बुधवार, 10 जून 2015

हुक्मरान होगा

कुछ हुस्न-ओ-इश्क की शरारत कुछ समाजी शराफत ने परेशान किया होगा
कुछ टूटे हुए ख्वाब कुछ दरपेश हकीकत ने इस तरह से लहुलुहान किया होगा

रूह में समाकर हँसता है जो हरा जख्म इस तरह से किसी हुक्मरान ने दिया होगा
ख्वाबों ख्वाहिशों की खाल दिखे जहाँ टंगी किसी ने मालिक के दालान को दिया होगा

शुक्रवार, 5 जून 2015

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो भी अन्याय होता है, अधिकतर मामलों में अपने और अपने प्रियजनों को बढ़त देने की प्रवृत्ति से जुड़ा होता है, चाहे बस/ ट्रेन में सीट दखल का मामला हो या स्कूल /अस्पताल में दाखिला का मामला हो; अपने आसपास नजर डालें तो बात साफ हो जायेगी। रही बात समाज के दुश्मन और दोस्त होने की तो 'ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर' एक  अच्छी नीति है। अनुरोध है कि कबीर साहित्य के प्रसंग में 'निर्वैर' की संकल्पना का स्मरण करें,  इससे बात और साफ हो जायेगी, ऐसी उम्मीद है। फिर भी मन नहीं माने तो आगे बात करेंगे। क्या?

हाँ, यह मुश्किल तो है! नीति अगर अच्छी है तो वह जहां तक संभव हो, क्या बुरा है! सहज संभव तो बस अन्याय के साथ जीना रह गया है, अन्याय सहते हुए भी और करते हुए भी! क्या किया जाए, निराला की पंक्ति याद आ गई 'दगा की, इस सभ्यता ने.... खैर जाने दीजिए...