देखो न शायद वही आया है, देखो न



देखो न शायद वही आया है, देखो न
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देखो न सर्वेश्वर, देखो न
तुमने कहा और हमने यकीन किया
देखो न, शायद वही आया है
और उसके हाथ में कितना सुंदर मशाल है

देखो न सर्वेश्वर, देखो न

हाँ, हमारा जनतंत्र सुरक्षित है

हाँ, हमारा जनतंत्र सुरक्षित है
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हम बारिश के इंतजार में
बूँद गिनने की कला पर चिंतन में थे
कवि भाषा के अच्छी होने पर सोच में शामिल थे
विचारक अपनी पक्की राय को लगभगा रहे थे कि
भाषा अच्छी हो तो मौसम का मिजाज ठीक रहता है
गायक सितार को कसते हुए सुर की तलाश में थे
उनके ख्याल में सुर में होने पर ही दिन अच्छे होते हैं, भाषा भी
वे सुर की तलाश में थे कि अ-सुरों के कोप का यही जवाब है
चित्रकार रंगों की महिमा के सामने नतमस्तक थे
रंगबाटी, और दिशा-संकेती रेखाओं को दुरुस्त कर रहे थे कि
आखिर यह सब होगा किस दिशा से अगर जीवन में रंग ही न हो

यानी सभी व्यस्त थे और अपने तरीके से तैयार हो रहे थे कि
जब अच्छापन आये तो ओछापन किबाड़ खोलने में बाधक न हो
सभी व्यस्त थे अपने तरीके से और तैयार हो रहे थे

उधर, दो बहनें...
हाँ, दो बहनें जो अच्छेपन के सपनों में शरीक थीं
ओछेपन की चपेट में आ गईं
अब इसे अधिक अच्छे तरीके से कैसे कहा जाये, छीः

हाँ, यह सुना हमने कहीं शिखर से उतरकर आई आवाज
▬▬ कानून अपना काम करेगा
हमने यकीन किया, आँख-कान मूँदकर
दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र ने साबित किया
आँख-कान मुँदा होना जनतंत्र के सुरक्षित होने की गारंटी है
यह भी कि आँख-कान का मुँदा होना जनतंत्र में सुरक्षित रहने की गारंटी है
और यकीन-न, हमें इस गारंटी पर भरोसा है

हाँ, हमारा जनतंत्र इस तरह सुरक्षित है
संतोष यह कि इसी तरह हम भी सुरक्षित हैं
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बाजार में, उछाल

बाजार में, उछाल

हाँ, अब यह तो मुमकीन नहीं कि तुम्हें मेरा ख्याल न आये।
बात उठे, न उठे महफिल में, तेरी आँखों में गुलाल न आये।

झूमकर बारिश हो खेत में हलचल हाथों में कुदाल न आये।
दिल उदास, आँखों में आँसू और बाजार में, उछाल न आये।

लोकतंत्र है, तो क्या, लुटे बाजार में हम, कोतवाल न आये।
इधर लगी हो आग बेचैनी की और उधर, कोषपाल न आये।

दिशाओं को पहचान लें हम और भटकाने, दिकपाल न आये।
हाँ थके हारे पहुँचे, जब धर्मशाला में, मगर धर्मपाल न आये।

हाँ, अब यह तो मुमकीन नहीं कि तुम्हें, मेरा ख्याल न आये।
बात उठे, न उठे महफिल में, तेरी आँखों में, गुलाल न आये।

मौसम, बहुत खराब है

मौसम, बहुत खराब है
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मौसम, बहुत खराब है, तुम न आये, न सही, तुम्हारा ख्याल तो है।
पाँव फैलाने के लिए चादर न सही, मुँह ढकने के लिए रुमाल तो है!

तुम न सही, गुंडों के इस शहर में, आखिर कोई एक कोतवाल तो है।
दाल न सही, नमक तो है, दिशाएँ गुमसुम हैं, मगर दिकपाल तो है!

लोग पूछेंगे तुम्हारे आँसुओं की कीमत बाजार में, ये सवाल तो है।
हाँ, ऊपर-ऊपर हरियाली, मगर भीतर में पक रहा बबाल तो है!

