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जो खो गया, उससे बेहतर की खोज

जो खो गया, उससे बेहतर की खोज

––––––––––1

आरंभ

मेरी आँख — सामाजिक आँख — जब खुल रही थी, उस समय प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस सरकार द्वारा देश पर लादी गई राजनीतिक आपातकाल चल रहा था। जिस तरह से देश पर राजनीतिक आपातकाल लागू की गयी, दल के रूप में कांग्रेस राजनीतिक रूप से जरूर जिम्मेवार कही जा सकती है, है भी। लेकिन नैतिक और राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री, श्रीमती इंदिरा गांधी इसके लिए खुद जिम्मेवार थी; करीबी लोगों की भूमिकाओं पर भी बात की जा सकती है। मानना होगा कि यह शुद्ध रूप से  तात्कालीन प्रधानमंत्री, श्रीमती इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत जिम्मेवारी थी — जैसे प्रीवी पर्स के समाप्त किये जाने, बैंकों के, कोयला क्षेत्र आदि के राष्ट्रीयकरण के लिए उनको व्यक्तिगत श्रेय दिया जाता है। हमारे जैसे बहुत सारे लोग इतना तो मानते थे कि श्रीमती इंदिरा गांधी बहुत शक्तिशाली नेता थी। साथ ही यह भी मानते थे कि हर मजबूती तारीफ के काबिल नहीं होती है — मजबूतों की हर बात तारीफ के काबिल नहीं होती है।

यह सच है कि राजनीतिक आपातकाल लागू करने की प्रशंसा नहीं की जा सकती है, लेकिन तात्कालीन परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए; तात्कालीन शासन व्यवस्था की ज्यादातियों पर भी विचार किया जाना चाहिए। विचार किया गया है — लेकिन सिर्फ राजनीतिक स्तर पर, न सामुदायिक स्तर पर, न नागरिक मंच पर, न ही नागरिक जमात के अंदर।

यह सच है कि जयप्रकाश नारायाण के नेतृत्व में चले राजनीतिक आंदोलन ने देश की हवा बदल दी। इस बदली हुई राजनीतिक हवा को प्रधानमंत्री, श्रीमती इंदिरा गांधी ने समझा, उसका दबाव महसूस किया — राजनीतिक आपातकाल ढीला हुआ, चुनाव हुआ और सत्ताधारी दल सत्ता से बाहर हुआ। चुनकर आये सत्ताधारी दलों की सरकार ने राजनीतिक आपातकाल को हटाकर सामान्य स्थिति बहाल की। उस समय के विपक्ष का राजनीतिक रूप से यह कहना गलत नहीं है कि राजनीतिक आंदोलन के दबाव से यह सब हुआ, लेकिन इसे समग्र रूप में नागरिक सच मान लेने में भी बुद्धिमत्ता नहीं है। यह मानने में कोई गुरेज नहीं है कि राजनीतिक आपातकाल का विरोध और राजनीतिक आंदोलन नागरिक अधिकार और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार की सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत जरूरी था। आज जरूरत इस बात की है कि हम नागरिक पूर्वग्रह मुक्त मन-मस्तिष्क  और खुले दिल से यह भी आकलित करें कि इस दौरान हमने क्या खोया, क्या पाया, हमारा अनुभव क्या कहता है, खैर यह तो इतिहास की बात है। वैसे, नेपोलियन बोनापार्ट के कहे को मानें तो — इतिहास झूठ का एक समूह ऐसा होता है जिस पर लोग सहमत हो चुके होते हैं (History is a set of lies that people have agreed upon  —  Napoleon Bonaparte)। मतलब! इतिहास होता नहीं, गढ़ा जाता है। खैर यह सब अपनी जगह, मूल बात यह है कि जिनके सामने राजनीतिक आपातकाल भारत में लागू हुआ उन में से अधिकांश अभी जिंदा हैं, अपना अनुभव बता सकते हैं।

राजनीतिक आपातकाल लागू करते समय श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश पर फासीवाद का खतरा मँडराने और उससे मुकाबले का तर्क दिया था। वह तर्क कितना वास्तविक था, कितना राजनीतिक था और इसका राजनीतिक मुकाबला कैसे और कितना हुआ, इस पर भी सोचने की जरूरत हो सकती है। लोकलुभावन राजनीति के इस दौर में यह भी सोचना होगा कि इसका मुकाबला कोई राजनीतिक दल अकेले कर सकता है या इसमें नागरिक मंच और नागरिक जमात की भी भूमिका है! नागरिक मंच और नागरिक जमात की भी भूमिका है, तो वह क्या है और कैसे उसका निर्वाह किया जा सकता है? जो खो गया, उससे बेहतर की खोज जरूरी तो है न!

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आपकी राय के आलोक में जारी —

2.

हाँ, राजनीतिक आपातकाल लागू हुआ था

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न्यायमूर्ति जग मोहन लाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री, श्रीमती इंदिरा गांधी को उस चुनाव में दो अनियमितताओं का दोषी ठहराया था — पहली यह कि प्रधानमंत्री सचिवालय में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी यशपाल कपूर का इस्तेमाल चुनाव में किया जाना और दूसरी यह कि जिन मंचों से श्रीमती गांधी ने चुनावी रैलियों को संबोधित किया, उन मंचों को तैयार करने में उत्तर प्रदेश में कार्यरत सरकारी अधिकारियों की लेना। राजनीतिक आपातकाल के दौरान जिन पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था उनमें से एक प्रमुख पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब “इमर्जेंसी ए इनसाइड स्टोरी” में दर्ज किया है —  “राज नारायण 1 लाख से अधिक वोटों के अंतर से हार गए थे। वास्तव में, ये अनियमितताएँ वैसी नहीं थीं, जिनसे हार-जीत का फैसला हुआ हो। ये आरोप एक प्रधानमंत्री को अपदस्थ करने के लिए बेहद मामूली थे। यह वैसा ही था जैसे प्रधानमंत्री को ट्रैफिक नियम तोड़ने के लिए अपदस्थ कर दिया जाए।” राजनीतिक आपातकाल लागू करने के पीछे इस अदालती फैसले को मोटे तौर पर एक कारण माना जाता है। अदालती फैसला को एक तात्कालिक कारण माना जाता है, और वह था भी लेकिन यह एक मात्र कारण नहीं था। अब अगर कुलदीप नैयर की बात मानें तो आरोप और सजा में अन-आनुपातिक संबंध तो था — माना जा सकता है कि यह अदालती फैसला राजनीति से प्रेरित नहीं था, लेकिन इस अदालती फैसले से राजनीतिक माहौल में युगांतरकारी बदलाव के हो जाने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इस अदालती फैसले को कोई राजनीति प्रेरित कहना चाहे तो उसका प्रतिवाद करना आसान नहीं है। यह जरूर ध्यान रखना होगा कि इस दौरान राजनीतिक मकसद ने भी अदालत और कानूनी संरचना को प्रभावित किया — @madhukantjha की टिप्पणी के संदर्भ में है। @amarnathgupta की टिप्पणी के संदर्भ में — हाँ, राजनीतिक आपातकाल के विरोध में चला आंदोलन ईमानदार हाथ में था, लेकिन इसके अन्य घटकों के दिल के मैल की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है — भले ही इसका कारण विभिन्न दलों और नेताओं की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और सत्ता लोलुपता को ही क्यों न ठहराया जाये। जनता और संविधान ने तो पाँच साल का समय दिया था। चला  बहरहाल,  इस बात को यहीं छोड़ते हैं, आगे बढ़ते हैं।

