सोमवार, 29 दिसंबर 2014

कोशिश के हुस्न की तासीर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan






जी, कामयाबी को नहीं जानता मैं, कोशिश से ही अपनी दिलजोई है
कामयाबी तो बेवफा है, मेरी कोशिश के हुस्न की तासीर कब खोई है

दीठ को दीदार तो कभी हासिल हुआ ही नहीं जाने आँख क्यों रोई है
सिर पर लदी टोकरी में है वही फसल जो हमने दिल लगाकर बोई है

है इतिहास गवाह, कैसे नदियों से मिलने के बाद लहरों ने धार खोई है
वो जो बात मुकम्मल सराही आपने, उसे मैंने आँसुओं से बारहा धोई है

तारीफ तवारुफ अल्फाज-ए-हकीकत क्या, आपने एहसास में बिलोई है
हँसी चेहरे पर है जैसे धरती पर फसल-ए-बहार ओ पुकार कहाँ खोई है

बहुत बोलती है आप की वे खामोशियाँ जिसे आपने हँसी से भिगोई है
रोकर पूरियाँ निकालती माँ, हँसकर पिता पूछते हाथ में कहाँ लोई है

जी, कामयाबी को नहीं जानता मैं, कोशिश से ही अपनी दिलजोई है
कामयाबी तो बेवफा है, मेरी कोशिश के हुस्न की तासीर कब खोई है

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

खिड़की से समय में झाँकता हूँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

हमारे समय में
जीवन के कई अच्छे प्रसंग
डरावने हो गये हैं, जैसे कि दोस्ती
डरता मैं भी हूँ, कम नहीं बहुत
लेकिन इस डर के बाहर
शायद थोड़ी-सी खुली हवा हो
थोड़ी-सी आजाद रौशनी
थोड़ी-सी जमीन बस थोड़ी-सी

इस उम्मीद से डर के बाहर
थोड़ी-सी खुली हवा,
थोड़ी-सी आजाद रौशनी,
थोड़ी-सी जमीन, बस थोड़ी-सी
के लिए आकाश में भटकता रहता हूँ

उम्मीद में भटकन
और भटकन में उम्मीद
हमारे समय को समझने की
एक छोटी-सी खिड़की है
बहुत दिनों से बंद
इस खिड़की को खोलने की
कोशिश को एक गुनाह की तरह
मैं अपने खाता में दर्ज करता हूँ
और इस तरह अपने समय की
उम्मीद को बचाने की कोशिश में
चुटकी भर लिखने की हिम्मत करता हूँ
बस चुटकी भर, सिंदूर की तरह
इस तरह उम्मीद से
डर के बाहर खिड़की से झाँकता हूँ ▬▬
देखो न प्रिय, यह जानते हुए कि
झाँकना देखना नहीं है,
मैं देहरी के अंदर बने रहकर
खिड़की से समय में झाँकता हूँ


मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

बातों में अब बहर कहाँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

मेरे हमराज! रंग और गंध में अब वह असर कहाँ
हुस्न की नरम परछाइयों में अब मेरा बसर कहाँ

हाँ रहते थे आगे-पीछे सदा अब आते नजर कहाँ
तिल-मिलाहट यह कि समझ न आये कसर कहाँ


उनकी आमद से रौनक! अब वह शाम सहर कहाँ
मसान में ढूढ़ो रात, सुबह, शाम कि दोपहर कहाँ

अमराइयों के एकांत को चीरने वाली कुहर कहाँ
ढूढ़ते क्या झुकी रीढ़ को मयस्सर गुलमोहर कहाँ

पानी ही सूख गया तो फिक्र क्यों, कि दहर कहाँ
जिंदगी में ही नहीं बची बातों में अब बहर कहाँ