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मैं आप से बात करना चाहता हूँ

मैं आप से बात करना चाहता हूँ

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मैं आप से बात करना चाहता हूँ

जानता हूँ, फिलहाल वक्त नहीं है आपके पास

इसलिए बात करना तो बहुत ही मुश्किल है इन दिनों

मुश्किल है बात करना इसलिए बता भर देना चाहता हूँ

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

इस सिकोड़ का रिश्ता मेरे इलाके में

रह रह कर पेट में उठनेवाले ममोड़ से कितना और कैसा है

कह नहीं सकता लेकिन, मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

इंटरनेशनल या ग्लोबल या ऐसे ही किसी विस्तार से

डर लगने लगा है मन, मन बहुत डर लगने लगा है

न याद करूँ झारखंड को, तो गुनाह है मकम्मल* --

फिलवक्त क्या कहूँ, हूँ बंगाल, पश्चिम बंगाल में हूँ 

जी हाँ, आराम से ही हूँ, जी आराम से हूँ फिलवक्त

जानता हूँ इतना ही नहीं है भारत, 

मन णणिपुर हुआ जा रहा है।*

मेरा मन तो अब मिथिला तक सिमटकर रह जा रहा है

बहुत जोर मारकर भी बस बचे हुए बिहार तक पहुँच पा रहा है

उससे आगे नहीं जा पा रहा है, बहुत पुचकारने के बावजूद

इसे कविता न समझें, आप के पास बेहतरीन कविताएं हैं

इसे बस एक गृहस्थ की हताशा और अनास्था समझ लें

जानता हूँ, आप के पास आशा और आस्था के बेहतरीन काऱण हैं

जानता हूँ, बेहतरीन काऱण हैं कि फिलहाल वक्त नहीं है आपके पास

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

बहुत ही भयानक होता है मन का सिकोड़

और दर्दनाक भी इस पर बात करना

न बताना बहुत ही खतरनाक, इसलिए बता रहा हूँ

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है।

जानता हूँ इतना ही नहीं है भारत,

मन मणणिपुर हुआ जा रहा है।*

(*थोड़े से संशोधन, संपादन के बाद)

महज इत्तिफाक नहीं

मुफलिस हूँ, सच इतना भी तो खौफनाक नहीं 
नजर-ए-हाजिर में मुकम्मल यह दर्दनाक नहीं


नजरशनाशी है मुझ में हादसा हौलनाक नहीं
तेरी नजर सलामत शहर में अब उश्शाक नहीं


ये कविता है मेरी जान जज्वात का पोशाक नहीं 
जिंदगी अपना सुख दुख खोलती है मजाक नही


गमगीन है कि मादरे-वतन में उसका रज्जाक नहीं 
इल्जाम हमारी पीढ़ी पर वह महज इत्तिफाक नहीं

बेजार रहे कोई, है दिल उसका अब मुश्ताक नहीं
इस चमन की रौशनी, हाल पर उसके अवाक नहीं 

और क्या है

घायल कौम की जिंदगी में अपाहिज संभावनाओं का दौर क्या है
सियासत में शिकस्त मुल्क की यह कथा यह व्यथा और क्या है

हुक्मरान होगा

कुछ हुस्न-ओ-इश्क की शरारत कुछ समाजी शराफत ने परेशान किया होगा
कुछ टूटे हुए ख्वाब कुछ दरपेश हकीकत ने इस तरह से लहुलुहान किया होगा

रूह में समाकर हँसता है जो हरा जख्म इस तरह से किसी हुक्मरान ने दिया होगा
ख्वाबों ख्वाहिशों की खाल दिखे जहाँ टंगी किसी ने मालिक के दालान को दिया होगा

मेरी कुछ कविताएँ

अपनी कविताओं पर बात करना, बहुत अच्छा नहीं लगता है। मुझे पता है कि मैं कवि नहीं बन पाया हूँ, लेकिन अपनी कविताओं के अलक्षित रह जाने का मुझे भी बहुत दर्द है! इसी दर्द के कारण आलोचकों से मेरी भी लगभग वही शिकायत है, जो आम तौर पर कवियों की होती है। मैं मानता हूँ कि आलोचकों से किसी भी तरह की शिकायत का न तो मुझे हक है और न यह मुझे शोभता है। फिर! कुछ कविताओं के लिंक दे रहा हूँ कि क्या पता शायद किसी को अच्छी लग ही जाये!  अच्छी नहीं लगने पर भी जो अपनी राय देंगे, मैं उनके प्रति सदा आभारी रहूँगा…


