करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था

करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था

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करोना का प्रकोप दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। अधिकृत सरकारी और प्रशासनिक निर्देशों का पालन कड़ाई से करना जरूरी है। इस समय बहुत ही डरावनी स्थिति है। अलग रहना ही सब के साथ होना है। 

सभ्यता का इतिहास जब लिखा जायेगा तब पिछले चालीस साल का एक अलग अध्याय होगा। 1980 से 2020 के बीच दुनिया का चक्का बहुत तेजी से घूमा, इतनी तेजी से घूमा कि इसकी धूरी ही दरक गई। करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था के बदलाव की कथा इतिहास की सिसकियों के साथ लिखी जायेगी। जाने मेरा मन क्यों ऐसा संकेत दे रहा है! मन यानी 6ठी इंद्रिय। 6ठी इंद्रिय के पास संकेत तो होते हैं, सबूत नहीं होते हैं। 6ठी इंद्रिय पर बात करने के पहले कुछ और शब्दों पर बात कर लेते हैं, जरूरी है। साहित्य तो सभ्यता की अंतर्ध्वनि को शब्दों से ही पकड़ता है, इसलिए शब्द। 

इन दिनों चाणक्य की चर्चा आम जुबान पर रहती है, सूत्र यहीं से सुलझाते हैं। साम, दाम, भय, भेद, दंड, माया, उपेक्षा, इंद्रजाल।। साम यानी प्रशंसा, पुरस्कार। दाम यानी पैसा, वस्तु भी। भय यानी असुरक्षा की आशंका। भेद यानी रहस्य। दंड यानी शक्ति का कोप। माया जो है ही नहीं या जो है उस पर जो नहीं है उसकी प्रतीति। उपेक्षा यानी जो है उसका होना न होने जैसा कर दिया जाये। ये सभी अलग-अलग सूत्र हैं जो अस्ल में नाभिनालबद्ध होकर भीतर से एक ही होते हैं। जब साम, दाम, भय, भेद, दंड, उपेक्षा और माया का इस्तेमाल कर लिया जाता है तब बारी आती है इंद्रजाल की। इंद्रजाल यानी जादू, धोखा का शक्ति का जाल। इंद्र देवताओं के राजा रहे हैं। महा शासक। अब इंद्र से इंद्रजाल का क्या रिश्ता हो सकता है! इस रिश्ते को मिलकर समझना और खोजना होगा। बहर हाल यह कि इंद्रजाल के प्रभाव में आई आबादी की इंद्रियों में दिमाग को सही सूचना देने में शक्ति नहीं रह जाती है। इसलिए ईश्वर को भी इंद्रियातीत, यानी बियांड इंद्रिय, अर्थात इंद्रियों के प्रभाव से पार जाकर ही समझा जा सकता है। ईश्वर यानी सत्य। सत्य जो न होकर भी नहीं होता है और होकर तो होता ही है। इसकी सूचना दिमाग को जिस से मिलती है उसी का नाम 6ठी इंद्रिय है। जी, 6ठी इंद्रिय! 6ठी इंद्रिय, जो न होकर भी होती है और होकर तो होती है। उसी 6ठी इंद्रिय का संकेत मानें तो यही लगता है कि करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था के बदलाव की कथा इतिहास की सिसकियों के साथ लिखी जायेगी।

विज्ञान और धर्म

विज्ञान और धर्म 

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करोना से बचाव के लिए अपनाई गई एहतियाती सामाजिक दूरी के हवाले से कुछ लोग विज्ञान और धर्म की उपयोगिता से जोड़ कर टिप्पणी करते हुए कह रहे हैं कि संकट की इस घड़ी में विज्ञान ड्यूटी पर है और धर्म छुट्टी पर! उनका इशारा अस्पतालों को खुले रखने और उपासना स्थलों को बंद रखने की स्थिति की तरफ है। इस इशारे में थोड़ा तंज भी है। यह तुलना समीचीन नहीं है। 

व्यक्तिगत आस्था जो भी हो, धर्म के पुरोहितवादी रुझान को बाद देकर देखा जाये तो धर्म मनुष्य की भिन्न जरूरतों को पूरा करता है और विज्ञान भिन्न जरूरतों को पूरा करता है। विज्ञान से भी जीवन में कम विसंगतियां नहीं पैदा हुई है। जानता हूँ कि यह बहुत बड़ा, यह बहुआयामी और संवेदनशील विषय है। कई तरह से बात की जा सकती है। इस प्रसंग पर अभी अधिक कुछ नहीं कहते हुए भी इतना कहना जरूरी है कि इस समय इस मुद्दे पर समग्र रूप से तंज करना न सिर्फ़ अनावश्यक है, बल्कि हानिकारक भी है। 