ये बाजार में कोहराम हो चाहे जितना, मगर वह मालामाल तो है।
असली न सही, नकली ही सही जो भी हो, बाजार में उछाल तो है!

मौसम, बहुत खराब है, तुम न आये, न सही, तुम्हारा ख्याल तो है।
पाँव फैलाने के लिए चादर न सही, मुँह ढकने के लिए रुमाल तो है!
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हवा बहुत बदनाम है

हवा बहुत बदनाम है
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ठहरी, ठमकी हुई सुबह है, मचलती हुई शाम है।
मालिक, तेरे इस शहर, में हवा बहुत बदनाम है।

जज्वात का रंग गाढ़ा तो है, मगर शब्द बेकाम है।
मालिक, तेरे इस शहर में, मिहनत मगर बेनाम है।

सदियों बहा पसीना, हाँ मगर बच्चा उसका, बेकाम है।
मालिक, तेरे इस शहर में, इधर भूख है, उधर जाम है।

इंतहान में रहे, न समझे वह असल में एक्जाम है।
मालिक, तेरे इस शहर में, हाँ पैसा अब हुक्काम है।

हक्का-बक्का ठिठका खड़ा जो चुचाप, हाँ आवाम है।
मालिक तेरे इस शहर में, फरेब नंगा और आम है।

ठहरी, ठमकी हुई सुबह है, मचलती हुई शाम है।
मालिक, तेरे इस शहर, में हवा बहुत बदनाम है।

हमने ऐसा ही जीवन पाया

हमने ऐसा ही जीवन पाया

जब हवा को कोई झोंका परेशान-सा करने लगे
समझ लेना मैं आया था
जब कभी बिजली गुल-सा हो जाये
समझ लेना मेरी ही शरारत है
जब कभी-कभी अकारण छलछला आये आँसू
समझना मैंने तुम्हें याद किया था और रोया था
जब कभी तुम्हारी आँखों के सामने टँगे इंद्रधनु या
जब कभी मेज पर रखे गुलदस्ता में मुस्कुराये फूल
समझ लेना मैंने कुछ कहना चाहा है,
जो आँखों से कहकर भी, मुँह से कह नहीं पाया था

हाँ, मेरे हमसफर जब भी मुझे याद करना
बस इतना ही समझ लेना, बस इतना ही कि
हमने ऐसा ही जीवन पाया था, ऐसा ही है जीवन

आँखों में खुश हो लेना

आँखों में खुश हो लेना
दिल में थोड़ी-सी उदासी बचाना जरूर


जब कोई ताजा खिला फूल दे ▬
तुम गहरी मुस्कान से उसे देखना
आँखों में खुश हो लेना
दिल में थोड़ी-सी उदासी के लिए जगह बचाना
हालाँकि यह थोड़ा मुश्किल है, फिर भी
याद कर लेना उस डाली को
जिस पर यह फूल खिला हो
याद कर लेना उस माली को
जिसके बच्चे की खलखिलाहट
उधार लेकर फूल खिला करता है
थोड़ी-सी उदासी के लिए जगह बचाना
थोड़ा-सा आसान हो जायेगा, शायद

▬▬ हाँ, अभी तो जरूरत नहीं लेकिन
लंबे सफर में कभी उदासी भी बहुत काम आती है
नमक की तरह, उसे थोड़ा ही सही पर बचाना जरूर

ओ मेरे हमसफर जब कोई ताजा खिला फूल दे
तुम गहरी मुस्कान से उसे देखना
आँखों में खुश हो लेना
दिल में थोड़ी-सी उदासी के लिए जगह बचाना जरूर

धूप में चाँद सा चेहरा निखरे

धूप में चाँद सा चेहरा निखरे
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥♥
   
बीता हुआ वक्त नहीं आता यादें आ जाये तो क्या कम है।
तेरी निगाह में अब भी मेरा अक्स, उभरे तो क्या कम है।

मन में है खौफ, फिर भी, कोई परी उतरे तो क्या कम है।
तमतमाती धूप में चाँद सा चेहरा निखरे तो क्या कम है।

हकीकत खूँख्वार सही, कोई ख्वाब उतरे तो क्या कम है।
जोरावरों की ताकत से, गृहस्थी न उजड़े तो क्या कम है।

