सोमवार, 21 मार्च 2016

माँ बिलखती है किस कदर

माँ बिलखती है किस कदर
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हिंदी को मेरी पुतली में थिरकती हुई देख कि मैथिली हँसती है किस कदर
झारखंड की ऊर्जा बंगाल का पानी मेरे वजूद में भारत बनता है किस कदर

मैं अगर जो होता हूँ शर्मिंदा तो सोचना शर्म से बचता है अब तू किस कदर
बात है साफ हिंदुस्तानी में कोई चाहकर भी इंग्लिश में समझेगा किस कदर

गाड़ी के आगे दौड़ चलनेवाला, कहता बैल को कि देख मैं चलता किस कदर
तेरी अंगराइयाँ, जम्हाइयाँ सोचता हूँ बिना वोट के ऐलान के टूटे किस कदर

तेरे हुजूर में जो आता तू देखता बिना हाथ बाँधे खड़ा होता है वह किस कदर
ये कैसी रहनुमाई है कोई बताये जिस राह से गुजरे वह टूट जाये जो इस कदर

शमशानी अकेले में पड़े कोई तब समझ में आये चीखता है सन्नाटा किस कदर
नगाड़े जिसकी खाल से बनते तू क्या जाने उनकी माँ बिलखती है किस कदर

शनिवार, 19 मार्च 2016

यह तो सत्ता का मिजाज

कसूर तेरा नहीं
यह तो सत्ता का मिजाज है
उसकी समझ अपने काम के लिए
काफी है
नीचे से जो भी दिखे
उसकी हैसियत ही क्या
जो दिखे ऊपर से
बस वही बात काफी है

तुझे जो कोई ज्ञान दे,
सलाह दे या दे कोई मशविरा
तेरा दुश्मन होने के लिए काफी है
हर औनी-पौनी बात पर
पीटे तालियाँ
असहमतों को गालियाँ
दोस्ती के लिए काफी है

एक नदी बहती है
बहुत तेज राय में,
पानी बहुत कम उसमें
नाम मगर उसका साफी है

इस जिंदगी की
यूँ ही नहीं होनी थी रवानगी
मगर तेरी आँख में
एक बूँद आँसू काफी है

कहने को बहुत है जेहेन में,
मगर वक्त की किल्लत
इतनी सी बात
सुन ले कोई काफी है

हकीकतों से मिल कर रोया बहुत,
पता बाद में चला
जीने के लिए बस ख्वाब काफी है

रेख्ता में, हिंदुस्तानी या हिंदी में फर्क नहीं इस्सलाह के लिए अंगरेजी ही काफी है

दर्द की जुबाँ होती नहीं कोई
मेरी कराह तेरे कानों में
लोरी की तरह उतरे यह काफी है

जनतंत्र का रियाया हूँ

जनतंत्र सही बेबस रियाया हूँ मेरी कुव्वत ही क्या
न गिरे मुझ पर तेरी गाज तो फिर हुकूमत ही क्या
आसमानी जिल्द नहीं कोई सिवा तेरी जरूरत क्या
मेरा कत्ल मेरे हित में नहीं तो तेरी जम्हूरियत क्या
बेवजह फरफराता रहता हूँ यूँ मेरी सलाहियत क्या
निगाह में उड़ान चाय और केतली की औकात क्या
जो बेच न दे मुल्क की अस्मत अब वह तिजारत क्या
मकतल तक घसीट कर न ले जाये, तो हिकारत क्या
ठगेरी बात रोटी का एवजी न बने, तो वजुहात क्या
मकतूल का चेहरा हँसता न दिखे, तो सियासत क्या

गुरुवार, 17 मार्च 2016

अमानत की तरह

थरथराती अँगुलियों में झनझनाये बेशुमार सितारों के तार
जब कभी छुआ अपने बदन को तुम्हारी अमानत की तरह
लगा कि यह बदन तो तुम्हारा ही है जिसे मैं लिये फिर रहा हूँ
जिसे जमाना मेरा समझता है अब वह तो मुझ पर तेरा उधार है
मैं जो खुद से लिपटने को मचलता हूँ ख्वाबों में बार-बार
माफी का हकदार है यह गुस्ताख हरकत, हाँ यही है मुहब्बत
इस गुस्ताख मुहब्बत को सलाम

ऐसा हो नहीं सकता

मेरा मर्सिया लिखे कोई, और तुम्हारा जिक्र न हो
यह तो कुछ ऐसा ही है कि सुबह और सूरज न हो

मुमकिन नहीं फिक्र-ए-तमाम हो, तेरी फिक्र न हो
अफसाना क्या, कान्हा हो, राधा हो, बिरज न हो

दिल करे भी तो क्या

कुछ हुस्न का गुनाह कुछ इश्क की शरारत, दिल करे भी तो क्या
दिल तो है दिल आखिर, ऐतबार न करे! और ये करे भी तो क्या

शनिवार, 12 मार्च 2016

एक तू है और कमल कोई नहीं

तेरा नाम लेकर हँसता हूँ और रुलाई कोई नहीं।
तेरी साँस से धड़कन और तो मेरी कमाई कोई नहीं।

तेरी गुफ्तगू से बनता मिजाज और फसल कोई नहीं।
ये बस मुसलसल आवारा जज्वात और गजल कोई नहीं।

दिल जीतने की चाह अपने दिल पर दखल कोई नहीं।
बहुत ज्यादा है तमन्ना सपनों का महल कोई नहीं।

फितरत कि तड़प कर रह जाऊँ पहल कोई नहीं।
कीचड़ जिंदगी मेरी जान तू है और कमल कोई नहीं।

पत्थर पूज कर भगवान करता हूँ

मुझे क्या लगेगा यूंही खामखा इम्तिहान देता हूँ।
तेरे वजूद का असर कहो छाया पर जान देता हूँ।
मुहब्बत में हिसाब नहीं इत्मीनान करता हूँ।
मेरी फितरत का क्या बस हैरान करता हूँ।
सच हों आपके अल्फाज जुबान कहता हूँ।
बस पत्थर की मुहब्बत अनुमान करता हूँ।
इबारत नहीं भेजते जो हाल बयान करता हूँ।
था जैसा भी प्रफुल्ल उसे कोलख्यान करता हूँ।
अच्छा खासा इश्क में तुझे हलकान करता हूँ।
कमीज तो फटी जो बची उसे गिरेबान करता हूँ।
इश्क समझ लो मेरी जान खुद को इंसान करता हूँ।
हूर और हुनर पूजकर पत्थर भगवान करता हूँ।
कुछ रुको तो फिर फिर दिल से बयान करता हूँ।
लंबी रात क्या बातचीत में बिहान करता हूँ।
जाइए कहाँ ख्वाब का ही उड़ान करता हूँ।
तकल्लुफ या तसल्ली खुद पर एहसान करता हूँ।