युद्ध और अकाल

युद्ध और अकाल
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युद्ध और अकाल बहुत नजदीकी रिश्तेदार हैं, साथ-साथ चलते हैं। इसलिए यह बहस फिलहाल बहुत जरूरी नहीं है। मनुष्य दोनों का मुकाबला करता आया है। अभी पूरी दुनिया में युद्ध जैसी स्थिति है। अकाल की स्थिति भी बहुत दूर नहीं है। अमर्त्य सेन ने यह साबित किया है कि अकाल वस्तु की उपलब्धता के अभाव से नहीं, बल्कि आधिकारिकता, इंटाइटेलमेंट, क्रय शक्ति में आई कमी से पैदा होता है। हमारी बहुत बहुत बड़ी आबादी क्रय शक्ति में होनेवाली कमी के सामने है। क्रय शक्ति में कमी का संबंध रोजगार के अभाव और उच्च महगाई दर से होता है।
हम करोना से युद्ध के साथ ही क्रय शक्ति के अभाव में अकाल के सामने हैं। इस समय धूमिल की कविता याद आ रही है। पूरी कविता के बजाय यहां उसकी एक उक्ति की याद आ रही है, दया अकाल की और एकता युद्ध की पूजी है। हमें इस युद्ध को जीतना ही होगा और अकाल के पहाड़ के पार भी जाना होगा। उस पार जहां मुक्तिबोध के शब्दों में सुनील जल में कांपता रहता है रक्त कमल।

करोना का कोहराम

करोना का कोहराम
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इस समय करोना का कोहराम मचा हुआ है। राज्य सरकारें अपनी सीमाओं को बंद कर रही है। एक तरह से यह जरूरी है। हर किसी को इसमें हर प्रकार से सहयोग करना चाहिए, मानसिक, संवेदनात्मक स्तर पर भी। यह विपत्ति का समय है। विपत्ति बीत जाने के बाद भी अपने कुछ सक्रिय निशान छोड़ जाती है।
नागरिक और निवासी का फर्क अधिक तीखा हो रहा है। नागरिक हम भारत के ह हैं और निवासी किसी न किसी राज्य के। नागरिकता स्थाई है लेकिन नैवासिकता स्थाई और अस्थ अस्थाई दोनों हो सकती है। बल्कि, बहुत बड़ी आवादी स्थाई नागरिकता के साथ अस्थाई ननैवासिकता में रह रही है। इस संबंध में उत्पन्न नई स्थिति पर भी नजर रखने की जरूरत है। बहरहाल ये संकेत भर है, इस समय तो सामाजिक दूरी के लिए सहयोग में ही संक्रमण से सुरक्षा की संभावना है। 

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु।

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु।

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सामाजिक दूरी में सुरक्षा की संभावना तलाशते हुए हमें इस बात के प्रति भी सचेत रहना होगा कि यह मानसिक दूरी में न बदलने लगे। सामाजिक दूरी में सुरक्षा की संभावना बहुत संवेदनशील मामला है। परिवार में इस समय संवाद और संवेदनशील आचरण की जरूरत है। पीढ़ियों के बीच के बीच के अंतराल को पाटते हुए संवाद की जरूरत है। जेंडर सेंसेटिव, अर्थात स्त्री पुरुष के बीच संवेदनशील व्यवहार की जरूरत है। घरेलू काम को जेंडर निरपेक्ष होकर किये जाने की जरूरत है। घरेलू काम में घर की साफ सफाई से लेकर धोने मांजने और बच्चों की जिज्ञासाओं को बिना खीझे पूरा किया जाना भी शामिल है। एक दूसरे को अवसाद से दूर रखने और विवाद के किसी भी प्रकरण को विनोद में बदलने के कौशल का उपयोग भी घरेलू काम में शामिल है। 

