इस्तीफा प्रेमचंद जयंती

इस्तीफा

इस्तीफा प्रेमचंद जयंती 2023

साहित्य के सच से इनकार नहीं, लेकिन जीवन का सच इस के विपरीत है ¾  इज्जत गँवा कर ही बाल-बच्चों की परवरिश की जाती है। गृहस्थ आदमी साहित्य के सार को बचाये या खुद को बचाये!

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आज प्रेमचंद का जन्मदिन है। स्वाभाविक है कि पाठकों को उनकी कई बातें, कई प्रसंग, कई रचनाएँ आदि स्मृति में कौंध जाती है। प्रेमचंद की कुछ रचनाओं को लेकर कई असहमतियाँ विवाद बनकर सामने आती हैं। कुछ लोग इसे प्रेमचंद पर हमला की तरह लेते हैं। ऐसे लोग प्रेमचंद के बचाव में तत्पर होते हैं और असहमतियाँ रखनेवालों से उलझ जाते हैं। प्रेमचंद ही, नहीं किसी भी बड़े लेखक या व्यक्तित्व से असहमतियाँ रखनेवालों को उन लेखकों या व्यक्तियों का विरोधी घोषित करने और आक्रामक बचाव में उतर आये लोगों की मुख मुद्रा देखकर मैं खुद भी उलझन में पड़ जाता हूँ। मैं यह मानता हूँ कि प्रेमचंद की रचनाओं पर अपनी सहमति-असहमति के आधार पर अपनी समझ कायम करने के लिए पाठक स्वतंत्र हैं। इस से इतर का रास्ता वीर-पूजा की ओर ले जाता है और असहिष्णु बनाता है। लेखक जो अपने पाठकों या व्यक्ति अपने माननेवालों को अंततः असहिष्णु बनने से रोक नहीं पाये तो अफसोस किया जाना चाहिए कि उसका संदेश ठीक से संप्रेषित नहीं हो पाया। यह अफसोसनाक स्थिति सिर्फ प्रेमचंद की ही नहीं है, हमारे देश में सभ्यता विकास, सामंजस्य-मेलमिलाप का रास्ता खोजने बरतनेवाले कई अति-विशिष्ट लोगों की भी है। ऐसे लेखकों, व्यक्तियों पर आक्रमण या बचाव की नकली बहस से बाहर निकलकर अपने समय में लोगों को असहज करनेवाली परिस्थितियों में हमारे अपने बचाव में ये कैसे हमारी मदद कर सकते हैं। मेरी समझ यह है कि हमारे लिए प्रेमचंद अत्यंत प्रयोजनीय हैं, पूजनीय नहीं। इस पर फिर कभी।

अभी, मैं अपनी बात कहूँ। बचपन में ही मुझे स्कूली पढ़ाई के बाहर दो किताबों को पढ़ने का मौका मिला — रामचर्चा और पंचवटी। रामचर्चा के लेखक, प्रेमचंद और पंचवटी के कवि मैथिली शरण गुप्त। दोनों का मेरे मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। आगे चलकर अन्य रचनाकारों के साथ इनकी रचनाओं को भी ठीक से पढ़ने और समझने का अवसर चुनौती की तरह आया। इनको पढ़ना और समझना कितना आया ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है। ऊपर से मुसीबत यह कि लिखने की ललक का शिकार हो गया। जीवन के अच्छे-बुरे तो क्या कहें, सुख-दुख में जिन रचनाकारों की विभिन्न रचनाओं, पंक्तियों की कौंध ने सहारा दिया, उन में प्रेमचंद महत्त्वपूर्ण हैं।

जीवन का आधार नौकरी में पाया। नौकर-चाकर की जिंदगी जैसी होती है, वैसी रही। एक बात यहीं बता दूँ, नौकरी बस नौकरी होती है ¾  छोटी हो या बड़ी। विवाहित लोगों में शायद ही ऐसा कोई होता या होती है जिसकी दिमाग का काँटा तलाक की तरफ कभी न लपका हो, उसी तरह नौकरी करके घर परिवार चलानेवालों में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके मन में कभी-न-कभी इस्तीफा का ख्याल न आया हो। लेकिन अधिकतर लोग तलाक और इस्तीफा से बच जाते हैं, किसी-न-किसी तरह निभा ले जाते हैं, खींच लेते हैं। इसके क्या कारण हैं या हो सकते हैं! दोनों का कारण एक ही है - परिवार के बरबाद हो जाने का डर। इस डर के सामने होते ही प्रेमचंद की कहानी इस्तीफा की याद आती है। पढ़िये प्रेमचंद की कहानी इस्तीफा का यह प्रसंग ¾ ‘मगर इनका परिवार तो मिट्टी में मिल जाता। संसार में कौन था, जो इनके स्त्री-बच्चों की खबर लेता। वह किसके दरवाजे हाथ फैलाते? यदि उसके पास इतने रुपये होते, जिसे उनके कुटुम्ब का पालन हो जाता, तो वह आज इतनी जिल्लत न सहते। या तो मर ही जाते, या उस शैतान को कुछ सबक ही दे देते। अपनी जान का उन्हें डर न था। जिन्दगी में ऐसा कौन सुख था, जिसके लिए वह इस तरह डरते। ख्याल था सिर्फ परिवार के बरबाद हो जाने का।’ कहानी में यह मनःस्थिति फतहचंद की है। प्रेमचंद दर्ज करते हैं, फतहचंद का नाम ‘हारचंद’ भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों? इसलिए कि फतहचंद के लिए ‘दफ्तर में हार, जिंदगी में हार, मित्रों में हार, जीवन में उनके लिए चारों ओर निराशाएँ ही थीं।’

फतहचंद को जीवन में पहली फतह हासिल तब हुई, जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने की हिम्मत कैसे आई! पत्नी ने कहा ¾ ‘आदमी के लिए सबसे बड़ी चीज इज्जत है। इज्जत गँवा कर बाल-बच्चों की परवरिश नहीं की जाती।’

साहित्य के सच से इनकार नहीं, लेकिन जीवन का सच इस के विपरीत है ¾  इज्जत गँवा कर ही बाल-बच्चों की परवरिश की जाती है। गृहस्थ आदमी साहित्य के सार को बचाये या खुद को बचाये! आप मुझ से असहमत हो सकते हैं, मौका मिले तो पढ़ लीजिएगा प्रेमचंद की कहानी ¾ इस्तीफा! फिर बात करते हैं!


उभय

'सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत' ⁠गीता में लिखा है, अर्जुन ने कृष्ण से निवेदन किया था, मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये। उसके बाद युद्ध हुआ। कुछ लोग खुद ही टहलते हुए गए और मध्य में ही घर बसा लिया। भू-मध्य से तब न दिखेगा, जब कोई कृष्ण दिखाये। हे तात, निवेदन है, इंतजार कीजिए कृष्ण का, दुर्घटनाग्रस्त संवेदना का समय भी दिखेगा। 

ज्ञान अपाहिज

ज्ञान अपाहिज

ज्ञान अपाहिज
बोलनहारे खामोश बैठ गये
—  बोल दुलारे तू ही बोल!

