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बिहार में दुख

बिहार में दुख
चारों तरफ से आते इस शोकगीत को सुनो
जिसमें कोई स्वर नहीं कोई लय नहीं
स्मृतियाँ भी नहीं हैं
सिर्फ रात है उन अक्षरों पर गिरती हुई
जिन्हें तुम अज्ञात लिपि की तरह पढ़ते हो रात भर।
- मंगलेश डबराल

 जन के बिना सृजन कैसा! सृजन में जन स्वत: शामिल है। सृजनशीलता का सीधा संबंध सामाजिकता से होता है। चाहे वह सांस्कृतिक-साहित्यिक सृजनशीलता हो या जीवन और जगत के किसी अन्य क्षेत्रों की ही सृजनशीलता क्यों न हो। सुखी आदमी भोग कर सकता है, सृजन नहीं। सृजनशीलता मन से मन का संवाद है। सृजनशीलता का दुख से गहरा संबंध होता है। संसार में तरह-तरह के दुख हैं। दुखों के कई रंग होते हैं। कई आवाजें होती हैं। दुख की कई ध्वनियाँ और प्रतिध्वनियाँ होती हैं▬▬ गूँज और अनुगूँज होती हैं। कई सुर होते हैं। कई भाषाएँ होती हैं। दुख किसी एक से बँधा नहीं होता है। दुख पहाड़ पर है। दुख मैदान में है। दुख जमीन पर है। दुख आसमान पर है। हर किसी का दुख उसके लिए गहरा है। दुख यहाँ से ले कर वहाँ तक पसरा है। किसी का दुख किसी से कम नहीं है। दुख चाहे जितने प्रकार का क्यों न हो, उसकी उदासी का रंग चाहे जितना गहरा ही क्यों न हो वह क्या सुख के बिना जी सकता है? एक पल भी नहीं जी सकता है। जीने के लिए दुख को भी सुख चाहिए। बिडंबना ही है कि खुद दुख भी सुख से ही जीना चाहता है! स्वाभाविक ही है कि दुख के पहाड़ के सीने से सुख की पतली नदी भी निकलती है। दुख है संसार में, इसलिए सुख भी है संसार में। इसे अलट-पलटकर तो कहा जा सकता है, लेकिन दोनों में से किसी का भी जीवन में निषेध नहीं किया जा सकता है। जो हर प्रकार के दुख से मुक्ति चाहते हैं उन्हें हर प्रकार के सुख से भी हाथ धोने के लिए तैयार रहना चाहिए। अ-सार के बिना सार या भूसा के बिना दाना की तलाश में जीवन बिता देनेवाले महात्माओं को प्रकृति निराश ही करती है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति का विकास अबांछित दुख को समझने और उसे बांछित दुख से बदलने का सुख हासिल करने के लिए किये गये संघर्षों के क्रम में हुआ है। मानना चाहिए कि आबांछित दुख को बांछित दुख से बदलने के अवसर का ही दूसरा नाम सुख है। हमारे समय की एक बड़ी समस्या और बिडंबना यह है कि कुछ लोगों को खालिस सुख के इंद्रजालिक चस्के के नुस्खे की जोरदार तलाश है। दुख को बुद्ध ने एक तरह समझा तो मार्क्स ने एक और तरह से समझा। गाँधी ने एक तरह से समझा तो आंबेदकर ने एक और तरह से समझा। बाल्मीकि ने एक तरह से समझा तो कबीर ने एक और तरह से समझा। तुलसी ने एक और तरह से समझा तो जायसी ने एक और तरह से समझा। सूर के लिए भी दुख वैसा ही नहीं था जैसा केशव के लिए था। इस दुख को एक तरह से निराला समझते हैं तो एक और तरह से नागार्जुन समझते हैं। मुक्तिबोध के लिए दुख कुछ और था तो अज्ञेय के लिए कुछ और ही था। और भी बहुत सारे नाम और संदर्भ लिए जा सकते हैं लेकिन यहाँ अभिप्रेत नाम गिनाना नहीं दुख के बहुवर्णी होने का संकेत भर करना है। चूँकि दुख बहुवर्णी होते हैं इसलिए सुख भी बहुवर्णी होते हैं। पूरे विश्व मानव समाज के समकालीन दुख पर भी बात की जा सकती है और भारतीय मन में उग रहे दुख के पहाड़ के गर्भ में सक्रिय ज्वालामुखी की अंतर्सक्रियता की आहटों को भी राष्ट्रीय धरती पर कान धरकर सुनने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन यह सब फिर कभी, अभी तो यह कि वर्णविभक्त हिंदी समाज के दुख के वर्णपट्ट में बिहार के दुख का भी एक अपना रंग है। कहना न होगा कि वर्णपट को समझने के लिए इस रंग को धैर्य के साथ और अलग से लक्षित करना होगा। वर्तमान शासक दल या वर्तमान राजनीतिक दलों के ही मत्थे सारा दोष मढ़ देना सरलीकरण होगा। इस सरलीकरण से बहुत सावधानी पूर्वक बचने की जरूरत है। इस सरलीकरण से बचे बिना हम बिहार के दुख को समझ ही नहीं सकते हैं। इस रंग को समझा जा सके तो यह दुख मनुष्य को बाँटनेवाला नहीं जोड़नेवाला दुख साबित हो सकता है। न समझा जा सके तो यह दुख जोड़नेवाला नहीं तोड़नेवाला भी हो सकता है। इस विषम दुनिया में दुख से बड़ा विस्फोटक दूसरा नहीं है। दुख की दहाड़ बहुत विध्वंसक होती है। दुख दहाड़े इसके पहले ही उसे उसकी मौनावस्था में समझना और सहलाना अधिक जरूरी होता है।दुख को जानने के लिए दुख से दोस्ती करना होता है।
‘हिंदी समाज’ के दुख का एक कारण अपने स्वरूप में इसका परिभाषित नहीं हो पाना भी है। भारत के वर्तमान राजनीतिक-सांस्कृतिक नक्शे को देखें तो इसके दस राज्यों को हिंदी भाषी राज्य माना जाता है। हिंदी भाषी राज्य अर्थात जहाँ दैनंदिन के कामकाज की व्यवहार-भाषा हिंदी है। इन दस राज्यों में हिंदी के साथ-साथ इसकी अड़तालीस जीवंत बोलियाँ भी व्यवहार में है। इन बोलियों में से कुछ ऐतिहासिक रूप से साहित्य समृद्ध बोलियाँ  भी हैं। इन में से कुछ का दावा भाषा होने का है। वे अपने को बोली कहा जाना अपने लिए अपमानजनक मानती हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो उनका ऐसा मानना अनुचित भी नहीं प्रतीत होता है। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि कोई समाज, समुदाय या व्यक्ति सिर्फ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रह कर नहीं जी सकता है। वर्तमान ही उसके जीवित और जीवनोन्मुखी होने की शर्त तय करता है। इस अर्थ में इतिहास की पुनर्रचना करने का काम भी इतिहास करता है। मनुष्य के जीवन में समृति का बड़ा महत्व होता है तो विस्मृति का भी महत्व कोई कम नहीं होता है। इतिहास इसलिए महत्चपूर्ण होता है कि वह हमें याद रखने और भूल जाने का विवेक देता है।याद रखने और भूल जाने का यही विवेक इतिहास विवेक कहलाता है। इतिहास विवेक की आँख से इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखें तो यह सहज ही स्वीकार करना होगा कि आज की तारीख में हिंदी के भाषिक समूह में ये बोलियाँ ही हैं। बोलियाँ मान लेने से इनका महत्व कम नहीं हो जाता है। बोलियाँ मान लेने से इनके जीने का या बरते जाने का हक खत्म नहीं हो जाता है। सचाई यह है कि बोलियाँ अपनी-अपनी भाषाओं की प्राणधाराएँ हुआ करती हैं। हिंदी की भी ये सारी बोलियाँ हिंदी की प्राणधाराएँ हैं। इन प्राणधाराओं के सूख जाने या विच्छिन्न हो जाने से हिंदी के जीवंत बने रहने के प्रति संशय उत्पन्न हो जायेगा। भाषा और बोलियों के प्राण-संबंध को नहीं समझ पाने या किसी गफलत में पड़कर उसके प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं बनाये रखने के कारण कई बार विघटनकारी तत्व और विचार वैधता हासिल कर लेते हैं। हिंदी की जो बोलियाँ बिहार में पड़ती हैं उन बोलियों से मातृभाषा के रूप में जुड़े लेखकों की सृजनशीलता में उन बोली समाजों का अपना रंग और असर होना लाजिमी ही है। तब यह भी बहुत हद तक सही है कि इन रंगों और असरों को अनन्यत: पहचान पाना और तय करना न तो संभव है और न हितकर ही है। यह पहचान निर्णयात्मक न होकर संकेतात्मक ही हो सकती है। इतनी-सी सावधानी बरतने के बाद ही इस दिशा में कुछ भी सोचना सार्थक हो सकता है।
संभवत: जॉर्ज ग्रियसर्न ने ही सबसे पहले भारत के भाषा सर्वेक्षण में ‘बिहारी बोली’ की चर्चा की। वस्तुत: तब ‘बिहारी बोली’ जैसी कोई एक बोली बिहार में थी ही नहीं, आज भी नहीं हैं। बल्कि कई बोलियाँ बिहार में बोली जाती थीं। ये बोलियाँ आज भी बोली जाती हैं। इन सारी बोलियों के समूह को ‘बिहारी बोली’ जैसे किसी एक नाम के अंतर्गत शामिल करने में अकादिमक सुविधा का अपना महत्व हो सकता है, रहा हो। आज अगर ध्यान से देखा जाये तो कुछ महत्त्वपूर्ण अपवादों को छोड़कर मोटे तौर पर इन सारी बोलियों और हिंदी में एक ही तरह की वैयाकरणिक कोटियों का ही इस्तेमाल होता रहा है, हालाँकि स्वाभाविक रूप से शब्द और अर्थभंगिमा में थोड़ा-बहुत अंतर है। कहने की जरूरत नहीं है कि वैयाकरणिक कोटियाँ ही भाषा का ढाँचा बनाती है। प्रसंगवश, ‘ट्रेन थर्टी मिनट लेट है।’ या ‘ओवरटाइम एलाउ है।’ जैसे वाक्य अपने शब्दों या लिपि के कारण नहीं वैयाकरणिक कोटियों के कारण हिंदी के प्रतीत होते हैं या हैं। बिहारी रंग उभरता है ऐसे वाक्यों को इस तरह कहने में, ‘ट्रेनवा थर्टी मिनट लेट है।’ या ‘ओवरटाइम एलाउए है।’ केंद्रीय गृहमंत्री के पद पर रहते हुए एक बार बुटा सिंह बिहार दौरे पर आये थे। किसी पत्रकार के मुँह से बुटा बाबू का संबोधन सुनकर वे काफी भड़क गये थे। इस प्रसंग पर चुटकी लेते हुए एक सज्जन ने कहा था▬▬ ‘इस में इतने भड़कने की क्या बात है? अरे भाई वह बिहार है, वहाँ किसी ने बुटबा नहीं कहा यह क्या कम है!’ ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार में संज्ञा के साथ धड़ल्ले से प्रयुक्त होनेवाला ‘बा’ सम्मानसूचक शब्द बाबू का ही घिसा हुआ या टूटा हुआ रूप है, जैसे बांग्ला में ‘दादा’ अब घिसकर ‘दा’ हो गया है। जो हो, ध्यान में सिर्फ यह लाना अपेक्षित है कि वैयाकरणिक कोटियों के अंतर्गत किये जानेवाले शब्द प्रयोग और अभिव्यक्ति के तेवर और टोन से उसमें स्थानिकता का पुट आता है। स्थानिकता को विनिर्मित करने में विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि कारक सक्रिय रहा करते हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के बिहारी रंग को संकेतात्मक रूप से भी समझने के लिए जरूरी है कि हिंदी भाषी राज्यों के विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे सक्रिय कारकों के संदर्भ में बिहार के विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे सक्रिय कारकों के वैशिष्ट्य एवं उनके विभिन्न अंतर्विरोधों को समझने की बारीक कोशिश की जाये। पुनरुक्ति का जोखिम मोल लेते हुए भी आगे बढ़ने से पहले एक बार यह याद दिलाना आवश्यक प्रतीत होता है कि यह पहचान अपने मूल रूप में सिर्फ निदर्शात्मक ही हो सकती है, किसी भी कीमत पर निर्देशात्मक नहीं।
पूरे भारत के पिछड़ेपन का कारण हिंदी भाषी राज्यों को बताया जाता है। इस पिछड़ेपन में आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन का अंतर्भाव समाहित है। प्रोफेसर आशीष बोस ने प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों के प्रथमाक्षरों को जोड़कर एक शब्द बनाया है ▬▬ ‘बीमारू’। यह ‘बीमारू’ शब्द बड़ा प्रचलन में है। ‘बीमारू’ का प्रथम द्विवर्ण (BI) बिहार को भासित करता है। क्या है यह बिहार? क्या बिहार भारतीय संदर्भ में कोई ‘सिंड्रोम’ है? जिस ‘सिंड्रोम’ का उल्लेख करते हुए अदालत में वकील देश और देश की राजधानी दिल्ली को इस ‘बिहार सिंड्रोम’ से बचाने की गुहार लगाता है। क्या कोई जाति जन्मजात अपराधी होती है? क्या बिहारी कोई जाति है? जन्मजात अपराधी जाति? इस अपराधी जाति के लोगों को घरेलू काम के लिए रखना जोखिम भरा होता है? इतना जोखिम भरा कि अपने लोगों को इस जन्मजात अपराधी जाति के अपराध का शिकार होने से बचाने के लिए देश की राजनीतिक राजधानी के वकील के ही तर्ज पर देश की आर्थिक राजधानी की पुलिस को परिपत्र निकालना पड़ता है। और देश की सांस्कृतिक राजधानी में इनके प्रति कैसा भाव है? मान्यताओं और मत के आधार पर इस्लाम के अंदर भी नाना पंथ हैं और इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। लेकिन बिहारी मुसलमान? इस्लाम का यह कौन-सा भेद है? झाड़खंड बिहार से अलग हो गया। बिहार और झाड़खंड से मेरा संबंध पिता के घर और माँ के घर से संबंध के जैसा है। मेरे लिए दानों में से कोई कमतर नहीं है। यह जानकर बहुत पीड़ा हुई कि अलग होने के बाद झाड़खंड को अपना माननेवालों की सर्वोच्च आकांक्षा झाड़खंड को बिहारी छवि से बाहर निकालने की है। पीड़ा चाहे जितनी हो लेकिन यह आकांक्षा निराधार बिल्कुल नहीं है। सच तो यह है कि बिहार को भी ‘बिहारी छवि’ से बाहर निकालने की आकांक्षा हर किसी की होनी चाहिए! ये प्रसंग फालतू लग सकते हैं। फालतू होने पर भी इतना तो बता ही जाते हैं कि बिहार और बिहारी की प्रथम छवि कैसी है। ये छवि हम जैसे लोगों को निश्चित ही सालता है, बहुत सालता है। मगर उपाय? अपनी छवि से लड़ना अपनी छाया से लड़ने के ही समान है। अपनी छाया से लड़ना मुश्किल और निरर्थक दोनों ही होता है। अपनी छाया से लड़ने को सार्थक बनाने का एक ही उपाय है, अपने-आप से लड़ना। अपने को तोड़कर ही अपनी छाया को तोड़ा जा सकता है। अपने को तोड़कर और मोड़कर ही छाया को आकार देनेवाले प्रकाशपुंज को विवश किया जा सकता है। बहरहाल यह समय बिहार के आत्म-संघर्ष का समय है। आत्म-संघर्ष के लिए आत्म-ज्ञान का होना परम अनिवार्य है। आत्म-ज्ञान के लिए निर्मम आत्म-दर्शन की जरूरत है। बिना आत्माभिमुखता के आत्म-दर्शन क्या खाक होगा! किसी समाज के लिए आत्म-केंद्रित या आत्म-रत होना बहुत अच्छा लक्षण नहीं है तो आत्म-विमुख या आत्म-विरत होना भी बहुत अच्छा लक्षण नहीं है। वस्तुत: आत्म-रति और आत्म-विरति के साथ ही आत्म-दृष्टि और विश्व-दृष्टि का अद्भुत जादुई सामंजस्य ही किसी समाज के आत्म-संघटन और आत्मोत्थान की सामाजिक संभावना रचता है। यह जादुई सामंजस्य हर समाज को खुद अपनी आंतरिक लोच के बल पर हासिल करना पड़ता है। स्वीकार करना होगा कि बिहार में इस आंतरिक लोच की कमी है। कहना न होगा कि लोच में सिर्फ आत्म-विस्तार या आत्म-प्रसार की ही संभावना नहीं रहती है बल्कि आत्म-संकोच की भी संभावना रहती है। एक जीवंत और लचीले समाज में आत्म-प्रसार और आत्म-संकोच की प्रक्रिया अधिक क्षिप्र होती है।
