रविवार, 29 जून 2014

सपना और सचःः भ्रम का दुख और दुख का भ्रम

सपना और सचःः भ्रम का दुख और दुख का भ्रम
एक बार एक दार्शनिक सुबह-सुबह खामोश बैठा था। अपने शिष्य के किसी प्रश्न का कोई जवाब नहीं दे रहा था। शिष्य के बहुत प्रयास के बाद वह बोला▬

▬ मैंने सपना देखा कि मैं चिंटी हूँ। मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ।
▬ लेकिन अब तो आप जग चुके हैं! परेशानी क्या है?
▬ परेशानी! परेशानी यह कि मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं आदमी हूँ जिसने सपना में देखा कि वह चिंटी है या फिर चिंटी हूँ जो सपना में अपने को आदमी समझ रही है!

उसके बाद दार्शनिक बहुत देर तक बोलता रहा और शिष्य खामोश हो गया। बाद में दार्शनिक और शिष्य दोनों गहन निद्रा में चले गये। इस गहन निद्रा में उन्होंने क्या सपना देखा, देखा भी या नहीं देखा, यह रहस्य है।

तुलसीदास ने लिखा ▬ जौ सपने सिर काटे कोई, बिन जागे भ्रम (दुख) दूर न होई! तुलसीदास ने सोते हुए समाज से कह दिया कि भ्रम के दुख और दुख के भ्रम से बचने का एक ही उपाय है ▬ जागरण! कबीरदास सोते नहीं थे, जागते थे और रोते थे! हम सपना में रोते हैं; अब कौन बताये कि हम सपना में जगे हुए हैं या जगे हुए में सपना देख रहे हैं!

हमारे सामने कठिन सवाल यह कि हम सपना में जीते हैं या सच में जीते हैं! जवाब...! वह तो, मुँह ढककर सोये हुए किसी और के सपने में विचर रहा है। क्या जीने के लिए हमें सपनों की खनतलाशी करनी चाहिए? क्या हम अंतःकरण की खनतलाशी कर सकते हैं! भ्रम का दुख और दुख का भ्रम यही हमारा जीवन है! क्यों बार-बार पूछते थे मुक्तिबोध कि बहुत-बहुत ज्यादा लिया/ दिया बहुत-बहुत कम;/ मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!

पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी


पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी
सिर्फ किसी रचना की विलक्षणताओं और विचक्षणताओं को उद्घाटित करने की अंतर्दृष्टि-संपन्न आलोचना, यदि हो तो, दो कौड़ी की भी नहीं मानी जाती है यदि रचना के चार और खरीददार जोड़ने, कुछ और पुरस्कार जुगाड़ने, विचारधाराओं के प्रति मौखिक आग्रहशील लेखक संगठनों में कुछ और स्वीकार्यता बढ़ाने का भी सूत्र उससे न निकले। 'अच्छा' आलोचक जब किसी रचना पर नहीं रचनाकार पर मुँह खोलने की सोचता है तो पहले प्रकाशक को पता चलता है। प्रकाशक पुस्तक प्रकाशित करता है। फिर पुरस्कार प्रदान करनेवाली संस्था को पता चलता है। अच्छा आलोचक जानता है कि किस पुरस्कार प्रदाता के स्वार्थ का प्राणवाही तोता किसके पिंजड़े में बंद है! और फिर खरीददारी का सिलसिला ▬ सरकारी हुआ तो फिर क्या कहने, 'समाजसेवी समर्थित' खरीददारी भी बुरी नहीं होती! रचनाकार बेरोजगार हुआ तो रोजगार में, शोधार्थी हुआ तो शोध कार्य में, घुमक्कड़ हुआ तो देश-विदेश यात्रा में, खाने-पीने का शौकीन हुआ तो खाने-पीने में, माइक-माला-माल-मंच का सुख हासिल करने में जो आलोचना जितनी सहायक रही है, वह उतनी ही कारगर भी रही है। आलोचना को तो खुद भी शायद पता नहीं कि वह किसकी क्या होकर रह गई है! आलोचना और विचार का ऐसा कौन-सा प्रकरण हिंदी आलोचना ने जोड़ा है जिसे भारत के बाहर या भारत के भीतर की अन्य भाषा के साहित्य आलोचकों ने सम्मान के साथ अपनाया है! साहित्य के सभी व्याख्याता साहित्य के आलोचक भी हैं! जाहिर है व्याख्या, वह भी छात्रोपयोगी, आलोचना के रूप में प्रतिष्ठित है। व्याख्याता, जो कक्षाओं में जरूरत की माँग पर लिख्याता में तब्दील हो चुके हैं, हलाँकि कइयों को अपनी हैसियत की तब्दीली का पता भी नहीं होता है, स्वाभाविक रूप से शोध पुरोधा भी होते हैं। आलोचना और रचना की भाषा भंगिमा में ढाँचागत भिन्नता होती है, फिर भी कुछ लोग कबीर, तुलसी, प्रेमचंद आदि की भाषा की सहजता और कथ्य की संप्रेषणीयता का उदाहरण ठोक कर देते हैं। कोई पूछे कि कबीर, तुलसी, प्रेमचंद आदि की भाषा की सहजता और कथ्य की संप्रेषणीयता इतनी ही अधिक सुग्राह्य और अनुकरणीय है तो उनको उच्च कक्षाओं में पढ़ाये जाने तथा पढ़ाये जाने पर इतने राजकीय व्यय करने या इतने बड़े-बड़े 'विद्वानों' की नियुक्ति करने का प्रयोजन क्या है! जब आलोचना और रचना के संबंधों और सूत्रों तथा संपर्कों के तार और नतीजों को सामने लाने के लिए कोई मजबूत कलम उठेगी या कुछ कुछ अंगुलियाँ कंप्यूटर के कुंजीपटल पर नाचने के लिए मचल उठेंगी तो पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी।


भावना-संचालित समाज का घोषणा काल


भावना-संचालित समाज का घोषणा काल

यह समय घोषणाओं का है। कह सकते हैं उद्घोषणाओं का समय है। पहले कोई घोषणा करता है कि वह उद्धारक है। बाद में जगह-जगह से उद्घोषणाएँ होनी शुरू होती हैं ▬ वह उद्धारक है। सभी लोग उद्घोषणा पर यकीन करते हैं और वह उद्धारक हो जाता है। हमारे मन के अंदर वह उद्धारक की जगह विराजमान होता है ▬ उद्धारक की मनोगत छवि के साथ हम सुख से जीने की कोशिश करते हैं। यह कोशिश तब तक जारी रहती है, जब तक बाहर की तपती जमीन बिल्कुल जीना मुहाल ही न कर दे, जब तक अंतःकरण पूरी तरह उपद्रव ग्रस्त न हो जाये। जब तक जीना मुहाल नहीं हो जाता हम चिरकाल तक इस मनोगत छवि के साथ सुख से जीते हैं। इसी तरह की घोषणाओं और अनुवर्त्ती उद्घोषणाओं से साधू, संत, फकीर, बाबा, नैतिकता की साक्षात मूर्त्ति, समाज सेवी, देश-प्रेमी, राष्ट्र भक्त, मुहब्बत का मसीहा, हिंदी-कवि-आलोचक-चिंतक-विचारक (अन्य भाषा-समाज की स्थिति का अनुमान नहीं), कंपनी, मैनजमेंट-गुरू, प्रॉफिट-लॉस, नास्तिक, कम्युनिस्ट आदि-इत्यादि की मनोगत छवि बनती है और लोगों के मन में विराजती रहती है। इस तरह की घोषणा और उद्घोषणा की कोई परख नहीं होती है, नहीं हो सकती है, क्योंकि मन के सत्यापन की कोई सामाजिक पद्धति नहीं है। हम में से जो लोग ऐसी मनोगत छवि को अपने अंदर सुरक्षित और अक्षत नहीं बचा पाते हैं, वे समय की मुख्य-धारा से बाहर नदी के तट पर, तलछट में फँसी या पड़ी मछली की तरह जीवन बिताते हैं। घोषणा और उद्घोषणा की सटिकता (साथ टिकने की क्षमता, सटीक अर्थात टीका सहित नहीं) की गोचर-अ-गोचर विकटता के अनुपात में मनोगत छवि बनती है; यों ही नहीं IBM अर्थात इमेज बिल्डिंग मेजर्स पर इतना जोर होता है! मन के सत्यापन की कोई पद्धति नहीं जबकि समाज मनोगत छवि के साथ जीता है! मन के सत्यापन की पद्धति के अभाव में भावना-संचालित समाज का यह घोषणा काल है। पहले भी था घोषणा का महत्त्व, परंतु उद्घोषणा के इतने प्रभावी उपकरण नहीं थे और न अंतःकरण इतना अधिक उपद्रवग्रस्त था। क्या कहते हैं...!

