मंगलवार, 11 जुलाई 2017

वे मार दिये गये

बहुत ही दुखद और शर्मनाक है। कहीं भी किसी की भी हो हत्या कभी भी कोई भी करे हत्या। यह दुखद और शर्मनाक है। कलंक है। शासन-प्रशासन की जबानी जमा-खर्च से यह कलंक धुल नहीं जाता है। साधारण आदमी की स्थिति तो यह है कि वह समझ ही नहीं पाता कि उसे किस ने मारा। सच और झूठ का चेहरा कैसा है यह नहीं मालूम होता है। वे जो उस वक्त अपने जीवन की सर्वाधिक निर्दोष स्थिति में थे, इस तरह से मार दिये गये! वे तीर्थ यात्रा पर थे। वे ईश्वर और शांति की तलाश में थे! वे ठीक उस वक्त किसी बदले की कार्रवाई में शामिल नहीं थे। वे अपने हक पर थे। वे मार दिये गये। इस की कोई भरपाई नहीं। ना जाने आनेवाला दिन कैसा है। मुझे पता नहीं इस समय किस से क्या माँग की जाये। मार कर किसी को किसी अन्य को जिलाया नहीं जा सकता। नफरत की लपट और उठेगी। मनुष्यता और झुलसेगी! ऐसे में क्या बात करूं! लेकिन बात तो करनी होगी क्योंकि ऐसे में, खामोशी का हर लम्हा हत्यारों के लश्कर में शामिल हो जाता है। ऊफ बहुत शर्मसार और लाचार हूँ।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

इंतज़ार बचा रहे

यही तो है जिंदगी
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चाहे जितना भी
खतरनाक हो मौसम
फूल के खिलने,
मुस्कुराने पर ऐतबार बचा रहे
चाहे जैसा भी हो
आसमान का तेवर
पंछियों में उड़ान के
हौसले पर यकीन बना रहे
नमक से दाल की हो
जितनी भी दूरी
पसीने को नमक की ताकत पर
अंत तक भरोसा कायम रहे
भाषा में हो जितना भी
अर्थ संकोच
कविता में
संभावनाओं का आँचल
प्यार से पसरा रहे
चाहे जैसी भी हो जिंदगी
पर रौनक की राह रहे
बस यही तो है,
यही तो है जिंदगी,
यही है जिंदगी
यह मौसम मुहब्बत का नहीं है
चाहे जितनी बार कहे कोई
तेरी निगाह में में
मेरे इंतजार का घर बसा रहे!

बुधवार, 28 जून 2017

श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान

उत श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान
इत एक-एक दाना के लिए तरस रहे हैं किसान
इत-उत डोल रहे पुरोहित करते हुए बड़े बखान
मुहँ बिधुआ कर फिर से मुरझाया है जजमान
चोर लुटेरों से पटा हुआ है धरती आसमान
दौड़ रहा है गली-गली में स्वच्छता अभियान
लोक अकिंचन तंत्र तो सचमुच बहुत महान
कामकाज का नहीं ठिकाना कोई नहीं निदान
सूरज तो उग कर डूब जाता आता नहीं बिहान
श्वेत सदन में जिम रहे स्वयं श्री भगवान

शुक्रवार, 9 जून 2017

डर लगता है

मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है,
वह किसी की मुट्ठी में हो,
आस्था या अक्ल में हो,
मन में हो या फिर वतन में हो।

मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है
और इसलिए लिखता हूँ।

मैं पत्थरों पर तुम्हारा नाम
नहीं लिख सकता
अब इसका चाहे जो मतलब हो
मैं पत्थरों पर तुम्हारा नाम
नहीं लिख सकता
जैसे कि कविता
मुझे पत्थरों से
बहुत डर लगता है
पत्थर की लकीर हो
या हो पत्थर का फकीर।

गुरुवार, 1 जून 2017

खून मेरे जिस्म का

यह सब देखकर भी मुझ को कोई परेशानी नहीं है।
कैसे कह दूँ कि खून मेरे जिस्म का अब पानी नहीं है!

चलता हूँ सम्हलकर कौन कहता निगहबानी नहीं है!
फिर भी सफर जारी है कि कैसे कह दूँ मेहरबानी नहीं है!

मुफलिसी में भी तेरी ये हँसी तेरा भी कोई सानी नहीं है।
ये शरारत है दिल कहता है कि ये तेरी कोई नादानी नहीं है।

तेरी आवाज में है जादू कायम नहीं अब कोई रवानी नहीं है।
सब सह लेता है ये इसके हिस्से में कोई जवानी नहीं है।

करिश्मा रोज मिलता हूँ पर सूरत कोई पहचानी नहीं है।
हर कदम पर पहरेदारी कौन कहता कि निगरानी नहीं है।

ये रवैया ये फैसला देख कह दे अदालत कोई दीवानी नहीं है!
जो न मुतासिर खुलकर कह दे वह कोई हिंदुस्तानी नहीं है।

सोमवार, 1 मई 2017

सच, उस तरह से नहीं

सच, उस तरह से नहीं
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उस तरह से
मेरे ख्यालों में नहीं
उभरती हो तुम
जिस तरह से
आसमान में
उगा करता है चाँद
मैं तो समझता रहा सदा कि
जिस कठौते में होती है गंगा
सब से पहले उसमें
उगता है चाँद
उगता है और
आसमान में छा जाता है चाँद
फिर भी उस तरह से
मेरे खयालों में नहीं
उभरती हो तुम

किसी सुंदरता को तुम में नहीं
सुंदरता में तुम्हें तलाशता हूँ

असल में इस दरम्यान मैं
कठौते चाँद गंगा सुंदरता
और तुम में खुद को तलाशता हूँ
और इस तरह से
मन गंगा तन कठौता
खयाल आसमान हो जाता है
और तुम बुझे हुए मन को
हुलसा जाती हो
और बस यही कि
तुम मेरे ख्यालों से
बाहर मचल जाती हो

सच, उस तरह से
मेरे ख्यालों में नहीं
उभरती हो तुम
जिस तरह से
आसमान में
उगा करता है चाँद

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

शुक्रिया वृक्ष

मकान की नींव और घर की जड़
 
एक मकान बन रहा था
एक वृक्ष था बिल्कुल पास
वृक्ष की एक डाल से रुकावट थी
डाल को काटे बिना
कोई उपाय न था
सो काट दी गयी डाल अंततः

लगभग नौ महीने बाद
प्रकृति की माया
कटी डाल पर वृक्ष का दुलार
शेष वृक्ष में नहीं,
कटी डाल पर दिखा
नव पल्लव से
आच्छादित दिखी कटी डाल

वृक्ष की जड़ है
मकान की है नींव
नींव चाहे जितनी गहरी हो
नींव जड़ नहीं होती

वृक्ष ने मुझे पास बुलाया 
वृक्ष ने मुझे
अपनी करुणा से समझाया ➖
मकान की नींव होती है जड़ नहीं
जड़ घर की होती है
मकान बनता है घर बसता है
घड़ बसता है अपनी जड़ पर

मुझे बेहद खुशी है
वृक्ष ने मुझ से बात की।

शुक्रिया वृक्ष! शुक्रिया!!