देकार्त आदि के विचार से आधुनिक दर्शन की शुरूआत मानी जाती है। जीवन-दृष्टि के रूप में आधुनिकता की सामाजिक शुरुआत को ध्यान में रखें तो आधुनिक भाव-बोध के निर्माण के मूल में डॉर्विन, फ्रॉयड और मार्क्स के चिंतन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैविक विकास के क्रम में बननेवाले जैविक-मन, व्यक्ति इच्छाओं की स्पर्द्धा और प्रतिसंघर्ष में बननेवाले व्यक्ति-मन और सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक अंतरालों के बीच जारी सामाजिक संघर्ष की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की ऐतिहासिक चेतना के विकासमान संदर्भों में बननेवाले गत्यात्मक सामाजिक-मन की प्रतिपूरकता की दृष्टि से आधुनिक भाव-बोध के निर्माण में इनके चिंतन के महत्व को समझा जा सकता है। आधुनिक दृष्टि से मध्यकालीन और मध्यकालीन दृष्टि से आधुनिक दार्शनिक माने जानेवाले फ्रान्सिस बेकन ने लक्षित किया था कि मनुष्य का मन तीन प्रकार का होता है। एक प्रकार का मन चींटी की तरह बाहर से वस्तु और विचार का संग्रह करता रहता है तथा उसमें अपनी ओर से कुछ भी जोड़ता नहीं है। अर्थात संग्रहवादी होता है। दूसरे प्रकार का मन मकड़ी की तरह होता है जो बाहर से प्राप्त वस्तु और विचार को उपयोग में नहीं लाता, जिसका सारा ज्ञान उसके भीतर से ही उपजता है। तीसरे तरह का मन वह होता है जो मधुमक्खी की तरह वस्तु और विचार बाहर से प्राप्त तो करता है लेकिन उसे अपनी योग्यता से बदलता भी है। पहला मन शुद्ध-अनुभववादी, दूसरा मन शुद्ध-विवेकवादी और तीसरा मन आलोचनात्मक-विवेकवादी होता है। कांट शुद्ध-अनुभववाद और शुद्ध-विवेकवाद को अकेले-अकेले अपर्याप्त मानते थे। इसलिए कांट शुद्ध-अनुभववाद और शुद्ध-विवेकवाद मिलाकर आलोचनात्मक- विवेकवाद की तलाश में थे। ध्यान देने की बात यह है कि यह आलोचनात्मक-विवेकवाद जो बाहर से प्राप्त विचार को आत्मसात कर बदलने की गुंजाइश का ही एक नाम सृजनशीलता है। इमानुएल कांट के अनुसार ज्ञानोदय के होने का अर्थ है, परिपक्व होना, दूसरे की प्रेरणाओं पर आश्रित होने के बजाये अपनी प्रेरणा से परिचालित होने की योग्यता अर्जित करना, मुक्त होना और अपने कार्य के लिए जवाबदेही स्वीकार करने के योग्य बनना। इस संदर्भ में कांट के ‘प्राइवेट’ और ‘पब्लिक’ की संकल्पना भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ उ­द्देश्य सिर्फ इतना भर संकेत कर देना है कि ज्ञानोदय, आधुनिकता और स्वतंत्रता में सहोदर का ही नहीं जुड़वाँ होने का भी संबंध है। इस प्रकार आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता का आपस में अविच्छेद्य संबंध है। यही कारण है कि आधुनिकता साधारण लोगों के मन में भी स्वतंत्रता और आत्मानुशासन की स्थिति प्राप्त करने के स्वप्न के लिए जगह बनानेवाला पहला सुचिंतित सामाजिक विचार है। यह ध्यान में रखना बहुत ही जरूरी है कि भारत में आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता या आत्मानुशासन तीनों अवधारणाओं की सामाजिक चर्या का प्रारंभ एक ऐसे वातावरण में हुआ जब भारत आर्थिक और राजनीतिक रूप से बाह्य उपनिवेश के तथा सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आंतरिक उपनिवेश के अधीन था। जाहिर है कि ऐसे में उस सामाजिक चर्या की ऊर्जा का सिंहभाग इस बाह्य उपनिवेश की अधीनता से मुक्ति में ही व्यय हुआ। इस व्यतीत ऊर्जा के अवशिष्ट अंश के बूते आंतरिक आत्म-उपनिवेश से लड़कर मुक्त होने और आधुनिक, ज्ञानोदित और स्वतंत्र या आत्मानुशासित सापेक्षिक समतामूलक लोकतांत्रिक-समाज के अखंड आत्म या संविधान को आत्मार्पित करनेवाले ‘हम’ के अर्जन और परिगठन का काम अधूरा ही रह गया। सहज ही लक्षित किया जा सकता है कि यह अधूरापन बिहार में कुछ अधिक तीखे तेवर में बना रहा है। कहना न होगा कि औपनिवेशिकता, चाहे वह बाह्य हो या आंतरिक, की अपनी ऐसी बहुत सारी बारीक समस्याएँ होती हैं जिन्हें शब्दश: अभिव्यक्त करना न सिर्फ मुश्किल होता है बल्कि कई बार ब्यर्थ का द्रविड़ प्राणयाम भी साबित होता है। औपनिवेशिकता एक दर्द है जिसे बेवाई की तरह सिर्फ महसूस किया जा सकता है। उसकी बारीकियों में के चक्कर में पड़े बिना भी उससे लड़ा जा सकता है। सही है कि आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता का बोध भी हमें इस बाह्य औपनिवेशिक वातावरण में ही मिला मगर एक पल के लिए भी यह भुलाया नहीं जा सकता है कि यह बोध हमें घेलुए की तरह मिला। इतिहास ने बड़ी क्रूरता से साबित कर दिया है कि घेलुए में मिले स्व-तंत्रता बोध के स्व-त्राता बन सकने की गुंजाइश न के बराबर होती है।
व्यक्ति-मन के संदर्भ में बेकन के विचार को सामाजिक-मन के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। सामाजिक मन को थाहने के लिए सामाजिक संरचना की आभ्यंतरिक अभियांत्रिकी पर विचार आवश्यक है। डॉ.श्यामचरण दुबे के अध्ययनों के निष्कर्षों पर ध्यान दिया जा सकता है। वे अमेरिकी समाजशास्त्री डेविड रिजमेन के हवाले से उल्लिखित करते हैं कि प्रवृतियों के आधार पर समाज के तीन प्रकार होते हैं; परंपरा-प्रेरित समाज, बाह्य-प्रेरित समाज और अपने अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाला स्वतंत्र-समाज। परंपरा-प्रेरित समाज पूर्वजों की बनाई राह पर चलनेवाला समाज होता है। इस प्रकार के समाजों में नवाचार कम होते हैं, नई माँगों का दायरा भी कम होता है। बाह्य-प्रेरित समाज बाह्य प्रभाव को बिना किसी प्रकार की पड़ताल-परख के बड़ी सरलता से ग्रहण कर लेनेवाला होता है। ऐसे समाज में परंपरा की शक्ति क्षीण हो जाती है और विवेक को विकसित तथा प्रभावी होने का मौका नहीं मिलता है। अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाला स्वतंत्र-समाज आंतरिक विवेक को  निर्णय का आधार माननेवाला होता है। ऐसे समाज के सदस्य संपूर्ण परंपरा को न तो पूजनीय मानते हैं और न सारे नवाचारों को ही स्वीकार्य मानते हैं। ये परंपरा और नवाचार दोनों को अपने विवेक से परखते हैं। यहाँ जरा ठहर कर एक बार फिर कांट के ज्ञानोदय की अवधारणा का स्मरण कर लिया जाये तो कहा जा सकता है कि अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाले स्वतंत्र-समाज में ही ज्ञानोदय हो पाता है। समस्या यह है कि अंतर्विवेक से परिचालित होने की सामाजिक स्थिति हवा में पैदा नहीं होती है। समाज के अंदर इसके लिए जगह बनानी पड़ती है। औपनिवेशिक जकड़न में फँसे समाज के अंदर अंतर्विवेक और उसकी निष्पत्तियों के आधार पर सामाजिक व्यवहार्यता के लिए जगह बनाना आसान काम नहीं होता है। यह काम तब और मुश्किल हो जाता है जब समाज को औपनिवेशिक जकड़न में फाँसे रखनेवाले जाल के धागों के निर्माण में जातीय अंतर्चेतना के गुणसूत्रों का भी योगदान हो।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने “हिंदी साहित्य का इतिहास”  में साहित्य की प्रवृत्ति को जनता की चित्तवृत्ति से जोड़कर देखने की जरूरत के महत्व को समझा था। उनके अनुसार, ‘जनता की चित्तवृत्ति’ बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। इसी के साथ औद्योगिक, बाजार-व्यवस्था एवं आर्थिक परिस्थिति को भी जोड़कर विचार किया जा सके तो जनता की चित्तवृत्ति की बनावट और बुनावट एवं उसकी जातीय चेतना का परिप्रेक्ष्य अधिक पूर्णता से स्पष्ट हो सकेगा। हिंदी रचनाशीलता में बिहारी वैशिष्ट्य को जानना हो तो पहले बिहार के बारे में कुछ तथ्यों का स्मरण कर लेना प्रासंगिक ही नहीं अनिवार्य भी है। उत्तर में नेपाल, पूरब में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखंड के बीच 94,163 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफलवाले इस राज्य की जनसंख्या 8,28,78,796 है जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.07   है। 56.03 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में से सिर्फ 33.51 लाख हेक्टेयर जमीन को ही सिंचाई की सुविधा हासिल है और भूमि-सुधार हुआ ही नहीं है। गंगा के इस पूर्वी मैदानी क्षेत्र में ऊपजाऊ जलोढ़ मिट्टी होने के बावजूद कृषि की उत्पादकता न्यून स्तर पर है। भूमिगत जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। सामान्यत: 100 से 200 सेमी. के बीच औसत वर्षा होती है। विषुवत रेखा बिहार से होकर गुजरती है। औसत तापक्रम 21 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है।गंगा, सोन, पुनपुन, फल्गु, कर्मनाशा, दुर्गावती, कोशी, गंडक, घाघरा, कमला, बलान जैसी नदियों के कारण जल की प्रचूरता के बावजूद इसके सार्थक प्रयोग के लिए जल-प्रबंधन की बुनियादी ढाँचागत सुविधा का अभाव है।परिणमत: जहाँ इस राज्य को एक ओर सेंच के अभाव में सूखा की आँच सहनी पड़ती है वहीं दूसरी ओर बाढ़ की चपेट में आकर जन-धन की भारी क्षति का भी सामना करना पड़ता है। धान, गेहूँ, मकई, दाल के अलावे ईख, तंबाकू, तिलहन, प्याज, मिर्च और पटसन यहाँ की मुख्य फसल है। सार्वजनिक क्षेत्र के बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की हालत बयान के काबिल नहीं है।पूरी परिवहन व्यवस्था निजी मालिकों के हाथ में है। जहाँ तक बिहार की औद्योगिक स्थिति का सवाल है मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर और मोकामा में भारत वैगन लि. का रेल वैगन प्लांट, बरौनी में इंडियन ऑयल कारपोरेशन का तेलशोधक और एच.पी.सी.एल का उर्वरक उत्पादन केंद्र, सिवान, पंडौल, भागलपुर, मोकामा और गया के सूताकल, गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, भागलपुर और सीतामढ़ी की डिस्टलरी, पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर, बरौनी के चमड़ा उद्योग, कटिहर एवं समस्तीपुर के चटकल, हाजीपुर का दवा उद्योग, कल्याणपुर बंजारी के सिमेंट उद्योग के साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की तेरह और निजी क्षेत्र की पंद्रह चीनी मीलों को मिलाकर बिहार का औद्योगिक नक्शा बनता है।बिजली आज के जीवन में प्राणवायु की तरह का महत्व रखती है। बिहार इलेक्ट्रिसीटी बोर्ड की बरौनी थर्मल पावर, मुजफ्फरपुर थर्मल पावर, कोशी हाइडेल पावर के साथ ही एन.टी.पी.सी. के कहलगाँव सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट बिजली के उत्पादन के केंद्र हैं। इनके अतिरिक्त एन.टी.पी.सी. के फरक्का सुपर थर्मल पावर स्टेशन और तालचर सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट, दामोदर घाटी निगम के दुर्गापुर थर्मल पावर पावर स्टेशन और नेशनल हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन चुक्का हाइडेल पावर स्टेशन के बिजली उत्पादन में भी हिस्सा मिलता है। स्वास्थ्य और शिक्षा के कार्यशील आधारभूत ढाँचे का अभाव है। नालंदा और विक्रमशीला के खंडहर सिर्फ ईमारतों के ही खंडहर नहीं हैं आज के गतवैभव और अप्रतिभ बिहार के भी प्रतीक हैं। भारत के अन्य राज्यों से तुलना करें तो बिहार में साक्षरता की दर और महिला-पुरुष साक्षरता का आनुपातिक औसत बहुत कम है। कहने की जरूरत है कि आर्थिक विकास, सामाजिक निवेश तथा औद्यागिक निवेश, प्रतिव्यक्ति आय, पक्का मकान, औषधि, पोषक एवं संतुलित आहार और बिजली खपत आदि के मामले में यह राज्य अपने न्यून स्तर पर है साथ ही आबादी के घनत्व, शिशु मृत्यु दर, शिक्षा से बाहर हो जानेवाले छात्रों की दर के मामले में अपने अधिकतम स्तर पर है? सापेक्षिक गरीबी तो है ही लेकिन परम गरीबी की समस्या बहुत ही विकराल है। दहेज और घरेलू उत्पीड़न की समस्या विकट है। खैनी, भाँग, गाँजा और ताड़ी स्थानीय स्तर पर सहजता से उपलब्ध होनेवाला नशा है। प्रमुख रूप से सत्तू, लिट्टी, चूड़ा-दही, भात और रोटी खानेवाले बिहारी औसत कद-काठी और स्थूल काया के होते हैं। बिहारी सामान्य रूप से अपने व्यवहार में भावुक, अनौपचारिक और आत्मीय तथा चरित्र में ग्रामीण होते हैं। संशय एवं बद्धमूल हताशा उनके अंतर्मन में , ऐंठ उनकी भाषा में और गुस्सा उनकी नाक पर होता है। उनके उत्साह का ग्राफ बड़ी तेजी से उठता-गिरता है। इसके कारण राजनीतिक होहकार में आगे-आगे रहने पर भी जाति-संप्रदाय-क्षेत्र-अपराध के जंजाल में फँसे राजनीतिक नेतृत्व की ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्रों के नेतृत्व की गुणवत्ता का भी औसत न्यून्यांक पर है। जाति को राजनीतिक समूह में बदल कर जाति पर आधारित राजनीति करनेवालों की महिमा यह है कि जाति का बंधन बेटी और रोटी के संबंध तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि फैलकर वोट तक पहुँच गया है। लगभग सामाजिक मान्यता ही मिल गई है कि किसी भी परिस्थिति में बेटी और वोट को जाति के बाहर नहीं जाना चाहिए। वहाँ लोग नाम पूछते हैं तो व्यक्ति की पहचान के लिए नहीं जाति की पहचान के लिए। जिस नाम से जाति का पता न चले उस नाम को संशय की नजर से देखा जाता है और अधूरा तथा छद्म माना जाता है! बिहार की यह स्थिति आरोप का नहीं, बिहारी छवि से बिहार को बाहर निकालने की कठिन मानसिक चर्या के लिए बिहार को तैयार करने के लिए गहरे, आत्मीय और संवेदनशील विश्लेषण का विषय है।