आँख जिसमें उतरता खून, आँसू भी उमड़े तो क्या कम है।
दूसरों का भला हो, अपना काम न बिगड़े तो क्या कम है।

मुहब्बत आँखों में, मगर जुबान से झगड़े तो क्या कम है।
हौसले से, तेरे आसामान में बादल घुमड़े तो क्या कम है।

बीता हुआ वक्त नहीं आता यादें आ जाये तो क्या कम है।
तेरी निगाह में अब भी मेरा अक्स, उभरे तो क्या कम है।

आज अंधेरा बहुत है



आज अंधेरा बहुत है
▬▬▬▬▬▬ ♦♥

कहने को कुछ नहीं, कहना बहुत है।
इतना कहा, इतना कहना बहुत है।

सूरज के घर में आज अंधेरा बहुत है।
वह खुश है, चारो ओर घेरा बहुत है।

हाँ खामोशी है, मगर प्यार बहुत है।
सामान भरा है, मगर उधार बहुत है।

रोजगार नहीं, मगर औकात बहुत है।
रास्ते पथरीले, मगर जज्वात बहुत है।

शिकायत सही, पर मुस्कुराना बहुत है।
इस गली से, तेरा आना-जाना बहुत है।

कुछ पाया नहीं, पर हाँ खोना बहुत है।
अभी तो कुछ हुआ नहीं, होना बहुत है।

सूरज के घर में आज अंधेरा बहुत है।
♠♥♦

पसंद

रचनाधीन उपन्यास

धूप-छाँव का अद्भूत खेल है। जंगल, पहाड़, सागर, सरिता, ताल-तलैया, ऊँच-नीच सबके जीवन में यह खेल चलता है। रौशनी में नहाकर दुनिया सँवर जाती है। कितने तो रंग हैं प्रकाश में। अंधकार भी प्रकाश का ही एक रंग है। अनुपस्थिति का रंग। ऐसा रंग जो अपने अलावा कुछ भी देखने न दे। जब उस एक के अलावा कुछ भी दिखाई न दे, सूझे न कोई राह। सिर्फ ठोकर ही राह बताये। समझो कि अंधकार के घेरे में हो। चाहे जितना भी घना होता है निराशा का अंधकार, उसके अंदर हमेशा ही सोई रहती है आशा की किरण। ठोकर लगते ही जग उठती है आशा की किरण। तन घायल, मन पायल। बार-बार पराजित होकर भी बची रहती है मनुष्य के अंदर की इच्छाएँ। इच्छाओं में भी होड़ लगी रहती है। आदमी किस इच्छा को तरजीह दे, किसे सपनों की नींद सुला दे। किसे मौत की नींद सुला दे। इच्छओं को पहचानना भी क्या कम कठिन है! आदमी आशा की पतली-सी डोरी से इच्छा की गठरी बाँधता ही रहता है। यह पतली डोरी टूटी नहीं कि गठरी बिखर कर छितराई नहीं। इस गठरी को काँख में दबाये आदमी भविष्य की अंधी घाटी में उतरता ही रहा है। प्रकाश के स्रोत को आदमी ने खोज निकाला। बार-बार खोज निकाला। आदमी को प्रकाश मिला और भरपूर मिला। फिर इतना अंधेरा क्यों है! आदमी प्रकाश को अपनी मुट्ठी में बाँध लेता है। मुट्ठी ढिली पड़ी और रौशनी कपूर। आदमी क्या करे? प्रकाश की हर किरण के साथ अंधकार भी लिपटा चला आता है। इसलिए ▬ तमसो मा, ज्योतिर्गमय! अंधकार नहीं, प्रकाश की ओर चलो! प्रकाश के संधान में चलो! सावधानीपूर्वक चलो। मगर चलो। चलते ही रहो। मुट्ठी बाँधकर चलो। हाथ जोड़कर चलो, कदम खोलकर चलो। चरैवेति-चरैवेति।
तमसो मा, ज्योतिर्गमय! अंधकार नहीं, प्रकाश की ओर चलो! प्रकाश के संधान में चलो! आँख के खुलते ही बाबा यही दुहराते थे। कभी-कभी तो इतनी जोर से गुहराते थे कि आँख बंद कर जागते हुए में सोये रहना किसी के लिए मुश्किल होकर रह जाए। आदमी खीझकर सोचने लग जाए कि सुबह-सुबह यह सब दुहराने का क्या मतलब! सुबह-सुबह तो प्रकाश आपके पास चलकर आता है। जो खुद आपके पास चलकर आता हो उसकी खोज में चलने के क्या मायने! तब यह समझ में बिल्कुल नहीं आया था कि नदी में पानी के निरंतर बहते रहने पर भी प्यास अपने-आप नहीं बुझती है! किशोर होने तक वह बाबा को इसी तरह जागते और जगाते पाया था। अचानक एक दिन उसे लगा कि वह जवान हो गया। उस एक दिन अचानक क्या हुआ था! बाबा के इस जागरण विन्यास में थोड़ा-सा अंतर प्रकट हुआ था। अंतर यह कि बाबा के दुहराव के समापन में अब कबीर प्रकट हो गए! कबीर कैसे और क्यों प्रकट हुए पता नहीं। समापन जल बीच मीन पियासी के साथ होने लगा था। पानी में रहते हुए भी मछली प्यासी है। यह वह नहीं समझ पाया था। वह भला क्या समझता! यह बात तो अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी के अंकों के साथ एम.. पास करने पर भी वह नहीं समझ पाया था। उससे भी सही बात यह है कि जवानी के पकते ही उसके मन से बाबा के जागरण अध्याय का वह प्रसंग ही गायब हो गया था। यह बात उसकी समझ में पहली बार तब आई जब वह आर्थिक विकास के परिप्रेक्ष्य में नाजीरगंज के जीवन स्तर पर शोध सामग्री जुटा रहा था। उसकी समझ में यह बात आ रही थी कि किस प्रकार चारो ओर समृद्धि के रहते हुए भी आदमी गरीबी में जीता है। किस प्रकार ज्ञान की बड़ी-बड़ी डिग्रियों के रहते हुए भी आदमी अज्ञान में जीता है। अब यह बात थोड़ी-थोड़ी समझ में आ रही थी कि किस प्रकार जल में रहकर भी मीन प्यासी रहती है। कि किस प्रकार चारो तरफ प्रकाश से घिरे रहकर आदमी अंधकार में रहता आ रहा है। 