आज की परिस्थिति

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जिस राजनीतिक मकसद से संविधान के प्रावधानों के राजनीतिक इस्तेमाल से आपातकाल लगा वे सारे मकसद बिना आपातकाल लगाये पूरा किया जा रहा है — ऐसा आज का विपक्ष आरोप लगाता है। विपक्ष का आरोप अपनी जगह, अधिकतर नागरिकों को क्या लगता है, महत्त्वपूर्ण यह है। मुझे तो विपक्ष का आरोप सही लगता है। नागरिक मन निराश और हताश है — सवाल, रोजी-रोटी का हो, महँगाई में उछाल का हो, अर्थनीति में साँठ-गाँठ (क्रोनी कैपटलिज्म) का हो, बेहतर नागरिक सुविधा का हो, स्वास्थ्य सेवा की सुलभता या गुणवत्ता का हो, समुचित शिक्षा व्यवस्था की सुलभता का हो, सामाजिक समरसता और संसाधनिक संतुलन का हो, सामाजिक न्याय और व्यक्ति और नागरिक गरिमा का हो। भारत में संसाधनों की कमी से भारत का नागरिक अवगत है — नागरिक मन तब फटता है जब गैर-आर्थिक मुद्दों पर भी वह छला हुआ महसूस करने लगता है। विभिन्न सेवा प्रदाताओं की तरफ से ठगा जाकर असहाय होना महसूस करने लगता है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India) की गतिविधियों से उपभोक्ता क्या उम्मीद करता है, करता भी है या नहीं! नागरिक मन अपनी हताशा और निराशा से कैसे बाहर निकले?

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आपकी राय से, जारी —

 

3

यह कैसे हुआ, क्यों कर हुआ

याद करते हैं डॉ मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी सालों को, लेकिन पहले उनकी शुरुआत। डॉ मनमोहन सिंह दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। विभिन्न हैसियत में भारत सरकार के वित्तीय मामलों पर सलाहकार और कर्ता के रूप में उनकी प्रभावी भूमिका रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर भी रहे। कई प्रधानमंत्रियों के साथ उन्हें काम करने का मौका मिला। न सिर्फ प्रधानमंत्री, के साथ उन्होंने काम किया, बल्कि खुद प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिला — दो-चार महीने, साल नहीं दो दशक तक वे प्रधानमंत्री रहे। लंबे समय तक जुझारू राजनीतिक जीवन के अनुभवों से समृद्ध लोक प्रिय प्रधानमंत्री, अटल विहारी बाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को दुबारा सरकार बनाने जितना बहुमत नहीं मिल सका — सरकार बनाने जितना बहुमत मिला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (युपीए) को। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के प्रमुख दल भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, एवं अन्य नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के मामलों को बहुत जोरदार ढंग से अपने राजनीतिक दाँव के रूप में उठाया। सोनिया गांधी को बहुमत हासिल करनेवाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (युपीए) के दलों का समर्थन हासिल था। लगभग तय था कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रही हैं — उस समय (25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक) भारत के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम थे — भारत के वैज्ञानिक और मिसाइल मैन के रूप में विख्यात थे। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का भारत के लोगों से, खास कर युवाओं से, बहुत गहरा भावात्मक और बौद्धिक लगाव था — युवा तो उन्हें अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में स्वीकार करते थे।

अपनी पुस्तक “टर्निंग प्वाइंट्स” में ए.पी.जे. अब्दुल कलाम लिखते हैं — “अपने कार्यकाल में मुझे बहुत-से कठिन निर्णय लेने पड़े। मैंने हमेशा कानूनी और संवैधानिक परामर्शों के आधार पर, अपने विवेक से फैसले किये। अपने हर फैसले के पीछे मेरी यही कोशिश रही कि मैं संविधान की प्रकृति, पवित्रता और दृढ़ता की रक्षा कर सकूँ।” इसी पुस्तक में, डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनाये जाने के बारे में वे लिखते हैं — “मेरे पास लोगों, संगठनों और राजनीतिक पार्टियों द्वारा भेजे गये बहुत से ई मेल, और पत्र आये, कि मैं सोनिया गाँधी को देश का प्रधानमंत्री न बनने दूँ। मैंने वह सारे पत्र वगैरह, बिना अपनी किसी टिप्पणी के, सूचनार्थ, अनेक सरकारी एजेंसियों को भेज दिए। इसी बीच, मेरे पास बहुत से राजनेता इस बात के लिये मिलने आये कि मैं किसी दबाव के आगे कमज़ोर पड़ कर, श्रीमती सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री न बनने दूं। यह निवेदन किसी भी तरह संवैधानिक नहीं था। वह अगर अपने लिये कोई दावा पेश करेंगी तो मेरे पास उसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं होगा। तयशुदा समय शाम 8:15 पर श्रीमती गांधी राष्ट्रपति भवन आईं और उनके साथ डॉ. मनमोहन सिंह थे। इस भेंट में, रस्मी खुशनुमा बातचीत के बाद उन्होंने मुझे अपने गठबंधन वाले दलों का समर्थन पत्र दिया। उसके बाद मैंने सरकार बनाने योग्य दल के रूप में उनका स्वागत किया और कहा कि राष्ट्रपति भवन उनके बताए समय पर शपथ ग्रहण समारोह के लिये तैयार है। उसके बाद उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री पद के लिये डॉ. मनमोहन सिंह को नामांकित करना चाहती हैं। वह 1991 के आर्थिक सुधार के नायक हैं, काँग्रेस पार्टी के विश्वसनीय कर्णधार हैं तथा प्रधानमंत्री के रूप में निर्मल छवि वाले नेता हैं। यह सचमुच मेरे लिये और राष्ट्रपति भवन के लिये एक अचंभा था। सचिवालय को डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हुए और यथा शीघ्र सरकार बनाने का आमंत्रण देते हुए, दूसरा पत्र बनाना पड़ा।”

प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया गांधी को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (युपीए) का समर्थन प्राप्त था। राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम उन्हें प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करने के लिए तैयार थे। सोनिया गांधी ने फिर भारत जैसे महान देश के प्रधानमंत्री के लिए अपने बदले डॉ मनमोहन सिंह का नाम कैसे आगे बढ़ाया — यह कोई सामान्य बात नहीं मानी जा सकती है। आखिर, क्या कारण थे! क्या राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेताओं के दबाव में थीं?

आपकी राय से, जारी —

 

4

डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने

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अपनी पुस्तक How Prime Ministers Decide में प्रसिद्ध पत्रकार नीरजा चौधुरी ने दर्ज किया है — “दोपहर के लगभग 2 बजे रहे होंगे। मुझे लगता है कि यह वरिष्ठ नेताओं की बैठक होने से ठीक पहले की बात है, "नटवर सिंह ने इस लेखक से कहा। उन्होंने कहा, 'मैं मनमोहन सिंह से संपर्क करने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने कहा कि वह 10, जनपथ पर हैं... मैं उसे खोजने के लिए वहां गया ... जब मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने (सचिवों ने) कहा, 'आप अंदर जा सकते हैं। गांधी परिवार के सहयोगी के रूप में, गांधी परिवार तक उनकी आसान पहुंच थी।

उन्होंने कहा, 'वह (सोनिया) वहां सोफे पर बैठी थीं... मनमोहन सिंह और प्रियंका भी वहां मौजूद थे। कुछ देर बाद सुमन दुबे आ गई। सोनिया गांधी परेशान दिख रही थीं... तभी राहुल अंदर आए और हम सबके सामने कहा, 'मैं आपको प्रधानमंत्री नहीं बनने दूंगा। मेरे पिता की हत्या कर दी गई, मेरी दादी की हत्या कर दी गई। छह महीने में, आप मारे जाएंगे। राहुल ने धमकी दी कि अगर सोनिया ने उनकी बात नहीं मानी तो वह अतिवादी कदम उठा लेंगे। नटवर सिंह ने याद करते हुए कहा, 'यह कोई साधारण धमकी नहीं थी, राहुल एक मजबूत इरादों वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने सोनिया को फैसला करने के लिए 24 घंटे का समय दिया। राहुल ने जब कहा कि वह अपनी मां को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए हर संभव कदम उठाने को तैयार हैं तो सोनिया गांधी गुस्से में थीं और उनकी आंखों में आंसू थे। कमरे में एक हैरान कर देने वाला सन्नाटा छा गया। उन्होंने कहा, 'यह राहुल की कुछ कठोर कदम उठाने की धमकी थी जिसके कारण सोनिया गांधी ने अपना मन बदल लिया। मूल रूप से उसके बेटे ने उसके लिए निर्णय लिया। नटवर सिंह ने कहा, उन्होंने कहा। एक मां के रूप में उनके लिए राहुल को नजरअंदाज करना असंभव था।” तो! इस तरह डॉ मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए।

   

 

लोक को समझने और उसके पास जाने की दो दृष्टि

#Fir_Loktantra_kolkhyan #फिरःलोकतंत्रःकोलख्यान

 

6.