चायवाला खुश मिजाज धुन में था
चाय की दुकान उदास!
बस एक बूढ़ा मेरा ही हम उम्र
थोड़ा-थोड़ा हम शक्ल भी
कोई जान-पहचान तो नहीं थी
लेकिन बैठते ही पूछ बैठा —
भाई आप मणिपुर को जानते हैं!
मैं ने कहा बस यही और इतना ही कि
मणिपुर भारत का ही एक राज्य है।
 
चाय की चुप्पी तोड़ते हुए
वह बुदबुदाया,
 खुद से ही बात करने लगा हो जैसे —
मणिपुर को कोई नहीं जानता
न हिंसा को जानता है
न घर शहर जलने को जानता है
 न अपनी चुप्पी को जानता है
न अंधेर नगरी को जानता है
न चौपट राजा को जानता है
न राजस्थान को जानता है
न मध्य प्रदेश को जानता है
न दिन जानता है न रात
न यूपी जानता है न गुजरात
न पानी में उतराते राजधानी को जनता है
न आग में जलती आबादी को जानता है
अपने पड़ोसियों की छोड़िये
खुद को भी नहीं पहचानता
सब के सब — ज्ञान अपाहिज!

कविता और विज्ञान

कविता और विज्ञान

कुछ कहियेगा जरूर सहमति-असहमति  परवाह किये बिना — बेबाक और बेलाग! न सुनने के संसदीय सिंड्रोम की चपेट में फँसे होने के बावजूद, मैं सुनने की कोशिश जरूर करूँगा, क्योंकि इससे मुझे किक (क्विक) मिलती है। समझने-समझाने के लिए युनिवर्सीटी की सुविधा हासिल करने की योग्यता तो है नहीं, यह लिहाजन फेसबुक ही मेरी अदब शाला है और मैं यहाँ, बाअदब होशियार रहता हूँ!

आदरणीय मित्र महेश मिश्र सर, यानी @Mahesh ने 09 जुलाई 2023 को मेरी एक बात

—‘कविता रोटी नहीं देती। रोटी को बाँटकर खाने की तमीज़ देती है’ — को यहीं फेसबुक पर कोट-पोस्ट किया था। इस पर कुछ मित्रों की राय सामने आयी। दिगंबर यानी @Digember सर, ने कहा ‘असली सवाल उत्पादन का नहीं, वितरण का है ... Kavita अगर यह तमीज दे तो फिर क्या कहने ...’। हालाँकि, उत्पादन का सवाल भी महत्त्वपूर्ण है और वितरण का सवाल भी महत्त्वपूर्ण है। लेकिन, इस पर मेरा कहना था —

‘वितरण के लिए ज्ञान+विवेक=बोध चाहिए। बोध, यानी अयं निजः, परोवेति गणना लघुचेतसाम को समझते समझाते उस से ऊपर उठते उठाते उदार चरितानाम के रास्ते वसुधैव कुटुम्बकम तक पहुँचने का हौसला। इस तरह रोटी (इस में सारी माँग शामिल है) को बाँटने (वितरण) का  बोध (तमीज) देती है। उत्पादन के लिए ज्ञान काफी होता है, उस काम में कविता दूसरे पायदान पर खड़ी होकर सहयोग करती है — ध्यान में होना चाहिए धनरोपनी से लेकर हर काम में मजदूरों के गीत। हालांकि, जब से श्रम के आनंद का सत्य और सौंदर्य विलुप्त हुआ शिव-तत्त्व का क्षरण हुआ। विज्ञान दूसरे पायदान पर खड़े रहकर बाँटने का औजार यानी साधन देता है — निर्माण (वेल्यू एडिशन) अर्थशास्त्र या परिवहन, परिसेवा आदि के साधन। कविता और विज्ञान साथ मिलकर काम करते हैं। मोटे तौर पर, पहले कविता शुरू हुई। विज्ञान बाद में शुरू होकर आगे निकल गया। कविता संस्कृति का अंग बनकर पीछे की तरफ उन्मुख होती गई और विज्ञान आगे बढ़ता गया। कविता और विज्ञान में जड़ (रूट) और तने का संबंध है — वृक्ष की जड़ नीचे की ओर जाती है और तना ऊपर की ओर, दोनों में विरोध नहीं होता है, विरुद्धों का सामंजस्य होता है (युनिटी आफ अपोजिट्स)।

इजाजत हो तो, एक स्वतंत्र पोस्ट डालूंगा। आप के सवालों से बहुत सारी बातें याद आई कहें तो किक (क्विक), आभार।

जो बहुत सारी बातें याद आई, उस में से एक प्रसंग — वे दिन थे, जब नौकरी के सिलसिले में कलकत्ता, अब कोलकाता, रह रहा था। मनोज दुबे @Manoj से नया-नया परिचय हुआ था, बड़े इत्तिफाक से और नाटकीय अंदाज में। इस पर फिर कभी। हम राष्ट्रीय पुस्तकालय में थे। मनोज ने श्री हरेराम चतुर्वेदी यानी @Hareram से परिचय करवाया। हम तीन लोग रापु (बतर्ज दपू)  यानी राष्ट्रीय पुस्तकालय के कैंटीन में आये। शाम का वक्त, दो ही समोसे बचे थे। मनोज ने दोनों समोसे को सामने रख दिया — अब शोले के गब्बर सिंह का वही सवाल उठ खड़ा हुआ, कितने समोसे थे, कितने आदमी थे! मनोज ने कहा कि अब इस दो का तीन में बँटवारा कैसे हो। हरेराम ने कहा — भई इस में क्या है! जिसको जितनी भूख हो, ले ले! मैं ने पूछा — यह पता कैसे चलेगा कि किस को कितनी भूख है? इस पर हरेराम जी ने बहुत सारे जवाब दिये जो अपनी बनक में दार्शनिक किस्म के थे। मैं उनके जवाब से असंतुष्ट हुआ। उन दिनों जवानी थी, तो सहज-स्वभाव थोड़ा उग्र टाइप का था। मैं ने हनकते हुए कहा — आप जिस स्कूल से बोल रहे हैं, मैं उसका हेडमास्टर हूँ। आप को समझ में नहीं आ रहा मैं वेरिफाइबलेटी ऑफ ट्रूथ, सत्य के सत्यापन के सिद्धांत की बात कर रहा हूँ। अपनी हनक पर आज मुझे अफसोस है, बेहद अफसोस है, खासकर खुद को हेडमास्टर घोषित करने की बात पर। शहर उनका था, मैं नया था। आजकल की स्थिति में बिना लपकी-झपकी के  इतिवार्त्ता तक पहुँचना असंभव ही लगता है। खैर, हरेराम जी की उदारता थी, वैसा कुछ अप्रीतिकर नहीं हुआ। तब तो नहीं, लेकिन इसके लिए आज मैं उनका कृतज्ञ हूँ। हालाँकि, उन दिनों के मित्रों से बातचीत में वही तेवर, वही मिजाज लौट आता है, बिना किसी कैफियत के इसे यहीं छोड़ता हूँ।

