शनिवार, 15 मार्च 2014

स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है

स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है

शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर किसी उत्ताल नदी के किनारे खड़ी कुछ-कुछ नीहारती रहती हो
शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर हवा की तरंगों में चढ़कर फूलों की सुरभि को घोलती रहती हो
शायरों, कवियों ने बार-बार कहा है
तुम अक्सर हुलास में जमीन को आसमान की ऊँचाइयों से मिलाती रहती हो

मैं शायर, कवि या वैसा नहीं लेकिन पाया है
असल में तुम जहाँ खड़ी हो जाती हो, एक नदी वहाँ से बहनी शुरू हो जाती है
तुम को छूकर हवा तरंग बन जाती है और अपने अंदर सुरभि को समेट लेती है
तुम जब कभी आसमान से नजर मिलाती हो, आसमान जमीन पर उतर आता है
हाँ, तुम जब कभी मेरे सपनों में आ जाती हो, एक ब्रह्मांड आकार पाने लगता है
तुम्हारी कोख में रहकर मैंने जाना, कि स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है
सच है बिल्कुल मैं शायर, कवि या वैसा नहीं लेकिन दुनिया को ऐसा ही पाया है
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