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु। 

विरोध और समर्थन

विरोध और समर्थन लोकतंत्र में लोकव्यवहार का आवश्यक उपकरण है। किसी भी मुद्दे पर सभी लोग एकमत या सहमत हों यह जरूरी नहीं होता है। लोकतंत्र सर्वसम्मत से नहीं बहुमत से चलता है। बहुमत तभी तक लोकतंत्र की सेवा करता है जब तक उसमें सब का सहयोग हासिल करने और अल्पमत के मूल्यवान तत्व के संयोजित करने की कोशिश का हौसला बचा रहता है। भारतीय वृहदाख्यान (मेगा टेक्स्ट) में आंख और कान की प्रतिबंधकता से उत्पन्न संकटों के संदर्भ में हिंदी आलोचक विनोद शाही ने अपनी किताब में विस्तार से लिखा है। अंधत्व या अंधापन आंख की प्रतिबंधकता से उतना नहीं जुड़ा है, जितना पूर्वग्रहों को प्रतिबद्धता मानकर अभिमत बनाने और उसके सामाजिक प्रसार से जुड़ा है। अंध समर्थन बुरा है, बहुत बुरा है। अंथ विरोध भी बुरा है और बहुत बुरा है। अस्ल में अंधत्व बुरा है। अंध समर्थन और अंध विरोध के इस घनीभूत समय में कभी इसके और कभी उसके उचित के साथ होनेवाले को दोनों तरफ की ओर से बेपेंदी का कहकर मजाक उड़ाया जाता है। अंध समर्थन से समर्थन की सार्थकता और धार खत्म होती है। अंध विरोध से विरोध की भी सार्थकता और धार खत्म ही होती है। लोकतंत्र को अंधलोकवाद से बचाने के लिए अंध समर्थन और अंध विरोध के ब्यूह से बाहर निकलना ही होगा, बेपेंदी का मान लिए जाने का जोखिम चाहे जितना हो। 

प्रियता की परवाह किये बिना किया जानलेवा यह साहस आसान नहीं है। आखिर कृष्ण को भी अर्जुन तभी तक प्रिय थे जब तक उनकी दी हुई दृष्टि से जगत को देखते रहे। अपने समय के कई अच्छे लोगों को अंध समर्थन और अंध विरोध के ब्यूह मैं पड़ा देखकर बहुत पीड़ा होती है। 

खामोशियां

खामोशियां बेजुबान नहीं होती अक्सर!
अल्फाज़ को तेरी पनाह होती है मयस्सर!

ऊँचा कद, ऊँचा पद


ऊँचा कद, ऊँचा पद

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ऐसा अवसर देखने में कम ही आता है जब इतिहास में किसी व्यक्ति का कद भी ऊँचा हो और पद भी ऊँचा हो। आज भौतिक विकास का जो ढाँचा हमारे समय प्रचलन में है, उसमें क्षैतिजीय विकास पर नहीं बल्कि लंबवत विकास पर ही जोर है। ऐसे में ऊँचाई का अपना महत्व है। इस ऊँचाई के हासिल में होने में कद और पद दोनों की बड़ी भूमिका होती है। अधिकतर मामलों में व्यक्ति अपने पद के आधार पर ऊँचाई को हासिल करते हैं। पद की ऊँचाई कद की ऊँचाई के अभाव में व्यक्ति को गरूर के ऐसे भँवर में डाल देती है कि उससे उसका व्यक्तित्व का वास्तविक सम्मान भयानक छीजन का शिकार हो कर इतिहास के कचरा घर में खो जाता है। इतिहास बहुत क्रूर होता है, निर्मम भी। संवेदनशील लोग, उनकी विचारधारा कुछ भी हो, अपने एकांत में इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं। चलिए, आप को अटल बिहारी वाजपेयी की कविताई के एक अंश की याद दिलाता हूँ।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कलि न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

हे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले लगा न सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
(अटल बिहारी वाजपेयी की कविता का एक अंश, साभार)