अभी पाँच-सात दिन पहले हरेराम जी का फोन आया। यहाँ जो प्रासंगिक है उसे सामने रखता हूँ। उन्होंने कहा — प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल कहा था। आज राजनीति कहाँ है, और साहित्य कहाँ है? मैं ने कहा — प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के ही नहीं राजनीति और देश भक्ति के आगे चलनेवाली मशाल कहा था। प्रेमचंद ने साहित्य और राजनीति (क्या आप राजनीचि शब्द का इस्तेमाल करना चाहेंगे, मैं तो ऐसा करना नहीं चाहूँगा) के बारे में कहा था, साहित्यकार को राजनेता के आगे चलनेवाला मशालची नहीं कहा था। लौटते हैं, फिर उसी बात पर कि साहित्य राजनीति के आगे चलता है या नहीं! मैं ने महात्मा गाँधी पर सत्य हरिश्चंद्र के प्रभाव की बात कही। मैं ने आज के संदर्भ में तुलसीदास कबीरदास की बात कही। मेरे मन भारतीय संविधान की नीति निर्देशक सिद्धांत में भक्ति साहित्य, खासकर संत परंपरा के निर्गुन साहित्य की मूल्य श्रृँखला की बात कही। उस समय वे मेरी बात से संतुष्ट हुए या नहीं, पता नहीं। पता हो भी कैसे! खूब कहने और बिल्कुल नहीं सुनने के संसदीय सिंड्रोम की चपेट में फँस जाने के मामले में मैं भी कोई कम थोड़े हूँ! संतुष्ट न हुए हों तो कोई बात नहीं, रुष्ट हुए हों तो हरेराम जी को मना लेंगे, सुजन हैं, बिना किसी गाँठ के मान जायेंगे, विश्वास है। एक बात बताऊँ! न बताना अपराध होगा। हरेराम जी की बात से मुझे एक किक (क्विक) (प्रेरणा या सूझ, अंतर्सूझ पुरानी शब्दावली है) मिली तो मैं ने एक कविता लिखी और फेसबुक पर डाली — सवाल है तो सवाल कर खुद से, याद नहीं तो क्यों याद नहीं। उस में हसरत मोहानी का प्रसंग है। हसरत मोहानी संविधान सभा के एक मात्र सदस्य थे, जिन्होंने संविधान के अंतिम पाठ पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और नहीं किया था। कारण कि उनके अनुसार मजदूरों और शायद किसानों के भी हितों की सम्यक रक्षा का कोई कारगर प्रावधान शामिल नहीं था। किसे याद है! रात दिन आँसू बहाना याद है, उन्हीं का लिखा है। छोड़िये से भी फिलहाल। इन्कलाब जिंदाबाद तो याद है न, या यह भी याद नहीं! यह भी हसरत मोहानी की शायरी से आया है, जिसे दुहराकर शहीद भगत सिंह ने अपने साथ-साथ अमर कर दिया! मानियेगा अब भी कि साहित्य राजनीति से आगे चलनेवाली मशाल है और वह हुस्न का मय्यार बदल देता है! एक बात और कुछ कहियेगा जरूर सहमति-असहमति  परवाह किये बिना — बेबाक और बेलाग! संसदीय सिंड्रोम की चपेट में फँसे होने के बावजूद, मैं सुनने की कोशिश जरूर करूँगा, क्योंकि इससे मुझे किक (क्विक) मिलती है। समझने-समझाने के लिए युनिवर्सीटी की सुविधा हासिल करने की योग्यता तो है नहीं, यह लिहाजन फेसबुक ही मेरी अदब शाला है और मैं यहाँ, बाअदब होशियार रहता हूँ!


मैं आप से बात करना चाहता हूँ

मैं आप से बात करना चाहता हूँ

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मैं आप से बात करना चाहता हूँ

जानता हूँ, फिलहाल वक्त नहीं है आपके पास

इसलिए बात करना तो बहुत ही मुश्किल है इन दिनों

मुश्किल है बात करना इसलिए बता भर देना चाहता हूँ

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

इस सिकोड़ का रिश्ता मेरे इलाके में

रह रह कर पेट में उठनेवाले ममोड़ से कितना और कैसा है

कह नहीं सकता लेकिन, मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

इंटरनेशनल या ग्लोबल या ऐसे ही किसी विस्तार से

डर लगने लगा है मन, मन बहुत डर लगने लगा है

न याद करूँ झारखंड को, तो गुनाह है मकम्मल* --

फिलवक्त क्या कहूँ, हूँ बंगाल, पश्चिम बंगाल में हूँ 

जी हाँ, आराम से ही हूँ, जी आराम से हूँ फिलवक्त

जानता हूँ इतना ही नहीं है भारत, 

मन णणिपुर हुआ जा रहा है।*

मेरा मन तो अब मिथिला तक सिमटकर रह जा रहा है

बहुत जोर मारकर भी बस बचे हुए बिहार तक पहुँच पा रहा है

उससे आगे नहीं जा पा रहा है, बहुत पुचकारने के बावजूद

इसे कविता न समझें, आप के पास बेहतरीन कविताएं हैं

इसे बस एक गृहस्थ की हताशा और अनास्था समझ लें

जानता हूँ, आप के पास आशा और आस्था के बेहतरीन काऱण हैं

जानता हूँ, बेहतरीन काऱण हैं कि फिलहाल वक्त नहीं है आपके पास

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है

बहुत ही भयानक होता है मन का सिकोड़

और दर्दनाक भी इस पर बात करना

न बताना बहुत ही खतरनाक, इसलिए बता रहा हूँ

मेरे मन में भयानक सिकोड़ हो रहा है।

जानता हूँ इतना ही नहीं है भारत,

मन मणणिपुर हुआ जा रहा है।*

(*थोड़े से संशोधन, संपादन के बाद)

निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

निष्ठा बहुत ही कठिन है। धूमिल को याद करें, वे पूछते हैं —

क्या मैं व्याकरण की नाक पर

रूमाल लपेटकर

निष्ठा का तुक

विष्ठा से मिला दूँ?