अब चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा है। क्या किया जा  सकता है? हम क्या कर सकते हैं! सोच-सोचकर मन भारी हो जाता है। आज बाबा की बहुत याद आ रही है। बाबा नहीं रहे। उनकी याद रह गई है। यह याद भी तब आती है जब मन अपने किये पर उलझ-पुलझकर छटपटाता रहता है। तब लगता है जैसे मछली पानी में आजाद रहने पर भी यह समझ ले कि वह जाल में फँसी हुई है। खैर तभी तक है जब जक कोई जाल की डोरी नहीं खींच नहीं लेता है। जिस दिन जाल की डोरी खींच ली जायेगी उसी दिन परदा गिर जायेगा। परदा गिर जायेगा और खेल खतम। बाबा ने आगाह करते हुए कहा था कि बेटा अपना परमानेंट ठिकाना बदलना ठीक नहीं। लेकिन यह कहने पर कि टेंपरोरी दुनिया में परमानेंट ठिकाने की बात में कोई दम नहीं है। साठ-सत्तर बहुत हुआ तो अस्सी-नब्बे बरस की तो होती है जिंदगी। इतना समय कहीं काट लेगा। बाबा की दिमागी बुनावट खाँटी हिंदू मूल्यों से बनी थी। इसीका लाभ उठाकर बाबा को उसने निरुत्तर कर दिया था। बाबा निरुत्तर हो गये थे। उस समय बाबा को निरुत्तर पाकर उसके चेहरे पर विजेता का दर्प आ गया था। तब की बात और थी। अब न तो बाबा हैं, न चेहरे पर विजेता का दर्प है। आज अगर कुछ बचा है तो सिर्फ प्रश्न। जीवन की परीक्षा में प्रश्नों के उत्तर लिखकर वह परम संतुष्ट हुआ था कभी। वे सारे उत्तर समय के साथ मलीन होते चले गये हैं। मलीन ही नहीं होते गये हैं, मिटते भी गये हैं। जलते हुए प्रश्नों से सिर्फ काला धुआँ निकल रहा है। चिरायँध निकल रही है। इस आग में सिर्फ धुआँ-ही-धुआँ है। इस आग में किसी रौशनी की कोई सूरत नहीं बाबा। आज सामलाल के चारों तरफ प्रश्नों का अँधेरा है। सिर्फ अंधेरा। उत्तर का आलोक कहीं नहीं है। बाबा आज दुनिया में नहीं हैं। दुनिया में नहीं हैं, मगर वह अपनी बात तो सिर्फ बाबा को ही कह सकता है।

राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता

राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता
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बचपन को याद करें तो दुकानों में दिलचस्प बोर्डों की याद आती है ▬ 'उधार प्रेम की कैंची है', 'आज नगद कल उधार', 'उधार माँगकर शर्मिंदा न करें', 'बिजनेस में दोस्ती नहीं', आदि! बिजनेस में दोस्ती नहीं का ही दूसरा पहलू है बिजनेस में दुश्मनी नहीं। दुनिया के बाजार में और नागरिकों के उपभोक्ता में बदल जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, और सच पूछिये तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, राजनयिक सदाशयता का महत्त्व स्वाभाविक रूप से व्यावसायिक व्यावहारिकता से तय होने लगा है। अमेरीकी राष्ट्रपति एवं राजनयिकता के रुख, चीन की पहल, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया, श्रीलंका के उत्साह आदि को ध्यान में रखने पर राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता के अंतस्संबंध को सहज ही
समझा जा सकता है। भारत श्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में दक्षिण एशिया से शुरू कर पूरी दुनिया में व्यावसायिक संभावनाओं को नये सिरे से तलाशना और टटोलना चाहता है तो निश्चित ही इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसी क्रम में शपथग्रहण समारोह में आमंत्रण की प्रासंगिकताओं को भी परखना चाहिए। युपीए सरकार, एनडीए सरकार, मनमोहन सिंह सरकार, मोदी सरकार का नाम भले ही दें, लेकिन अपनी अंतर्वस्तु में वह भारत सरकार ही होता है और यह अखंड होता है। देश के सामान्य उपभोक्ता-नागरिक के रूप में प्राथमिक तौर पर, मुझे लगता है कि शपथग्रहण समारोह में आमंत्रण का यह प्रतीकात्मक पहल सकारात्मक कदम है इसका स्वागत किया जाना चाहिए और इस कदम की दिशा और गंतव्य के स्पष्ट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

चलना एक तमीज है


चलना एक तमीज है
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वे भी बायें से चल रहे हैं
मैं भी बायें से चल रहा हूँ
हम एक दूसरे से दूर हैं
क्योंकि हमारी दिशाएँ विपरीत हैं

वे दायें से चल रहे हैं
उनके दोस्त भी दायें से चल रहे हैं
वे एक दूसरे के करीब हैं
हालाँकि उनकी भी दिशाएँ विपरीत हैं

मैं ने सीखा कि
चलना एक तमीज है

मैं अपनी हार से लड़ रहा हूँ

मैं अपनी हार से लड़ रहा हूँ
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एक बात कह दूँ, साफ-साफ
मैं अनुमान नहीं लगा रहा हूँ
मैं अपनी हार से लड़ रहा हूँ

जानता हूँ ऐसी लड़ाई में शामिल हूँ कि
जीत किसी की हो मेरे हिस्से में सिर्फ हार है
जीवट है कि मैं अपनी सुनिश्चित हार से लड़ रहा हूँ

आओ हे नवजीवन, जीवन की तरह आओ






उम्र के इस कगार पर जब शुरू होता है,
पाई हुई जिंदगी को खोने का सिलसिला
अमूमन शुरुआत केश की सुरमई चमक के खो जाने को
छुपाने में हुई चूक से होती है
दाँत में माँद बनते हैं,
हर नागवार बात पर भिंच जानेवाला जबड़ा पड़ जाता है ढीला
फिर आँख की ज्योति की आती है बारी,
कभी पास नहीं दीखता है तो कभी दूर नहीं
हसरतें दम तोड़ती हैं, सपनों के रंग काफूर होते हैं,
आशा की डोर हो जाती है ढीली
हर वह कसाव जो देता है
आगे बढ़ने का रंग भरा साहस और मनोबल, पड़ जाता है ढीला
पुरानी पड़ जाती है साइकिल, बहुत मुश्किल से घूमता है, हाँफता हुआ चक्का
हर सीवन उधड़ने लगती है, जिंदगी के झोले का मुँह नीचे से खुलने लगता है
कभी धीरे से तो तेजी से कभी,
सौदा हो या सौगात नीचे से निकल बाजार में बिखर जाता है
मेला उठने लगता है, पूजा और पुजारी, फूल और प्रसाद बासी पड़ जाते हैं,
देवता रूठ जाता है