बुद्धि भ्रंश Intellect Deficit


बुद्धि भ्रंश
Intellect Deficit

यह मान लेने में गुरेज करने की कोई वजह नहीं है कि हम बुद्धि भ्रंश के भयानक दौर से गुजर रहे हैं। इस बुद्धि भ्रंश या इंटिलेक्ट डेफिसीट को गंभीरता से समझने की कोशिश करनी चाहिए। बुद्धि या इंटलेक्ट क्या होती है, पहले तो यही समझना होगा। intellect deficit और intellect disability के अंतर को भी ध्यान में रखना होगा। डिसएबिलीटी सामान्यतः, व्यक्तिगत होती है जब कि डेफिसीट सामूहिक होती है। मोटे तौर पर डिसएबिलीटी व्यक्ति के अपने आंतरिक असामंजस्य या संकट से उत्पन्न होती है तथा उससे केवल व्यक्ति ही दुष्प्रभावित होता है जब कि डेफिसीट समाज के अपने आंतरिक असामंजस्य या संकट से उत्पन्न होती है। समाज के इस संकट में फँस जाने के कारण समाज सर्वनाश के मुहाने पर पहुँच जाता है। इतना इशारा काफी है।
इंटिलेक्ट वह क्षमता है जिससे विचारों और तरकीबों को विश्लेषित किया जाता है, निष्कर्ष निकाले जाते हैं और उसे माना जाता है, निष्कर्ष की स्वीकृति का मानसिक माहौल बना रहता है। इसे कैसे समझा जाये! हिंदी साहित्य से कुछ उदाहरण ले सकते हैं। हिंदी के कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता हमें बताती है, जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। इस विवेक पर ध्यान देना जरूरी है। एक इशारा और करना जरूरी लग रहा है। यूरोपीय नवजागरण जिसे ज्ञानोदय का युग  या the age of enlightenment  कहा जाता है। इस इनलाइटमेंट के पीछे विवेक सक्रिय था बुद्धिवाद के तर्क की जगह इसे विवेकवाद के संदर्भ से समझा जा सकता है और इसमें दार्शनिक कांट (Immanuel Kant 1724–1804) आदि हमारी मदद कर सकते हैं। लेकिन हमें रामचरितमानस लिखनेवाले तुलसीदास की याद आ रही है, उनकी कविता में उल्लेख है कि बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई । यानी विवेक गहरा संबंध सत्संग से होता है। राम कृपा को हम पक्षपात रहित या पक्ष निरपेक्ष बुद्धिवाद के समाज-मानसिक उत्पाद के तौर पर देख सकते हैं। बहरहाल, यह कि हम  बुद्धि भ्रंश या intellect deficit के भयानक दौर से गुजर रहे हैं। हम यह समझने मानने को तैयार ही नहीं हैं कि लंबे समय में हमारे हित में क्या है, अहित में क्या है। बुद्धि भ्रंश या intellect deficit के चलते हमारा विवेक मर नहीं भी गया हो तो सर्वोच्च निष्क्रियता का शिकार हो गया है। इस पर मैं भी सोचता हूँ, आप भी सोचिए कि इस फाँस से कैसे बाहर निकला जा सकता है।  