(साभार: धूमिल: संसद से सड़क तक)

निष्ठा का सवाल सिर्फ लेखकों कवियों तक सीमित नहीं है — यह समस्त नागरिक, सामाजिक और राजनीतिक जमात से जुड़ा है। अधिकतर का जवाब क्या होगा?  वाणी में नहीं, आचरण में! निष्ठा को समझना, तय करना और टिकाये रखना सचमुच बहुत कठिन, बहुत कठिन है।

 

अज्ञेय की कहानी को याद करते हैं। द्रोही का पात्र कहता है :-

निष्ठा क्या है? जिसका हम पालन करें। कर्तव्य क्या है? जिसके लिए हम कष्ट झेलें। प्रतिज्ञा क्या है? जिसे हम निभाएँ! पर यह सब उस अखंड निष्ठा, उस प्रकीर्ण कर्तव्य, उस उग्र प्रतिज्ञा के आगे क्या है? उस व्रत के आगे जिसमें माता-पिता, बन्धु-बान्धव, घर-बार, प्रतिष्ठा, कलंक, सब भूल जाने पड़ते हैं? उस आदर्श के आगे जिसका अनुसरण करनेवाला पतित होकर भी दिव्य पुरुष होता है? जानती हो कमला! वह क्या है? प्रेम!

(साभार : अज्ञेय : कहानी – द्रोही)

निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

गंभीर पाठक का भाव ; हार से ज्यादा जीत में जोखिम है

गंभीर पाठक का अभाव

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लगभग सभी गंभीर लेखक गंभीर पाठक के अभाव को कभी-न-कभी महसूस करता ही है।
निराश भी होता है, फिर सम्हलता है। निराशा के भँवर से बाहर निकलने की कोशिश करता है — कभी जुट जाता है, कभी टूट जाता है! क्या ऐसा सिर्फ आज के लेखकों — हिंदी लेखकों — के साथ हो रहा है? नहीं, बिल्कुल नहीं! करुण रस के सब से बड़े संस्कृत कवि भवभूति ने भी इस दर्द को सहा था। कबीरदास जैसे युगांतरकारी कवि को सराहनेवाले कितने थे? अपने समय में माँग कर खाने और मसीत में सोने, किसी के साथ नातेदारी न जोड़ने की घोषणा करनेवाले तुलसीदास के साहित्य के कितने पाठक थे?  इस मामले में तो भवभूति की पीड़ा की अभिव्यक्ति बहुत प्रेरक है!

ये नाम केचिदिह न प्रथयन्त्यवज्ञां जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।

उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्मयं निरवधिः विपुला च पृथ्वी ।।

(साभार: भवभूति : उत्तररामचरित : अनुवाद – इंद्र : राजपाल एण्ड सन्ज़)

समान धर्मा पाठक का आदर न मिलने पर भवभूति जैसा संस्कृत का महाकवि भी निराश हो गया था। टिका रहा इस विश्वास पर भी की पृथ्वी भी बहुत बड़ी है और काल भी विस्तृत है। कभी-न-कभी कोई-न-कोई ऐसा होगा जो उस की रचनाओं का आदर करेगा, सराहेगा।

  

निष्ठा किसी भी विद्वान को ऐसे मजबूत कवच से मंडित कर देती है कि प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह उसे ऐसा पारदर्शी मुखरक्षक भी देती है जो किसी भी दिशा से आने वाले प्रकाश की किसी भी किरण को नहीं रोकती। उसका लक्ष्य होता है अधिक प्रकाश, अधिक सत्य, अधिक तथ्य और तथ्यों का अधिक संयोग। यदि उस लक्ष्य प्राप्ति में वह असफल होता है, जैसा कि उसके पहले कई विद्वान असफल हुए हैं, तो वह यह जानता है कि सत्य की खोज में असफलताएँ कभी-कभी विजय और सच्चे विजेता की शर्त बन जाती हैं, चाहे उसे संसार पराजित कहता है।

(साभार: भारत हमें क्या सिखा सकता है: मैक्समूलर – अनु. सुरेश मिश्र)

आज के लेखकों को भी निराशा की घड़ी में इस भवभूतीय विश्वास और  कवच-प्रदायी निष्ठा को अपने अंदर सक्रिय कर रचना में — विफलता के जोखिम पर भी — तल्लीन रहना चाहिए। लेखक के लिए आज हार से ज्यादा जीत में जोखिम है।

सांस्कृतिक अराजकता

सांस्कृतिक अराजकतावाद:

विश्वास है, साहित्य संभव होता रहेगा — हुस्न का मय्यार बदलकर भी बरकरार रहेगा!

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यों ही नहीं जीतता कछुआ खरगोश से ...

उसकी चाल धीमी थी पर

लगातार थी...!!!

आज सुबह एक मित्र ने व्यक्तिगत रूप से यह खुशनुमा संदेश भेजा। अच्छा लगा। सोचा, कहानी पुरानी है। संदेश नया है। इस में मेरे काम करने की धीमी गति का इशारा किया गया है, मेरी जीत, यानी अंतिम जीत, में भरोसा जताया है। थोड़ी देर तक, अच्छा लगता रहा! मन उछलता रहा मित्र के भरोसे पर। मन अटका रहा अपनी धीमी गति पर। धीमी गति से दुख भी हो रहा था। तेज से तेज रफ्तार होती जा रही इस दुनिया में धीमी गति! गति बढ़ाने के क्या उपाय हो सकते हैं। भला जीत का प्रलोभन किसे नहीं होता है! जीत के लिए ही तो बार-बार कीलिंग इंस्टिक्ट की दुहाई दी जाती है। कीलिंग इंस्टिक्ट — यानी जीत के लिए प्रतिद्वंद्वी मार डालने पर आमादा होने की हद तक की मनोवृत्ति! भयानक है यह सब। किसी भी कीमत पर जीत! किस की जीत? जीत व्यक्ति की। व्यक्ति की जीत का दु:स्वप्न ही तो व्यक्ति को युयुत्सा के मनोभाव के गिरफ्त में फँसाकर अकेला करने का मूलमंत्र है। यहीं भूत है। व्यक्ति की जीत का दु:स्वप्न ही वह प्रेत है, जिसके पाँव के निशान दिखते तो आगे जाते हुए हैं, लेकिन जा पीछे रहे होते हैं, बहुत पीछे आदिम काल तक — यही तो है आदि पुरुष के प्रति जादुई खिंचाव और फिर से वैसा ही कुछ बनने की जानलेवा ललक का रहस्य! जी, इसी सरसों में भूत के होने का अंदेशा नहीं, विश्वास बढ़ता गाया।

