गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

बाघ था पोसा जिसे, बिलाव समझकर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan


खेल में मुँह नोच डाला नकाब समझकर
मुस्कान को रौंद डाला जवाब समझकर

बाँह चढ़ा वोट डाला इंक्लाब समझकर
भूल जो कर बैठे उसे इंतखाब समझकर

सुलझा ही था छोड़ा उलझाव समझकर
बाघ था पोसा जिसे, बिलाव समझकर

साथ रहा निकटता को दुराव समझकर
जिंदा रहा अब तक, अपनाव समझकर

अँधेरे को स्वीकारा, रखरखाव समझकर
हाँ भूल की जुल्फ का बिखराव समझकर

मंजिल बनी, जहाँ रुका पड़ाव समझकर
जिंदगी ने उसे छोड़ा, बहलाव समझकर

धोखा है, वह खुश है, बदलाव समझकर
दुखी है इन बातों को दोहराव समझकर


खेल में मुँह नोच डाला नकाब समझकर
मुस्कान को रौंद डाला जवाब समझकर


  

बात सँवरेगी! किसी और को दोष देकर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

क्या करूँगा दोस्ती का अमरकोष लेकर
बात सँवरेगी! किसी और को दोष देकर

इश्क तो ठीक क्या मिलेगा होश खोकर
माना कि आसान जीना मदहोश होकर

चाँद कूदता आकाश में, खरगोश होकर
जैसे-तैसे वह जीता है सफेदपोश होकर

विचार वो फैले जो खून में जोश होकर
मुहब्बत जिंदा है पँखुरी पर ओस होकर

हाँ मरना क्या एहसान फरामोश होकर
ये जीना भी क्या एहसान फरोश होकर


बात सँवरेगी! किसी और को दोष देकर

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

हम ने इश्क भी, फरमाया है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

हाँ सच ने मुझे बहुत सँवारा है
तेरे झूठ ने भी तो दुलराया है
जिंदगी बस खालिस तमन्ना है
जब आँख कुछ छलछलाया है

एक तेरे ही ख्याल में, डूबकर
मैं ने ओढ़ी जब भी चादर तो
चाँद मेरे पहलू में, उग आया
इस हँसी ने कम ही रुलाया है

आँसू से तर रुमाल लहराया है
देख रूठे चाँद का रौब भाया है
मन लहका! किसने भरमाया है
मेरे वजूद पर, तेरा ही साया है

खुशियों ने दी जब कभी, दस्तक
चुप से, अपने गम को बुलाया है
कुछ इस तरह काम निपटाया है
जी हम ने इश्क भी, फरमाया है



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इरादा ठीक न सही पर लह जाता है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan


वह इतनी जोर से आवाज लगाता है
अंदर का पवित्र मकाम ढह जाता है

है दुश्मन सही मगर जादू जगाता है
वह काला लिबास कुछ कह जाता है

राह में बेवजह सब को आजमाता है
न हवा, न पानी, जो है बह जाता है

हुनरमंद डूबकर हर राग को गाता है
राग कत्ल को राग चैन कह जाता है

हर फरीक से खुद को ही पुजवाता है
इरादा ठीक न सही पर लह जाता है



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Ajay Rathore, Noor Mohammad Noor, Gulab Sharan और 4 अन्य को यह पसंद है.

हाथ की चलनी से पानी क्या भरूँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

जब खुद पर ही नहीं तो तुझ पर यकीन क्या करूँ
बलखाती नदी, हाथ की चलनी से पानी क्या भरूँ

सब लुट गया पानी में अब और पानी से क्या डरूँ
पंख सारे बिक गये आसमान खाली, पर क्या उड़ूँ

एक बाँकी मुस्कान है सिवा उसके बंधक क्या धरूँ
सौ बार तो उजड़ा हूँ अब और कितनी बार उजड़ूँ

इस तूफान में तिनका है हाथ, तो और क्या पकड़ूँ
जिंदगी बता किस तरह जमूँ, कि फिर क्या उखड़ूँ

जब खुद पर ही नहीं तो तुझ पर यकीन क्या करूँ
बलखाती नदी, हाथ की चलनी से पानी क्या भरूँ




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Sudhir Kumar Jatav, Rajesh Kumar Yadav, Snehlata Singh और 9 अन्य को यह पसंद है.

वह बिहार है मालिक

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

माना कि जुर्म है मगर रोजगार है मालिक
जो पढ़ गया हाँ वही अब बेकार है मालिक

उसका भी मन है वह तलबगार है मालिक
कहाँ किस काम का अब जोगार है मालिक

यह दौर! तरुण हाथ में हथियार है मालिक
सन सैंतालीस की आँख! इंतजार है मालिक

हादसा पर भी भाषा में ललकार है मालिक
सम्हलकर गिर जाता वह बिहार है मालिक

लोकसभा, जनसभा कहाँ दरबार है मालिक
आपकी सलामती का ये गुनहगार है मालिक

सुनाई देती नहीं चुप की फटकार है मालिक
भूखा तो क्या हुआ वह खबरदार है मालिक



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Hari Pratap Singh, Manoj Kumarjha, Kailash Kalla और 31 अन्य को यह पसंद है.

