शनिवार, 24 मई 2014

धूप में चाँद सा चेहरा निखरे

धूप में चाँद सा चेहरा निखरे
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बीता हुआ वक्त नहीं आता यादें आ जाये तो क्या कम है।
तेरी निगाह में अब भी मेरा अक्स, उभरे तो क्या कम है।

मन में है खौफ, फिर भी, कोई परी उतरे तो क्या कम है।
तमतमाती धूप में चाँद सा चेहरा निखरे तो क्या कम है।

हकीकत खूँख्वार सही, कोई ख्वाब उतरे तो क्या कम है।
जोरावरों की ताकत से, गृहस्थी न उजड़े तो क्या कम है।

आँख जिसमें उतरता खून, आँसू भी उमड़े तो क्या कम है।
दूसरों का भला हो, अपना काम न बिगड़े तो क्या कम है।

मुहब्बत आँखों में, मगर जुबान से झगड़े तो क्या कम है।
हौसले से, तेरे आसामान में बादल घुमड़े तो क्या कम है।

बीता हुआ वक्त नहीं आता यादें आ जाये तो क्या कम है।
तेरी निगाह में अब भी मेरा अक्स, उभरे तो क्या कम है।

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