कल की ही तो बात है। महेश मिश्र जी ने जॉर्ज ऑरवेल की किताब — फासिज्म एंड डेमोक्रेसी — के एक लेख के हवाले से इस दौर में साहित्य की किसी संभावना के पूरा खत्म नहीं भी तो, संभावना के कम-से-कमतर होने की बात पर चिंता जतायी थी। इस लेख में व्यक्ति की स्वायत्तता के अभाव — उस की व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, प्रज्ञाओं, कर्मठताओं, प्रसन्नताओं, संतोषों का किसी अन्य के अधीनस्थ हो जाने के हाहाकर — की चिंता थी। व्यक्ति की स्वायत्तता की एक सीमा होती है, उस सीमा से बाहर व्यक्ति की स्वायत्तता के उच्छृंखलता में बदलते कितनी देर लगती है! किसी हद तक उच्छृंखलता और अराजकता पूँजीवाद की वैचारिकी के अनुकूल होती है। उसे मानव संगठन के किसी भी रूप से परेशानी होती है — सिविल सोसाइटी और अहिंसा प्रतिश्रुत संगठन से भी। परेशानी होती है, क्योंकि संगठित होने की कुछ बुनियादी शर्तें होती हैं, कुछ अनुशासन होता है, संगठन से कुछ-न-कुछ तो शक्ति बनती ही है। इस परेशानी को दूर करने का पूँजीवाद की वैचारिकी के पास एक उपाय होता है — संगठन से उत्पन्न शक्ति को वह व्यक्ति की शक्ति होने का, संगठन की जीत के व्यक्ति के जीत होने का सामाजिक भ्रम बनाता है। ऐसे में, हमारा सचेत कवि भी कह उठता है — है जिधर अन्याय, है उधर शक्ति! या यह कि उपन्यासकार दर्ज करता है कि लोगों के बिखर जाने का उतना डर नहीं है, जितना संगठित होने से, क्योंकि संगठन में शक्ति है और शक्ति अनिवार्यत: अन्याय करती है।

थोड़ा, जीत और हार पर भी बात कर लेते हैं, यहाँ संक्षेप में विस्तार से फिर कभी, फिर कहीं! यदि धोनी की जीत जिसे कहा जाता है, वह अगर सिर्फ धोनी की जीत हो तो वह हमारी खुशी का कारण कैसे हो सकता है! हम क्यों खुशी से मतवाले या बावरे हो जाते हैं। चलिए, ध्यान दिलाएँ — खेल की अपनी राजनीति होती है, राजनीति का अपना खेल। ऐसा मानते हैं तो इसे दोनों जगह लागू हो सकने की संभावना पर विचार करना आप की भी जिम्मेवारी है।

कल जब मैं ने महेश मिश्र के वाल पर गाँधियन नैतिकता और मार्क्सीय दृष्टि के महत्व का इशारा किया तो मेरे मन में क्या बात थी, इसे थोड़ा-सा साफ करना जरूरी है। गाँधियन नैतिकता का आशय व्यक्ति की व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, प्रज्ञाओं, कर्मठताओं, प्रसन्नताओं, संतोषों के स्वत्वों के स्व अधीन और मार्क्सीय दृष्टि का आशय स्वत्वों के स्व अधीन होने की सांगठनिक संभावनाओं को हासिल करने — स्व के स्वत्व और संगठन की शक्ति के रसायन के सामाजिक अंतर्लयन का आशय है! थोड़ा कठिन है। असंभव नहीं। क्योंकि इस कनवर्जेंस (Convergence) के अलावा संगठन से उत्पन्न शक्ति को व्यक्ति की शक्ति होने का, संगठन की जीत के व्यक्ति के जीत होने का सामाजिक भ्रम बनाने के पूँजीवाद की विषाक्त-हितैषिता से बच निकलने का फिलहाल न कोई कौशल है, न कोई कारगर उपाय दिखता है। जय पराजय की शब्दावली में नहीं, सह-अस्तित्व में ही अस्तित्व के सुरक्षित होने की समझ के रूप में पढ़ा जाये — कीलिंग इंस्टिक्ट से तत्काल मुक्त होने की आपात-धर्मिता एवं सर्वाइवल इंस्टिक्ट की दीर्घकालिक जरूरत और महत्व को डिकोड करने और समझने का प्रयास किया जाये। रोजी-रोटी सहित जीवन के सारे उपक्रम सामूहिक और सांगठनिक उद्यमों और उद्यमिताओं से हासिल होते हैं! और हाँ, इसे मेरा व्यक्तिगत निष्कर्ष न मानकर सामाजिक स्वीकृति का प्रस्ताव मानना उचित होगा — यही प्रार्थना है। विश्वास है, साहित्य संभव होता रहेगा — हुस्न का मय्यार बदलकर भी बरकरार रहेगा!

यह फासिज्म से पार का और उस से भयावह दौर है

ऑरवेल के निष्कर्ष को भाषा के पार जाकर देखना चाहिए, उन्हें फासिज्म और सोशलिज्म के पश्च प्रभाव (After Affect) को समझने का मौका नहीं मिला, थोड़े-से विभ्रमित निष्कर्ष पर पहुँचने की छूट उन्हें मिलनी चाहिए।

