शनिवार, 29 मार्च 2014

सोचो भैया, बहना सोचो

सोचो

सोचो भैया, बहना सोचो, 
यही वक्त है, सही वक्त है

सोचो भैया, बहना सोचो, यही वक्त है, सही वक्त है, सोचो क्योंकि,
भावनाओं के बरसाती नाले में, बहे जा रहे हैं, जड़ उखड़े महा वृक्ष और खढ़ पतवार।
देख रहा है, बड़े गौर से, यह भारत देश बूढ़ा, पर नहीं कहीं से थोड़ा-सा भी लाचार।
गाँव, गली में वोट बटोरू ठग घूम रहे, ले दाना और महाजाल, ये हि़टलर के अवतार।
कौन बचाये इन लोगों से देश को, जो आता अपना-सा बनकर, कर जाता है बंटाढार।
पानी कम पर तूफान बहुत है, डरा-डरा-सा यह जीवन, जय हो, हे विश्वनाथ दरबार।
न्याय का पाउच एक हाथ में लेकर लुभा रहे जन को, अन्यायी और उनके लंबरदार।
विचर रहे हैं राम, कृष्ण, चंद्रशेखर, सुभाष, भगत सिंह, आंबेदकर के ओढ़ किरदार।
नेहरू, गाँधी, जयप्रकाश, लोहिया संग देखो कैसा करते हैं, ये सपूत चुनावी व्यवहार।
भाषा भ्रष्ट, नीयत भ्रष्ट, चाल, चलन, खान-पान, रहन भ्रष्ट, ये खुद जिंदा भ्रष्टाचार।
सावधान विश्वनाथ, जिस माथे पर गंगा मैया का सदावास, टूट पड़ा उस पर पहाड़।
चाय, कचौड़ी, गर्म जलेबी, और न जानें क्या लेकर आयेंगे भैया रखना बंद किबार।
सुनना सब, ये अपने ही हैं, जैसे हैं, करना मन की, पहले लेना जमकर सोचविचार।
न सोचा, बहते गये भाव में तो समझो डूबी नैया बिन पानी के, होगा कैसे बेड़ा पार।
ढोल, नगाड़ा, कीर्तन, काला, सफेद और नीला, पीला सारे हैं, पर केवल शिष्टाचार।
विपदा बड़ी भारी, थोड़ा भी सोच लिया तो देश को मिलेगा इतने से ही बड़ा सम्हार।
सोचो भैया, बहना सोचो, यही वक्त है, सही वक्त है, सोचो..........
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