बुधवार, 28 जून 2017

श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान

उत श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान
इत एक-एक दाना के लिए तरस रहे हैं किसान
इत-उत डोल रहे पुरोहित करते हुए बड़े बखान
मुहँ बिधुआ कर फिर से मुरझाया है जजमान
चोर लुटेरों से पटा हुआ है धरती आसमान
दौड़ रहा है गली-गली में स्वच्छता अभियान
लोक अकिंचन तंत्र तो सचमुच बहुत महान
कामकाज का नहीं ठिकाना कोई नहीं निदान
सूरज तो उग कर डूब जाता आता नहीं बिहान
श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान

शुक्रवार, 9 जून 2017

डर लगता है

मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है,
वह किसी की मुट्ठी में हो,
आस्था या अक्ल में हो,
मन में हो या फिर वतन में हो।

मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है
और इसलिए लिखता हूँ।

मैं पत्थरों पर तुम्हारा नाम
नहीं लिख सकता
अब इसका चाहे जो मतलब हो
मैं पत्थरों पर तुम्हारा नाम
नहीं लिख सकता
जैसे कि कविता
मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है
पत्थर की लकीर हो
या हो पत्थर का फकीर।

गुरुवार, 1 जून 2017

खून मेरे जिस्म का

यह सब देखकर भी मुझ को कोई परेशानी नहीं है।
कैसे कह दूँ कि खून मेरे जिस्म का अब पानी नहीं है!

चलता हूँ सम्हलकर कौन कहता निगहबानी नहीं है!
फिर भी सफर जारी है कि कैसे कह दूँ मेहरबानी नहीं है!

मुफलिसी में भी तेरी ये हँसी तेरा भी कोई सानी नहीं है।
ये शरारत है दिल कहता है कि ये तेरी कोई नादानी नहीं है।

तेरी आवाज में है जादू कायम नहीं अब कोई रवानी नहीं है।
सब सह लेता है ये इसके हिस्से में कोई जवानी नहीं है।

करिश्मा रोज मिलता हूँ पर सूरत कोई पहचानी नहीं है।
हर कदम पर पहरेदारी कौन कहता कि निगरानी नहीं है।

ये रवैया ये फैसला देख कह दे अदालत कोई दीवानी नहीं है!
जो न मुतासिर खुलकर कह दे वह कोई हिंदुस्तानी नहीं है।