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लोकतंत्र पर फासिस्ट और कम्युनिस्ट दोनों में सर्वसत्तावाद के लक्षण होते हैं, एक ही आधार पर प्रहार करते हैं। ऊँचे और बड़े लोगों को अच्छा लगनेवाला तर्क सामने आता है । लोकतंत्र में निकृष्तम को उच्चतम स्थान मिल जाता है। सर्वसत्तावाद के समर्थक लोकतंत्र को एक धोखा मानते हैं। वे मानते हैं, लोकतंत्र पूरा धोखा नहीं है, लेकिन अंततः धोखा है। लोकतंत्र के पक्ष में जितने तर्क हैं उन से ज्यादा विपक्ष में हैं। पाँच साल में एक बार अपने पसंदीदा को अपना समर्थन देने का मौका मिलता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उनका जीवन उनको रोजगार देनेवाले से नियंत्रित होता है। रोजगार देनेवाला से तात्पर्य सकल पूँजीवादी व्यवस्था से है , जो पूँजीवादी व्यवस्था इस या उस तरीके उसके पसंदीदा को अपनी ओर मोड़ लेता है। लोकतंत्र के सारे गुण तभी तक बने रहते हैं जब तक पूँजीवादी व्यवस्था इसे बने रहने देती है। यह एक ऐसी दुनिया होती है जहाँ स्वशासित या स्वनियंत्रित व्यक्ति नहीं होता। आलोचना का मोल नहीं रहता है। लेखक के पास कुछ बुनियादी निष्ठा होनी चाहिए। आज के दौर में लेखन एक व्यक्तिगत मामला होता है। ऑरवेल के मन में केंद्रित अर्थव्यवस्था  इस में वे पूँजीवाद और समाजवाद (स्टेट कैपिटलिज्म) को भी जोड़ लेते हैं। बेरोजगारी, गरीबी से मुक्त करनेवाला हमारा बुद्धि और संवेदना, अर्थात संपूर्ण प्रज्ञा का नियंत्रण, या अपने पक्ष में अनुकूलन भी देर सबेर कर लेता है। हमने देखा है भारत में एक कंपनी अपने कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम दाम में अपना शेअर बेचती है और शेअरधारक कर्मचारी अपनी कंपनी के नफा-नुकसान की चिंता कंपनी के मालिकों से अधिक करने लगता है। बहुत सारे शेअर धारक मतदाता भी होते हैं। सारे मतदाता शेअर धारक नहीं होते हैं, लेकिन सारे शेअर धारक मतदाता होते हैं। क्या ऐसे माहौल में जहाँ व्यक्ति के चिंतन मनन , संवेदनाओं, इच्छा और चयन आदि की स्वायत्ता न हो और ये क्षण-क्षण बदलने की छम-छम चपलताओं से आक्रांत हों वहाँ क्या लेखन संभव है! ऑरवेल मानते हैं नहीं। ऑरवेल का मानना जरूरी नहीं कि हमारे लिए भी सही हो, बल्कि नहीं है। हाँ, कठिन जरूर है। यह  सच है कि जब व्यक्ति जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के संदर्भ  में गत्यात्मक स्थिरता (इसे जड़ता न समझा जाये) न हो तो, उसकी प्रज्ञात्मक-स्वायत्ता, मानसिक स्वायत्ता, चयन की इच्छा और क्षमता भंगुर हो जाता है। जब इच्छा की स्वतंत्रता नहीं तब नैतिकता की बात बे मानी है, यह बात तो बार-बार कही गई है। जब इच्छा स्वायत्त नहीं तो चिंतन का स्वायत्त होना दूर की कौड़ी है। से में गाँधियन नैतिकता और मार्क्सवादी दृष्टि काम आ सकती है – अलग-अलग नहीं, इनके भौतिक मिश्रण से नहीं, बल्कि एक साथ और इनके रासायनिक मिश्रण से। भौतिक मिश्रण और रासायनिक मिश्रण के अंतर पर यहाँ विस्तार से कहने की जरूरत नहीं है। एक बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए, समाजवाद और फासीवाद दोनों एक ही तरह के कारण से लोकतंत्र का विरोध कतरते हैं, लेकिन हम ने दोनों के विरोध के अंतर को ठीक से समझा नहीं। हमने फासिज्म और सोशलिज्म को ही तरह का बरताव किया – जबकि फासिज्म खुद निकृष्ट है और उत्कृष्ट के बारे में सोचता भी नहीं है, वहीं शोसलिज्म निकृष्ट को उत्कृष्ट बनाने की बात पर सोचता है। यह सच है कि ऊँचे और बड़े लोगों को भी जीवन में भौतिक समृद्धि के उपरांत जो भी आधिभौतिक भौतिक चाहिए वह लोकतंत्र में ही मिल सकता है। निकृष्तम को उच्चतम स्थान मिलने का तर्क उतना प्रभावी नहीं रह जाता है। और अंततः निकृष्ट के उत्कृष्ट बनने की प्रक्रिया की खोज शुरू होगी। इस खोज के रास्ते कठिन होंगे, लेकिन  में गाँधियन नैतिकता और मार्क्सवादी दृष्टि  का रसायन उनका पाथेय या बटखर्चा  जोगाता रहेगा। इस काम में साहित्य की भूमिका है, बस साहित्यकार को समकालीन हताशा से बाहर निकलना होगा और समझदार पूँजी का सहयोग मिलेगा। और हाँ, आगत एवं आसन्न संकट का संबंध सिर्फ व्यवस्था की वैचारकिता से तो है ही, कुव्यवस्था के कारण हुए प्राकृतिक क्षरण से भी है। यह फासिज्म का नहीं, उसके पार का और उससे अधिक भयावह दौर है, खैर।

ऑरवेल के निष्कर्ष को भाषा के पार जाकर देखना चाहिए, उन्हें फासिज्म और सोशलिज्म के पश्च प्रभाव (After Affect) को समझने का मौका नहीं मिला, थोड़े-से विभ्रमित निष्कर्ष पर पहुँचने की छूट उन्हें मिलनी चाहिए। बाकी फिर कभी।

(महेश मिश्र के वाल पर टिप्पणी के संदर्भ में)

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

इंसाफ की डगर

इंसाफ की डगर
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लोकतंत्र से क्या अपेक्षा होती है? लोकतंत्र से जो भी अपेक्षा होती है, उस अपेक्षा के पूरे होना का दारोमदार लोकतंत्र के नेताओं पर होता है। लोकतंत्र के नेता अपने व्यवहार में लोकतांत्रिक हों भी यह जरूरी तो नहीं रह गया है! फिर भी उम्मीद तो, उन्हीं से होती है। 1961 में एक फिल्म आई थी – गंगा जमुना। भारत की संस्कृति गंगा-जमुनी है। इस फिल्म में शकील बदायूनी का एक गीत है, इसे गायक हेमंत कुमार ने गाया है। यह गीत बहुत लोकप्रिय भी हुआ था, आज इसकी चर्चा कम होती है। संदेश यह कि लोकप्रियता चाहे जितनी ऊँची हो, एक दिन वह लोक स्मृति से निकल ही जाती है। बहरहाल उस गीत की कुछ पंक्तियों को याद किया जा सकता है –

इंसाफ की डगर पर बच्चो दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
सच्चाइयों के बल पर आगे बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
अपने हों या पराए, सब के लिए हो न्याय
रस्ते बड़े कठिन हैं, चलना सम्हल सम्हल के
इंसानियत के सर पर इज्जत का ताज रखना
तन मन की भेंट देकर भारत की लाज रखना
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के

लोकतंत्र अपने नेताओं से इससे ज्यादा क्या उम्मीद रखता है! बहरहाल, बच्चे बड़े हो गये, बाकी तो दिख ही रहा है! लोकतंत्र के संदर्भ में, उसके खतरों के बारे में, महत्त्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध न हों तो इस गीत को सुन लीजिए; उपलब्ध हों तो उन से गुजरते हुए इसे भी सुन लीजिए।