लोक को समझने और उसके पास जाने की दो दृष्टि

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भारत के ग्रामीण इलाकों में यह लोकोक्ति चलती है कि घर में महाभारत न रखना चाहिए न पढ़ना चाहिए — लोकोक्तियों के पीछे निश्चित ही कोई प्रेरणा, लोक का कोई सांस्कृतिक अनुभव होती है, कोई-न-कोई बात जरूर होती है। क्या हो सकती है वह बात! अरुण त्रिपाठी हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। महाभारत काव्य खरीदके घर ले जाते समय यह लोकोक्ति दिमाग में झलकी, मन में शंका उठी! हर शंका में डर नहीं होता है, लेकिन उस में एक ख्याल तो होता ही है — एक ठिठक होती है। लोक में, खासकर मिथिला में एक उक्ति प्रचलित है — अपना गामक गाछी डेराउन, आन गामक पोखैर डेराउन! जाने-पहचाने बगीचों में भूत-प्रेत की कहानियाँ स्मृति में होती है, जो एकांत अंधेरे में डर पैदा करती है : अनजान तालाब की गहराई का पता नहीं होता है, प्रवेश के पहले थोड़ा डराता है। महाभारत को लेकर लोक के मन में ऐसी क्या बात है, लोक का ऐसा क्या अनुभव हो सकता है! इस बात की छान-बीन के लिए लोक मन और महाभारत की खासियत को समझना चाहिए। लोक मन बहुत गहरा होता है और महाभारत भी दुनिया की जटिलतम महागाथाओं में से एक है — इसे समझना इतना आसान नहीं। एक बात यह भी है कि लोक का मन धार्मिक, सांस्कृतिक से संबंधित वेदांत-दंतकथाओं से बनी पाप-पुण्य बोध की अवधारणाओं का वहन अधिक गुरुता से करता है; संवैधानिक प्रावधानों की विधि-निषेध से उतना संचालित नहीं होता है। लोक मन को समझना मुश्किल, महाभारत की बारीकियों को समझने में भी मुश्किल कम नहीं। फिर भी कोशिश तो की ही जा सकती है! फेसबुक तो वैसे भी त्वरित टिप्पणी के लिए उकसाती है।

अरुण त्रिपाठी की पोस्ट : ‘सोमवार को अयोध्या से गीताप्रेस से प्रकाशित महाभारत ले आया। यह छह खंडों में है और इसका एक सेट का मूल्य 3000 रुपए है। गांव में कहते है महाभारत पढ़ने से झगड़ा होता है। इसलिए न तो पढ़ना चाहिए है और न ही घर में  रखना चाहिए। पर मैं दोनों कर रहा हूँ। लेकिन शुरुआत शान्ति पर्व से कर रहा हूँ।’

मेरी त्वरित टिप्पणी थी — ‘महाभारत का हर पात्र अपने अतीत का भारी पत्थर सामने रखकर आगे बढ़ता है। इस पत्थर को कभी हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, कभी ढाल की तरह। अपने अतीत से वर्तमान को परिभाषित करता हुआ अपना अगला कदम उठाता है। नैतिक सवाल के खड़ा होते ही अपनी वैधता के लिए अपने अतीत की ओर लपकता है, कभी-कभी अतीत से कुछ जवाब ढूँढ लाता है, कभी-कभी वहाँ से तब तक नहीं लौटता है जब तक नैतिक सवाल खुद टल नहीं जाता है। अतीत को जब पीठ के बदले सीने पर लेकर परिजन मिलते हैं उनके बीच टकराव की आशंका अपने उच्चतम स्तर पर सक्रिय हो जाती है -- बुजुर्ग जानते हैं, इस तरह की शंका से बचने के लिए महाभारत को घर में न रखने, न पढ़ने का आदेश देकर समझते हैं कि परिवार के लोग टकराव से बच पायेंगे; हालाँकि ऐसा होता नहीं है! महाभारत को समझकर ही महाभारत की आशंका की परिधि से निकला जा सकता है — इसलिए इसका पारायण (पढ़ना) कीजिये।’

मेरी टिप्पणी पर @Aruntripathi अरुण जी ने कहा — ‘आपने बेहद नवीन और कल्पनाशील व्याख्या की है। मुझे तो इस ग्रंथ में सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, हिंसा और अहिंसा, नीति अनीति, लज्जा और निर्लज्जता, धैर्य अधैर्य, समता विषमता का अद्भुत टकराव दिख रहा है।’

भारत को समझने में महाभारत से कोई मदद मिल सकती है क्या? कम-से-कम उत्तर भारत की सामाजिक संरचना की जड़ों को समझने में इसकी थोड़ी-सी भूमिका हो सकती है! अब इसका प्रमाण क्या हो सकता है — इशारा हो सकता है। कहीं भी, खासकर पारिवारिक मामलों में झमेला फँसने पर लोगों के मुँह से अनायास निकल जाता है — महाभारत मचा हुआ है! ध्यान रहे यह इतिहास नहीं है, लेकिन आख्यान जरूर है, बल्कि महा-आख्यान है!

पूर्व घटित से वर्तमान निदेशित होने लगे तो वर्तमान कलह से घिर जाता है, और फिर आज का वर्तमान भविष्य के लिए पूर्व घटित बनकर भविष्य की संभावनाओं को कलुष से भर देता है — इस भँवर से निकलना जरूरी है! निकलने के लिए इसे जानना जरूरी है — जानने में महाभारत मददगार हो सकता है! महाभारत से उदाहरण तो लिये जा सकते हैं — अधिकरण नहीं बनाया जा सकता है।

कम-से-कम उत्तर भारत के लोक को समझने के लिए इसकी चर्चा करने के बाद भिन्न दृष्टि से लोक समझने की बेहतर स्थिति में हम हो सकते हैं — दो प्रमुख दृष्टि है : बाबा साहब आंबेडकर और महात्मा गांधी से मिल सकती है। यह ध्यान में रखना होगा कि ये दोनों दृष्टि जड़ नहीं गतिमान हैं; इनकी विकसित दृष्टि रेखाओं से मदद लेनी होगी। यह थोड़ा संवेदनशील और स्पर्श-कातर मामला है। थोड़ी-सी असावधानी से वह बात हाथ आकर भी, हाथ से निकल जायेगी जिसकी तलाश में हम लगे हैं! इसलिए थोड़ा ठहरकर!

जीवित रहने की शर्तें और व्यवहार की समानता

4.

