रविवार, 30 मार्च 2014

चुनावी राजनीति की पढ़ाई

चुनावी राजनीति की पढ़ाई
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आपको तो मालूम ही है उन हठी बालकों के पास--- जिनके बारे में मशहूर था कि इन राजकुमारों को कोई पढ़ा नहीं सकता और राजा पढ़ाने के हठ से हट नहीं सकते, सो बाल-हठ और राज-हठ का खेल जारी था--- एक गुरू जी पहुँचे। उन्होंने तरकीब लगाई। तरकीब के तहत बालकों से दोस्ती गाँठी। छः महीने लग गये, दोस्ती चल निकली। उपयुक्त समय देखकर गुरू जी ने छोटे राजकुमार से पूछा मान लो तुम्हारे पास तीन सेव हैं और बड़े राजकुमार के पास दो सेव हैं। तुमने एक सेव बड़े राजकुमार को दे दिया तो तुम्हारे पास कितने सेव बचे? छोटे राजकुमार ने झट से कहा, दो। फिर उसने बड़े राजकुमार से पूछा तुम्हारे पास कितने सेव हो गये? बड़े राजकुमार ने फट से कहा तीन? गुरू जी ने फिर बड़े राजकुमार से पूछा अब तुमने सारे सेव छोटे राजकुमार को दे दिया तो छोटे के पास कुल कितने सेव हो गये? बस क्या था, छोटा राजकुमार चीख उठा--- भैया सावधान, एकदम कोई उत्तर नहीं देना... यह हिसाब पढ़ा रहा है! गुरू जी को पकड़ कर, पास में एक भी सेव नहीं है और तब से सेवों के लेने-देने का हिसाब किये जा रहे हो! क्या मतलब सच-सच बतलाओ हमें हिसाब पढ़ा रहे हो? गुरू जी ने कहा, नहीं विद्या कसम मैं तुम लोगों को हिसाब नहीं पढ़ा रहा हूँ। अब दोनों राजकुमार सोच में पड़ गये, विद्या कसम खाई है, झूठ नहीं कह रहे हैं, लेकिन कुछ--कुछ तो पढ़ा रहे हैं जरूर! तो फिर क्या पढ़ा रहे हैं? दोनों ने तय किया और पूछा कि अच्छा आप हमें हिसाब नहीं पढ़ा रहे थे तो क्या पढ़ा रहे थे? गुरू जी ने कहा, मैं तुम दोनों को राजनीति पढ़ा रहा था, चुनावी राजनीति। राजकुमारों ने कहा हम तो राजकुमार हैं, चुनावी राजनीति की पढ़ाई हमारे किस काम आयेगी? गुरू जी ने कहा कि तुम लोग राजकुमार हो और राजकुमार ही रहोगे। लेकिन राजनीति यही नहीं रह जायेगी! यह पढ़ाई तब काम आयेगी जब 'सच्चा जनतंत्र' आ जायेगा क्योंकि उसमें जो होता नहीं है, उसी का हिसाब पढ़ा-पढ़ाया जाता है!

मुल्क है निःशुल्क

मुल्क है निःशुल्क


और आँख नचाकर झूमकर बोला मदारी
भाइयों और बहनों मेरी मुट्ठी में क्या है
इधर, बंदरों का नाच हो रहा था भारी
उधर, मजमा खमोश, उदास त्रिपुरारी

फिर आँख नचाकर झूमकर बोला मदारी
भाइयों और बहनों मेरी मुट्ठी में क्या है

रंग-अबीर नहीं, है बच्चों की किलकारी
मुट्ठी में बंद है, हवा, और हवा बेचारी
सुर्रर्रर्र, जब चाहूँ खोल दूँ, हवा चला दूँ
हवा दंगे की, हवा फसाद की, विकास की
भाइयों और बहनों, ये हवा बहुत है प्यारी
मान भी जाओ, जो भी हो पास, सब धरो
अब देखो यह छप्पन इंच का चौड़ा सीना
अपना मरना, मुर्दों के टीले पर मेरा जीना
देखो-देखो प्यारे दोनों आँख खोलकर देखो
डरो मुझ से तुम, नहीं प्यार से तो डर से दो
जो है पास तुम्हारे, रूप, रुपैया नोट या वोट
हाँ करो समर्पण, करो समर्पण, करो समर्पण
जोर से गाओ गान हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन
पीयो चाय और जो भी है पास चुप-चाप धरो
तेरा जीना क्या, मरना क्या, मेरी मुठ्ठी में क्या

