बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

अब कोई मुकरे ही क्यों

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

जी हाँ मेरी बात पर कोई कान धरे ही क्यों
देश में पेश इस हालात से कोई डरे ही क्यों

अक्ल के सिवा कोई और घास चरे ही क्यों
हासिल मुफलिसी ही तो कोई लड़े ही क्यों 
इस तरह,दीन-ईमान पर, कोई मरे ही क्यों
गुंडे महफिल की शान तो कोई डरे ही क्यों
साथ रहजन उस राह से कोई गुजरे ही क्यों
कबूल किया पहले, अब कोई मुकरे ही क्यों 
सब ठीक रहे, तो फिर कोई पिछड़े ही क्यों
वे साथ हैं जब, ये खेल फिर बिगड़े ही क्यों

देश में पेश इस हालात से कोई डरे ही क्यों


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Sudhir Kumar Jatav, Rajesh Kumar Yadav, Noor Mohammad Noor और 8 अन्य को यह पसंद है.
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