सोमवार, 7 जनवरी 2013

बच्चा उदास है और अन्य कवितएँ


सड़क का जायजा

हवा बेशर्म हो गयी है --
फिरती है गोद लिये
उन दगाबाज नारों को
जिन्होंने हमें भरमाया है

हवा इतनी खतरनाक हो गयी है कि
आँखवालों को अंधा
कानवालों को बहरा
घोषित किया जा रहा है
और बहरा चौकन्ना है

टुकड़ी-टुकड़ी साँस
गिरवी रखी जा चुकी है

यह वक्त
नाक की ऊँचाई नापने का नहीं
हाथ की औकात आजमाने का है

भूखे पेट सोकर
सपनों का मजा लेने से बेहतर
दीवार में सूराख कर
सड़क का जायजा लेना है।

बाजार और संविधान

बाजार से गुजरते हुए
बराबर कचोट होती है
जो चीज वहाँ
नहीं होनी चाहिए
वह चीज वहीं होती है

बाजार से होकर
आने के बाद
कितनी खाली-खाली
नजर आती है
किराये की छोटी-सी कोठरी

जैसे काम की चीज का
अकाल ही पड़ गया हो
या यों कि
गत्तों के बीच से
संविधान की मूल प्रति ही
गायब हो गई है

उपमाएँ और भी हो सकती हैं
आप भी
सोचिए न !
बच्चा उदास है

रोते हुए
छोटे बच्चे ने
इनकार कर दिया
चोर बनने से

उसे ऐतराज है
चोर बनाये जाने पर

इस ऐतराज को खतियाने
के लिए कोई खाता
नहीं मुल्क के पास

होशियार बच्चे
तमीज दे रहे हैं कि
अपराध है
जाना इस खेल के खिलाफ

चोर सिपाही का खेल
राष्ट्रीय भावना का परिचायक है

आज का बच्चा
कल का नायक है

बच्चा के सामने स्थिति
बिल्कुल साफ है

बच्चा उदास है

हम आजाद हैं
अंजुरी में भर
मिट्टी को दुलराया

अच्छा लगा
अंजुरी में महसूसना
मिट्टी को

एक ऐसे मौसम में
जब पैर के नीचे से
जमीन खिसकाने की हो
रही हो कोशिश
सकून देता है
अंजुरी में मिट्टी का होना

मिट्टी का होना
अंजुरी में एहसास है
धरती की उष्मा का

बड़ा अवसादमय होता है
महसूसना
कुछ इस तरह कि
हम आजाद हैं
और हमारी
मिट्टी बंद है
किसी और की मुट्ठी में

हमारा समय

एक पूरी वयस्क भाषा में
हमारा समय
उस सवाल के सामने खड़ा है
जहाँ झूठ
सच से बड़ा है

जनतंत्र के बाजार में
किसी के सीना ताने
गर्दन उठाये
टिनोपाल के विज्ञापन के साथ
रोब भरी मुस्कान पसारे
चलने
और किसी के
झुकी हुई रीढ़ पर
घायल हो चुकी गर्दन
सम्हाले
चेहरे पर
जंगल की दहशत
और पैरों के नीचे
हुहुआते रेगीस्तान के आतंक का
राज पसारे
गुजरने के फर्क पर
बहस करते हुए
आँख की लाली को
हाथ के गुस्से के हवाले कर देना
सवाल का सामना करने की
पहली शर्त्त है

एक पूरी वयस्क भाषा में
हमारा समय
इस सवाल के सामने पड़ा है
जहाँ मौत की शर्त्त पर
जिंदगी हथियानी है

आपके इलाके का गुंडा कौन है

भूगोल के मास्टर जी
अब नहीं हँसते है
अब नहीं पूछते है
राजधानियों के नाम

क्या हो गया है ?
भूगोल के मास्टर जी को !

वे क्यों भूगोल के पीरियड में
पूछने लग जाते हैं
इतिहास के सवालों के जवाब ?
वे क्यों नायकों के नाम रटाने के बदले
बताने लग जाते हैं
इलाके के गुंडों के नाम ?

क्या सम्हलकर
चलने के लिए
नायकों के नाम जानने से
अधिक जरूरी है जानना
इलाके के गुंडों के नाम ?

ओ माँ...!
क्या हो गया है मास्टर जी को
देश की चौहद्दी पढ़ाने से
वे कतराते क्यों है ?

आपके इलाके के गुंडा का नाम क्या है !