महात्मा बुद्ध ने पूरी दुनिया को जीवन के लिए ‘मझम निकाय’ का महत्व समझाया लेकिन बिहार के चरित में किसी मध्यम मार्ग के लिए कोई जगह नहीं बन पाई। एक अति से दूसरी अति पर पहुँच जाना इनकी नियति है और मानसिक अधीरता इनका स्वभाव। व्यक्तिगत प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन सामाजिक समूहन और सामाजिक सूत्रबद्धता के महत्व को ठीक से समझ और साध नहीं पाने के कारण अपने व्यवहार में अकेले-अकेले मुक्ति पा लेने की आकांक्षा पालनेवाले लगते हैं। उपस्थित-बुद्धि और-साहस में औसत से अधिक होने के बावजूद दुष्चक्र में फँसी इनकी सरस्वती मंद रहती है। आत्म की पहचान और अभिज्ञान के अभाव में भी इनके आत्म-सम्मान के बोध का ग्राफ उच्च स्तर पर रहता है। इनकी आत्म-दृष्टि और विश्व-दृष्टि एक दूसरे की प्रतिपूरकता में सक्रिय न होकर एक दूसरे के टकराव में आगे बढ़ती है और एक दूसरे को खंडित, ब्यर्थ और धूमिल बनाती है। यहाँ रोजगार के अवसर कम होने के कारण यहाँ की बहुत बड़ी आबादी रोजी-रोटी की तलाश में देश के कोने-कोने में जाती है जबकि देश के अन्य क्षेत्र से रोजगार की तलाश में आनेवाली आबादी बहुत छोटी है, खासकर झारखंड के अलग हो जाने के बाद। बाहर जानेवाली ऐसी बड़ी आबादी में पूँजी-विहीन अ-कुशल और अर्द्ध-कुशल लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है, स्वभावत: दैनिक मजदूरी इनकी विवशता होती है। क्या आश्चर्य यदि बिहारी और मजदूर एक दूसरे के राष्ट्रीय पर्याय बन गये हैं। राष्ट्र में मजदूरों की जो दशा है उसी से राष्ट्र में बिहारियों की दशा का भी अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ये बिहार में टिक पाते नहीं हैं और बिहार के बाहर इनका कोई सम्मानजनक आत्मीय ठौर होता नहीं है। ऐसी स्थिति में ये न इधर के रहते हैं न उधर के रहते हैं। ये दोनों ही जगह अपने बाहरी होने के एहसास के साथ समाज-विहीनता या कठ-सामाजिकता के साथ जीने लिए विवश हो जाते हैं। जीवन के किसी क्षेत्र में जनतांत्रिक जीवन पद्धति की कोई कारगर भूमिका नहीं है। मानव विकास रिपोर्ट-200, जिसका मुख्य विमर्श आत्मविभक्त दुनिया में लोकतंत्र की दुरवस्था से संबंधित है, के इस निष्कर्ष को ध्यान में लाना यहाँ प्रासंगिक है कि किसी भी समाज में लोक को शक्तियुक्त करनेवाले लोकतंत्र के ढाँचों और अंतर्वस्तु दोनों को खुद अर्जित पड़ता है, इसे आयातित नहीं किया जा सकता है। सत्ता के विभिन्न रूप होते हैं, यथा लोकसत्ता, ज्ञानसत्ता, धनसत्ता आदि। लोकतंत्र में इन विभिन्न सत्ताओं के विकेंद्रीकरण के लिए विभिन्न स्तर के ढाँचों की जरूरत होती है। ये विभिन्न ढाँचे पंचायतों, स्थानीय स्वशासी निकायों, समितियों, संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों,सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों आदि के रूप में प्रकट होते हैं। इस तरह से विकेंद्रित विभिन्न सत्ताओं को सूत्रबद्ध कर उन्हें राज्य-सत्ता से जोड़कर लोकतांत्रिक शक्ति को अर्जित किया जाता है। यह लोकतांत्रिक शक्ति ही समतामूलक सामाजिक संरचना का निर्माण और और उसके प्रतिफल के सापेक्षिक रूप से समान संवितरण को सुनिश्चित कर लोकतंत्र की बुनियादी प्रतिश्रुति को पूरा कर पाती है। लोकतंत्र के ढाँचों और अंतर्वस्तु की बिहार में क्या स्थिति है, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। गैर सरकारी संगठन, संक्षेप में एन.जी.ओ. के नाम से जाने जाते हैं। आजकल पूरी दुनिया में एन.जी.ओ. का बड़ा शोर है। एन.जी.ओ. नया ओझा है। बताया जाता है कि एन.जी.ओ. के पास हर प्रकार की सामाजिक समस्याओं का निदान है। अन्यत्र बात सही भी हो सकती है। बिहार के संदर्भ में लगता है सारे तो नहीं लेकिन अधिकतर एन.जी.ओ. खुद ही समस्या हैं। इनकी कार्यप्रणाली और इनके होने के परिणाम गहन अध्ययन के विषय हैं। बात कड़वी है मगर इसे आत्म-स्वीकृति के रूप में कहा जा सकता है कि बिहार में लोकतंत्र के ढाँचे भीतर से ध्वस्त हैं और अंतर्वस्तु धुहाँसे (धुआँ+कुहासा) के ही रूप में उपलब्ध है। यह राज्य अपने सामंतवादी स्वभाव में आगे है और सामाजिक-आर्थिक शोषण में भी अपने चरम पर है। तरह-तरह की सेनाएँ और तरह-तरह के आक्रमण हैं। आक्रमण हैं तो प्रत्याक्रमण भी हैं। बिहार विभिन्न प्रकार से सामाजिक अभियांत्रिकी को आजमाने की प्रयोगशाला का उदाहरण बन कर रह गया है। इसकी दशा वैज्ञानिकों के शोध कार्य के लिए जी रहे पशु की तरह की है। निर्विशिष्ट मनुष्य के लिए मनुष्य का सम्मान-बोध यहाँ सपने में भी मुश्किल से ही सक्रिय हो पाता है। सामूहिक हत्या, अपहरण, बरजोरी उद्योग का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं।
सल्हेस, बिरहा, चैता, फाग इनके दर्द की लोकगाथाएँ हैं। होली, दीवाली, छठ इनके दर्द के लौकिक उल्लास, उत्साह, मनोरथ पूरने के अवसर हैं। मैथिली (अब भाषा की संवैधानिक मान्यता प्राप्त), मगही और भोजपुरी इस क्षेत्र की मुख्य बोलियाँ हैं। ध्यान रहे ये सिर्फ बोलियाँ नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक समाज भी हैं। इन सांस्कृतिक समाजों की अपनी विशिष्टताएँ भी रही हैं। इन विशिष्टताओं के कारण कहीं-न-कहीं में इनमें पार्थक्य का भाव भी सक्रिय रहता है। बिहारी होना इनकी अपेक्षाकृत नई और आधुनिक पहचान है। इस नई पहचान को यहाँ के लोग पूरी तरह आत्मगत नहीं कर पाये हैं। ये बिहार के अंदर अपेक्षाकृत नये और आधुनिक अर्थ में बिहारी न होकर पुराने और पारंपरिक अर्थ में मैथिल, भोजपुरी, मागध आदि होते हैं और बिहार के बाहर ये बिहारी होते हैं। बाहर और भीतर में पहचान की इस भिन्नता के कारण यहाँ के लोगों के मानस में आधुनिकता और पारंपरिकता के अंतर्द्वंद्व से इनके अंदर व्यक्तित्व के जिस अंतर्पथ (Orbit) का निर्माण होता है वह इनके अंदर एक तरह से पहचान की अस्मिता का संकट भी खड़ा करता है। कई बार बिहार के बाहर भी वे अपनी मैथिल, भोजपुरी या मागध पहचान को स्वीकृति दिलाने की निष्फल चेष्टा करते हैं। सही अर्थ में देखा जाये तो बिहारी समाज में आधुनिकता से अधिक पारंपरिकता को ही वरीयता प्राप्त होती है। इसके कारण हैं। अवधाराणा के रूप में हो या जीवन-दृष्टि के रूप में हो आधुनिकता पारंपरिकता से बिल्कुल विच्छिन्न नहीं हो सकती है। सच्ची बात तो यह है कि आधुनिकता परंपरा में ही नया विकास या संयोग होती है। जाहिर है प्रत्येक पारंपरिक समाज को अपने अंदर यह नया विकास या संयोग उद्योगपूर्वक घटित करना पड़ता है। यही कारण है कि युरोपीय समाजों की आधुनिकता और भारतीय समाजों की आधुनिकता में भी अंतर होता है। जब तक यह अंतर मनुष्य और प्रगति विरोधी न हो तब तक इस अंतर के प्रति आदर ही किसी संस्कृति की समाजिक बहुलात्मकता के प्रति सहिष्णुता का आधार और सहअस्तित्व की संभावना रचता है। ध्यान देने की बात यह है कि परंपरा के अंतर्गत यह नया विकास और नया संयोग ही सामाजिक गत्यात्मकता को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक-प्रसार और प्रगति के पथ का संधान करता है। सांस्कृतिक विकास चक्र में कौन-सी प्रक्रिया पहले शुरू होती और कौन-सी बाद में यह कहना संभव नहीं है। अधिक सही बात तो यह है कि दृश्य या अदृश्य रूप में ये प्रक्रिया सहसंचलन की अवस्था में एक दूसरे को अपनी द्वंद्वात्मक संगति में प्रगति प्रदान करती है। बिहार के खास संदर्भ में देखें तो इसके विभन्न समाजों की पारंपरिकताओं और आधुनिकताओं के अंतर के प्रति पारस्परिक सम्मान, सहबद्धता और संवाद का नहीं आत्मकोष्ठता और आत्मश्रेष्ठता के कारण उदासीनता, अन्यता और शत्रुता का भाव ही अधिक सक्रिय रहा है। यही कारण है कि आधुनिकता की परियोजना का पहला चरण भी यहाँ सचेत रूप से प्रारंभ नहीं हो सका। बंगाल के नवजागरण को देखें तो सवर्ण हिंदुओं के नेतृत्व में और औपनिवेशिक वातावरण में प्रारंभ नवजागरण की सीमाएँ आज बहुत साफ देखी जा सकती है लेकिन बावजूद इसके उस नवजागरण में आधुनिकता की परियोजना के सचेत प्रारंभ का पाठ भी पढ़ा जा सकता है। बिहार के खास संदर्भ में बौद्धिक नेतृत्व, जिसका समग्र नहीं भी तो बहुत बड़ा अंश सवर्ण हिंदुओं के हाथ में था, ने कभी अपनी इस जिम्मेवारी को गंभीरता से समझा ही नहीं। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो बिहार हमेशा से प्रतिसंस्कृति का केंद्र रहा है। आर्य वर्चस्व के अंतर्गत विकसित संस्कृति के अंदर बिहार का सांस्कृतिक विकास अधिक द्वंद्वात्मक रहा है। चूँकि आज बाहरी और भीतरी का झगड़ा एक भिन्न प्रकार के संदर्भ से उठाने की कोशिश की जा रही है इसलिए एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि संस्कृति और प्रतिसंस्कृति के द्वंद्व में कोई बाहरी और कोई भीतरी नहीं होता है, यह आत्म-द्वंद्व ही होता है। बुद्ध और महावीर ने ही नहीं बिंबसार, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक आदि के शासन ने भी इस प्रतिसंस्कृति को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। बल्कि एक बार याद कर लेने की जरूरत है कि खुद बिहार नाम में बौद्ध प्रभाव है। अकारण और नगण्य नहीं है यह याद करना कि बुद्ध और महावीर ने ही सबसे पहले संस्कृत सत्ता, संस्कृत भाषा और संस्कृत शास्त्र को चुनौती दी और पालि और प्राकृत को अपनी आधार भाषा के रूप में अपनाया। अपेक्षाकृत बाद के संदर्भ में देसिल बयना के सब जन मिट्ठा होने की सचेत घोषणा भी सबसे पहले इसी बिहार से विद्यापति ने की।
बिहार में अब तक कोई बड़ा बाजार, औद्योगिक या व्यापारिक केंद्र बन नहीं पाया। समुद्री तट के अभाव और औपनिवेशिक अवशेष पर अर्थ-व्यवस्था ख़़डी की जाने की स्थिति में जो यत्किंचित विकास हुआ, उसका भी पूरा लाभ इस क्षेत्र के सामाज-आर्थिक आधार को नहीं मिला। मुख्यत: कृषि पर आधारित होने और लगातार बाढ़-सूखा एवं बढ़ती आबादी की मार, निरक्षरता, निरक्षराचार एवं भ्रष्टाचार से संत्रस्त होने के कारण इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधि को गहरा आघात लगता रहा है। विकास की राह पर चलने और आर्थिक विकास की नई मंजिलों को प्राप्त करने में यह बुरी तरह विफल रहा है। बिहार के रहनेवालों को भारत में ही उनके प्रवास के स्थानों पर न जाने किस-किस तरह के अपमान और जिल्लत  का सामना करना पड़ता है। बिहार का समाज बाह्य-प्रेरित परतंत्र-समाज का ही उदाहरण बनकर रह गया है। एक ऐसा समाज जो अपनी परंपरा को भी अपने विवेक प्रदत्त निष्कर्षों एवं अंत:करण की पे्ररणा से नहीं, बल्कि किसी बाह्य-शिक्त की अभिप्रेरणा से ही समझता, पकड़ता और ग्रहण करता है।