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Upadhyaya Pratibha जो पढ़ गया, वही अब बेकार है.
22 घंटे · पसंद · 1


Bal Mukund Pathak बहुत ही उम्दा आलोचनात्मक काव्य ।हिँदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक की कलम से
22 घंटे · पसंद


Kumar Bijay Gupt अच्छा लगा...तीर आर पार हो गया
21 घंटे · पसंद


Dilip Chanchal achi rachna hai badhai
20 घंटे · पसंद


Arti Priya Jha aap ki rchna share krne ka lobh samvarn nai kr pati hu..............gustakhi maf krenge aasha hai.............
14 घंटे · नापसंद · 1


Mrityunjay Tiwari एक उम्दा कविता,जो बिहार की अन्दरूनी तस्वीर दिखा रही है
5 घंटे · पसंद


Manoj Kumarjha वाह...गिरते-गिरते भी बन जाए वो सरकार है मालिक
3 घंटे · पसंद

कुछ कर नहीं सकता

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

हाँ, सच है कि कुछ कर नहीं सकता
दो बूँद आँसू बनकर बस ढरक जाऊँ


हाँ, सच है कि कुछ कर नहीं सकता
हँसो तो गाल की गहराई बन जाऊँ

हाँ, सच है कि कुछ कर नहीं सकता
नाराजगी हो तो चुप से सरक जाऊँ

हाँ, सच है कि कुछ कर नहीं सकता

कठिन दौर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

यह कठिन दौर है। कठिन दौर के कई लक्षण होते हैं। इसका एक मारक लक्षण है कि इसमें एक की विवेकहीनता कई लोगों के विवेक को अपना अधीनस्थ बना लेती है। विवेकवान लोगों का एकाकी विवेक प्रतिपल आहत होता रहता है। आहत विवेक व्यक्तित्व को विघटित करने लगता है। जो लोग व्यक्तित्वहीन रहकर जीवनयापन को साध लेने के अभ्यास में समय के साथ पारंगत हो जाते हैं, वे इस कठिन दौर को नर्म बनाकर फिर भी एक स्तर पर, चाहे जैसे हो, जी लेते हैं। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं, कठिन दौर उनको रौंद देता है। इसलिए कहता हूँ कि इस कठिन दौर को थोड़ा नर्म बनाकर अपने लिए जगह बनाना, भावुक मूर्खता या विचारधारात्मक जड़सूत्रात्मकता का शिकार हो जाने से बेहतर है। जीवन रक्षा मनुष्य के अंतर्विवेक का पहला निदेश है। अंतर्विवेक के पहले निदेश का अनुपालन निःशर्त्त विवेक-संपन्न नैतिक कार्य है।


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Sundar Srijak, Kamlesh Sharma, Kumar Sushant और 16 अन्य को यह पसंद है.

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Dileep Mridul Pashchim bangal me to "kathin samay" ka prabhav to kam hona chahiye,?
ya fir pahale se "abhyas" hoga?
Kya "vichar dhara" bhi kisi "uchch bauddhik" ko itana "sankirn" soch de sakti hai?
3 अक्टूबर को 09:27 अपराह्न बजे · पसंद


प्रफुल्ल कोलख्यान Dileep Mridul ... आपकी बात मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। आप समझ रहे हैं?
3 अक्टूबर को 10:59 अपराह्न बजे · संपादित · पसंद


Harinarayan Thakur यह विचार नहीं, भाव का युग है. भक्ति-भावना और भजन-कीर्तन का युग है. विचारवान बने कि गए. जनता रूप-रस-गंध के चमत्कार में विश्वास करती है, रूखे-सूखे ज्ञान और वचन में नहीं.
3 अक्टूबर को 11:08 अपराह्न बजे · संपादित · नापसंद · 2


Manzar Jameel well spoken@harinarayan thakur.
4 अक्टूबर को 01:02 पूर्वाह्न बजे · पसंद

दुखद है

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

दुखद है जज्वात का इस तरह किताब बनकर रह जाना
दुखद है मेरी बात का इस तरह जवाब बनकर रह जाना 
दुखद है मुस्कान का इस तरह अदाव बनकर रह जाना
दुखद है सोच का इस तरह विखराव बनकर रह जाना 
दुखद है हुकूमत का इस तरह लाजवाब बनकर रह जाना
दुखद है उजालों का इस तरह खिजाब बनकर रह जाना 
दुखद है हर नीति का इस तरह हिजाब बनकर रह जाना
दुखद है मेरी बात का इस तरह जवाब बनकर रह जाना



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Rakesh Karna, Tejasvi Ravi, Sundar Srijak और 15 अन्य को यह पसंद है.