जीवित रहने की शर्तें और व्यवहार की समानता

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इस समय लोकतंत्र के संदर्भ में लेख लिखने की कोशिश में लगा हूँ। मैं खुद इतना बुद्धिमान नहीं हूँ कि अकेले इस काम को पूरा कर सकूँ। सामग्री और संदर्भों की तलाश में रहता हूँ — बिना सहयोग सहायता के किसी काम को पूरा करने में स्वयं नहीं हूँ। @Animesh अनिमेष प्रियदर्शी के दो पोस्ट को मैं ने इस विचार क्रम में विचार के लिए यहाँ ले रहा हूँ। एक संदर्भ हिंदी के विख्यात कवि @Rajesh राजेश जोशी की कविता से उन्होंने लिया है। और एक में @Manoj मनोज अभिज्ञान का जिक्र है। मैं इन सभी के प्रति आभार व्यक्त कर लूँ, यह जरूरी है — आभार।

मैं खुद से सवाल करता हूँ — आखिर लोकतंत्र से हम, यानी नागरिक, क्या उम्मीद करते हैं! फिर याद कर लूँ नागरिकता को बचाये रखने के लिए सुकरात ने दैहिक जीवन का मोह छोड़ नैतिक जीवन का विकल्प चुना था — विष का प्याला पीना स्वीकार किया था। किसी भी हाल में नागरिक होने के कर्तव्य को पूरा करते हुए नागरिकता को बचाना और इसके साथ नागरिकता से प्राप्त होनेवाले हक एवं हक से प्राप्त सुफल को हासिल बरामद करने तथा निर्भय जीवन यापन की स्थिति से संतुष्ट रहना। संक्षेप में, हर हाल में और सभी अर्थों में जीवित रहने की स्थिति और जीवन प्रसंगों में समान व्यवहार। किसी भी विद्रोह या आक्रोश को गौर से देखने पर यह समझते देर न लगेगी कि उसके मूल में समान व्यवहार का अभाव है — समान व्यवहार का अभाव अपने-आप में अन्याय है। समान व्यवहार और अन्याय-बोध का बड़ा हिस्सा आत्म-निष्ठ होता है इसके वस्तु-निष्ठ स्वरूप को खोज निकालना, थोड़ा मुश्किल होता है। मुश्किल इसलिए भी होता है कि कई बार हम अपने हित और स्वार्थ के दबाव में जाने-अजाने, आत्म-निष्ठ होकर वस्तु-निष्ठता की तलाश करने लग जाते हैं।  

 

जीवित रहने की शर्तें

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राजेश जोशी कि यह कविता बहुत मार्मिक और इस संदर्भ में प्रासंगिक है — हम पूरी कविता को, खासकर, इस अंश को याद करते रहते हैं।

‘सबसे बड़ा अपराध है इस समय  

निहत्थे और निरपराधी होना 

जो अपराधी नहीं होंगे’

तब जीवित रहने का रास्ता क्या बचता है! हथियार थामना! हथियार थामते ही हम निहत्थे भी नहीं रह जायेंगे और निरपराध भी नहीं रह जायेंगे! इससे क्या जीवित रहने की शर्तें पूरी हो जायेंगी? यहाँ हमें ठहर कर हथियार थामनेवालों एवं अपराधी लोगों के जीवन पर गौर करना होगा। उनकी कठिनाइयों को समझना होगा। क्या इस तरह से निर्भय जीवन यापन की स्थिति हासिल हो सकती है? क्या नागरिकता खंडित होने से बच पाती है? क्या यह कविता या कवितांश इस तरह से जीवित रहने के लिए उत्प्रेरित करती है? तीनों का उत्तर है — नहीं। तो फिर काव्य-न्याय (Poetic Justice) का संकेत क्या है? संकेत है — इस स्थिति से बाहर निकले की लोकतांत्रिक कोशिश। लेकिन लोकतांत्रिक कोशिश तो, लोकतांत्रिक पर्यावरण में ही संभव है! लोकतांत्रिक पर्यावरण सुनिश्चित हो तो, ऐसी स्थिति ही क्यों उत्पन्न हो! समझना होगा, गड़बड़ी कहाँ है — लोक में या तंत्र में या दोनों में! तंत्र लोक का निर्माण नहीं कर सकता है— क्या यह पूरा सच है। नहीं यह पूरा सच नहीं है। लोक अपने लिए तंत्र का निर्माण करता है, लोक अपने बनाये तंत्र को आत्म-गृहीत करता है, तंत्र को शक्ति प्रदान करते है कि वह निर्भय जीवन यापन की स्थिति सुनिश्चित करे और बदले में लोक अपने को तंत्र की शर्तों के अनुपालन का भरोसा देता है। तंत्र की शर्तों को माननेवालों के लिए तंत्र यदि निर्भय जीवन यापन की स्थिति उपलब्ध नहीं करवा पाता है तो यह तंत्र की विफलता है। तंत्र को दुरुस्त करना लोक का ही काम है — तंत्र को दुरुस्त करने का रास्ता संविधान देता है। संविधान लोक और तंत्र के बीच भरोसे का पुल है। संविधान प्रदत्त रास्ते पर चलकर तंत्र को दुरुस्त किया जा सकता है। संविधान प्रदत्त रास्ते पर चलना क्या एकाकी संभव है! या संगठित होकर संभव है! संगठित होकर ही संभव है — दलीय नहीं, निर्दलीय संगठन की महत्ता को समझना होगा। व्यक्ति और नागरिक समुदाय को समझना होगा; मुराद नागरिक जमात (Civil Society) से है! नागरिक जमात नहीं है! कमजोर है! ऐसा है, तो लोक के पास अपने तंत्र को दुरुस्त करने का औजार नहीं है। औजार हासिल करना होगा — हथियार नहीं। नहीं तो धीरे-धीरे मारे जाते रहेंगे। निहत्थे हों, हथियारबंद हों, निरपराध हों या अपराधी हों कोई फर्क नहीं पड़ता है।

सामाजिक समरसता के लिए निर्भय जीवन यापन की स्थिति सुनिश्चित करना तंत्र का दायित्व है यह कहते हुए मुझे ग्रीक दार्शनिक पाइथागोरस और हेराक्लिटस को याद करना चाहिए — पाइथागोरस के दर्शन में समरसता पर जोर दिया गया है। हेराक्लिटस के दर्शन में जीवन की विरोधी की तनातनी द्वारा बने रहने की बात कही गई है। इस तनातनी में किसी की निर्णायक जीत की स्थिति से इनकार किया गया है। यहाँ दोनों को मिलाकर देखने की जरूरत है — महत्त्वपूर्ण है फिर भी ये पहले की बात है, आज की परिस्थिति में नये ढंग से समझने की जरूरत है। इस तना-तनी को दो विरोधियों की तना-तनी के रूप में न देखकर लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच की तना-तनी के रूप में देखा जा सकता है जिसका लक्ष्य निर्णायक जीत-हार के मुहावरे में न समझकर निरंतर अर्जित होते रहनेवाली समरसता के रूप में देखा जा सकता है। हेराक्लिटस के संगी क्रेटाइलस ने यह टिप्पणी सही है कि ‘‘आप एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते।’’ लेकिन एक विचार को बार-बार पढ़ने की जरूरत होती है — वाक्य एक रहे, अर्थ बदलता रहे! नहीं क्या!

 

 

असमान के साथ समान व्यवहार

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@Manojabhigyan मनोज अभिज्ञान जी के जिस पोस्ट को @Animesh अनिमेष जी के वॉल से लिया है — पूरी बात उनकी वॉल पर देखी जा सकती है।

‘कुछ लोग कहते हैं कि प्रकृति ही हमें असमान बनाती है इसलिए समानता की बात करना ही मूर्खता है. सही बात है. प्राकृतिक तौर पर सब समान नहीं हैं. सब समान हो भी नहीं सकते. इसलिए हमारा संघर्ष यह है ही नहीं कि सबके साथ समान व्यवहार हो. हमारा तो संघर्ष ही इस बात के लिए है कि असमान लोगों के साथ समान व्यवहार न हो. असमान लोगों के साथ समान व्यवहार करना मूलभूत मानवीय अधिकारों के खिलाफ़ है. किसी ट्रेन, बस या अन्य स्थान पर अगर एक गर्भवती स्त्री खड़ी है और एक पुरुष खड़ा है और बैठने के लिए एक ही सीट हो तो सीट पर बैठने का बुनियादी हक़ गर्भवती स्त्री का बनता है, न कि पुरुष का. इसी तरह जहां एक बार में एक ही व्यक्ति के पार निकलने का रास्ता हो वहां सिर पर बोझ उठाए व्यक्ति को पहले निकलने का बुनियादी हक़ है. इन मामलों में यह तर्क नहीं चलेगा कि सबके साथ समान व्यवहार होना चाहिए और जिसमें क्षमता होगी, वह सीट या रास्ते से निकलने का हक हासिल कर लेगा.’