आज बिहार की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति कोई बहुत अच्छी  नहीं है। बिहार ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। लेकिन उस संग्राम की राजनीतिक और सामाजिक पुननिर्माण की नव सांस्कृतिक चेतना को कार्यशील ऊर्जा में बदलने में, सामाजिक-पुनर्निर्माण के स्वप्न के साथ उसे जोड़ने में, नई सामाजिक गतिशीलता के वेगबर्द्धन की कार्यलिपि को पढ़ने में और अपेक्षित नई पहल करने में बिहार सफल नहीं हो पाया। बिहार के संदर्भ में, न तो सांस्कृतिक-राजनैतिक-सामाजिक चेतना के नवप्रवाह का सातत्य बना रह सका न स्मृतिकोश में ही उसके लिए कोई जगह बन सकी। स्वतंत्र भारत में भी, आपात काल की तानाशाही का जोरदार ढंग से राजनीतिक मुकाबला करने के बावजूद संपूर्णक्रांति के सामाजिक स्वप्न का जो बुरा हाल हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। बिहार और उसके समाज का छंद जनतांत्रिक चेतना से अधिक वर्णतांत्रिक चेतना द्वारा ही पोषित हो रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में जनता की चित्तवृत्ति के अंदर जो द्वंद्व बने थे, उसे नवपरिप्रेक्ष्य प्रदान करने, संवेदनात्मक स्तर पर उस से जुड़ने के बजाय, किसी-न-किसी गफलत में पड़कर हमने अपेक्षा और उससे भी अधिक जिद यह रखी कि जनता की चित्तवृत्ति ही साहित्य की संवेदना से जुड़े! फणीश्वर नाथ रेणु का मैला आँचल आज भी मैला ही है, बल्कि पहले से अधिक मैला ही नहीं अधिक तार-तार भी हो गया है। बलदेव और महंत वैसे के वैसे  हैं। इन परिस्थतियों को बदलने के लिए कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं है। राजनीतिक-सांस्कृतिक सक्रियता, प्रगतिशील सामाजिक दबाव और समर्थन के अभाव में बदलाव की प्रक्रिया या तो अपने ठहराव में है या फिर अपने अंतर्विराधों के कारण भयावह विकृतियों का शिकार बन कर रह गई है। सामाजिक संस्तरण और संलयन की सकारात्मक प्रकिया ठप है। आर्थिक सुधार के इस हंगामे भरे समय में भूमि सुधार तो दूर, अब सामाजिक सुधार की बात भी नहीं होती। पंचायती व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन के राजनीतिक निकाय या तो हैं ही नहीं या फिर जहाँ हैं, वहाँ अपने आकांक्षित प्रभाव और रूप में नहीं हैं। गतिशीलता, चाहे वह प्रगतिशीलता हो या दुर्गतिशीलता और बदलाव, चाहे वह अच्छा हो या बुरा की इस तेज आँधी के समय में जब सबकुछ नये सिरे बनने और बिगड़ने के दौर के सम्मुख खड़ा है बिहार अपनी यथास्थिति में निस्तेज बना हुआ है। दुनिया रोज बनती है, लेकिन बिहार नहीं बनता है। यहाँ मिट्टी पानी ही बिगड़ गया है। कैसा नृशंस हो गया है सब कुछ कि यहाँ अभिसारिकाओं के मधुर गीत में पके धान की मदिर गंध नहीं चॉदनी रात का जहर पसरता है। यह किस नये इलाके में आकर हम ठहर गये मीत कि नीम रोशनी में भी दिन गुजारने के लिए न हीरामन का मन बचा है न हीराबाई अंर्तद्वंद्व। इतना बड़ा भारत, इतने पूत भारत माता के लेकिन बचा हुआ है सिर्फ अंडा, वह भी सड़ा हुआ ! जिस धुआँ को ढ़ूढ़ रहे थे बाबा उस धुआँ की आग यहाँ की ठिठुरती पूस की रात में यहाँ के किसी हल्कू के लिए प्राण रक्षक आग बनने के बदले आत्मदहन का सामान बन गयी है।झबरू भी तो नहीं है आज हल्कू के पास! हाँ बाबा यह भी लाल, वह भी लाल लेकिन ऐसा नहीं कोई माई का लाल कि बिहार को भी कर दे लाले लाल। बिहार के दुख की गाथा परती परिकथा है। बिहार कुंभीपाक है। यहाँ कोई हुँकार नहीं है। यहाँ कोई मुक्ति प्रसंग नहीं है। न आम्रपाली है न सुजाता है। यहाँ से ले कर वहाँ तक कहीं कोई नहीं है जो जरा ठहर कर बिहार और बिहारियों के बारे में दो मिनट का मौन चिंतन करे। आरोप और उपहास तो बहुत हैं परायों के भी और अपनों के भी लेकिन अपनापन, प्रेम पगा अपनापन? वह तो नदारद है! अपनों के भी, परायों के भी! कैसी ट्रेजडी है नीच। बहुत फटा हुआ है बिहार का मन। पोर-पोर दुख से सराबोर। खून और पसीने लतपथ। बिहार की सृजनशीलता की सीवन में बहुत दर्द है, बहुत दुख है। इस समय बिहार में नींद बहुत ज्यादा है सपने बहुत कम हैं। जवान दिमाग को तोड़कर उसमें नाजायज सपनों की खेती करनेवालों ने बिहार को कहीं का नहीं छोड़ा है। कहीं का नहीं! आत्म-युद्ध के चक्रवयूह में अंगुलिमालों से घिरे बिहार में दुख सिंगा की तरह बजता है। बिहार के दुख को कोई बुद्ध ही समझ सकता है। दिक्कत यह है कि प्रबुद्ध तो कई हैं पर बुद्ध कोई नहीं। गुलमुहर के तले किसकी प्रतीक्षा में खड़ा है, बुद्धू बना, दुख के भार से दबा हुआ नतग्रीव बिहार? बुद्ध की या अपनी भावी पीढ़ी की आँखों में समतामूलक, समृद्ध, पुलकित, परदुखकातर शक्तिशाली लोकतांत्रिक समाज को हासिल करने की आकांक्षा के सामाजिक स्वप्न बनकर धीरे-धीरे उतरने की! कौन जाने !