लोकतंत्रीय नागरिक

लोकतंत्रीय नागरिक 

आज राज्य और समाज भयानक तनाव से गुजर रहे हैं। मणिपुर की घटना से लोग बहुत विचलित हैं। लोकतंत्रीय सरकारों के रहते यह सब हुआ है, होता रहा है। इस तरह की घटनाओं को, वह कहीं भी हो, नजरंदाज करना मुश्किल तो है ही, खतरनाक भी है। याद करना चाहिए, ‘भारत में विभिन्न वंशों और राजाओं का शासन रहा, लेकिन समाज अपना काम करता रहा और कभी भी इस काम में कोई दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की। राजनीतिक नेतृत्व के परास्त होने या शासन से बाहर कर दिये जाने के बावजूद, बिना किसी उथलपुथल के इसकी संपन्नता अक्षुण्ण रही। सापेक्षिक रूप से समाज स्वशासी था। समाज और राज्य स्वतंत्र इकाई के रूप में काम करते थे, यह टैगोर का स्पष्ट रूप से मानना था।’ (साभारः THE POLITICAL IDEAS OF RABINDRANATH TAGORE: Reflections of a Public Intellectual: SUBRATA MUKHERJEE)
 समाज में स्वशासन का होना आज दूर की कौड़ी हो गई है। यह राजनीतिक विफलता से अधिक नागरिक जमात की बौद्धिक एवं सामाजिक अनुपस्थिति से उत्पन्न संकट है। लोकतंत्र के नाम पर समाज धर्म, समुदाय आधारित वोट बैंक में और नागरिक महज वोटर बनकर रह गया है।  दुनिया भर में घट रही घटनाओं को देखते हुए यह साफ-साफ मान लेना चाहिए कि सराकारें, वे कैसी भी हों कहीं भी हों, कभी नहीं चाहती हैं कि समाज लोकतंत्रीय हो। चुनाव केंद्रित राजनीतिक दलों से इस मामले में, अब व्यर्थ की न तो लोकतंत्रीय उम्मीद की जानी चाहिए और न ही दोष देना चाहिए। यह मान लिया जाना चाहिए कि सारा दारोमदार नागरिकों पर ही है। लोकतंत्र के प्रति निष्कपट निष्ठा रखनेवाला नागरिक जमात ही लोकतंत्रीय समाज और लोकतांत्रिक सरकार बनवा सकता है। एक अच्छा नागरिक होने के लिए क्या जरूरी है?  ‘किसी व्यक्ति को अच्छा हरवाहा बनने के लिए भूगर्भशास्त्री बनने की जरूरत नहीं है और इस बात की भी जरूरत नहीं है कि वह उस चट्टानी परत को या उसके नीचे की चट्टानी परत को जाने जो उस मिट्टी को थामे है, जहाँ वह रहता है और काम करता है और जहाँ से वह अपने लिए पोषण प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अच्छा और उपयोगी नागरिक बनने के लिए यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति अच्छा इतिहासकार हो और यह जाने कि जिस संसार में वह रहता है वह कहाँ से आया और जहाँ वह रहता है तथा काम करता है और जहाँ से वह अपना श्रेष्ठ पोषण हासिल करता है, उस बौद्धिक जमीन को तैयार करने के लिए मानव जाति को भाषा, धर्म और दर्शन के कितने चरणों से होकर गुजरना पड़ा है।’ (साभारः Bharat : Hamein Kya Sikha Sakta Hai? (Hindi Edition)Max Muller and Suresh Mishra)
 जी, सारा दारोमदार नागरिकों पर ही है।


अचानक छा जाता है अंधेरा

अचानक छा जाता है अंधेरा

अचानक छा जाता है अंधेरा

फिर उठता है पर्दा

मंच पर बिखर जाती है रौशनी

पर्दा उठानेवाला भी अंधेरे में  

दर्शक दीर्घा भी अंधेरे में

बहुत मद्धम उजाला नेपथ्य में

 

मंच के नीचे से आती है आवाज

दर्शकों को अंधेरे में क्यों रखा जाता है!

जवाब देता है पर्दा उठानेवाला

कृपया, शांति बनाये रखें

ऐसा ही होता आया है शुरू से

नाटक का यही है रिवाज

शांत पापम, बिल्कुल शांत फालतू आवाज।

 हँसता हुआ सूत्रधार, सूत्र से पीठ खुजलाते हुए

जनता खुश होना क्यों नहीं सीखती

जानते हुए भी कि खुश न होना द्रोह है!

नेपथ्य से आती है आवाज जनता खुश है महाराज!

काली रौशनी कहकहे में लिपटकर पसर जाती है!

आकाशवाणी, पुष्प वृष्टि

नाटक का यही है रिवाज

शांत पापम, बिल्कुल शांत फालतू आवाज।

छा जाता है अंधेरा।

लोकतंत्र का भविष्य पर

लोकतन्त्र का भविष्य : लोकतान्त्रिक सरकार के लिए लोकतान्त्रिक समाज होना अनिवार्य है!
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आज के प्रश्न की पुस्तक श्रृँखला की 24वीं कड़ी में Vani Prakashan वाणी प्रकाशन की नई पुस्तक लोकतन्त्त्र का भविष्य Arun Tripathi अरुण कुमार त्रिपाठी के संपादन में आई है। इस पुस्तक में कई महत्त्वपूर्ण आलेख हैं। इन आलेखों में लोकतंत्र के भविष्य के संदर्भ में काफी गहन चिंतन किया गया है। सिर्फ भारत के लोकतंत्र के संदर्भ में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की घनीभूत चिंता को भी इस पुस्तक के आलेखों के केंद्र में रखा गया है। "सम्पादक की  बात" में काफी विस्तार से लोकतन्त्त्र के अतीत और वर्त्तमान के उलझे सूत्रों को सुलझाने में भविष्य की संभावित और आशंकित रूपरेखा को आँकने की तीव्र छटपटाहट है। इस छटपटाहट में भारत की अद्यतन लोकतांत्रिक स्थितियों की भी आहट है। इस पुस्तक में शामिल लेखों को पढ़ते हुए इस आहट की आवाज क्रमशः तेज होती जाती है। आम नागरिकों की तरह जनतंत्र मेरी भी चेतना का बड़ा इलाका घेरता रहा है। यह पुस्तक रेखांकित करती है कि लोकतान्त्रिक सरकार के लिए लोकतान्त्रिक समाज होना अनिवार्य है। यहाँ इस सवाल पर भी विचार करना जरूरी है कि समाज के लोकतांत्रिक होने की प्रक्रिया क्या है और इस प्रक्रिया में सरकार या राज्य की भूमिका क्या हो सकती है या होनी चाहिए। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे भी फिर से, एक स्वतंत्र लेख तैयार करने की इच्छा हो रही है। वैसे, इस पुस्तक की आलोचना की भी इच्छा है। पता नहीं यह सब मुझ से हो पायेगा या नहीं। एक बात और, यह पुस्तक आम और निर्विशिष्ट नागरिकों के लिए तो दिलचस्प है ही, राजनीति और समाज शास्त्र के शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी है।   
इस पुस्तक में शामिल हैं –
1 लोकतन्त्रः नन्ही-सी जान, दुश्मन हजार – रमेश दीक्षित
2 लोकतन्त्र का पुनर्निर्माण – शंभुनाथ
3 लोलुभावनवाद और तानाशाही – अभय कुमार दुबे
4 लोकतन्त्रः स्वप्न से अन्तर्विरोध तक – नरेश गोस्वामी
5 पूँजीवाद से परे जाने की जरूरत – विजय झा
6 लोकतन्त्र की धड़कन है आन्दोलन – डॉ सुनीलम
7 औपनिवेशिक अतीत को उतारने की जरूरत – गिरिश्वर मिश्र
8 आपातकाल का अतीत और उसका भविष्य – जयशंकर पाण्डेय
9 न्यायपालिकाः क्या कुछ संभावना शेष है? – अनिल जैन
10 गोदी मीडिया का स्तम्भ – अरुण कुमार त्रिपाठी
11 अल्पसंख्यकों को चाहिए समान अवसर – सैयद शाहिद अशरफ
12 लोकतन्त्र के हाशिये पर – कमल नयन चौबे
लगभग आम राय यह है कि दुनिया भर में लोकतंत्र के विपन्न होने में लोकतांत्रिक पद्धतियों से चुनी हुई सरकारें ही भूमिका अदा कर रही हैं; अर्थात सरसों में ही भूत! अभी तो यहाँ इतना ही।

