मंगलवार, 30 सितंबर 2014

भारत माता की, जय

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan
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जी, जी समझ गया, समझ गया,
बहुतै अच्छे तरीके से समझ गया
जी, कवि नहीं ,चाहिए कार्यकर्त्ता चाहिेए
मेरी मति में गति नहीं चाहिेए जड़ता चहिए
दो-चार नहीं हजार-हजार, चाहिए
चाहे चलाएँ, चरखा, चाहे चलाएँ तकली,
गाँधी चाहिए, मगर असली नहीं चाहिए, चाहिए नकली
तीन ही तो हैं मालिक जिन पर नाच रही आपकी पुतली
एक उपभोक्ता, दो कार्यकर्त्ता, तीन वोटकर्त्ता
मालिक यही तीन हैं इन तीनों का एकहि में पंच चाहिए
मैं समझ गया ठहरे आप गुसाईं
और हम सब बस मर्कट की नाईं
हर पूज्य पैर को जूता चाहिए
हर दल को कार्यकर्त्ता चाहिए
दो-चार नहीं हजार-हजार, चाहिए

भारत माता की, जय
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Braj Nandan, Mahesh Mishra, Asim Kumar और 19 अन्य को यह पसंद है.

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Noor Mohammad Noor Bharat mata ki jai.....
27 सितंबर पर 08:31 अपराह्न · नापसंद · 1



Jitendra Narayan मेरी मति में गति नहीं चाहिए जड़ता चाहिए....
27 सितंबर पर 09:10 अपराह्न · नापसंद · 1



Mrityunjay Tiwari और हमें क्या चाहिए?यह सब देखते-झेलते जाना या....
27 सितंबर पर 10:18 अपराह्न · नापसंद · 1



Javed Usmani ''गाँधी चाहिए, मगर असली नहीं चाहिए, चाहिए नकली
तीन ही तो हैं मालिक जिन पर नाच रही आपकी पुतली''--------------------------------------बेजोड़
28 सितंबर पर 01:36 पूर्वाह्न · नापसंद · 1



Nawal Sharma -------पूज्य पैर को जूता चाहिये ।
समझ गया जी , समझ गया - जी ।
28 सितंबर पर 07:31 पूर्वाह्न · नापसंद · 1



Upadhyaya Pratibha मेरी मति में गति नहीं , जड़ता चहिए!
28 सितंबर पर 08:43 पूर्वाह्न · पसंद



Asim Kumar sahee haha karyakarta chahiye nahin to Bairam Khan chahiye, apne chhote rajkumar Akabar ke liye?
28 सितंबर पर 02:39 अपराह्न · पसंद

रविवार, 28 सितंबर 2014

थके हुए यात्री बच्चों से डरते हैं

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

पाँव की थकान से रास्ता और लंबा हो जाता है
थके हुए यात्री पड़ाव को ही मंजिल बताने में व्यस्त हैं
थके हुए यात्री चलने की सार्थकता से त्रस्त हैं

मंजिल एक छलावा है ऐसा थके हुए यात्री का दावा है
थके हुए यात्री भजन-भाव की मुद्रा में खर्राटे भरते हैं
थके हुए यात्री बच्चों से डरते हैं

शनिवार, 27 सितंबर 2014

दिल पर रखकर हाथ कहिये...

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

उसकी जरूरत के अनुसार दिये जाने की अधिकतम संभावना हो। यानी, योग्यता के अनुसार दो, जरूरत के अनुसार लो! योग्यता के अनुसार देने, जरूरत के अनुसार पाने के हक की व्यवस्था को नकारकर कोई परिवार टिक ही नहीं सकता है! वृहत्तर परिवार बोध के कारण भी उत्सव सामाजिक और मानवीय आकांक्षा के रूप में महत्त्वपूर्ण होते हैं। उत्सवों के इस मौसम में हमें बाजार के कोलाहल से कान बचाकर इस धीमे, बहुत ही धीमे स्वर को भी सुनने की कोशिश करनी चाहिए कि साम्यवादी आचरण को त्याग कर लगातार टूटन की तरफ बढ़ते परिवार नाम की सामाजिक संस्था को बचाया नहीं जा सकता है! क्या हम पसंद करेंगे कि परिवार का जो सदस्य जितना कमाता है वह उतना आनंद भोग करे और जो कम कमाता है या बेरोजगार है वह बस टुकुर-टुकुर ताकता रहे! शायद नहीं! जिस बोध के बिना अपना परिवार खुश नहीं रह सकता उस बोध के अभाव में देश, दुनिया में खुशी कैसे आ सकती है। साम्यवाद का निषेध तो आत्म-निषेध है। हाँ, मैं जानता हूँ, साम्यवाद के रास्ते बहुत कठिन हैं लेकिन इसके निषेध से तो रास्ता बंद ही हो जाता है।

घृणा और प्रेम के बिना हम रह नहीं सकते और इसे जाने बिना हम अपने आँगन में खुशी की अल्पना रचने की कल्पना भी नहीं कर सकते। नहीं क्या! दिल पर रखकर हाथ कहिये...