अब थोड़ा-सा आँख बचाकर झूमकर बोला मदारी
लो पीयो चाय, लो चुस्की लो, लोकतंत्र बस चुस्की है
सत्ता, जनता की? अब भी नहीं पता कि वह किसकी है
बस इतना अब भी मान जाओ कि लोकतंत्र बस चुस्की है

याद रहे, भाइयो और बहनो, मेरी मुट्ठी में मुल्क है निःशुल्क

तेरी यादों की रौशनी में

तेरी यादों की रौशनी में

मेरे इसरार में कभी तुम्हारा नाम नहीं आयेगा
तुम्हारी खामोशी में, मैं अपना नाम पढ़ लूँगा

आँखों में जब भी कोई खूबसूरत अक्स उतरेगा
तेरी यादों की रौशनी में, मैं खबर को पढ़ लूँगा

यह एहसास बेशकीमती है, रैपर में नहीं बँधेगा
लिफाफा जस-का-तस, मजमून सारा पढ़ लूँगा

किसी गुमशुदा का जब भी कोई चेहरा दिखेगा
देखना जरा गौर से, मैं तुम्हारी आँख पढ़ लूँगा

शनिवार, 29 मार्च 2014

रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए!




रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए!


कैसे जिया, अब उनको मेरी जिंदगी का हिसाब चाहिए।
बंद आँखों से पढ़ी जा सके, ऐसी खुली किताब चाहिए।

मैं अपने काम में डूबा हुआ, उनको हाथ में रबाब चाहिए।
उनकी सारी नींद मैं ले लूँ और उनको मेरा ख्वाब चाहिए।

मैं वतन का मुहब्बत हूँ, उनको वतन का असबाब चाहिए।
छुपा कर रखें खंजर जो, उनको मेरे हाथों गुलाब चाहिए।

अंधेरे में कटी जिंदगी, उनको आफताव, महताव चाहिए।
मुल्कियों की गरीबी अपनी जगह, उनको बेहिसाब चाहिए।

मेरे दुख में जो रहे नहीं शरीक, उनको भी इंतखाब चाहिए।
अब आप ही करें तय कि रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए।

सोचो भैया, बहना सोचो

सोचो

सोचो भैया, बहना सोचो, 
यही वक्त है, सही वक्त है

सोचो भैया, बहना सोचो, यही वक्त है, सही वक्त है, सोचो क्योंकि,
भावनाओं के बरसाती नाले में, बहे जा रहे हैं, जड़ उखड़े महा वृक्ष और खढ़ पतवार।
देख रहा है, बड़े गौर से, यह भारत देश बूढ़ा, पर नहीं कहीं से थोड़ा-सा भी लाचार।
गाँव, गली में वोट बटोरू ठग घूम रहे, ले दाना और महाजाल, ये हि़टलर के अवतार।
कौन बचाये इन लोगों से देश को, जो आता अपना-सा बनकर, कर जाता है बंटाढार।
पानी कम पर तूफान बहुत है, डरा-डरा-सा यह जीवन, जय हो, हे विश्वनाथ दरबार।
न्याय का पाउच एक हाथ में लेकर लुभा रहे जन को, अन्यायी और उनके लंबरदार।
विचर रहे हैं राम, कृष्ण, चंद्रशेखर, सुभाष, भगत सिंह, आंबेदकर के ओढ़ किरदार।
नेहरू, गाँधी, जयप्रकाश, लोहिया संग देखो कैसा करते हैं, ये सपूत चुनावी व्यवहार।
भाषा भ्रष्ट, नीयत भ्रष्ट, चाल, चलन, खान-पान, रहन भ्रष्ट, ये खुद जिंदा भ्रष्टाचार।
सावधान विश्वनाथ, जिस माथे पर गंगा मैया का सदावास, टूट पड़ा उस पर पहाड़।
चाय, कचौड़ी, गर्म जलेबी, और न जानें क्या लेकर आयेंगे भैया रखना बंद किबार।
सुनना सब, ये अपने ही हैं, जैसे हैं, करना मन की, पहले लेना जमकर सोचविचार।
न सोचा, बहते गये भाव में तो समझो डूबी नैया बिन पानी के, होगा कैसे बेड़ा पार।
ढोल, नगाड़ा, कीर्तन, काला, सफेद और नीला, पीला सारे हैं, पर केवल शिष्टाचार।
विपदा बड़ी भारी, थोड़ा भी सोच लिया तो देश को मिलेगा इतने से ही बड़ा सम्हार।
सोचो भैया, बहना सोचो, यही वक्त है, सही वक्त है, सोचो..........