बच्चा उदास है.pdf




तीन कविताएँ


रात की अंतिम गाड़ी के पीछे

सिर्फ घड़ी के भरोसे नहीं
चाहे कोई कितनी भी सावधानी बरते
बार-बार देखे घड़ी की ओर
पहलू बदले बार-बार
लेकिन कुछ औपचारिकताएँ तो ऐसी होती ही हैं कि
आदमी चाहकर भी समय का पाबंद नहीं रह पाता है
कभी इस भरोसे में कि
आखिर गाड़ियाँ भी तो चला ही करती है लेट-लतीफ
कभी इस चक्कर में कि
वह शायद इसी तरह से अपने को संजीदा साबित कर सके

रात की अंतिम गाड़ी के पीछे की भुकभुकाती लाल बत्ती जब धीरे-धीरे
पुतलियों से ओझल होती जा रही हो 
ठीक उस समय कितना असहाय होता है
प्लेटफॉर्म पर खड़ा यात्री, स्तब्ध, बेचैन और घबराया हुआ -- हक्का-बक्का
फिर आहिस्ते-आहिस्ते नीहारना शुरू करता है आस-पास की चीजों को
झाड़ियों और दरख्तों को कुत्तों को भीखमंगों को खाली पड़े खोखों को
केला के छिलकों को चाय के मृदभांड को 
लहराने के बाद थककर सो गये पताकों को
मरी-मरी-सी बिखरी हुई रोशनी में जड़ हो चुके स्टेशन के नामपट्ट को
हर उस चीज को जिससे पहले कभी इस रूप में मिला ही न हो तब
जब गंतव्य तक ले जानेवाली गाड़ियों के आने का
और बावजूद भीड़ के उस पर चढ़ सकने का भरोसा बाकी हो

थोड़ी देर से ही सही लेकिन अंतत: हारकर शुरू होती है तलाश
अपने ही तरह के छुटे हुए यात्रियों की
विश्वास और अविश्वास के बीच झूलते हुए
अपने अकेलेपन से लड़ता हुआ प्लेटफॉर्म पर छुटा हुआ  यात्री
छुटी हुई दुनिया को परिचय के वृत्त में लेने की व्याकुलता से गुजरता है
बढ़ती जाती है व्याकुलता जितनी तेज रफ्तार
उतनी ही तेजी से आदमी रचने लगता है अपने लिए सुरक्षा का नया विस्तार
चाहे जिस सूरत से भी हो --
प्रतीक्षा की घड़ी बिताने के लिए 
अगली यात्रा की सुरक्षा के लिए 
आदमी सिर्फ घड़ी के भरोसे बैठा नहीं रहता है
भरोसा चाहे धरती की ही तरह क्यों न फैला हो उसके आस-पास

एक दुर्लभ दृश्य   

सचमुच एक दुर्लभ दृश्य है स्तनपान कराती हुई माता को देखना
जब मैंने आर्टगैलरी में एक ऐसी ही पेंटिंग पर मुग्ध
होते विदेशी को देखा तो महसूस किया

ऐसे दुर्लभ दृश्य आर्टगैलरी में ही दीखते हैं अब
मैंने याद करना चाहा पिछली बार
स्तनपान कराती हुई किसी माँ को मैंने कब देखा था--
मैं शर्मिंदा हूँ महाशय कि मुझे कुछ भी याद नहीं
मैं लौटकर फिर पेंटिंग के पास गया और गौर से देखा उस माँ का चेहरा
काली, मटमैली, फटी हुई साड़ी, पसीने से सराबोर 
दमकती हुई आभा के बीच
माँ का खिला हुआ  चेहरा
अद्भुत है कि 
-- सच को कितने करीब से और रंगे हाथ पकड़ा है पेंटर ने
-- सजी-धजी माँ  की गोद से कैसे बचाया इस नौनिहाल को पेंटर ने
उस प्रणम्य पेंटर के बारे में जानना चाहा तो 
सिर्फ इतना ही पता चल पाया कि
इस पेंटर की जननी माँ भागलपुर के दंगे में मारी गयी थी
उसके साथ बलात्कार हुआ था
घर से दस लग्गे की दूरी पर उसकी लाश पड़ी मिली थी
पास में ही यह पेंटर नवजात पड़ा मिला था
बस इतना ही और वह भी किंवदंती
क्योंकि सरकारी रिकार्ड से इसकी पुष्टि कभी नहीं हो पायी
अतिरिक्त रूप से यह बताया गया कि बाबूजी यह फिलहाल बिकाऊ नहीं है
वह रहमदिल अमेरिकी सैलानी इसे किसी भी कीमत पर खरीदना चाहता है
उसके पास सरकारी कागज है, उसकी खरीद से होनेवाली आय कर-मुक्त है
फिर भी यह दृश्य कम-से-कम इस समय बिकाऊ नहीं है
इससे अधिक कुछ जानना हो तो
ईश्वर जिसके नाम पर दंगे हुए थे वह या
खुद यह पेंटिंग ही आपकी कुछ मदद करे तो करे