राष्ट्रवाद का नया चेहरा नहीं, नये राष्ट्रवाद का चेहरा


राष्ट्रवाद का नया चेहरा नहीं, नये राष्ट्रवाद का चेहरा

भारत में राष्ट्रवाद का मोटे तौर पर अंग्रेजों से मुक्ति के  संघर्ष के दौरान विकसित हुआ। इसका व्यावहारिक पक्ष 1857 में दिखता है। 1857 में किसान जनता का बड़ा हिस्सा शामिल हुआ। यह सिर्फ सिपाहियों का मामला होता तो बलिया बागी क्यों होता! देश के साधारण जन पर अंग्रेजी हुकूमत का ऐसा कहर क्यों ढाया गया होता! 1857 पर काबू पाना आसान नहीं था, मगर पा लिया गया। कैसे काबू पाया गया, इस पर अभी यहाँ बात करने का अवकाश नहीं। अभी तो इतना ही कि 1857 पर काबू पाने के बाद अंग्रेज जो अपनी समझ से हिंदू मुसलमान को न सिर्फ अलग मान रहे थे, बल्कि एक दूसरे के विरोधी भी मान कर चल रहे थे। उन्हें भरोसा था कि उन्होंने राजपाट मुसलमानों का छीना है तो विरोध सिर्फ वहीं से होगा। दलित प्रताड़ित जनता तो खुद अपने लोगों से सदियों से परेशान हैं, तो खतरा वहाँ से भी नहीं हो सकता है। मगर ऐसा नहीं हुआ। उसमें हिंदू (सदियों से शोषित-प्रताड़ित जनता सहित) मुसलमान एक साथ मिलकर उनके विरुद्ध खड़े हो गये। हिंदू मुसलमान का एक साथ मिलकर खड़ा हो जाना भारतीय राष्ट्रवाद की पहली उठान था। अंग्रेज इस बात पर भौंचक्के रह गये थे। उनके बुद्धिजीवियों ने सलाह दी कि भारत को नहीं जानने के कारण ऐसा हुआ। उन्होंने भारत को जानने की कोशिश शुरू की। एक निष्कर्ष यह निकाला कि किसी देश पर शासन करने और जनता को काबू में रखने के लिए उसके धार्मिक रीति रिवाज और मान्यताओं को जानना बेहद जरूरी है। वैसा ही जरूरी है जैसा युद्धरत दुश्मन की शक्ति और शक्ति के स्रोत को जानना जरूरी है।
1857 पर काबू पा लिया गया था, मगर भरोसा हिल गया था। वे भारत के राष्ट्रवाद में निहित शक्ति को पहचान गये थे। बहुत जल्दी उन्होंने अपने प्रोजेक्ट की रूप रेखा बनाई और उस पर अमल शुरू कर दिया। नतीजा भारतीय राष्ट्रवाद बिखर तो नहीं गया, लेकिन दो फाड़ जरूर हो गया। द्विराष्ट्रीयता का सिद्धांत सक्रिय हो गया। यह नया राष्ट्रवाद था। जिसे स्थानापन्न राष्ट्रवाद कहा गया। जिसकी त्रासद परिणति भारत विभाजन के रूप में सामने आयी। पढ़ा-लिखा, समझ कुछ भी काम नहीं आया। यह इसलिए हुआ कि अंततः राष्ट्रवाद से जनता को विच्छिन्न कर दिया गया और दलों के राष्ट्रवाद ने उसका स्थान ले लिया। जनता हिंदू हो या मुसलमान लगभग ताकती रह गयी, दोष किसका था, कितना था, गिन-गिनकर क्या होगा! मतलब कि बात इतनी ही है कि विधाताओं ने नारकीय दुखों की पटकथा लिख दी। दलों के राष्ट्रवाद या कह लें स्थानापन्न राष्ट्रवाद से भारत परेशान और लहूलुहान होता रहा।
अब ऐसा लग रहा है कि भारत का पहले उभार का राष्ट्रवाद अपने नये रूप में प्रकट हो रहा है। इस अर्थ में यह भारत का नया राष्ट्रवाद है। इस में दलों की भूमिका सिकुड़कर शून्य होती चली जा रही है। यह बात समझ में आनी चाहिए कि भारत की विशिष्टताओं को, उसकी अंतर्निहित बहुलताओं को सुगठित दलों ने नहीं बिखरी-बिखरी-सी दिखने और लगने वाली जनता ने बनाया है, और वही उसे बचा ले जायेगी। मेरा अध्ययन सीमित है, ज्ञान तो खैर बहुत ही अपर्याप्त है। मूल रूप से जो भी सीखा है, बस साहित्य से सीखा है, इसलिए इस पर भरोसा कर लेगा कोई कि नये राष्ट्रवाद के चेहरे को पढ़ने में कोई गलती नहीं कर रहा हूँ, मैं नहीं मानता हूँ। लेकिन साहित्य समाज और जनतंत्र से जुड़ी संवेदना यही पढ़ पा रही है कि यह राष्ट्रवाद का नया चेहरा नहीं, नये राष्ट्रवाद का चेहरा है। यह मेरा भ्रम तो, भ्रम ही सही। हो अतिकथन, तो वही सही,  मैं भी फ़ैज अहमद फ़ैज को याद कर लेता हूँ और क्षमा सहित भरोसा कर लेता हूँ कि वो इंतजार था जिसका ये वही सहर है, ये वही सहर है चले थे जिसकी आरजू लेकर!

