शनिवार, 29 मार्च 2014

रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए!




रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए!


कैसे जिया, अब उनको मेरी जिंदगी का हिसाब चाहिए।
बंद आँखों से पढ़ी जा सके, ऐसी खुली किताब चाहिए।

मैं अपने काम में डूबा हुआ, उनको हाथ में रबाब चाहिए।
उनकी सारी नींद मैं ले लूँ और उनको मेरा ख्वाब चाहिए।

मैं वतन का मुहब्बत हूँ, उनको वतन का असबाब चाहिए।
छुपा कर रखें खंजर जो, उनको मेरे हाथों गुलाब चाहिए।

अंधेरे में कटी जिंदगी, उनको आफताव, महताव चाहिए।
मुल्कियों की गरीबी अपनी जगह, उनको बेहिसाब चाहिए।

मेरे दुख में जो रहे नहीं शरीक, उनको भी इंतखाब चाहिए।
अब आप ही करें तय कि रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए।
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