का मन उसी तरह पवित्र हो रहा है बेचन मुखिया का मन मुंगिया को इस तरह अपनी ओर आते देखकर।

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