तयशुदा मकाम नहीं है

मेरे लिखे की विधा का नाम, जो पूछते हैं शाह-ए-हुनर
उन रिश्तों को भी जिया खूब जिनका कोई नाम नहीं है

वे हरे वक्त जो बहुत मुमताज थे इस कंबख्त जिंदगी में
उस हरे वक्त का हकीकत में, अब कोई तो दाम नहीं है

बना-बिगड़ा रहा मस्त ता-उम्र अपने उखड़े मिजाज में
मुहब्बत की मगर ये क्या कम की कोई इल्जाम नहीं है

जाने दो, अब क्या पूछते हो, खोये हुए लम्हों का पता
ये अफसाना है, जिसका दरअसल कोई अंजाम नहीं है

मेरे हिस्से में सुबह-शाम बस दौड़ की तरह है शामिल
सच, इस कहन का कोई अपना तयशुदा मकाम नहीं 
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