धर्म की सत्ता और सत्ता का धर्म



धर्म और सत्ता में बहुत नजदीकी संबंध रहा है। धर्म अपने आप में एक तरह की सत्ता है तो सत्ता अपने काम-काज को धार्मिक आभा की पवित्रता में देखे जाने की आग्रही होती है। धर्म और सत्ता में टकराव के बिंदु भी कम नहीं हैं, लेकिन मनुष्य को इन दोनों के टकराव के साथ नहीं सहकार के साथ जीना पड़ता है। धर्म और सत्ता दोनों की आकांक्षा रहती है कि मेरे शरण में आ जाओ। दोनों ही मनुष्य से निःशर्त्त समर्पण की माँग करते हैं। दोनों ही इस समर्पण को मनोरम और पवित्र बनाने के सारे प्रबंध करते हैं। इस प्रबंध में प्रेम का इस्तेमाल कौशल और तत्त्व दोनों के रूप में होता है। इस तरह समर्पण धर्म में आस्था और श्रद्धा आदि के रूप में प्रकट होता है। यही समर्पण सत्ता में प्रतिबद्धता और बफादारी आदि के रूप में प्रकट होता है। भारत का अनुभव तो इस मामले में अद्भुत है। यहाँ द्वि-राष्ट्रीयता की सिद्धांतिकी ऐसी परवान चढ़ी कि राज और राष्ट्र एक ही अर्थ ध्वनित करने लगे। पहले राज के साथ प्रेम की कोई गुंजाइश नहीं थी। राज प्रेम का कहीं कोई प्रसंग नहीं बनता था। राज धर्म और राज भक्ति का चलन था। राजा या शासक का प्रजा के प्रति किया जानेवाला सलूक राज धर्म से परिभाषित होता था और राजा या शासक के प्रति प्रजा का सलूक राज भक्ति से मार्यादित होता था। राज के स्थान पर राष्ट्र के आने के साथ पहले प्रेम जुड़ा, फिर धर्म जुड़ा और फिर भक्ति भी जुड़ गई ▬▬ राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र धर्म और राष्ट्र भक्ति के प्रसंग के बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। यह साधारण प्रक्रिया नहीं है। इसे समझना जरूरी है। यहाँ एक और बात को ध्यान में रखे जाने की जरूरत है, सत्ता को धर्म निरपेक्ष बनाने के लिए बहुत प्रयास हुए, कमोबेश सफल भी हुए लेकिन धर्म को सत्ता निरपेक्ष बनाने की बात ही कभी नहीं उठी। क्यों? क्या इसलिए कि सत्ता को, कुछ हद तक ही सही, धर्म निरपेक्ष बनाया जा सकता है, लेकिन धर्म को सत्ता निरपेक्ष नहीं बनाया सकता है! भारत के संविधान में भारत राष्ट्र की सत्ता को तो धर्म निरपेक्ष बनाने का प्रावधान है, लेकिन धर्म को सत्ता निरपेक्ष बनाने का कोई प्रवाधान नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य और धर्म पर आधारित भारतीय समाज के बीच जाति-धर्म की राजनीतिक रस्साकशी चलती रहती है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य और धर्म पर आधारित भारतीय समाज के बीच के संबंधों की जटिलताओं को समझने के लिए इनके गठन की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को भी समझना जरूरी है। इन जटिलताओं को बहुत संवेदनशील बना दिया गया है। इस पर किये जानेवाले संवाद में अतिरिक्त संवेदनशीलता और संतुलन की भी जरूरत है। किसी भी प्रकार के सरलीकरण और अधीर कथन से संवाद की प्रक्रिया क्षतिग्रस्त हो सकती है। सभ्यता में आधुनिक चेतना के समावेश के बाद से शिक्षा का एक वैश्विक आयाम सर्वदा आकांक्षित रहा है। इसी आकांक्षा के कारण शिक्षा के शिखर संस्थानों को विश्वविद्यालय कहा जाता है। आज जीवन के अन्य प्रसंगों में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को, विश्व-स्तरीय जनविरोध के बावजूद, निर्बाध चलाने की कोशिश की जा रही है, राष्ट्र बोध सिकुड़ रहा है। अद्भुत यह कि 'राष्ट्र बोध' का दायरा सिकुड़ रहा है और 'भारत बोध' का दायरा बढ़ रहा है। ध्यान रहे, राष्ट्रीयकरण और भारतीयकरण एक ही नहीं। ‘राष्ट्रीयकरण’ की नहीं, शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ की भावुक माँग बार-बार उठाई जाती रही है। शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ की यह भावुक माँग अपने आशय में इस भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की विरोधी है या राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत प्रतीत होनेवाली यह माँग भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की ही मददगार है? विज्ञान और वाणिज्य की शिक्षा का भारतीयकरण क्या हो सकता है! सीधी-सी बात यह है कि ‘भारतीयकरण’ की इस माँग का संदर्भ मानविकी से जुड़ता है। हम जानते हैं मानविकी से जुड़े विषयों, विशेषकर इतिहास, साहित्य आदि से संबंधित विषयों, को लेकर पिछले कुछ वर्षों से किस प्रकार का शैक्षणिक और सामाजिक वातावरण बनाने की कोशिश निरंतर की जा रही है। इस वातावरण में इस माँग से जो संकेत मिलते हैं उससे तो यही लगता है कि ‘भारतीयता’ और ‘हिंदुत्व’ को एक दूसरे का समव्यापी पर्याय मानकर ही यह माँग की जाती रही है। शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ की माँग असल में शिक्षा के ‘हिंदुत्वीकरण’ की ही माँग ठहरती है। इस माँग का एक सिरा मिशनरियों के स्कूलों और मदरसों के पाठ्यक्रम से भी जुड़ जा सकता है। सर्वोच्च न्यायलय का इस मामले में एक महत्त्वपूर्ण फैसला भी है। मोटे तौर पर राज्य से अनुदान प्राप्त शिक्षण संस्थान को ही सरकार के अनुमोदन की जरूरत रह जाती है। जो अनुदान न दे, उसके अनुमोदन की परवाह वैसे भी कौन करता है! जब शिक्षा के आधार पर राज्य हमें जीवनयापन की बुनियादी सुविधाएँ देने की स्थिति में नहीं रहे तब उसके द्वारा किसी की शिक्षा को मान्य या अमान्य ही करने से क्या फर्क पड़ता है! लेकिन शिक्षा का मकसद क्या रोजगार उपार्जन में सक्षम बनाने के प्रयोजन से ही सीमित है या जटिल परिस्थितियों में बेहतर सामाजिक और नागरिक निर्णय लेने में सक्षम सामाजिक और नागरिक मन बनाने तक फैला हुआ है? इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। औपनिवेशिक राज्य शिक्षा के मकसद को रोजगार में सक्षम बनाने तक सीमित रखता है। स्वाधीन राज्य शिक्षा के मकसद को जटिल परिस्थितियों में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम सामाजिक और नागरिक मन बनाने तक फैलाने की कोशिश करता है। ऐसा सामजिक और नागरिक मन सिर्फ धर्मनिरपेक्ष शिक्षा ही बना सकती है, धर्म आधारित शिक्षा नहीं। धर्म से संबंधित, विचार विज्ञान और तर्क का विरोध करता रहा है। धर्म से संबंधित विचार और विश्वास को अटूट मान कर मनुष्य उस से चिपका रहता तो आज कहाँ और किस दशा में होता, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। धर्म से संबंधित विचार और विश्वास को अतिक्रमित करता हुआ मनुष्य आगे बढ़ा, तो इस में राज-सत्ता, चाहे वह अपनी घोषणाओं में जितनी भी धर्म निरपेक्ष रही हो, का अधिक योगदान नहीं रहा है। 