हमें जिंदा रहना है
       दुख पर काबू पाने के लिए

रात के दस बजे हैं
मैं दाल में नमक की स्थिति पर आत्म-संघर्ष कर रहा हूँ
दूरदर्शन पर थ्रिलर एट टेन आ रहा है
फोन की घंटी बजने लगती है
यथासंभव अन्य घरेलू आवाज को थामकर
फोन उठाता हूँ
हलो, मदन कश्यप । पटना से। बहुत बुरी खबर है।
मैनेजर पांडेय के इकलौते पुत्र आनंद की हत्या कर दी गयी है
पुलिस ने ही गोली मार दी है.... बिल्कुल नजदीक से

दिन भर की थकान और मुसकान को किनारे कर सोने की तैयारी कर रहा हूँ
शायद कोई सपना आ जाये जिंदगी के ताप से छनकर ---
हलो..... प्रफुल्ल जी
रविभूषण राँची से। बहुत बुरी खबर है। अशोक सिन्हा नहीं रहे....
कैसे? कब?
हर्ट अटैक से। कल।

तारीखें अलग-अलग हैं पर पसरी हुई एक ही त्रासदी है
यहाँ से वहाँ तक जिंदगी दुख की एक बहती हुई नदी है

मेरी बेटी निरंतर अपने दाग से जूझती हुई
बाज दफा हारने भी लगती है अपनी दाग-दाग जिंदगी से
मैं उसे कविता की घूंटी पिलाकर बचाना चाहता हूँ
मैं उसके लिए बाज दफा कविता लिखने का वादा करता हूँ

मुसीबत यह है कि कविता कैसे लिखूँ आज की रात
जब घने बादल में पानी की एक भी बूँद न हो और बिजलियाँ
आसमान  में लिट्टेई सुरंग की तरह बिछीं हों.......

...नींद खुली है, रात के सपने की हल्की सी परछाई मन पर बची रह गयी है
परछाई को पकड़कर आज की सुबह उठना चाहता हूँ
परछाई में मैनेजर पांडेय मुक्तिबोध की कविता से अंधेरे में जिरह कर रहे हैं
सरोज स्मृति से निराला को हासिल कर रहे हैं
मैनेजर पांडेय कबीर का पीछा करते-करते बाजार से लड़ रहे हैं
मैनेजर पांडेय गोरख को हाँक लगा रहे हैं
मैनेजर पांडेय सिवान के युवा कवियों से आगे के रास्ते पर बतिया रहे हैं
मैनेजर पांडेय आँसू  की बूँदों को फाड़कर मुस्कुरा रहे हैं
वाह मैनेजर पांडेय वाह

रविभूषण की बात सही है
मृत्यु के कई कारण होते हैं लेकिन वे जीवन के कारण से बड़े नहीं होते हैं
युद्ध के कई कारण होते हैं लेकिन वे शांति के कारणों से बड़े नहीं होते हैं
रविभूषण गुससे में हैं, रविभूषण दुख में हैं,  रविभूषण आवेश में हैं
मृत्यु रविभूषण के  आस-पास  नाच रही है
रविभूषण हैं-- जैसे ब्यूह में अभिमन्यु, जैसे दुख में मैनेजर पांडेय
जैसे संकट में जीवन, जैसे क्षुब्ध सागर में लवण
जैसे क्रोध में करूणा
वाह रविभूषण वाह
हमें जिंदा रहना है दुख पर काबू पाने के लिए

मेरी बच्ची सुबह-सुबह मेरे लिए चाय बना रही है
बावजूद दुख के इससे अधिक खुशगवार सुबह मेरे लिए हो नहीं सकती
एक ऐसी सुबह जहाँ से अंधेरे के खिलाफ मद्धम-मद्धम आवाज आती हो
और चाय के खौलते पानी के साथ मेरी बेटी गीत गाती हो
सच इससे अधिक खुशगवार सुबह मेरे लिए हो नहीं सकती

बच्चा उदास है और अन्य कवितएँ


सड़क का जायजा

हवा बेशर्म हो गयी है --
फिरती है गोद लिये
उन दगाबाज नारों को
जिन्होंने हमें भरमाया है

हवा इतनी खतरनाक हो गयी है कि
आँखवालों को अंधा
कानवालों को बहरा
घोषित किया जा रहा है
और बहरा चौकन्ना है