इस टिप्पणी या पोस्ट की मूल भावना से असहमत होने का कोई कारण नहीं है — रूपक से बाहर कुछ बातों को समझने की जरूरत मुझे है, क्या पता अन्य को भी हो! सुकरात ने रेखांकित किया था — सामान्य जीवन में जितने भी इस तरह के उदाहरण हम देखते हैं, उनमें समानता लगती अवश्य है, लेकिन फिर भी वह समानता 100 प्रतिशत नहीं होती है। खैर।

यह सच है कि प्रकृति हमें असमान बनाती है, लेकिन हम प्रकृति के बनाये को जस-का-तस स्वीकार नहीं कर लेते, उसके बनाये को बदलने की कोशिश अवश्य करते हैं। हम प्राकृतिक प्राणी तो हैं ही, लेकिन सामाजिक प्राणी भी हैं। अगर हम प्रकृति के बनाये नियम को जस-का-तस स्वीकार कर लेंगे तो हमें ‘मत्स्य न्याय’ को स्वीकार कर लेना होगा — बड़ी मछली के द्वारा छोटी मछली को निगल जाने को वैध मान लेना होगा। अगर हम ऐसा करते हैं तो हम खुद को किसी भी नैतिक प्रसंग से बाहर हो जाने का जोखिम उठा लेंगे। मुझे लगता है, हम ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे! गर्भवती महिला के लिए स्थान छोड़ना या जिसके माथे पर अधिक बोझ है उसे पहले राह देना एक नैतिक प्रसंग है — इस नैतिक प्रसंग के अनुकूल आचरण राजकीय प्रक्रिया से विनिर्मित और स्वीकृत विधि का नहीं, सांस्कृतिक प्रक्रिया से विनिर्मित और अर्जित विवेक का मामला है। अधिकतम परिगणित समानता के आधार पर विभिन्न लाभार्थी समूह बनता है, गौर से देखिये तो इस समूह के सदस्यों में भी असमानता दिखना बहुत मुश्किल नहीं होगा।

समान और असमान का निर्धारण तुलनात्मक निर्णय है। असमान और समान की तुलना गफलत में डाल सकता है — एक गर्भवती महिला की तुलना दूसरी गर्भवती महिला से करने पर नैतिक दुविधा खड़ी होगी! मान लीजिए — सीट एक है और दो गर्भवती महिलाएँ हैं! इनके बीच तुलना करने के बाद सीट प्रदाता को अपना फैसला करना पड़ेगा। क्या समान के बीच असमान का आधार तलाशना उचित नहीं होगा! यह ‘असमान लोगों के साथ समान व्यवहार’ का उदाहरण हो सकता है! ‘समान के प्रति समान व्यवहार’ एक नैतिक प्रसंग है जो विवेक का विषय है, ‘सभी के प्रति समान व्यवहार’ एक विधिक प्रसंग है — ध्यान रहे विधिक प्रसंग का मूल रूप नकारात्मक होता है और नैतिक प्रसंग का मूल रूप सकारात्मक होता है — कानून कहता है क्या-क्या नहीं करना है, विवेक कहता है क्या-क्या करना है! यह थोड़ा जटिल है, समझने की कोशिश जारी है। क्या कहते हैं!  

सुधार के लिए कृपया, सुझाव देते रहिए।

जाति सर्नेक्षण का नतीजा

जाति सर्वेक्षण का नतीजा

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बिहार में जाति सर्वेक्षण का नतीजा प्रकाश में आ गया है। इस पर तरह-तरह से चर्चा की जायेगी लेकिन यह तय है कि इससे भारतीय राजनीति में तात्त्विक और गुणात्मक अंतर आयेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस अंतर का प्रभाव सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा — सामाजिक न्याय के साथ-साथ सामाजिक सचेतनता, सिद्धांतिकी और आर्थिकी पर भी अनिवार्यतः पड़ेगा — जीवन-स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा — सामाजिक न्याय और व्यक्ति न्याय को आमने-सामने न कर दिया जाये। उम्मीद की जानी चाहिए — वोटों की गोलबंदी से सीमित नहीं होगी और स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होनेवाली नकारात्मक ऊर्जा को शून्य नहीं भी तो, न्यूनतम स्तर पर बनाये रखने में कामयाब रहेगी; अमीरी गरीबी की बढ़ती खाई की विभिन्न कुप्रवृत्तियों की वृद्धियों को भी रोकने में कामयाब रहेगी। जाति सर्वेक्षण के नतीजे का उम्मीद से स्वागत किया जाना चाहिए।

प्रसंगवश, इधर एक प्रवृत्ति देखने में आ रही है — सामुदायिक मुद्दों पर समुदाय के सदस्यों को ही चर्चा करनी चाहिए — समुदाय से बाहर का कोई इस के पक्ष में भी चर्चा न करे! अभी सत्य हिंदी पर अंबरीश कुमार अपने जनादेश कार्यक्रम में जाति सर्वेक्षण के नतीजों पर चर्चा कर रहे थे — उस पर 37 दर्शक देखते हुए दिख रहे थे, किसी ने पैनल के समुदाय का सवाल उठा ही दिया। यह अपवाद हो सकता है — उम्मीद की जानी यह प्रवृत्तिजन्य लक्षण नहीं है!

महंगाई की चर्चा

महंगाई की चर्चा

आज भारत की जनता महंगाई से परेशान है। भ्रष्टाचार और राजनीतिक दुरभिसंधियों से घिरे समय में महंगाई राजनीतिक मुद्दा बने या न बने औसत जिंदगी की बढ़ती हुई बदहाली के बुरे असर से इनकार नहीं किया जा सकता है। बदहाली से जूझते हुई आबादी को पहले अपनी लोकतांत्रिक सरकारों से सहारा की उम्मीद होती है। नाउम्मीदी उसे अपने-अपने भगवान तक ले जाती है। बदहाली में चीखने की ताकत भी अंततः नहीं बचती है। जिन्हें चीख नहीं सुनाई देती, उन्हें भला सिसकियाँ कैसे सुनाई देगी।

महंगाई सिर्फ कीमत में बढ़ोत्तरी का मामला नहीं होता है। दुनिया के विभिन्न देशों में वस्तुओं की कीमत की तुलना करते हुए इस निष्कर्ष पर किसी जल्दी में पहुँच जाना कि एक की तुलना में दूसरी जगह कीमत कम या अधिक है, थोड़ा भ्रम भी पैदा करता है। असल में कीमत का कम या अधिक होना उस देश की मुद्रा की दृढ़ता और लोगों की आय पर भी निर्भर करता है। ऐसा इसलिए कि मुद्रा की कमजोरी और घटती हुई आय से क्रय क्षमता में छीजन आ जाती है। महंगाई का होना या न होना औसत खरीददार की क्षमता पर निर्भर करता है। निश्चित रूप से महंगाई का संबंध क्रय क्षमता में छीजन से होता है। यह ध्यान में रहे तो समझा जा सकता है कि किसी वस्तु की कीमत प्रति व्यक्ति कम आयवाले क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक दुस्सह हुआ करती है। यह भी कि विभिन्न आय समूहों पर भी इसका असर विभिन्न तरीके से पड़ता है। महंगाई औसत क्रेता की पहुँच से वस्तुओं को बाहर कर देती है, जिससे उपभोग का अवसर खो बैठता है। इसलिए महंगाई का असर जीवन पर बहुस्तरीय होता है। लोगों की आय में तदनुरूपी बढ़त व्यय के संतुलन को किसी हद तक बरकरार रखती है। विशेष परिस्थिति में इसका विपरीत असर भी देखने में आ सकता है, इसलिए व्यय के साथ ही बचत के अवसरों को भी इसमें जोड़ लेना उचित है।    