असली सत्ता जनता में निहित होती है। जनता समाज बनाकर रहती है। इसलिए असली सत्ता मूल रूप से समाज के पास होती है। समाजों के समवेत से बने राज्य में समाज की सत्ता अंतरित हो जाती है। राज्य का यह दायित्व हो जाता है कि वह समवेत समाज से प्राप्त सत्ता का सही और सार्थक इस्तेमाल करते हुए समवेत समाज के हितों की शांतिपूर्ण रक्षा करे। सत्ता के समाज से राज्य में अंतरित हो जाने से समाज में एक प्रकार का खालीपन बनता है। इस खालीपन के दुष्प्रभाव से समाज को बचाने की सतत चेष्टा राज्य को करनी चाहिए। यह काम सबसे अधिक जनतंत्रात्मक राज्य में ही संभव हो सकता है। जनतंत्र के प्रति व्यावहारिक सम्मान में कमी और वोट के समीकरण में जनतंत्र के उलझकर रह जाने के कारण इस खालीपन के दुष्प्रभाव से समाज को बचाने का काम अधूरा रह जाता है। नतीजा, एक ही राज्य के विभिन्न समाजों में तनाव बना रहता है। इस तनाव को टूट और सहनशीलता की सामान्य सीमा से बाहर नहीं जाने देने का दायित्व राज्य और समाजों का होता है। इस संदर्भ में, राज्य की भूमिका सामाजिक न्यायकर्त्ता के रूप में महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसके लिए राज्य की न्यायिकता को प्रमाणिक आधार संविधान देता है। चूँकि जनतंत्र में संख्या का अपना महत्त्व होता है, इसलिए संख्याबल की दृष्टि से अधिक शक्तिशाली समाज और कमजोर समाज के बीच राज्य किसी प्रकार का कोई भेदभाव न करे, इसका प्रवाधान सत्ता के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप में होता है। समाज के बनाव के कई आधार होते हैं। इन कई आधारों में से कोई एक मुख्य आधार होता है। यह मुख्य आधार उस समाज के अधिकतर सदस्यों के मूल चरित्र का निर्मायक और नियामक होता है। यह दुखद ही है कि ज्ञान-विज्ञान के आज के युग में भी सामाजिकता के लिए ‘हम’ और ‘अन्य’ के रूप में चिह्नित किये जाने के मुख्य आधार का अधिकांश धर्म ही बनाता है। इस पेंच को समझना होगा कि ऐसा क्यों होता है! यदि आर्थिक आधार पर सामाजिकता का बनाव होगा तो संसार के सारे धनवान अल्पसंख्यक हो जायेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि बहुसंख्यक समाज में अल्पसंख्यक समाज पर चढ़ बैठने की तीव्र प्रवणता होती है। अर्थ के आधार पर बने बहुसंख्यक समाज की अंर्निहित प्रवणता के खतरों से अल्पसंख्यक समाज को बचाने, अर्थात गरीब लोगों के दबाव से अमीर लोगों को बचाने के वास्ते यह जरूरी हो जाता है कि ‘हम’ और ‘अन्य’ के रूप में चिह्नित किये जाने के लिए मुख्य आधार के बनाव का निर्मायक और नियामक तत्त्व अर्थ के प्रसंग से तय न होने लगे। तब, ‘हम’ और ‘अन्य’ के रूप में चिह्नित किये जाने के लिए मुख्य आधार के बनाव के लिए धर्म से अधिक विश्वसनीय आधार और क्या हो सकता है? सामाजिकता के बनाव के निर्मायक और नियामक तत्त्वों का मुख्य आधार धर्म बना रहे इसके लिए धनवानों की सत्ता सदैव सक्रिय रहती है। ऐसी सत्ता, एक हाथ से धार्मिक अल्पसंख्यकों को धार्मिक बहुसंख्यकों के किसी भी प्रकार के दबाव से बचाने का आश्वासन देती है और दूसरे हाथ से धार्मिक बहुसंख्यकों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में डर बैठाने के लिए उकसाती भी रहती है। इसमें राज्य सत्ता के द्वारा धर्मनिरपेक्षता का सबसे कुत्सित इस्तेमाल होता है। दुखद है कि भारतीय राज्य सत्ता भी धर्मनिरपेक्षता के इस कुत्सित इस्तेमाल से पूरी तरह बच नहीं पाई है। बल्कि ज्यों-ज्यों भारतीय राज्य में पूँजीवादी रुझानों के समावेश का आग्रह बढ़ता गया त्यों-त्यों धर्मनिरपेक्षता के कुत्सित इस्तेमाल की प्रवृत्ति भी बढ़ती और उजागर होती गई है। राज की धर्मनिरपेक्षता और समाज की धर्मनिरपेक्षता में भी अंतर होता है। धर्म में सत्ता-निरपेक्षता का अभाव राज-सत्ता और समाज-सत्ता दोनों को संकट में डाल देता है। इस संकट के दुष्प्रभाव के चलते सामाजिक साझापन कम होता जाता है।

भयावह यह कि इधर हमारे शासकों के अंतर्मन में जनतंत्र से प्राप्त शक्तियों के बल पर राजतंत्रीय आचरण के प्रति तीव्र आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। राज्य और नागरिक के संवैधानिक संबंध की आत्मीयता में भारी गिरावट आई है। जन के लिए जनतंत्र कवच का काम करता है। कवच आघातों से हमारी रक्षा करता है, अगर हम कवच की रक्षा कर सकें। अभी तो राज-सत्ता खुद इस कवच को धर्म की सत्ता-सापेक्षता की चौकठ पर गिरबी रखने को तत्पर है और इस काम में उसे धन-सत्ता का साथ और निर्देश, दोनों ही मिलता है। जन-सत्ता की सक्रियता के अभाव में चमचम जनतंत्र बुनियादी और सामान्य नागरिक अभिलाषा के पूरी होने की प्रयोजनीयता की दृष्टि से भी बहुत काम का नहीं रह पाता है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया, लेकिन वह उनका व्यक्तिगत धर्म था। बाबर ने हुमायूँ के लिए लिखे वसीयतनामा में दर्ज किया है कि भारत धार्मिक बहुलता से संपन्न देश है, इसलिए सभी धर्म की भावनाओं का ख्याल रखते हुए निष्पक्ष होकर न्याय करना। अशोक ने बौद्ध धर्म को व्यक्तिगत तौर पर अपनाया और बाबर ने निष्पक्ष होकर न्याय करने के महत्त्व को समझा। यह समझ उस समय थी जब न तो ज्ञान, विज्ञान का इतना विकास हुआ था, न मानवाधिकार का प्रसंग आकार में आया था और न ही भारत में धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक जनतंत्र की स्थापना ही हुई थी। आज कुछ लोग यह धारणा फैलाने में लगे हैं कि भारत एक धर्मप्राण देश रहा है। धर्म इसके लिए सबसे बड़ा मूल्य रहा है। धर्मनिरपेक्षता अ-भारतीय अवधारणा है। यह सेकुलरिज्म का अनुवाद मात्र है, भारतीय अनुभव नहीं। यह सच है कि भारत धर्मप्राण देश है लेकिन सच यह भी है कि जब पूरी दुनिया के धर्मों में अपेक्षाकृत अधिक कट्टरता थी, तब भी धर्म को लेकर भारतीय समाज में उदारता थी। धर्मनिरपेक्षता का अनुभव दुनिया को अप्रतिम भारतीय देन है। आज विज्ञान और मानवीय विकास के इस युग में जब पूरी दुनिया समानता और स्वतंत्रता का आश्वासन देनेवाले जनतंत्र को सामाजिक व्यवस्था के मूलाधार के रूप में बरत रही है तब धुरंधर लोग समाज को धर्म के जंजाल में नये सिरे फाँसाने के कूट उद्यम में लगे हुए हैं। कूट उद्यम को बल मिलता है धर्म की सत्ता-सापेक्षता से। 

अशोक के बौद्ध और बाबर के इसलामिक संदर्भ के साथ-साथ हिंदु संदर्भ से भी यह बात पुष्ट होती है। हिंदु जीवन में चार पुरुषार्थों अर्थात जीवन के चार महान लक्ष्यों की बड़ी चर्चा होती है। ये चार पुरुषार्थ या महान लक्ष्य हैं--- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनके पारस्परिक संबंध के बारे में बताया जाता है कि वही धर्म है जो अर्थ के अर्जन में सहायक होता है; वही अर्थ है जो काम की संतुष्टि में सहायक होता है; वही काम है जो मोक्ष लाभ करने में सहायक होता है। मोक्ष परम मूल्य है, सबसे बड़ा पुरुषार्थ। धर्म सबसे शुरुआती पुरुषार्थ है। मिलकर चलने की बात वेद में भी कही गई है। चरैवेति, चरैवेति भारतीय जीवन के अन्य पक्षों के साथ-साथ इसके धर्म की गत्यात्मकता को भी प्रतिध्वनित करता है। जब विभिन्न धर्म अपने आज के रूप में नहीं थे तब भी धर्म को लेकर भारतीय मानस बहुत गतिशील था। यक्ष ने यह भी तो पूछा था धर्मराज से कि क्या है धर्म। इस सवाल का जवाब उतना ही आसान होता जितनी आसानी से आज के धर्मधुरंधर इसका जवाब दे देते हैं, तब यह प्रश्न यक्ष-प्रश्न बनता ही क्यों? धर्म बहुत ही जटिल मामला है। इसे किसी एक ही ओर से समझने का दुराग्रह हमें खतरे में डालता है। मूल बात यह है कि एक घाट पर बँध कर धर्म गतिशील नहीं रह सकता है। गतिशीलता के बिना धर्म जीवित नहीं रह सकता है। धर्म अपने से निरपेक्ष रहकर ही गतिशील रह सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता धर्म के प्राणवंत बने रहने की भी अनिवार्य शर्त है। इस तथ्य को अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में भारतीय राज और समाज दोनों ने हासिल कर लिया था। न सिर्फ हासिल कर लिया था बल्कि अपने अस्तित्व के लिए इसे अपनी संवेदना का अंग बना भी लिया था। बावजूद इसके धर्म सत्ता-निरपेक्ष नहीं रहा, यह भी सच है। धर्म के सत्ता-निरपेक्ष नहीं रहने के कारण ही भारतीय समाज अंदर से विखंडित समाज बनकर रह गया। 