सोमवार, 16 जून 2014

आवाज को खामोशी में बदलने और आँख को झुकने से रोको प्रिय

आवाज को खामोशी में बदलने और आँख को झुकने से रोको प्रिय
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मैं खामोश हूँ
जब भी तुम्हारा मुँह खुलेगा
मेरी खामोशी तुम्हारी जुबान पर चढ़कर बोलेगी

मेरी आँख झुकी है
जब भी तुम्हारी नजर उठेगी फलकर पर
तुम्हें मेरे टूटे हुए सपनों की छटपटाहट दिखेगी

मेरी खामोशी, मेरी झुकी हुई निगाह
दूर तक तुम्हारा पीछा करेंगी▬
उस वक्त भी जब तुम आनंद-भोज में शामिल हो रहे होओगे
उस वक्त भी जब तुम श्मसान से खाली पैर लौट रहे होओगे

यह सब पहली बार तुम्हारे ही साथ नहीं होगा
किसी भी अजायब घर में जाकर देख लो जान लो
जिसे नायक मानते हो उनकी तस्वीरों से
उनकी आवाज में एक कशिश है▬
किसी की खामोशी, किसी की झुकी हुई निगाह
दूर तक, अब तक उनका पीछा करती रही हैं
क्योंकि वे किसी की आवाज को खामोशी में बदलने से रोक नहीं पाये थे
क्योंकि वे किसी की आँख को झुकने से रोक नहीं पाये थे
ये गुनाह है, आवाज को खामोशी में बदलने से रोक नहीं पाना
ये गुनाह है, किसी की आँख को झुकने से रोक नहीं पाना

यकीन मानो, मैं जो आवाम हूँ मेरी खामोशी, मेरी झुकी हुई निगाह
दूर तक तुम्हारा पीछा करेंगी▬
उस वक्त भी जब तुम आनंद-भोज में शामिल हो रहे होओगे
उस वक्त भी जब तुम श्मसान से खाली पैर लौट रहे होओगे

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यकीन मानो, मैं जो आवाम हूँ मेरी खामोशी, मेरी झुकी हुई निगाह
दूर तक तुम्हारा पीछा करेंगी▬
उस वक्त भी जब तुम आनंद-भोज में शामिल हो रहे होओगे
उस वक्त भी जब तुम श्मसान से खाली पैर लौट रहे होओगे
 

शुक्रवार, 13 जून 2014

वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है

वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है
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होता है, बहुत होता है, बस तबादला-ए-खयालात नहीं है।
होता है, बातों में वक्ती जुनून, जिंदगी का जज्वात नहीं है।

तेरी फनो-फिक्र में मिसाइल सारे, असल सवालात नहीं है।
बोलता तो है मगर इत्तेफाक यह कि बातों में बात नहीं है।