उम्र के इस कगार पर, तुम आओ इस मरू जीवन में
वह कंधा बनकर जो उठा सके,
गये जमाने के खोये हुए तमाम ख्वाबों का बेतरतीब बोझ
वह एहसास बनकर,
जिसके होने से सुरमई चमक लौट आये, मेंहदी की नई चमक की तरह
जिसके होने से चमचमा उठे भरोसा, सब्ज हवा के सुर-ताल में,
लहराते सूरजमुखी की तरह
छलछलाते आँसू को चुन लेनेवाले जवान पलकों पर मचलते
मजबूत इरादों की हसरतों की तरह
होठों की फटन पर फिरते रफूगर की अँगुलियों के
उनींदे ख्वाब की गहरी मुसकान के पैबंद की तरह
पुराने टायर की ट्यूब में नई हवा की तरह
अपनी धुरी पर घूमती धरती के अथक उल्लास की तरह
ज्यौं की त्यौं नहीं धरी जा सकी चादर
इसके हर ताना, हर बाना, हर सीवन को दुलराते रंगों की तरह
खोने-पाने का सिलसिला जीवन है, ऐसे जीवन में
हौले से आओ जंगल में उतरते चाँद की तरह

स्वागत हे नवजीवन
तुम आओ मगर डाली से टूटकर
पत्थर पर चढ़नेवाले फूलों की तरह नहीं
वन-उपवन में फैले गंध की तरह जिसके होने से
घनघोर अंधेरे में भी देवता मन में बिहुँसते हैं
बिना किसी आहट के उतरो इस जीवन में
गाय के थन में उतरनेवाली दूध की पहली बूँद की तरह
आओ हे नवजीवन, उम्र के इस कगार पर
शिशु के पहले कदम की बेचैनी की तरह
चलो जैसे चलते हैं गंगा के टूटे दो किनारे
हिमालय से सागर तक, सागर से गागर तक
हर शोर को लाँघते हुए, अफवाहों को झुठलाते हुए,
आओ हे नवजीवन , जीवन की तरह आओ !

जो हासिल नहीं, उसके खोने का दर्द

जो हासिल नहीं, उसके खोने का दर्द
♦    ♦   ♦    ♦    ♦    ♦    ♦

तानाशाह ने लोकतंत्र को देखा
देखा प्यार से
हद हो गई जब
लोकतंत्र ने तानाशाह को देखा
देखा इंतजार से

दोनों की आँख में एक दूसरे की छवि समा गई
सूरज ने आँखें झुका ली और धरती के कान में कहा
तुम्हें पता है कि तुम्हारी संतान ने क्या खोया है ▬▬

जो हासिल नहीं हुआ, उसके खोने के दर्द को
धरती से बेहतर कौन जानता है

धरती ने बस गर्म निगाह से सूरज को देखा


कित पायेगा ठौर

कित पायेगा ठौर

सुन ले आप मते कुछ और है, साहेब के कुछ और,
सम्हल, सम्हल रे मन बौराहा, कित पायेगा ठौर।

कोई आये, कोई जाये पर कठिन बहत यह दौर,
मुश्किल बना रहेगा हाँ, जाना मुँह में पूरा कौर।

सीख रहा, बड़े जतन से करना हालात पर गौर,
अंधियारे में हासिल हो कैसे अँजुरी भर अंजोर।

हाथ में आकर कोमल होंगे, हैं जो कठिन कठोर,
हाँ, पर सावधान, है घातक उसका क्रूर नछोर।

सुन ले आप मते कुछ और है, साहेब के कुछ और,
सम्हल, सम्हल रे मन बौराहा, कित पायेगा ठौर।