सोमवार, 21 मार्च 2016

माँ बिलखती है किस कदर

माँ बिलखती है किस कदर
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हिंदी को मेरी पुतली में थिरकती हुई देख कि मैथिली हँसती है किस कदर
झारखंड की ऊर्जा बंगाल का पानी मेरे वजूद में भारत बनता है किस कदर

मैं अगर जो होता हूँ शर्मिंदा तो सोचना शर्म से बचता है अब तू किस कदर
बात है साफ हिंदुस्तानी में कोई चाहकर भी इंग्लिश में समझेगा किस कदर

गाड़ी के आगे दौड़ चलनेवाला, कहता बैल को कि देख मैं चलता किस कदर
तेरी अंगराइयाँ, जम्हाइयाँ सोचता हूँ बिना वोट के ऐलान के टूटे किस कदर

तेरे हुजूर में जो आता तू देखता बिना हाथ बाँधे खड़ा होता है वह किस कदर
ये कैसी रहनुमाई है कोई बताये जिस राह से गुजरे वह टूट जाये जो इस कदर

शमशानी अकेले में पड़े कोई तब समझ में आये चीखता है सन्नाटा किस कदर
नगाड़े जिसकी खाल से बनते तू क्या जाने उनकी माँ बिलखती है किस कदर

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