सुबह-शाम पूछता खैर, ये क्या कि बातों में खैरात नहीं है।
ये बसर जिंदगी का कभी रोटी नहीं, तो कभी भात नहीं है।

मुहब्बत बहुत है, अभी तक मुल्कियों की मुलाकात नहीं है।
बात अपने जनतंत्र की है, वैसे तो कोई अलग बात नहीं है।

मुखपोथी है, खोल लेता हूँ, मुँह खोलने की औकात नहीं है।
बिजली नहीं है, वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है।

होता है, बहुत होता है, बस तबादला-ए-खयालात नहीं है।
होता है, बातों में वक्ती जुनून, जिंदगी का जज्वात नहीं है।

गुरुवार, 12 जून 2014

बात से हालात नहीं बदल सकती

बात से हालात नहीं बदल सकती

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उम्मीद का क्या है, वह तो किसी से भी हो सकती है।
करें बात, तो सच बात से हालात नहीं बदल सकती है।।

फँसे तो, याद किया कि हाँ मुसीबत तो है टल सकती है।
यकीन ही नहीं था, कि तेरी नियत भी बदल सकती है।।

ये व्यवस्था जैसे चली है, अब और चल नहीं सकती है।
रेत की नदी पर डोंगी, कभी भी चल नहीं सकती है।।

जुबान है, हाँ वह तो कभी, कहीं भी, फिसल सकती है।
छुपा के रखी चर्चा में जो, वह बात निकल सकती है।।

बहलाया पर, अब यह भूख और बहल नहीं सकती है।
ये सच है कि उनके आगे तेरी एक चल नहीं सकती है।।

उम्मीद का क्या है, वह तो किसी से भी हो सकती है।
करें बात, तो सच बात से हालात नहीं बदल सकती है।।

बुधवार, 11 जून 2014

स्वतंत्रता-विमुख सुख के समय में

स्वतंत्रता-विमुख सुख के समय में
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यदि कोई व्यक्ति, समुदाय या समाज घटना, विचार, भाषा के बदलते संदर्भों के फलक को जोड़ अर्थात को-रिलेट नहीं कर सकता है तो उसके लिए अपनी भाषा में लिखित अपने समय की बौद्धिक संवेदनागत समझ से जुड़ना और अपनी समझ को हासिल करना संभव नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति, समुदाय या समाज किसी अन्य भाषा और समाज से इन्हें आयात कर अपनी बौद्धिक संवेदनागत समझ के अभाव की भरपाई करता है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पहला सौंदर्य है और दूसरा श्रृँगार। सौंदर्य का घटता जाना और श्रृँगार का बढ़ता जाना समय का खतरनाक इशारा है। बाजार में एकाग्र मन इस खतरा को आसानी से नहीं समझ पाता क्योंकि बाजार की भाषा में श्रृँगार ही सौंदर्य है। अन्य भाषा और समाज से आयातित बौद्धिक संवेदनागत समझ से संचालित व्यक्ति, समुदाय या समाज थोड़ी देर के लिए सुखी तो हो सकता है लेकिन स्वतंत्र नहीं; शायद स्वतंत्रता के निहितार्थ भी उसकी बौद्धिक संवेदनागत समझ से बाहर हो जाती है। हमारे समाज का सक्षम भाग सुख की तलाश में है, इसे फिलहाल स्वतंत्रता की परवाह नहीं है। ऐसे में व्यक्ति, समुदाय या समाज के लिए यह समझना भी आसान नहीं रहता है कि स्वतंत्रता में अपना सुख होता है जो चित्त के आनंद में बदलने की संभावना से भरपूर होता है जबकि स्वतंत्रता-विमुख सुख अंततः मनुष्य होने की विलक्षणताओं को अर्जित करने की संभावना से वंचित करता है।

क्या हम इस स्वतंत्रता-विमुख सुख के समय में अपनी बौद्धिक संवेदनागत समझ के अभाव की भरपाई कर पा रहे हैं! इससे भी पहले यह कि ऐसे किसी अभाव को समझ पा रहे हैं?

