तेरी आबरू क्यों महज जिस्मानी है

साफ-साफ कह दो इस बार मोहब्बत है कि मेहरबानी है
तिलस्म महल में, पता नहीं चलता जमीन है कि पानी है

झुक-झुक कर सलाम करती है बुजुर्गियत है कि जवानी है
रगों में भटक रहा है जो इधर-उधर वह खून है कि पानी है

पट्टी बँधी आँख में जनतंत्र है या कि बस संसदीय कहानी है
इस तरह जुल्म सह लेना मेरा नाकारापन है कि नादानी है

हर बेगैरत बात पर अकड़ जाने की बात तो बहुत पुरानी है
नयी लोच है मुझ में, हमनवाँ झुक जाना मेरी बुद्धिमानी है

जो शहर में शोर मचा है वह माजरा, यकीनन परेशानी है
मुक्कमल इंसान है फिर तेरी आबरू क्यों महज जिस्मानी है

साफ-साफ कह दो इस बार मोहब्बत है कि मेहरबानी है
तिलस्म महल में, पता नहीं चलता जमीन है कि पानी है

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