रविवार, 31 जनवरी 2016

क्योंकि, प्यास एक घटना है और नदी एक संभावना


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मैं जिस नदी के किनारे तक पहुँच कर ठिठक गया
वह बहुत लंबी थी, लंबी इतनी कि
धारा की दिशा में चलते जाओ तो भी समुद्र दूर ही रह जाये
धारा की दिशा के विपरीत चलते जाओ तो भी उद्गम नजर न आये
एक मुश्किल यह भी थी कि
जितनी लंबी नदी थी, उससे कहीं लंबी प्यास लिये मैं उसके किनारे पहुँचा था
यह प्यास भी दरअसल एक मछली से मिली थी, जो अब मेरी अपनी थी

न मुझे नदी में तैरना था, न नदी की गहराई नापनी थी
मुझे तो बस अपनी प्यास की लंबाई नापनी थी
यह मेरी समझ में आया और वह भी नदी की मदद से ही कि
नदी कुछ और है और मेरी प्यास कुछ और ही है
नदी और प्यास को नापने का यह तरीका ठीक नहीं

नदी और मैंने मिलकर यह समझ कायम की
प्यास हमारे समय की एक घटना है और नदी हमारे समय की एक संभावना
और यह भी स्थिर किया कि जैसे रह लेती है एक साथ ही
हमारे समय की सबसे बड़ी घटना और हमारे समय की सबसे बड़ी संभावना
बिना कलह के, हमने मिलकर यह समझ भी कायम की, हम भी साथ रह सकते हैं
हम भी साथ रह सकते हैं, क्योंकि अंततः
प्यास हमारे समय की एक घटना है और नदी हमारे समय की एक संभावना

शनिवार, 30 जनवरी 2016

दुनिया तो बस, दुनिया है!

सुख दुख बांट लेना थोड़ा हँस लेना थोडा रो लेना थोडा उदास होना थोडा खुश हो लेना साथ-साथ और भरोसे के साथ। दोस्त को उतना ही कोई जानता है जितना कि अपने ख्वाब को। उतना जितना दिल में होता है। हाँ, मेरे हमसफर! बहुत दूर लेकिन बहुत पास - - - आभासी दुनिया है और बहुत पास लेकिन बहुत दूर--- तथाकथित वास्तविक दुनिया है। दुनिया तो बस, दुनिया है!

बुधवार, 20 जनवरी 2016

चाँद को ऐतराज है बहुत

विकास पुरुष चाँदनी को
जेब में डाल लेने पर आमादा है

चाँद को इस बात पर ऐतराज है
ऐतराज चाँदनी को भी है

मुश्किल यह कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँद के बूते में नहीं है और
सच तो यह है कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँदनी के बूते में भी नहीं है

मजबूरी यह कि
विकास पुरुष की जेब के
फैलाव को
रोकना संभव नहीं
सच तो यह है कि
चाँद जेब में है, चाँदनी भी
और जुबान पर है देशभक्ति

यह सब है मेरी जान और
इस वक्त मैं बहुत परेशान
परेशान कि मैं घिर गया हूँ
उनके बीच जो माहिर हैं
आँख से आँसू
रगों से खून
जिस्म से पसीना
प्रतिभा से प्राण
दिल से अरमान
जीवन से पानी
चेहरे से मुस्कान
हौसले से हुलास
निचोड़ लेने में माहिर हैं
सितारों के बुझ जाने पर
जश्न में शामिल लोगों से
घिर गया है वक्त

वह फूल कहाँ से लाऊँ जो
जान और जिस्म को
खुशबू की चमक से भर दे
चाँद को ऐतराज़ है बहुत

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

अफसोस और सिर्फ़ अफसोस के बाहर आज कुछ नहीं

रोहित बेमुला यही नाम है तुम्हारा तुम कभी भुलाये नहीं जाओगे मैं नहीं जानता इस देश का क्या होगा दुखी मैं भी बहुत हूँ, स्तब्ध, बिल्कुल खामोश मुसीबत यह कि मेरा दुख उन लोगों को नौटंकी लगेगा इस मुल्क मेरा हर दुख नौटंकी करार दिया गया है इसलिए कि अंततः हर बार दुख पैदा करनेवालों की कतार में खड़ा कर दिया जाता हूँ कैसे जीत पायेंगे इस लड़ाई को इस देश में ब्राह्मणवाद का मुकाबला ब्राह्मणवाद के हथियार से किये जाने की कोशिश अंततः ब्राह्मणवाद की जीत को ही सुनिश्चित करती है दोस्त ब्राह्मणवाद का हथियार यानी बहिष्करण का जन्मगत आधार वे जो ब्राह्मणवाद के विपरीत खड़े दिखते हैं नव-व्राह्मण ही हैं नव-व्राह्मण हैं इसलिए, हाँ इसलिए इसलिए मेरा हर दुख नौटंकी है जन्म पर न मेरा नियंत्रण न तुम्हारा, लेकिन जन्म ही तो है जो अपने और पराये का आधार मुहैय्या कराता रहा इधर भी उधर भी इधर भी और उधर भी और मौत इस तरह खेल है इधर भी उधर भी मेरा दुख भले नौटंकी लगे इधर भी और उधर भी लेकिन दुखी मैं भी बहुत हूँ, स्तब्ध, बिल्कुल खामोश हाँ जानता हूँ, न इधर हूँ न उधर हूँ अफसोस भीम, अफसोस और अफसोस के बाहर आज कुछ भी नहीं

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

देशज

भाषा में पुंसकोड का मतलब! पितृ सत्तात्मकता की भाषा के मर्दवादी रुझानों और मर्दवादी निर्मिति से है। यह रुझान और निर्मिति का ही कमाल है कि नागार्जुन जैसे कवि भी (अनजाने में ही सही) लिख जाते हैं :- पाँच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गये चार चार पूत भारत माता के, चारों चतुर-प्रवीन देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन तीन पूत भारत माता के, लड़ने लग गए वो अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच बच गए दो दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया है एक एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा (साभार :नागार्जुन : हज़ार हज़ार बाँहोवाली) अब, कोई सवाल खड़े कर सकता या सकती है कि भारत माता के सिर्फ पूतों को लेखे में ही क्यों लेती है नागार्जुन की यह कविता! यह सवाल आलोचना के नजरिए से नहीं वितंडा की चालाकी से खड़ा होता है क्योंकि इसका संबंध कवि की सामाजिक चेतना से उतना नहीं है जितना कि भाषा की निर्मिति में सक्रिय पुंसकोड से है।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

आलोचना वितंडा और पाठक

आलोचना के लिए जगह कम होती जा रही है और वितंडा के लिए जगह बढ़ रही है। साहित्य को पाठक की जरूरत होती है, भक्तों की नहीं। विडंबना यह कि हिंदी में लेखकों को भक्त चाहिए पाठक नहीं। इस समय कविता के कुछ भक्त तो यत्र-तत्र दीख जाते हैं, लेकिन पाठक रूठ गये हैं। पाठक, जिसे पहले सामाजिक भी कहा जाता था और ठीक ही कहा जाता था, तो इस बात से उदासीन ही है कि कहीं कोई पाठ बहुत ही बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। पाठक की इस उदासीनता के लिए कुछ हद तक साहित्य तो जिममेवार है ही पाठक भी कम जिम्मेवार नहीं है। क्या सचमुच साहित्य में पाठकों की प्रतीक्षा का प्रमाण मिलता है?

जांच

आलोचना के लिए जगह कम होती जा रही है और वितंडा के लिए जगह बढ़ रही है।