धर्म की सत्ता-सापेक्षता धर्म को पुरोहितवाद के सांस्थानिक संकोच की तरफ ले जाती है। धर्म की सत्ता-निरपेक्षता धर्म को भक्ति के सामाजिक विस्तार की तरफ ले जाती है। भक्ति धर्म की सत्ता-सापेक्षता का विस्तार नहीं है, बल्कि भक्ति धर्म का सत्ता-निरपेक्ष विकल्प है। इसीलिए भक्ति तो संतन को कहा सीकरी सौं काम कह कर सत्ता से अपने को दूर रखने की लगातार कोशिश करती रहती है, लेकिन पुरोहितवाद से सक्षम धर्म ऐसा कह कर अपने को सत्ता से दूर रखने की बात भी नहीं सोचता, बल्कि सत्ता के बिना तो वह जी ही नहीं सकता! स्पष्ट है कि राजनीतिक-सत्ता और धर्म-सत्ता ने एक दूसरे के साथ मिलकर समाज-सत्ता का दुरुपयोग किया है। इस दुरुपयोग का अपना इतिहास रहा है। सच्चे साधु-संतों और साहित्यिकों ने उस ऐतिहासिक विकासक्रम में इस दुरुपयोग को समझा भी है और उसके प्रति सावधान भी किया है। इस सावधान करने का भी अपना इतिहास है। बहुत विस्तार में जाने की गुंजाइश यहाँ नहीं है, फिर भी प्रसंगवश कुछ की चर्चा तो की ही जा सकती है। इससे साधु-संतों और साहित्यिकों की चिंता के मूल केंद्र और उस समय के सामाजिक संबंध में धार्मिक परिप्रेक्ष्य से बनाये जा रहे मारक तनाव का भी पता चलता है। हम जानते हैं कि धर्म और भक्ति एक ही नहीं है, फिर भी ध्यान में रखने की बात यह है कि ये कवि उस अर्थ में अ-धार्मिक नहीं थे। आज के किसी भी स्वनामधन्य धार्मिकों से अधिक धार्मिक थे। लेकिन उनका अपना धर्म उनके निर्विशिष्ट मनुष्य बनने में कहीं से बाधक नहीं बन रहा था। बल्कि निज धर्म के ढाँचे की कोष्ठबद्धता से बाहर निकलकर उनके मनुष्यतर बनने की प्रेरणा बन रहा था। गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, दादूदयाल, रज्जबजी आदि के भक्ति संदर्भ से हम समझ सकते हैं कि सामाजिक एकता के संदर्भ में धर्मनिरपेक्ष होकर किस प्रकार धार्मिक हुआ जा सकता है। धर्म मूलत: उस लोक का मामला माना जाता है, लेकिन इन कवियों के यहाँ धर्म के ये भक्ति संदर्भ पूर्णत: इसी लोक से संबंधित है। यह स्थिति उस राजतंत्र में थी जिस राजतंत्र में देश के शासन की बागडोर उन मुसलमान शासकों के हाथ में थी, जिन्हें आज कट्टर और क्रूर बताया जाता है। इस पूरे प्रकरण में एक बात की ओर ध्यान गये बिना नहीं रहता है कि उस समय भी सवर्ण कवियों की वाणी में अन्य उदात्त चेतना चाहे जितनी हो लेकिन हिंदू मुसलमान संबंधों में मधुरता के लिए राम और रहीम के एक होने की बात या तो है ही नहीं या बिल्कुल अ-प्रभावी है। यह तथ्य तब और परेशान करता है जब हम आज के भारतीय राज्य में जनतंत्र की उपस्थिति में भी लक्षित करते हैं कि हिंदू मुसलमान के बीच कटुता पैदा करनेवालों में निर्णायक स्वर सवर्णों का ही दिखता है। क्या यह महज संयोग है? या इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक संरचना के धर्मेतर प्रसंगों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है?

धर्म और सत्ता दोनों कहती है कि मेरे शरण में आ जाओ, निःशर्त्त समर्पण ही सुख और समृद्धि का रास्ता है। आज यही बात बाजार की सत्ता भी कहती है। मनुष्य से समर्पण करवाने की धर्म, राज्य और बाजार की संयुक्त इच्छा इनके संश्रय की नाभिकीय बिंदु है।

सामाजिक विकास और साहित्य का संदर्भ


सामाजिक भौतिक और संसाधनिक विकास का क्रम जिस तेजी से आगे बढ़ा है वह चमत्कृत कर देनेवाला है। आज का मनुष्य भौतिक रूप से जितना संपन्न और समृद्ध है उतना पहले कभी नहीं था। चिकित्सा विज्ञान से ले कर ज्ञान का हर क्षेत्र आज पहले से अधिक विकसित है। मनोरंजन के भी एक-से-एक साधन और तौर-तरीके विकसित हो गये हैं। अनुभूति के भी एक-से-एक साधन विकसित हो गये हैं। ज्ञान और मनोरंजन के अतिविकसित साधनवाले इस उत्तर-आधुनिक होते समय में अब साहित्य की क्या जरूरत? और किसे जरूरत है? इस क्या और किसे का उत्तर ढूढें तो तुरंत पता चलेगा कि एक तरफ यह सचाई है तो दूसरी तरफ इस सचाई का एक और चेहरा है जो अति भयानक है। इसका कारण यह है कि ज्ञान-विज्ञान-संसाधन जितनी तीब्रता से विकसित हुए हैं उतनी तत्परता से वितरित नहीं हो पाये हैं। विकास का चेहरा विषमता की आँच से झुलसा हुआ है। विकास के बड़े-बड़े आंकड़े पढनेवाले लोग भी विकास के इस झुलसे हुए चेहरे को देखकर डर जाते हैं। यह डर उन्हें विषमता बढ़ानेवाली प्रवृत्ति को रोकने के लिए बहुत उद्योगी या तत्पर नहीं बनाता है तो इसका कारण यह नहीं कि उनका डर नकली या नाटक है बल्कि इसका कारण उनका अपना वर्ग-चरित्र है। विकसित होने के बावजूद विषम समाज में जीने के लिए बाध्य है आज का मनुष्य। इसलिए आज का मनुष्य पहले के मनुष्य से अधिक संपन्न होने के बावजूद पहले के मनुष्य से कहीं अधिक दुखी और विपन्न है। संपन्नता उसके दुख को कम करने में किसी भी प्रकार से मददगार नहीं हो पा रही है। विपन्नता उसके जीवन का स्थाई भाव है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस दुख में वह बिल्कुल अकेला है। कोई उसका दुख बाँटने के लिए तैयार नहीं है। उसके दुख का कारण कस्तूरी की तरह उसीके नाभि-कुंड में विकसित होता रहता है। सुत-वित्त-नारी/नर-भवन-परिवार, सब बेकार। कोई उसके अकेलेपन को तोड़ पाने में उसका सहायक नहीं हो पाता है। इस अकेले पड़ते मनुष्य के संदर्भ में आज साहित्य की भूमिका परीक्षणीय है। उसे इस निरंतर अकेले पड़ते जा रहे हबोडकार मनुष्य से संवाद करना, उसका साथी बनना, उसकी आहत भावनाओं का आदर करना और अंतत: उसे अकेलेपन की अंधगुहा से बाहर निकालने की युक्ति करना है। यानी एक बेहतर साथी के रूप में साहित्य की जरूरत बनी हुई है। इस भूमिका के संदर्भ में ही उन सारे सवालों के उत्तर तलाशे जाने चाहिए जिनका संबंध साहित्य से है।

साहित्य का अपनी भाषा से गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हुआ करता है। अर्थात साहित्य का अपना सुनिर्दिष्ट भाषिक-समाज हुआ करता है। इस भाषिक-समाज को एक बनाये रखनेवाले सूत्र का एक सिरा उस समाज के सबसे निचले स्तर तक जाता है तो दूसरा सिरा सबसे ऊपर के स्तर तक भी जाता है। वृहत्तर मानव आबादी की चिंता करते हुए भी उसे उसकी भी उतनी ही चिंता करनी पड़ती है जिसके तात्कालिक हितों के खिलाफ साहित्य अपना संवेदनात्मक विस्तार सिरजता है। वर्ग साहित्य तात्कालिक दृष्टि से भले अधिक लोक हितकारी प्रतीत होता हो लेकिन अंतत: लोक हित के अपने महत्त्वपूर्ण उद्देश्य में सफल होना उसके लिए असंभव रहा है। वर्ग हित साधने के लिए भी साहित्य को वर्गातीत होना पड़ता है। एक अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय मान-समाज के परिगठन के लिए इस रणनीति के मर्म को समझा जाना चाहिए। तातपर्य यह कि साहित्य को अपना बाहरी वितान सबके लिए खुला रखना चाहिए। यदि वर्गबोध को साहित्य के लिए अनिवार्य माना लिया जाये तो बड़े और ख्यातिनामा साहित्यकार के साहित्य के बड़प्पन के मर्म के समझ ही नहीं पाएंगे। कालिदास से लेकर जयदेव, विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, जायसी, प्रेमचंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, निराला, प्रसाद आदि के साहित्य का वर्ग-पाठ किस प्रकार तैयार किया जा सकेगा? मुझे लगता है बाद के प्रगतिशील हिंदी साहित्य-विचारकों ने इस मामले में अपेक्षित सावधानी नहीं बरती। प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकार जिस भाषा में हो गये उस भाषा के साहित्य में इस दुर्विपाक का घटित होना विस्मयकारी भी है और दुखद भी। प्रेमचंद की सहानुभूति एक व्यक्ति और विचारक के रूप में चाहे होरी के प्रति ही क्यों न रही हो लेकिन एक उपन्यासकार के रूप में रायसाहब समेत सभी पात्रों के प्रति उनकी सचेष्टता का संतुलन गजब है। एक बात की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान जाना चाहिए कि प्रगतिशीलता के नाम पर हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा आग्रह रहा है, शोर की हद तक, और सच्चे अर्थों में हिंदी समाज में सबसे अधिक अनाग्रह भी इसी प्रगतिशीलता के नाम पर रहा है। भाषा-समाज और भाषा-साहित्य के इस भयंकर अंतर्विरोध का सबसे घातक नतीजा यह देखने में आ रहा है कि इस पूरे प्रकरण में साहित्य का पाठक ही उससे बिदक गया। इधर गंभीरता से ध्यान देना होगा।

आज के भाषा-समाज पर ध्यान देने से जो बात सबसे पहले समझ में आती है वह यह कि आज भाषिक -समाज का स्वरूप काफी बदल चुका है। आज का पढ़ा-लिखा समाज अगर बहुभाषी नहीं भी हो गया हो तो उसके द्विभाषी होने में क्या संदेह है। यहीं पर इस बात पर विचार करना प्रासंगिक होगा कि भाषा और साहित्य का आपसी संबंध क्या होता है। क्या अंग्रेजी में हिंदी साहित्य का लेखन संभव नहीं है, यह भी कि क्या हिंदी में अंग्रेजी का साहित्य लिखना संभव है कि नहीं? यह सही है कि साहित्य का संबंध भाषा से बहुत गहरा है तथापि साहित्य को साहित्य बनानेवाले तत्त्व का नाम भावना, संवेदना, विचार, करूणा, आनंद, स्वप्न आदि से जुड़ता है। तो क्या हुआ? सामाज द्विभाषी हो या बहुभाषी लेकिन उसके सदस्यों की मूलभाषा (जरूरी नहीं कि मातृभाषा ही हो) अर्थात वह भाषा जिस भाषा के माहैल में उसके सामाजिक-जीवन का अधिकांश कारोबार संपन्न करता है, आत्मस्फूर्त ढंग से प्रेम करता है, घृणा करता है, क्रोध करता है, विरोध करता है, रोता और हंसता है वह एक ही हो सकती है। सहित्य के अलावे संस्कार से भी भाषा का बहुत गहरा लगाव हुआ करता है। सामान्यत: यकीन करना कठिन है कि तमाम कोशिशों के बावजूद फासीवाद और सांप्रदायिकता से लड़ना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है कि उसके लिए हमारे पास कोई अनुभव-सिद्ध देशज शब्द लोक में प्रचलित नहीं है जिसका इस्तेमाल सार्थक ढंग से किया जा सकता, नतीजा लोगों की नागरिक-संवेदना से इस समस्या को जोड़ने में हम नाकाम रहते आये हैं। अज्ञेय जब बर्त्तन के रूपक से शब्द के घिसने, मुलम्मा छूट जाने और देवता के कूच कर जाने की बात कहते हैं तो उसका व्यापक अर्थ है। उस व्यापक अर्थ का एक पहलू यह भी है कि अधिक व्यवहार से शब्द सिर्फ घिसते ही नहीं हैं बल्कि अधिक सुग्राह्य, संवेद्य, संप्रेष्य, विश्वसनीय और आत्मीय भी बनते हैं। फिर भी इस सवाल पर विचार करलेने का इतना भर कारण है कि आज हिंदी भाषा-साहित्य में हिंदी भाषा-समाज की कविता कम ही लिखी जा रही है। अन्य विधाओं की भी हालत थोड़ी बेहतर हो तो हो। साथ ही एक विचार यह भी सामने आ रहा है कि अंग्रेजी में लिखे साहित्य को भी भारतीय साहित्य क्यों नहीं माना जाये? इस तरह का विचार करनेवाले भारतीय का सहारा लेते हैं। कारण यह कि भारतीय भाषा नाम की कोई एक भाषा तो है नहीं इसलिए किसी एक भाषा-समाज के संदर्भ से साहित्य को जोड़कर देखने का प्रयास बेमानी हो जाता है। प्रत्येक भाषा का अपना भाषा-समाज होता ही है चाहे वह जैसा भी होता हो। जिस भाषा का कोई समाज नहीं होता है उस भाषा के अस्तित्व का आधार संस्थानिक होता है। भारत में अंग्रेजी संस्थानिक भाषा है सामाजिक भाषा नहीं। यह याद रखना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि भारत के संस्थानों का आर्थिक-बौद्धिक प्रभुत्व जिनके हाथ में है उनका अपना आर्थिक-बौद्धिक स्वार्थ अंग्रेजी के माध्यम से संतुष्ट होता है और उनके भीतर पक रही खिचड़ी की गंध बाहरवालों को कम ही लगती है। और लग भी जाए तो उनके पास काई चारा नहीं होता। जिन साहित्यकारों को वे निर्विवाद रूप से महान और विश्व स्तरीय बताते हुए थकते नहीं उनके बारे में कोई रूशदी कुछ भी कहकर निकल जाए वे हल्की-सी भी चुनौती नहीं दे पाते हैं। विडंबना यह कि हम उसी रूशदी की अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता सुनिश्चत करने के लिए सबसे अधिक आतुर होते हैं। जब कि उसकी अभिव्यिक्त की सार्थकता और सदाशयता पर विचार करने का न तो कारगर अधिकार रखते हैं और न तो सामर्थ्य ही रखते हैं। हम तो इसी बात पर ढेर हो जाते हैं कि राजकमल झा को करोड़ों की रॉयल्टी मिली है। अब यह देखने की फुर्सत किसे है कि राजकमल झा ने भला लिखा क्या है। कुल मिलाकर यह कि भाषा से विच्छिन्नता अंतत: समाज से विच्छिन्नता का ही आधार प्रस्तुत करती है। विश्व-भाषा का मुहावरा सुनने में बेहतर है लेकिन उसमें अंतर्निहित चालाकी को समझना ही चाहिए।