और अंत में … 
टूटे हुए सपने में बूढ़े महा वृक्ष की गवाही

जाने किस बात का
जयकारा है
किस बात पर झड़ रहा है उल्लास
जाने क्यों
हाहाकार को
जयकार से ढक लेने का का
जमाना भर रहा है स्वाँग

नगाड़ो पर
पड़ रही है चोट
गुंजित हो रही है
शंख ध्वनि

जाने क्यों
देवताओं को
फैशन की दुनिया में
ले आने का
जमाना रच रहा इतिहास

महानगर के
महाशोर में
अद्भुत सन्नाटा है

लोग वहाँ जुबान नहीं खोलते
जहाँ खोलनी चाहिए
लोग वहाँ कान नहीं धरते
जहाँ धरना चाहिए

लोग दीवारों की
सुनना चाहते हैं
जब कि दीवारों की
अपनी आदत है
अपनी सियासत है

मैं ने पाया
चाहे जो हो
दीवारें गवाह नहीं हो सकती
लकिन किसी निषकर्ष पर पहुँचने के लिए
बेहद जरूरी होते हैं गवाह

कौन हो सकता है गवाह ?
कौन बता सकता है
गवाह के बारे में
कैसा होता होगा
सच्चे गवाह का हुलिया ?

मैं सच्चे गवाह के
हुलिये की तलाश में निरंतर
डूबता रहा --- रात भर

मुझे लगा
इस समय हम वहाँ पहुँ गये हैं
जहाँ से आगे बढ़ने के लिए
पीछे लौटना बेहद जरूरी है
मजबूरी है कि
आगे बढ़ने का रास्ता पीछे से है

पीछे लौटने लगे जदम
हाँफता हुआ मैं
दम टूटने के कगार पर
जा पहुँचा कि
अचानक मुझे ख्याल आया --
वृक्ष पहले भी गवाह बन चुके हैं

मैं दौड़ा हुआ
बूढ़े महा वृक्ष के
पास जा पहुँचा

लोग मुझ से भी पहले
वहाँ पहुँच चुके थे
शुक्र है कि लोगों की भीड़ में भी
महा वृक्ष अब तक बचा हुआ था

थोड़ी भीड़ छँटे
मैं करता रहा इंतजार
आँखों में सहेजता रहा महा वृक्ष को
ढूढ़ने लगा उसकी जड़
मन में उठने लगा द्वंद्व कि
बिना जड़ के वृक्ष की गवाही वैध हो सकती है ?

तभी जैसे नींद से जागा हो
महा वृक्ष --- या तोड़ी हो
अपनी ना-राज चुप्पी ---
गंभीर मंद्र स्वर में
लगा बोलने महा वृक्ष ---
यहाँ बड़े-बड़े लोग आये
जड़मति, चालाक, ज्ञानी, विज्ञानी, कुशल
भद्र, सौम्य, सभ्य और सुशील
ढूढ़ने की कोशिश की हमारी जड़ें
मेरी सहस्त्रों जड़ों की
अनदेखी कर लगा दी तख्ती ---
इस महा वृक्ष की जड़ नहीं है
और तुम भी तख्तियों के षड़यंत्र में
हो गये शामिल !

तंत्र को समझते हो ?
समझते नहीं
दरख्त के खिलाफ तख्त का इस्तेमाल ?
कि कैसे बन जाता है पूरा देश बिकाऊ माल ?

सुनो ---
यहाँ जो लोग आते हैं
उनके हाथ में
अछिंजल भरा लोटा नहीं होता
उनके पास पानी नहीं होता
न हाथ में
न आँख में
न चरित्र में
न बात में

--- उनके हाथ में
आइस्क्रीम होती है
चिप्स होते हैं

--- उनकी आँख में
बिक जाने की हसरत होती है

--- उनके चरित्र में
बिकाऊ बन सकने की कसरत होती है

--- उनकी बात में
उम्दा विज्ञापन होता है

पूरी दुनिया को
जड़ से उखाड़े जाने के मौसम में
तुम मेरी जड़ ढूड़ रहे हो
तो सुनो ---
मेरी जड़ धरती में फैली है
तुम धरती की तलाश कर सकोगे ?
धरती ! जिसे इंच-इंच कर गँवाते रहे हो अब तक !

और ठठाकर हँस पड़ा महा वृक्ष
तुम मेरी गवाही लेने आये हो तो
ध्यान से सुनो ----
मेरे और न जाने किन-किन प्राणियों के
पूर्वजों की खाल उतारकर
अपनी नग्नता ढकने की कोशिश में
तुम्हारे पुरखों ने
जिस सभ्यता की शुरुआत की थी
उसके शीर्ष पर पहुँचकर भी
दुनिया में
सिर्फ तुम ही नंगे हो ---

सारा जंगल हँसने लगा
हँसने लगा पशु
जिसकी खाल से बना हुआ था नगाड़ा
हँसने लगा सागर
जिसकी संतानों की काया से बना हुआ था शंख

मैं कुछ कह पाता कि
मेरे सपने से
टकरा गया का चमगादड़ का पंख

टूटे हुए सपने में
बूढ़े महा वृक्ष की गवाही
सभ्यों की दुनिया में
कौन कबूलेगा --- सोचता हूँ...


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