अपवाद की तरह जीना क्या होता है


अपवाद की तरह जीना क्या होता है
प्रफुल्ल कोलख्यान

मनुष्य इसलिए भी अन्य प्राणियों से अलग इस सृष्टि में अपना स्थान बना पाया है तो इसका एक प्रमुख कारण यह है कि इसने अपनी भाषा को विकसित किया है। भाषा के बनने या होने में व्याकरण की बड़ी भूमिका होती है। व्याकरण पढ़ते समय हम देखते हैं कि भाषा में कुछ नियम ऐसे होते हैं जिन पर उस भाषा के साधारण नियम लागू नहीं होते हैं, इन्हें अपवाद की श्रेणी में डाल दिया जाता है। अपवादों पर नियम लागू नहीं होते, इसलिए नियमों के आधार पर उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता है। भाषा के विकसित होने में इन अपवादों की बड़ी भूमिका होती है। यही जीवन में भी होता है। विकसित भाषा ने उसे बहुत बड़ी ताकत दी है, कौशल दिया है। सृष्टि के जीव जंतु पर गौर करने से यह बात समझ में आ सकती है कि मनुष्य उन में अपवाद है। बात खुद-ब-खुद समझ में आ सकती है, फिर भी कुछ उदाहरण। संसार का कोई प्राणी कपड़ा नहीं पहनता, किसी प्राणी ने अपने लिए स्कूल-कॉलेज, गाड़ी-घोड़े की व्यवस्था नहीं की है, इत्यादि।
मनुष्य अपने आप में एक अपवाद है। मनुष्य इसलिए भी अपवाद है कि उसने अपवाद के महत्व को समझा और उसे अपने बीच जगह दी। विकास के जितने भी प्रकरण हैं उन के होने में अपवादों की गहरी भूमिका है, इसके साथ यह भी कि उन अपवादों के वजूद को कायम रखने में नियमों की भूमिका भी कोई कम बड़ी भूमिका नहीं है। इस बात को स्वीकार करते हुए भी, यह तो मानना ही होगा कि नियमवालों ने अपवादों की जिंदगी को कम मुसीबत में नहीं डाला। वैसे तो जरूरत नहीं है, फिर भी कुछ उदाहरण का उल्लेख इस से बात को समझने में मदद मिल सकती है। सुकरात, गौतम, वाल्मीकि, शेक्सपीयर, एडीसन, विवेकानंद, तुलसी, कबीर, गाँधी, आंबेदकर, भगत सिंह, बिल गेट्स और इन जैसे बहुत सारे लोग आदि अपवाद ही तो हैं। उनकी जीवनी को समझें तो पता चलते देर नहीं लगेगी कि अपवादों का जीना, खासकर प्रारंभ में, कितना मुश्किल होता है। सवाल उठता है कि कुछ को नियम से बाहर रहने को क्यों मान लिया जाता है या यह कि कुछ को नियम से बाहर रहने की अनुमति ही क्यों दी जाती है। जवाब सीधा और सरल है। क्योंकि अपवाद ही विकास और परिवर्तन के वाहक होते हैं।
अपवादों के रास्ते का बाधक होने से बचना चाहिए। जानना चाहिए कि अपवाद क्या होता है। अपवाद बनने की क्या प्रक्रिया होती है। इस समय सभ्यता में धीरे-धीरे अपवाद बनने की स्थिति कमजोर पड़ती गई है। यह जरूरी नहीं कि यही स्थित सदैव रहेगी। मुश्किल यह है कि अपवाद को उसके प्रारंभिक अवस्था में समझ पाना बहुत आसान नहीं होता है। जब हमारे चारों तरफ एक जैसा या एकरूपता का कोलाहल है, नियमबद्धता का दबाव है क्या हम अपने आस-पास बनते किसी अपवाद को पहचान सकने की क्षमता रखते हैं। कोशिश तो करें। हम अपवाद बन नहीं सकते, कम-से-कम किसी बन रहे अपवाद के प्रति संवेदनशील तो हो ही सकते हैं। क्या पता किस बनते हुए अपवाद से सभ्यता को सार्थक दिशा मिल जाये!

खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन


खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन
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जब कभी
अत्याचार की घटनाओं की खबरों से
टूटता है मन, परत-दर-परत
खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन

जीने के लिए बेहद जरूरी
और न्यूनतम जो खुशियाँ
आँख की कोर में सहेजकर रखता हूँ
जैसे पोखरिया सहेज कर रखती है जीरा

तपत नोर में
मछलियों की तरह
तड़फड़ाती है खुशियाँ

तड़पती है खुशियाँ
पोखरिया सिकुड़कर
कराही में तबदील हो गई जैसे
और तुम्हारी मुसकान उग्र भट्ठी में

मन तड़पता है कि
क्यों नहीं मुसलमान हुआ
क्यों नहीं दलित हुआ
औरत ही क्यों नहीं हुआ
आदि, आदि इत्यादि
कम-से-कम
अत्याचारियों के समूह में
गिने जाने से खुद को बचा ले जाता

अंधेरे के सच और उजाले के झूठ में फँसकर
मन ही बौड़म बना है, मालिक
अत्याचार पीड़ित को मेरा मन इंसान नहीं मानता
अत्याचार पीड़ित का मन मुझे इंसान नहीं मानता

आग में घिरे गऊ-गृह के बीच
खूँटे से बँधे बैल सा छटपट करता है मन