टुकड़ी-टुकड़ी साँस
गिरवी रखी जा चुकी है

यह वक्त
नाक की ऊँचाई नापने का नहीं
हाथ की औकात आजमाने का है

भूखे पेट सोकर
सपनों का मजा लेने से बेहतर
दीवार में सूराख कर
सड़क का जायजा लेना है।

बाजार और संविधान

बाजार से गुजरते हुए
बराबर कचोट होती है
जो चीज वहाँ
नहीं होनी चाहिए
वह चीज वहीं होती है

बाजार से होकर
आने के बाद
कितनी खाली-खाली
नजर आती है
किराये की छोटी-सी कोठरी

जैसे काम की चीज का
अकाल ही पड़ गया हो
या यों कि
गत्तों के बीच से
संविधान की मूल प्रति ही
गायब हो गई है

उपमाएँ और भी हो सकती हैं
आप भी
सोचिए न !
बच्चा उदास है

रोते हुए
छोटे बच्चे ने
इनकार कर दिया
चोर बनने से

उसे ऐतराज है
चोर बनाये जाने पर

इस ऐतराज को खतियाने
के लिए कोई खाता
नहीं मुल्क के पास

होशियार बच्चे
तमीज दे रहे हैं कि
अपराध है
जाना इस खेल के खिलाफ

चोर सिपाही का खेल
राष्ट्रीय भावना का परिचायक है

आज का बच्चा
कल का नायक है

बच्चा के सामने स्थिति
बिल्कुल साफ है

बच्चा उदास है

हम आजाद हैं
अंजुरी में भर
मिट्टी को दुलराया

अच्छा लगा
अंजुरी में महसूसना
मिट्टी को

एक ऐसे मौसम में
जब पैर के नीचे से
जमीन खिसकाने की हो
रही हो कोशिश
सकून देता है
अंजुरी में मिट्टी का होना

मिट्टी का होना
अंजुरी में एहसास है
धरती की उष्मा का

बड़ा अवसादमय होता है
महसूसना
कुछ इस तरह कि
हम आजाद हैं
और हमारी
मिट्टी बंद है
किसी और की मुट्ठी में

हमारा समय

एक पूरी वयस्क भाषा में
हमारा समय
उस सवाल के सामने खड़ा है
जहाँ झूठ
सच से बड़ा है

जनतंत्र के बाजार में
किसी के सीना ताने
गर्दन उठाये
टिनोपाल के विज्ञापन के साथ
रोब भरी मुस्कान पसारे
चलने
और किसी के
झुकी हुई रीढ़ पर
घायल हो चुकी गर्दन
सम्हाले
चेहरे पर
जंगल की दहशत
और पैरों के नीचे
हुहुआते रेगीस्तान के आतंक का
राज पसारे
गुजरने के फर्क पर
बहस करते हुए
आँख की लाली को
हाथ के गुस्से के हवाले कर देना
सवाल का सामना करने की
पहली शर्त्त है

एक पूरी वयस्क भाषा में
हमारा समय
इस सवाल के सामने पड़ा है
जहाँ मौत की शर्त्त पर
जिंदगी हथियानी है

आपके इलाके का गुंडा कौन है

भूगोल के मास्टर जी
अब नहीं हँसते है
अब नहीं पूछते है
राजधानियों के नाम

क्या हो गया है ?
भूगोल के मास्टर जी को !

वे क्यों भूगोल के पीरियड में
पूछने लग जाते हैं
इतिहास के सवालों के जवाब ?
वे क्यों नायकों के नाम रटाने के बदले
बताने लग जाते हैं
इलाके के गुंडों के नाम ?

क्या सम्हलकर
चलने के लिए
नायकों के नाम जानने से
अधिक जरूरी है जानना
इलाके के गुंडों के नाम ?

ओ माँ...!
क्या हो गया है मास्टर जी को
देश की चौहद्दी पढ़ाने से
वे कतराते क्यों है ?

आपके इलाके के गुंडा का नाम क्या है !