मास क्लास

लोक

डिजिटल आवारगी

डिजिटल आवारगी

डिजिटल दुनिया में लोग पहुँच रहे हैं। कुछ लोग पहुँच चुके हैं। पहुँच ही नहीं गये हैं, वहाँ बस भी गये हैं। वहाँ उन्हों ने अपने लिए मनोबांछित घर, सड़क, गली, वाहन, वाशरूम की डिजिटल सुविधा अर्जित कर ली है। इस के साथ ही डिजिटल आवारगी के लिए भी बहुत सारे अवसर वहाँ उपलब्ध हैं। कुछ लोग अपने हिसाब से कुछ गंभीर काम करना चाहते हैं, वे भी आवारगी के सुख से खुश होने के लोभ से अपने को बचा नहीं पा रहे हैं। क्या यह डिजिटल घर सुरक्षित है? सुरक्षित हो या नहीं, सुविधाजनक बहुत ही है। सुविधा का आकर्षण कई बार सुरक्षा मानकों की अवहेलना करवा बैठता है। डिजिटल आवारगी विशेषज्ञता का दंभ भर कर किसी को भी विशेषज्ञ की भंगिमा में  कुछ भी कहने के लिए उकसाती रहती है। असल में, हाइपर एक्टिविटी हमें अटेंशन डेफिसिट में डाल देती है। इसके साथ साइबर लोफिंग या डिजिटल आवारगी की ओर मन और अधिक तेजी से लपकने लगता है।  मन की  गति से लोग जहाँ-तहाँ पहुँच जा रहे हैं।  जरूरी नहीं कि वहीं पहुँचें, जहाँ वे पहुँचना चाहते थे। यह चाहना बहुत महत्त्वपूर्ण और यह  इच्छा स्वातंत्र्य के सवाल से जुड़ा हुआ है। इतने तरह के  प्रभावों से इस तरह आच्छादित रहता है मन कि इच्छा स्वातंत्र्य की हवा निकल जाती है। निकलते हैं कहीं और के लिए, पहुँच कहीं और जाते हैं। जहाँ पहुँचते हैं, वहीं रम जाते हैं। जहाँ जाने की इछ्छा लेकर निकलते हैं उस जगह को भूल जाते हैं, उस जगह जाने की अपनी इच्छा और इच्छा के कारणों के प्रति उदासीन हो  जाते हैं। न सिर्फ उदासीन हो जाते हैं, बल्कि मानने लगते हैं कि जहाँ पहुँचे वहीं के लिए निकले थे। न इच्छा बचती है, न स्वतंत्रता। 

लेखक कुछ और लिखने के लिए बैठता है और लिखने कुछ और ही लग जाता है। पाठक कुछ और पढ़ने के लिए सोचता है पढ़ने कुछ और ही लग जाता है। हालाँकि, अब पाठक तो बचे नहीं हैं, लेखक में उन्नत या अवनत हो गये हैं। अवनत! जी हाँ अवनत। क्योंकि मेरे लिए यह मानना कठिन है कि पाठक हमेशा लेखक से कमतर होता है। लिखना एक तरह का कौशल है तो पढ़ना भी एक तरह का कौशल है। न सिर्फ दोनों तरह की कुशलता में अंतर होता है, बल्कि दोनों तरह की कुशलता के लिए भिन्न तरह की दक्षता उपयोगी होती है। अच्छे पाठक का बुरे लेखक में अंतरण पाठक की अवनति ही है। हिंदी पर तो इसका बड़ा दुष्प्रभाव हुआ है। इस प्रक्रिया में हिंदी का पाठक भी काम से गया और लेखक भी काम से गया। नहीं क्या! उच्च कोटि के पाठक के अंदर भावनात्मक उमंग और बौद्धिक समझ का  घनत्व किसी साधारण लेखक से कहीं ज्यादा होता है।  

हिंदी लेककों के पास ऐसा कोई पाठक, पाठक समूह या कम्युनिटी सपोर्ट नहीं है जो उसके लेखन की प्रक्रिया दौरान लेखन की गुणवत्ता को बढ़ाने में कोई योगदान कर सके या करता हो। यह बात भी सही है कि हिंदी के लेखक में अपने पाठक के प्रति भी कोई खास सम्मान तो बना नहीं, अब तो पाठक काअस्तित्व ही संदेह के घेरे में है। संभव है, प्रोफेसर लोग अपने छात्रों से पाठक के अभाव की थोड़ी-बहुत क्षतिपूर्त्ति कर लेते होंगे। क्या हम अपनी इच्छा और स्वतंत्रता को समझने और इनकी परवरिश के लिए जरा भी उत्सुक हैं! या यों ही बहते जाना है!  

मेरे ध्यान में है कि पंत जी की कविता को एक प्रोफेसर साहब न सिर्फ पढ़ते थे बल्कि उस पर बातचीत भी करते थे। मैंने महसूस जारी… 


याद नहीं, तो क्यों याद नहीं है

याद नहीं, तो क्यों याद नहीं है

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सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

मोहान में पैदा हुए हसरतें कामिल थी

नये-नये ख्वाब मुकम्मल खैरियत याद है

तो आवाज-ए इन्कलाब क्यों याद नहीं

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

वो दश्त-ए-खुद फरामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आते तो क्यों नहीं अक्सर याद आते हैं

क्या कहूँ खुद को अब मन में गरूर इस तरह कि

न दामनों की खबर है न गिरेबानों की

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

वो जो बाँसुरी रहती थी साथ उनके सदा

वो नगर आशिकी से इसरार कोई

याद नहीं है तो क्यों नहीं है

 

सवाल है तो यही सवाल कर से खुद से

सवाल कि दस्तखत नहीं वहाँ तो क्यों नहीं

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

तो फिर हसरत मोहानी क्यों याद नहीं

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

(हसरत मोहानी को याद करते हुए)