बढ़ती हुई महंगाई अकाल की स्थिति पैदा करती है। प्रो. अमर्त्य सेन ने यह साबित किया है कि अकाल वस्तुओं की अनुपलब्धता से नहीं वस्तुओं के क्रय क्षमता से बाहर हो जाने से पैदा होता है। बाजार में वस्तुएँ भरी-पड़ी हों लेकिन वह औसत उपभोक्ता की पहुँच और उपभोग से बाहर हो जाये। वस्तु और उपभोग के अवसरों का पहुँच से बाहर होना लोकतंत्र और स्वतंत्रता के अर्थ को भी बदल देता है। वस्तु और उपभोग से वंचित आबादी सही मायने में लोकतंत्र और स्वतंत्रता से वंचित हो जाती है। क्या मान लिया जाये कि हमें सचमुच अपने समय में कोई सिसकी नहीं सुनाई दे रही है!प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

कविता के साथ क्या हुआ!

कविता कोई बौद्धिक कार्रवाई तो है नहीं सो लिखी जाती है अचेत मन से। कविता पढ़ना लेकिन बौद्धिक कार्रवाई है सो, पढ़ी जाती है सचेत मन से।  कोई भी कविता जब हमारे अनुभव का हिस्सा बनती है तो उसकी अनुभूतियाँ हमारे मन को नये सिरे से सरियाती और सँवारती है, रिएलाइन करने की कोशिश करती है। अगर अपने अंदर के कोलाहल को स्थगित कर हम कविताओं पर कान धरने में कामयाब हो सकें। आज लिखी जा रही अधिकतर कविताओं के संदर्भ में यह कहना प्रयोजनीय है, कि भाषा एक सार्वजनिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक औजार है। इस औजार को साधना पड़ता है। फिर कहें, कविता लिख ली जाती है अचेतन मन से, लेकिन पढ़ी जाती है सचेत हो कर। समाज, भाषा और कविता के अंतस्संबंध पर गौर करें तो, भाषा कविता को काबू करे यह अच्छी स्थिति नहीं है, बल्कि चाहिए यह कि कविता भाषा को काबू करे। शायद सब से अधिक संख्या में कविता लिखी जाती है, और सब से कम संख्या में पढ़ी जाती है! तो कविता के साथ क्या हुआ!
कविता के साथ क्या हुआ! जी हिंदी कविता के साथ! अन्य भाषा की कविताओं के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा।
हिंदी में हिंदी कविता लिखना मुश्किल होता गया। हिंदी में हिंदी कविता लिखना मुश्किल होता गया! क्या मतलब? जब हिंदी में मैथिली, भोजपुरी, ब्रज, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, उर्दू आदि कविता का लिखा जाना मुश्किल होता गया तो हिंदी में हिंदी कविता का लिखा जाना मुश्किल हो गया। नागार्जुन हिंदी में मैथिली कविता लिखते थे, इसलिए जनकवि हो सके। बिना जनपद के जनकवि नहीं हुआ जाता है। धीरे-धीरे कवियों में यह कहने का साहस खोता गया कि ‘उस जनपद का कवि’ हूँ। जब साहस ही खो गया तो शब्द को मरना ही था, सो मर गया। क्योंकि सहमत न होने का सवाल ही नहीं उठता केदारनाथ सिंह की बात से कि ‘शब्द मरते हैं, साहस की कमी से’। भारतेंदु हरिश्चंद्र और अयोध्या प्रसाद खत्री के पत्राचार की याद है न! तो फिर हिंदी में मैथिली आदि की कविता का लिखना क्यों बंद हो गया? इसलिए कि मैथिली आदि में ही मैथिली आदि की कविता लिखना लगभग असंभव हो गया! इस हादसा से निबटने के लिए हिंदी आदि के कवियों ने भारतीय कविता की बात शुरू कर दी। स्थानिकता, कह लें आंचलिकता, को दबाने में राष्ट्रीयता से बड़ा  चिक (बाँस की कमानियों से बना पर्दा) और क्या हो सकता था। तो हिंदी कवि हिंदी कविता की जगह भारतीय कविता की और बढ़ गये। इधर स्थानीय कवि भी लपककर भारतीय कविता बनाने की दौड़ में शामिल हो गये तो अगला विश्व-कविता लिखने लगा। जो इशारा न समझे उसे आगे कुछ भी कहना बेकार है। इसलिए, अब आगे कहना जरूरी नहीं कि हिंदी कविता के साथ क्या हुआ। 

सपना और सचःः भ्रम का दुख और दुख का भ्रम

सपना और सचःः भ्रम का दुख और दुख का भ्रम
एक बार एक दार्शनिक सुबह-सुबह खामोश बैठा था। अपने शिष्य के किसी प्रश्न का कोई जवाब नहीं दे रहा था। शिष्य के बहुत प्रयास के बाद वह बोला▬

▬ मैंने सपना देखा कि मैं चिंटी हूँ। मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ।
▬ लेकिन अब तो आप जग चुके हैं! परेशानी क्या है?
▬ परेशानी! परेशानी यह कि मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं आदमी हूँ जिसने सपना में देखा कि वह चिंटी है या फिर चिंटी हूँ जो सपना में अपने को आदमी समझ रही है!

उसके बाद दार्शनिक बहुत देर तक बोलता रहा और शिष्य खामोश हो गया। बाद में दार्शनिक और शिष्य दोनों गहन निद्रा में चले गये। इस गहन निद्रा में उन्होंने क्या सपना देखा, देखा भी या नहीं देखा, यह रहस्य है।

तुलसीदास ने लिखा ▬ जौ सपने सिर काटे कोई, बिन जागे भ्रम (दुख) दूर न होई! तुलसीदास ने सोते हुए समाज से कह दिया कि भ्रम के दुख और दुख के भ्रम से बचने का एक ही उपाय है ▬ जागरण! कबीरदास सोते नहीं थे, जागते थे और रोते थे! हम सपना में रोते हैं; अब कौन बताये कि हम सपना में जगे हुए हैं या जगे हुए में सपना देख रहे हैं!

हमारे सामने कठिन सवाल यह कि हम सपना में जीते हैं या सच में जीते हैं! जवाब...! वह तो, मुँह ढककर सोये हुए किसी और के सपने में विचर रहा है। क्या जीने के लिए हमें सपनों की खनतलाशी करनी चाहिए? क्या हम अंतःकरण की खनतलाशी कर सकते हैं! भ्रम का दुख और दुख का भ्रम यही हमारा जीवन है! क्यों बार-बार पूछते थे मुक्तिबोध कि बहुत-बहुत ज्यादा लिया/ दिया बहुत-बहुत कम;/ मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!

पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी


पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी
सिर्फ किसी रचना की विलक्षणताओं और विचक्षणताओं को उद्घाटित करने की अंतर्दृष्टि-संपन्न आलोचना, यदि हो तो, दो कौड़ी की भी नहीं मानी जाती है यदि रचना के चार और खरीददार जोड़ने, कुछ और पुरस्कार जुगाड़ने, विचारधाराओं के प्रति मौखिक आग्रहशील लेखक संगठनों में कुछ और स्वीकार्यता बढ़ाने का भी सूत्र उससे न निकले। 'अच्छा' आलोचक जब किसी रचना पर नहीं रचनाकार पर मुँह खोलने की सोचता है तो पहले प्रकाशक को पता चलता है। प्रकाशक पुस्तक प्रकाशित करता है। फिर पुरस्कार प्रदान करनेवाली संस्था को पता चलता है। अच्छा आलोचक जानता है कि किस पुरस्कार प्रदाता के स्वार्थ का प्राणवाही तोता किसके पिंजड़े में बंद है! और फिर खरीददारी का सिलसिला ▬ सरकारी हुआ तो फिर क्या कहने, 'समाजसेवी समर्थित' खरीददारी भी बुरी नहीं होती! रचनाकार बेरोजगार हुआ तो रोजगार में, शोधार्थी हुआ तो शोध कार्य में, घुमक्कड़ हुआ तो देश-विदेश यात्रा में, खाने-पीने का शौकीन हुआ तो खाने-पीने में, माइक-माला-माल-मंच का सुख हासिल करने में जो आलोचना जितनी सहायक रही है, वह उतनी ही कारगर भी रही है। आलोचना को तो खुद भी शायद पता नहीं कि वह किसकी क्या होकर रह गई है! आलोचना और विचार का ऐसा कौन-सा प्रकरण हिंदी आलोचना ने जोड़ा है जिसे भारत के बाहर या भारत के भीतर की अन्य भाषा के साहित्य आलोचकों ने सम्मान के साथ अपनाया है! साहित्य के सभी व्याख्याता साहित्य के आलोचक भी हैं! जाहिर है व्याख्या, वह भी छात्रोपयोगी, आलोचना के रूप में प्रतिष्ठित है। व्याख्याता, जो कक्षाओं में जरूरत की माँग पर लिख्याता में तब्दील हो चुके हैं, हलाँकि कइयों को अपनी हैसियत की तब्दीली का पता भी नहीं होता है, स्वाभाविक रूप से शोध पुरोधा भी होते हैं। आलोचना और रचना की भाषा भंगिमा में ढाँचागत भिन्नता होती है, फिर भी कुछ लोग कबीर, तुलसी, प्रेमचंद आदि की भाषा की सहजता और कथ्य की संप्रेषणीयता का उदाहरण ठोक कर देते हैं। कोई पूछे कि कबीर, तुलसी, प्रेमचंद आदि की भाषा की सहजता और कथ्य की संप्रेषणीयता इतनी ही अधिक सुग्राह्य और अनुकरणीय है तो उनको उच्च कक्षाओं में पढ़ाये जाने तथा पढ़ाये जाने पर इतने राजकीय व्यय करने या इतने बड़े-बड़े 'विद्वानों' की नियुक्ति करने का प्रयोजन क्या है! जब आलोचना और रचना के संबंधों और सूत्रों तथा संपर्कों के तार और नतीजों को सामने लाने के लिए कोई मजबूत कलम उठेगी या कुछ कुछ अंगुलियाँ कंप्यूटर के कुंजीपटल पर नाचने के लिए मचल उठेंगी तो पाठकों के अभाव में बने हिंदी रचना और आलोचना के दंभ को ढहते देर नहीं लगेगी।


राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता

राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता
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बचपन को याद करें तो दुकानों में दिलचस्प बोर्डों की याद आती है ▬ 'उधार प्रेम की कैंची है', 'आज नगद कल उधार', 'उधार माँगकर शर्मिंदा न करें', 'बिजनेस में दोस्ती नहीं', आदि! बिजनेस में दोस्ती नहीं का ही दूसरा पहलू है बिजनेस में दुश्मनी नहीं। दुनिया के बाजार में और नागरिकों के उपभोक्ता में बदल जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, और सच पूछिये तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, राजनयिक सदाशयता का महत्त्व स्वाभाविक रूप से व्यावसायिक व्यावहारिकता से तय होने लगा है। अमेरीकी राष्ट्रपति एवं राजनयिकता के रुख, चीन की पहल, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया, श्रीलंका के उत्साह आदि को ध्यान में रखने पर राजनयिक सदाशयता और व्यावसायिक व्यावहारिकता के अंतस्संबंध को सहज ही
समझा जा सकता है। भारत श्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में दक्षिण एशिया से शुरू कर पूरी दुनिया में व्यावसायिक संभावनाओं को नये सिरे से तलाशना और टटोलना चाहता है तो निश्चित ही इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसी क्रम में शपथग्रहण समारोह में आमंत्रण की प्रासंगिकताओं को भी परखना चाहिए। युपीए सरकार, एनडीए सरकार, मनमोहन सिंह सरकार, मोदी सरकार का नाम भले ही दें, लेकिन अपनी अंतर्वस्तु में वह भारत सरकार ही होता है और यह अखंड होता है। देश के सामान्य उपभोक्ता-नागरिक के रूप में प्राथमिक तौर पर, मुझे लगता है कि शपथग्रहण समारोह में आमंत्रण का यह प्रतीकात्मक पहल सकारात्मक कदम है इसका स्वागत किया जाना चाहिए और इस कदम की दिशा और गंतव्य के स्पष्ट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

चुनावी राजनीति की पढ़ाई

चुनावी राजनीति की पढ़ाई
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आपको तो मालूम ही है उन हठी बालकों के पास--- जिनके बारे में मशहूर था कि इन राजकुमारों को कोई पढ़ा नहीं सकता और राजा पढ़ाने के हठ से हट नहीं सकते, सो बाल-हठ और राज-हठ का खेल जारी था--- एक गुरू जी पहुँचे। उन्होंने तरकीब लगाई। तरकीब के तहत बालकों से दोस्ती गाँठी। छः महीने लग गये, दोस्ती चल निकली। उपयुक्त समय देखकर गुरू जी ने छोटे राजकुमार से पूछा मान लो तुम्हारे पास तीन सेव हैं और बड़े राजकुमार के पास दो सेव हैं। तुमने एक सेव बड़े राजकुमार को दे दिया तो तुम्हारे पास कितने सेव बचे? छोटे राजकुमार ने झट से कहा, दो। फिर उसने बड़े राजकुमार से पूछा तुम्हारे पास कितने सेव हो गये? बड़े राजकुमार ने फट से कहा तीन? गुरू जी ने फिर बड़े राजकुमार से पूछा अब तुमने सारे सेव छोटे राजकुमार को दे दिया तो छोटे के पास कुल कितने सेव हो गये? बस क्या था, छोटा राजकुमार चीख उठा--- भैया सावधान, एकदम कोई उत्तर नहीं देना... यह हिसाब पढ़ा रहा है! गुरू जी को पकड़ कर, पास में एक भी सेव नहीं है और तब से सेवों के लेने-देने का हिसाब किये जा रहे हो! क्या मतलब सच-सच बतलाओ हमें हिसाब पढ़ा रहे हो? गुरू जी ने कहा, नहीं विद्या कसम मैं तुम लोगों को हिसाब नहीं पढ़ा रहा हूँ। अब दोनों राजकुमार सोच में पड़ गये, विद्या कसम खाई है, झूठ नहीं कह रहे हैं, लेकिन कुछ-न-कुछ तो पढ़ा रहे हैं जरूर! तो फिर क्या पढ़ा रहे हैं? दोनों ने तय किया और पूछा कि अच्छा आप हमें हिसाब नहीं पढ़ा रहे थे तो क्या पढ़ा रहे थे? गुरू जी ने कहा, मैं तुम दोनों को राजनीति पढ़ा रहा था, चुनावी राजनीति। राजकुमारों ने कहा हम तो राजकुमार हैं, चुनावी राजनीति की पढ़ाई हमारे किस काम आयेगी? गुरू जी ने कहा कि तुम लोग राजकुमार हो और राजकुमार ही रहोगे। लेकिन राजनीति यही नहीं रह जायेगी! यह पढ़ाई तब काम आयेगी जब 'सच्चा जनतंत्र' आ जायेगा क्योंकि उसमें जो होता नहीं है, उसी का हिसाब पढ़ा-पढ़ाया जाता है!