प्यारे यह करतब, आप अब दिखलाओ

प्यारे यह करतब, आप अब दिखलाओ
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चलती गाड़ी से नदी में कूद गये थे आप
अराजकता का लगाकर जोर से आलाप

अब नदी से उछल गाड़ी पर चढ़ जाओ
प्यारे यह करतब, आप अब दिखलाओ


जनता ने किया, आप पर बहुत भरोसा
अब तो ना आलू रहा, ना रहा समोसा


महिपाल पधारे, लोक पाल बिसराओ
प्यारे यह करतब, आप अब दिखलाओ

अच्छा बदल रहा

अच्छा बदल रहा
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उदारीकरण, का उदार बदल रहा
अच्छे दिन, का अच्छा बदल रहा
अच्छे-अच्छों का अच्छा बदल रहा
अच्छा तो राजधानी में टहल रहा
अच्छा! हद कि तू भी, मचल रहा
तेरा मन क्यों अब नहीं बहल रहा
अच्छा से क्यों, कलेजा दहल रहा
ले देख, यह सपनों का महल रहा

तो कहो जोर से
है छप्पन इंच का सीना, हाँ-हाँ यही पसीना
अरे मेरा जीना क्या और क्या है मेरा मरना

वाह-वाह उदारीकरण, का उदार बदल गया
हाँ-हाँ अब अच्छे दिन, का अच्छा बदल गया

मेरी अक्ल पर पत्थर पड़े

मेरी अक्ल पर पत्थर पड़े
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सच्चा आशिक और समर्थक तो वही होता है, जो अंत तक इंतजार करे।
और किसी भी सूरत में, अंत का दोषारोपण अपने महबूब पर न करे।


जिसके इंतजार का हौसला अध-बीच में ही न टूट जाये, जीये या मरे।
सच्चे महबूब को हाँ, रत्ती भर भी कोई फर्क न पड़ा है और न कभी पड़े।


यही तो इम्तिहान है, कि उसीके के नाम पर सुबह-शाम, सबसे झगड़े।
उस पर सदा नरम रहे, न कभी जरा भी गरम हो और न कभी उखड़े।


उसे तुक बहुत पसंद है, मैं तुक मिला रहा हूँ, मेरी अक्ल पर पत्थर पड़े।

मंगलवार, 10 जून 2014

अब दिल किधर से लायेंगे



अब दिल किधर से लायेंगे
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सारी उम्र
इसके, उसके
जिसके, तिसके
पीछे भागता रहा
फूलों से, किसलय से
नदियों से, नालों से
कभी कोई बात नहीं की
और अब सब रूठे हुए हैं
क्रोध में हैं पृथ्वी
पृथ्वी का क्रोध कैसे कम हो
फूलों के, किसलय के
नदियों के, नालों के
मन को समझें कैसे
ये स्वजन हैं मान जायेंगे
जब दिल से क्षमा के गीत गाये जायेंगे
मुश्किल मगर यह कि अब दिल किधर से लायेंगे!

हे पिता, मैं नया



हे पिता, मैं नया

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हे पिता तुमने तो कहा था
मंत्र में बड़ी शक्ति होती है
मंत्र बल से पत्थरों में
प्राण का स्पंद होता है
मंत्र बल से पत्थरों को
मिलती है प्रतिष्ठा

हे पिता उसने तो कहा था
सौ बार दुहराने से
झूठ सच हो जाता है

हे पिता मैं नया मंत्र गढ़ता हूँ
पत्थरों में प्राण के स्पंद के लिए नहीं
पथरायी आँखों में जीवन के उल्लास के लिए

हे पिता मैं नया मंत्र पढ़ता हूँ
पत्थरों की प्रतिष्ठा के लिए नहीं
पथरायी जिंदगी में खुशी के नये इतिहास के लिए

हे पिता मैं नया मंत्र गढ़ता हूँ
हे पिता मैं नया मंत्र पढ़ता हूँ