इसी प्रकार स्त्री-साहित्य के विमर्श को भी समझना होगा। स्त्री-साहित्य का उद्देश्य सामान्य अर्थात निर्विशिष्ट साहित्य के उद्देश्य से कतई भिन्न नहीं हो सकता है। यदि स्त्री-साहित्य कुछ अलग चीज हो तो बाकी बचे साहित्य को भी पुरूष साहित्य ही मानना होगा। असल बात यह है कि स्त्री-साहित्य हो या दलित साहित्य या प्रगतिशील साहित्य या सिर्फ साहित्य वह एक दूसरे का दुश्मन नहीं हो सकता है। एक दूसरे के पूरक भले हों। विडंबना यह कि स्त्री और दलित साहित्य के पैरोकार अक्सर शिकायत करते हैं कि बिना स्त्री और दलित हुए स्त्री और दलित पीड़ा को कोई समझ ही नहीं सकता है। हो सकता है यह बात बिल्कुल ही ठीक हो। लेकिन तब उन पर यह आरोप चस्पा नहीं किया जा सकता है कि वह स्त्री और दलित विरोधी है, समझने में अक्षमता उनके सारे पाप, अगर हों तो, को धेाकर रख देगी । लेकिन संभवत: ऐसा है नहीं। कुछ लेखकों के लेखन में सचमुच स्त्री और दलित विरोधी रूझान पाये जा सकते हैं। यह विरोध सीधे-सीधे नहीं हुआ करता है बल्कि किसी के पक्ष में अधिक झुकाव से महसूस किया जा सकता है। जरूरी नहीं कि ये लेखक सामान्यत: स्वयं स्त्री या दलित नहीं ही हों। रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी (माटी पानी ) का कोई पात्र अगर सामाजिक हैसियत बदल जाने पर दलित विरोधी आचरण कर सकता है तो उसका आचरण विश्वसनीय इसलिए पाया जाता है कि समाज में इसके उदाहरण मिल जाते हैं। इस प्रकार के आचरण किसी में भी पाये जा सकते हैं, लेखक में भी ।

आधुनिक हिंदी साहित्य की शुरूआत से लेकर आज तक के समय में बहुत बदलाव घटित हो चुका है। यह बदलाव सामाजिक संरचना के ऊपरी स्तर से लेकर उत्पादन की शैली और लोगों की हैसियत में भी आया है। ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्र में बदलाव आया है। राजनीतिक संरचना में आया बदलाव तो और भी भयंकर है। अर्थ-संबंध का स्वरूप भी बहुत तेजी से बदला है। कला के विभिन्न माध्यमों की क्षमता और शैली में भी परिवर्तन आया है। पिछले बीस-पच्चीस साल में यह परिवर्तन और अधिक तीव्रता से घटित हुआ है। इस परिवर्तन का थोड़ा-सा प्रभाव थोड़े-से लोगों के लिए सकारात्मक रहा है तो बहुत सारे लोगों के लिए नकारात्मक ही रहा है। साहित्य ने इस थोड़े और बहुत के ऊपर पड़नेवाले प्रभाव को कैसे अभिव्यक्त किया है और इस अभिव्यिक्त के क्रम में खुद कितना परिवर्तित हुआ है इसका आकलन करना निश्चय ही दिलचस्प होगा। वास्तव में किसी भी समय में समकालीनता की पहचान निर्विवाद नहीं हुआ करती है। फिर आज न तो कोई प्रकट काव्यांदोलन ही है और न किसी मतवाद का कोई गहरा सामूहिक या सामाजिक असर ही। कुछ आलोचकों के निजी आग्रह भले ही कभी-कभी सक्रिय प्रतीत होते हों पर वह कोई मान्य काव्यसूत्र की रचना करने में सफल हो ऱहे हों ऐसा नहीं है। इसे कविता के लिए अच्छा माना भी जा सकता है और नहीं भी। यदि कविता इतनी स्वायत्त हो चुकी है कि उसे बाहर से निदेशित करना अब संभव नहीं ऱहा इसलिए दिनों-दिन कविता से किसी खास प्रकार की मांग करने की जरूरत कोई महसूस नहीं कर ऱहा अर्थात किसी बाहरी अनुशासन के हस्तक्षेप की कोई प्रासंगिकता नहीं बची तब तो ठीक है लेकिन यदि कविता में खुद किसी प्रकार की सामाजिक उपादेयता नहीं बचने के कारण या कविता से किसी प्रकार का आश्वासन न पाने के कारण कविता किसी वैचारिक उदासीनता के तात्कालिक भंवर में पड़ी है तो यह हम जैसे लोगों के लिए चिंता का कारण है। इस मामले में मुझे लगता है थोड़ी-थोड़ी सच्चाई दोनों प्रकार की सोच में है। कविता अपनी इस स्थिति से बेखबर नहीं है। आज हर समाज-सचेत हिंदी कवि इस इस बात को शिद्दत से महसूस कर ऱहा है। न सिर्फ महसूस कर ऱहा है बल्कि उसकी काव्याभिव्यिक्तयों में भी इसका प्रमाण दे रहा है। यहां आज की समकालीन हिंदी कविता की एक सामान्य चिंता को हम रेखांकित कर सकते हैं। निरर्थकताबोध के स्वर का इस या उस प्रकार से हिंदी कविता में प्रकट होना इस खास स्थिति को स्पष्ट करता है। राजेश जोशी, अरुणकमल जैसे कवियों की कविताओं में भी इसे बड़ी असानी रेखांकित किया जा सकता है। 
समकालीन समाज जिन संकटों से जूझ रहा है वे सारे संकट किसी-न-किसी रुप में समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियाँ भी निर्धारित कर रही हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों की तलाश करने का प्रत्येक उद्यम समाज के संदर्भों के बीच से ही अपना रास्ता बनाता है या आकार पाता है। अब अगर समकालीन समाज के संकटों पर ध्यान दिया जाये तो कुछ बातें निम्नलिखित रुप में उभर कर हमारे सामने आती हैं।
1) सार्वजनिक जीवन में जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान का अभाव
2) भ्रष्टाचार का नंगा स्वरुप और उसकी सामाजिक स्वीकृति का बनता हुआ माहैाल
3) जनांदोलनों या वास्तविक जनमुखी राजनीतिक पहल का घनघोर अभाव
4) व्यापक बेरोजगारी और शिक्षित समाज में घर करती सामाजिक उदासीनता
5) शिक्षा संसाधनों का अभाव और उपलब्ध संसाधनों का निर्मम दुरुपयोग
6) समाज का बचा हुआ सामंती मनोभाव और बरजोरी या बलगेंग का रवैया
7) समाज और परिवार में स्त्रियों , बच्चों ,खासकर बालिकाओं की दुर्दशा और बढती असुरक्षा
8) जानलेवा गरीबी, मंहगाई, जीवनयापन के संसाधनों और आय वृद्धि की संभावनाओं का अभाव
9) असंतुलित विकास की अंधी दौड़ और उसके कारण उत्पन्न होनेवाला पर्यावरण संकट
10) सांप्रदायिकता , जातिवाद और फासीवाद के बढते खतरों के साथ उन्माद का स्थाईभाव बनते जाना
11) दिनों दिन पारस्परिक सम्मान के भाव की कमी और अवहेलना भाव में हो रही वृद्धि
12) परदुखकातरता का बढता हुआ अभाव और परपीड़कता की बढती हुई प्रवृत्ति
13) घटती हुई सहिष्णुता और बढती हुई आक्रामकता में शौर्य की बनती प्रवृत्ति
14) सामाजिक संबंधों में बढ़ती हुई दरार की बाढ़ को रोकने की वास्तविक प्रक्रिया का अभाव
15) संपन्नता में विपन्नता की स्थिति और बढती हुई बेलगाम भयावह विषमता आदि

भारतीय समाजों का भूगोल भी बहुत बड़ा है और इतिहास भी। हिंदी समाजों और भाषा में इसके अनुभव युगों से संचित होते रहे हैं। हिंदी समाज और भाषा एक अर्थ में भारतीय स्मृति और संस्कृति का केंद्रीय कोष है। इसलिए उपरोक्त समस्याओं से जूझते हुए भी इस समाज में सिर्फ हताशा या पराजयबोध ही नहीं है बल्कि सहज उल्लास भी है और धैर्य भी है और है एक अद्भूत तथा स्पृहणीय जीवनशैली। एक भिन्न प्रकार का जीवन-बोध। समकालीन हिंदी कविता में समस्याओं से जूझते हुए इस विस्तृत भैगोलिक-ऐतिहासिक समाज की पीड़ाओं की काव्यात्मक अभिव्यिक्त की प्रचुरता है। इसे किसी वैचारिक दर्शन से जोड़कर भी देखा जा सकता है या सीधे सामाजिक परिप्रेक्ष्य के हवाले से भी समझा जा सकता है। लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस दुष्चक्र में फँसे समाज के साथ हिंदी की समकालीन कविता खड़ी है और पूरी ताकत, वह जितनी भी हो, के साथ खड़ी है। कुछ ऋषिनुमा लोग और भी हैं जो हिंदी कविता के पथ के दावेदार हैं और जो कालजयी कविता लिखने के व्यापक कारोबार में व्योम-व्यस्त हैं। उनकी कविताएँ कालजयी चाहे जितनी हो काल-सिद्ध और काल-बिद्ध तो बिल्कुल ही नहीं है। इसलिए ये चाहे तुमार जितना बांधें समकालीन हिंदी कविता की सामान्य प्रवृत्तियों को समझने में सहायक तो बिल्कुल ही नहीं हैं। यदि आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रमाण मानें (न मानने की कोई आवश्यकता नहीं दीखती है) तो किसी भी समय के साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियों को पहचानने का सबसे प्रामाणिक ढंग होता है जनता की चित्तवृत्तियों आ रहे बदलाव को स्वर देनेवाले साहित्य-रुपों का संगठित अध्ययन किया जाये। समकालीन हिंदी कविता की सामान्य प्रवृत्तियों को समझने के लिए भी इससे बड़ा, प्रामाणिक और महत्वपूर्ण कोई दूसरा सूत्र नहीं हो सकता है। हां, विभिन्न समकालीन हिंदी कवियों की कविताओं में इसके काव्यात्मक निभाव का स्वरुप अपना और अनोखा है।

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सादर, प्रफुल्ल कोलख्यान