राजेश राज "दुखद है मुस्कान का इस तरह अदाव बनकर रह जाना दुखद है सोच का इस तरह विखराव बनकर रह जाना"--बहुत ही दमदार।
4 अक्टूबर को 02:50 अपराह्न बजे · नापसंद · 1

अब कोई मुकरे ही क्यों

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

जी हाँ मेरी बात पर कोई कान धरे ही क्यों
देश में पेश इस हालात से कोई डरे ही क्यों

अक्ल के सिवा कोई और घास चरे ही क्यों
हासिल मुफलिसी ही तो कोई लड़े ही क्यों 
इस तरह,दीन-ईमान पर, कोई मरे ही क्यों
गुंडे महफिल की शान तो कोई डरे ही क्यों
साथ रहजन उस राह से कोई गुजरे ही क्यों
कबूल किया पहले, अब कोई मुकरे ही क्यों 
सब ठीक रहे, तो फिर कोई पिछड़े ही क्यों
वे साथ हैं जब, ये खेल फिर बिगड़े ही क्यों

देश में पेश इस हालात से कोई डरे ही क्यों


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Sudhir Kumar Jatav, Rajesh Kumar Yadav, Noor Mohammad Noor और 8 अन्य को यह पसंद है.

कम क्या जो तुझे याद रहा हूँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

मैं गिलहरी की तरह दरिया को बाँध रहा हूँ
इन दिनों का धीरज सरहद को लाँघ रहा हूँ


यही है आजादी जिसके बल पर फाँद रहा हूँ
हाँ थोड़ा कमजोर हूँ पर कभी फौलाद रहा हूँ

कुछ भूल गये वे कम क्या जो तुझे याद रहा हूँ
पस्त हूँ, मगर मैं ही मुल्क की बुनियाद रहा हूँ

सोने की चिड़िया पिंजरे में मैं तो बर्बाद रहा हूँ
मैं कटी जुबानों का श्लोक नहीं फरियाद रहा हूँ

इतिहास कहता है कि कभी नहीं उन्माद रहा हूँ
मैं व्याकारण का धीरज, सरहद को लाँघ रहा हूँ



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अमनदीप सिँह, Priyanka Thakur, Arvind Kumar Tiwari और 14 अन्य को यह पसंद है.


Bal Mukund Pathak बहुत हीँ उम्दा रचना ।
6 अक्टूबर को 01:38 अपराह्न बजे · पसंद

मुँह खोल मेरे अंतरतम में

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

चुप न रहे तो क्या करे
यह न्याय नहीं ज्यादती है कि
जबरा अपने पक्ष में
इस लाचारी को
इकबालिया बयान की तरह पेश करे
शास्त्र साबित करे स्वीकृति की तरह
और कोई इस बात पर कविता की उम्मीद करे
उम्मीद किसी लाचार का अंतिम अरण्य नहीं
सक्रियता में निहित प्राथमिक कथ्य होती है
खामोश उम्मीद से कहीं बेहतर
चिखती ना-उम्मीदी होती है
बोल मेरे देश हाँ अपनी जुबान में बोल
कब तक बोलता रहेगा सिर्फ फूटा ढोल
वह तेरा नाम लेकर देख कैसे रहा डोल
कोलाहलों के बीच खामोश रहना अच्छा नहीं है
उम्मीद न सही, ना-उम्मीदी में ही बोल
मगर बोल मुँह खोल मेरे अंतरतम में


Dharmendra Pandey, Suresh Upadhyay, Ranjit Kumar Sinha और 14 अन्य को यह पसंद है.


शांतिदीप 'दीप' वाह....बहुत सुंदर रचना।
कल 10:08 पूर्वाह्न बजे · पसंद

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

बस बुदबुदाता हूँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

जी हाँ आपको नहीं खुद को ही फुसलाता हूँ
जो बात डूब रही होती है निकाल लाता हूँ

इस तरह आवाम का टूटा दिल बहलाता हूँ
इस मौसम में कागज पर, फूल खिलाता हूँ

हर जहरीली हवाओं से साँस को बचाता हूँ
जब खुद को खोता, तुम को करीब पाता हूँ

मैं वह दुख हूँ जो रोज खुद को दुरदुराता हूँ
आजकल कहीं जाता हूँ, न कहीं से आता हूँ

कातिल के लिए खुद ही खंजर ढ़ूढ़ लाता हूँ
जान की खैरियत के लिए बस बुदबुदाता हूँ

हुआ कुछ नहीं

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

रावण के मारे जन पर फिर संदेह गहरा गया
इस साल भी, कल की कथा कोई दुहरा गया

यकीन मानवता की जीत का फिर भहरा गया
सच की छाती पर, झूठ का झंडा फहरा गया

मुझको ही, मेरी दुर्दशा का दोषी ठहरा गया
आँख के सामने देखो कैसे खंजर लहरा गया

आवाम के हाथ, पुलिंदा झूठ का पकड़ा गया
आजादी के सिपाही का कदम लड़खड़ा गया

न मानूँ तो झूठ, सच मैं थोड़ा-सा घबरा गया
खिड़की से हुलककर अभी जो वह जबरा गया

इंतजार वक्त का! वही तो बुद्धि भोथरा गया
हुआ कुछ नहीं बस यकीन थोड़ा थरथरा गया