मन उढ़रल जाइ

मन उढ़रल जाइ

माई गे, बतहवा दुआरे मन उढ़रल जाइ

काज क कथा स रहे दूरे दूर
ठोकै ताल, ललकारै भरपूर

कहियो सोन त बूझै आखार
लागए जेना, झूठक अवतार

ई है सरकार, हो उहे सरकार
वोटवा के बतहा करए ब्यौपार

सबहिक मन लोभी, उठावै उढ़ार
माई रे, माई के करे ऐसन विचार

दुख-सुख नहिं खाली सूखल प्रचार
मन थथमार माई, देख वोटवा के पार

माई गे, बतहवा दुआरे मन उढ़रल जाइ

गुरुवार, 27 मार्च 2014

जरूरी है देश

मूसलधार वर्षा के बाद उगी धूप में
खिलखिला उठती है बरसाती पनाली
जब किसी बूढ़े वृक्ष के बिछे हुए तने पर
फुदकते हुए पार हो जाती है नन्ही गिलहरी

सहम उठता है वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
आदमी और आदमी के बीच, आदमी और प्रकृति के बीच
अविश्वास का धुँआ, होता चला गया है इतना घना
कि वह अब, जोड़ने की किसी तमीज तक
उसे पहुँचाने में असमर्थ है, कि प्रकृति का समर्थ संकेत भी
आदमी के लिए व्यर्थ है

स्तब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
अब कोई मरणासन्न बूढ़ा, अपने बेटों को एकता का
पाठ पढ़ाने के बहाने, उसकी सूखी टहनियों को
जोड़कर एक नहीं करता

क्षुब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
दुनिया के विश्वग्राम में बदलते जाने पर वे भी
नाच में शामिल हैं,जिनका अपना गाँव
उजड़ गया है इस आँधी में

दुखी है, बहुत दुखी है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
उसने आदमी और आदमी के बीच बढ़ती दूरियाँ देखी हैं
संततियों के लगातार दूर होते जाने की
बनती मजबूरियाँ देखी है

बहुत परेशान है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
कोई ईश्वर नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई ग्रंथ नहीं,
कोई ज्ञान नहीं, कोई विज्ञान नहीं, कोई विवेक नहीं
जो एहसास करा सके आदमी को कि जब नैया डूबती है
तब बचते वे भी नहीं, जिनके पैर में
खूबसूरत, चमकदार, कीमती जूते होते हैं

जब डूबता है देश, तब डूब जाते हैं, सारे महेश-गणेश-सुरेश
इसलिए जरूरी है देश -
नारे की शक्ल में, मगर पत्थर की तरह उछाल भर देने से
जरूरत की परवरिश नहीं हो जाती है

सहमा हुआ, स्तब्ध, दुखी, परेशान वृक्ष का बिछा हुआ तना
आज भी लुकाठी की तरह जलने को है तैयार
उसे बस कबीरायी साहस का है इंतजार