मेरी खुशी की मेरे गम से आशनाई है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

मेरी खुशी की मेरे गम से आशनाई है
आज अभी दोनों की मन से विदाई है

चेहरे पर न हँसी न पहली रुलाई है
चाँद तारों की, सब की तो धुलाई है

एक कली, अाज डाल पर मुरझाई है
हँसते मिलेंगे, बाकी इतनी बेहयाई है

देखकर चाँद समझे कि मुँह देखाई है
हम नहीं प्रथम, बहुतों ने आजमाई है

हाँ जी हाँ न विस्तरा है न चारपाई है
यह बात कवि त्रिलोचन की बताई है

तेरे खासमखास होने से बेहतर आम होना है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

बदकलामी से बेहतर तो खुदकलाम होना है
तेरे खासमखास होने से बेहतर आम होना है

दिल बेकाबू तो बेहतर मुँह में लगाम होना है
किया कुछ नहीं, कैसे बेहतर अंजाम होना है 


यही बेहतर जो इस तरह उम्र तमाम होना है
बदगुमां है, और क्या बेहतर इंतजाम होना है

जब मर्ज मर्जी में, क्या बेहतर आराम होना है
इस मकबूलियत से, तो बेहतर गुमनाम होना है

तेरी खामोशी से बेहतर सुबह का शाम होना है
पानी बिके नदी का क्या बेहतर उद्दाम होना है

बदकलामी से बेहतर तो खुदकलाम होना है
तेरे खासमखास होने से बेहतर आम होना है

रविवार, 21 सितंबर 2014

बादल मेरी आँख उधार ले गया है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

है बारिश में भीगने की तमन्ना, उनको मुबारक
हो खबर कि बादल मेरी आँख उधार ले गया है

बिजलियाँ तड़पती हैं, ये तड़प उनको मुबारक
हाँ मौसम विभाग का हाकिम पगार ले गया है


अब बूँदों का पत्थर पर गिरना उनको मुबारक
हल-बैल खेत में हाँक कर, दिलदार ले गया है

हर चीज में है पानी की चमक उनको मुबारक
आँख का पानी तो छीनकर, बाजार ले गया है

गर्मी का मौसम, पुरजोर ठंढक उनको मुबारक
मिस्त्री की जेब काटकर, तो औजार ले गया है

लंबा-चौड़ा बैलेंस शीट है, जो उनको मुबारक
सच हमारा अमन चैन तो, जयकार ले गया है

है बारिश में भीगने की तमन्ना, उनको मुबारक
हो खबर कि बादल मेरी आँख उधार ले गया है

यही मयस्सर अकेलेपन के अँधेरे में सफर कर लेते हैं।

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

पूजा में देवता फूल ग्रहण करना स्वीकार लेते हैं।
प्रेम में देवता फूल बन जाना स्वीकार कर लेते हैं।

सच अपनी ऊँचाइयों-गहराइयों में एक हो लेते हैं।
तू न समझे, चल हम इसको मुनासिब मान लेते हैं।

हाँ मुहब्बत है लाम तो अक्सर कमान काट लेते हैं।
देवता फूल और फूल देवता में खुद को बदल लेते हैं।

हम खुद से निकलते हैं बस जेब में हुनर रख लेते हैं।
वे कब के हवा हुए जो मुश्किल में लाज रख लेते हैं।

हम तो लिखने की मेज पर सिर टिका कर रो लेते हैं।
यही मयस्सर अकेलेपन के अँधेरे में सफर कर लेते हैं।

दिन इतबार का, तुम पर दिल से ऐतबार कर लेते हैं।
जेब खाली है मगर कमाल कि हम बाजार कर लेते हैं।

किसी की आँख में चढ़ना इस तरह कबूल कर लेते हैं।
आँसू के साथ निकलकर बह जाना कबूल कर लेते हैं।

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

यहाँ पर अब मेरा क्या होना


राजदार कभी बन नहीं पाया ना-राज क्या होना
यूँ ही तो सफर पर निकला हूँ हमराज क्या होना

फुदकता है पुरजोर दिल का उम्रदराज क्या होना
सुबह भटक गयी, शाम के न आने पर, क्या रोना

नंगा नहाया तो, क्या निचोड़ना और, क्या धोना
हँसी लपेटकर निकलता, घर से बाहर क्या रोना

सुननेवाला ही न है तो अब शिकायत क्या होना
रोटी, न लंगोटी कब्जे में तो तिजारत क्या होना

भूख जब जिंदगी की जंग, जनतंत्र का क्या रोना
कौन किसको आजमाये, वफादारी का क्या होना

चेहरे पर हँसी नहीं, फूल में खुशबू का क्या होना
कहीं और चलें अब, यहाँ पर अब मेरा क्या होना

राजदार कभी बन नहीं पाया ना-राज क्या होना
यूँ ही तो सफर पर निकला हूँ हमराज क्या होना