और अंत में … 
टूटे हुए सपने में बूढ़े महा वृक्ष की गवाही

जाने किस बात का
जयकारा है
किस बात पर झड़ रहा है उल्लास
जाने क्यों
हाहाकार को
जयकार से ढक लेने का का
जमाना भर रहा है स्वाँग

नगाड़ो पर
पड़ रही है चोट
गुंजित हो रही है
शंख ध्वनि

जाने क्यों
देवताओं को
फैशन की दुनिया में
ले आने का
जमाना रच रहा इतिहास

महानगर के
महाशोर में
अद्भुत सन्नाटा है

लोग वहाँ जुबान नहीं खोलते
जहाँ खोलनी चाहिए
लोग वहाँ कान नहीं धरते
जहाँ धरना चाहिए

लोग दीवारों की
सुनना चाहते हैं
जब कि दीवारों की
अपनी आदत है
अपनी सियासत है

मैं ने पाया
चाहे जो हो
दीवारें गवाह नहीं हो सकती
लकिन किसी निषकर्ष पर पहुँचने के लिए
बेहद जरूरी होते हैं गवाह

कौन हो सकता है गवाह ?
कौन बता सकता है
गवाह के बारे में
कैसा होता होगा
सच्चे गवाह का हुलिया ?

मैं सच्चे गवाह के
हुलिये की तलाश में निरंतर
डूबता रहा --- रात भर

मुझे लगा
इस समय हम वहाँ पहुँ गये हैं
जहाँ से आगे बढ़ने के लिए
पीछे लौटना बेहद जरूरी है
मजबूरी है कि
आगे बढ़ने का रास्ता पीछे से है

पीछे लौटने लगे जदम
हाँफता हुआ मैं
दम टूटने के कगार पर
जा पहुँचा कि
अचानक मुझे ख्याल आया --
वृक्ष पहले भी गवाह बन चुके हैं

मैं दौड़ा हुआ
बूढ़े महा वृक्ष के
पास जा पहुँचा

लोग मुझ से भी पहले
वहाँ पहुँच चुके थे
शुक्र है कि लोगों की भीड़ में भी
महा वृक्ष अब तक बचा हुआ था

थोड़ी भीड़ छँटे
मैं करता रहा इंतजार
आँखों में सहेजता रहा महा वृक्ष को
ढूढ़ने लगा उसकी जड़
मन में उठने लगा द्वंद्व कि
बिना जड़ के वृक्ष की गवाही वैध हो सकती है ?

तभी जैसे नींद से जागा हो
महा वृक्ष --- या तोड़ी हो
अपनी ना-राज चुप्पी ---
गंभीर मंद्र स्वर में
लगा बोलने महा वृक्ष ---
यहाँ बड़े-बड़े लोग आये
जड़मति, चालाक, ज्ञानी, विज्ञानी, कुशल
भद्र, सौम्य, सभ्य और सुशील
ढूढ़ने की कोशिश की हमारी जड़ें
मेरी सहस्त्रों जड़ों की
अनदेखी कर लगा दी तख्ती ---
इस महा वृक्ष की जड़ नहीं है
और तुम भी तख्तियों के षड़यंत्र में
हो गये शामिल !

तंत्र को समझते हो ?
समझते नहीं
दरख्त के खिलाफ तख्त का इस्तेमाल ?
कि कैसे बन जाता है पूरा देश बिकाऊ माल ?

सुनो ---
यहाँ जो लोग आते हैं
उनके हाथ में
अछिंजल भरा लोटा नहीं होता
उनके पास पानी नहीं होता
न हाथ में
न आँख में
न चरित्र में
न बात में

--- उनके हाथ में
आइस्क्रीम होती है
चिप्स होते हैं

--- उनकी आँख में
बिक जाने की हसरत होती है

--- उनके चरित्र में
बिकाऊ बन सकने की कसरत होती है

--- उनकी बात में
उम्दा विज्ञापन होता है

पूरी दुनिया को
जड़ से उखाड़े जाने के मौसम में
तुम मेरी जड़ ढूड़ रहे हो
तो सुनो ---
मेरी जड़ धरती में फैली है
तुम धरती की तलाश कर सकोगे ?
धरती ! जिसे इंच-इंच कर गँवाते रहे हो अब तक !

और ठठाकर हँस पड़ा महा वृक्ष
तुम मेरी गवाही लेने आये हो तो
ध्यान से सुनो ----
मेरे और न जाने किन-किन प्राणियों के
पूर्वजों की खाल उतारकर
अपनी नग्नता ढकने की कोशिश में
तुम्हारे पुरखों ने
जिस सभ्यता की शुरुआत की थी
उसके शीर्ष पर पहुँचकर भी
दुनिया में
सिर्फ तुम ही नंगे हो ---

सारा जंगल हँसने लगा
हँसने लगा पशु
जिसकी खाल से बना हुआ था नगाड़ा
हँसने लगा सागर
जिसकी संतानों की काया से बना हुआ था शंख

मैं कुछ कह पाता कि
मेरे सपने से
टकरा गया का चमगादड़ का पंख

टूटे हुए सपने में
बूढ़े महा वृक्ष की गवाही
सभ्यों की दुनिया में
कौन कबूलेगा --- सोचता हूँ...