गठरिया तोर, कि मोर

गठरिया तोर, कि मोर
कल (09 फरवरी 2014) शब्दकर्म विमर्श की ओर से बंगीय हिन्दी परिषद सभाकक्ष में आयोजित अनय स्मरण सभा में शामिल हुआ। प्रोफेसर अनय हमारे बीच नहीं हैं, यह टीस ताजा हो गई। लेकिन, सभा में शामिल होना अच्छा लगा। डॉ. हितेंद्र पटेल (Hitendra Patel) खुद प्रोफेसर हैं, अच्छा बोलते हैं। कल अनय जी पर बोलते हुए भावुक हो गये। कहा कि अनय जी मेरे लिए हमेशा जीवित हैं, उनके बारे में इस तरह बोलना मेरे लिए संभव नहीं है। आँख भर आई, गला भर्रा गया और बैठ गये। कभी-कभी आदमी न बोलकर भी बहुत कुछ कह जाता है और कभी-कभी बहुत बोलकर भी कुछ नहीं कह पाता है। यह महसूस करना अच्छा लगा। इतनी-सी भावुकता बची रहनी चाहिए। डॉ. हितेंद्र पटेल इतिहास के सक्रिय प्रोफेसर हैं। आज वे बहुत कुछ जानते हैं लेकिन अनय जी उन्हें और अनय जी को वे तब से जानते हैं जब डॉ. पटेल ने प्रसिद्ध पिल्मकार सत्यजित रे का नाम भी नहीं सुना था। अनय जी हिंदी के प्रोफेसर थे, हितेंद्र इतिहास के प्रोफेसर हैं। इतिहास का प्रोफेसर किसी हिंदी प्रोफेसर को अपना गुरू मानकर इतना भावुक हो जाये तो इसे भी ऐतिहासिक घटना मानना चाहिए। इसे सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों की तरह न मानकर, सक्रिय ज्ञान के अंतर-अनुशासनिक गति-मति के लिए शुभ लक्षण मानना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि भावुकता से बाहर निकलकर अनय जी के बारे में सोचना चाहिए। इतिहास के बनने-बिगड़ने, इतिहासदेव की चमक और मलीनताओं की गति-प्रकृति को हम सभी थोड़ा-बहुत जानते हैं, हितेंद्र पटेल तो खैर विशेषज्ञ ही हैं। अनय जी के रचना विकास को ठीक से समझने पर यह बात भाषा में समा सकती है कि विभिन्न हिंदी इलाकों से आकर कोलकाता में रहनेवालों/ आकर रहनेवालों का जीवन संघर्ष कैसा होता है। किस तरह वह यहाँ की सामाजिक-नागरिक कार्रवाइयों का हिस्सा और अंततः राजनीतिक प्रक्रिया का अंशीदार बनता है और यह भी कि कैसे इस प्रक्रिया की मूल प्रेरणा वह रचनात्मक प्रवृत्ति और शक्ति होती है, जो साहित्य लिखने की प्राथमिक शर्त्त है। अनय जी प्रोफेसर थे, लिखते थे लेकिन प्रोफेसनल लेखक नहीं थे। जो लिखा वह भाषिक बुनावट और बारीकियों के कारण महत्त्वपूर्ण तो हो सकता है, लेकिन उसका अधिक महत्त्व उसमें निहित समय के साक्ष्य के कारण है। मुझे लगता है कि अनय जी के मोनोग्राफ के बारे में सोचा जाना चाहिए। हितेंद्र पटेल की भावुकता ने यह एहसास कराया कि बिना बोले भी आदमी बहुत कुछ कह सकता है तो प्रियंकर पालीवाल (Priyankar Paliwal) की अनुपस्थिति ने यह एहसास कराया कि अनुपस्थिति में उपस्थिति कैसे बनती है। अच्छा लगा... शहर के कई महत्तवपूर्ण साहित्यिक लोगों को बहुत दिन बात करीब से देखा...


लेकिन यह अच्छा नहीं लगा कि वहाँ उपस्थित युवाओं को सुनने का अवसर नहीं बन पाया... बहरहाल यह जिंदगी है.. लाख समेटो कुछ-न-कुछ गठरी के बाहर छूट ही जाता है... और बिरासत की लड़ाई में झिका-झोरी शुरू होती है... गठरिया तोर, कि मोर... 

द्वंद्व और दुविधा

द्वंद्व और दुविधा
मन द्वंद्व और दुविधा से घिरा हुआ है। वैसे, काँग्रेस की कई नीतियों, और कई मामलों में नीयत का भी, प्रशंसक मैं नहीं रहा हूँ। सुशासन की कमियों, बेलगाम महगाई, बेकाबू भ्रष्टाचार, रोजगार वंचना आदि के प्रति काँग्रेस की राजनीतिक उदासीनताओं से भी कम आहत नहीं हूँ। लेकिन कोई कारगर विकल्प दिख नहीं रहा है। इसलिए, बावजूद कई भयावह कमियों के लग यही रहा है कि देश के सामने उपस्थित आंतरिक विघटन और ढाँचागत विसर्जन के खतरों से बचने का संसदीय रास्ता काँग्रेस ही निकाल सकती है, शर्त्त यह कि राजनीतिक बरताव में कामचलाऊ ईमानदारी को लागू करने का साहस कर सके। सामने उपस्थित खतरों से बचने के लिए देश अगर अ-संसदीय, गैर-संसदीय या वि-संसदीय रास्ता पर चल पड़ता है, तो यह बहुत उथल-पुथल भरा दौर होगा। इस उथल-पुथल में सबकुछ बुरा ही होगा ऐसा नहीं है, यदि देश इस उथल-पुथल की झंझा को बरदाश्त कर लेता है तो कुछ अच्छा भी हो ही सकता है...। बाद में क्या होगा यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन और कुछ हो न हो यथा-स्थिति और तदर्थता जरूर बहुत हद तक टूटेगी...। जो भी हो, फैसला देश को करना है...। मुझे देश के मतदाताओं की सामूहिक समझ के औसत पर पूरा भरोसा है, हाँ यह अलग बात है कि इधर मतदाताओं के एकांश पर नागरिक बोध से अधिक उभोक्ता मिजाज का वर्चस्व बढ़ रहा है..। इसे, द्वंद्व और दुविधा से घिरे मेरे नागरिक मन के एक स्तर पर चलनेवाली मुखरताओं के रूप में ही लिया जाना चाहिए किसी अपरिवर्त्तनीय विचार या प्रेरक अपील की तरह इसे नहीं लिया जाना चाहिए। 

'स्वजन' और 'श्वजन'



'स्वजन' और 'श्वजन'


वैसे तो, बात पुराने जमाने की है लेकिन क्या पता आज के भी काम की हो। एक विद्वान का पुत्र पढ़ने से कतराता था। पिता बहुत निराश थे। अपने एक साथी विद्वान से सलाह करने पहुँचे कि इस वीरवान बालक का आखिर किया क्या जाये! सघन सलाह के बाद तय हुआ कि इसे भाषा संबंधी ज्ञान को अवश्य ही अर्जित करना चाहिए। अब समस्या यह थी कि इसके लिए साहित्य की राह पकड़ी जाये या व्याकरण की! जैसा कि विद्वानों के साथ होता ही है, फिर सघन-सलाह! अंत में फैसला व्याकरण के हक में गया। व्यकारण के हक में निर्णायक तर्क यह कि किसी तरह थोड़ा-सा भी व्याकरण पढ़ ले तो 'स्वजन' और 'श्वजन' में फर्क कर पायेगा। व्याकरण का बोध बिगड़ जाये तो 'स्वतंत्र' के 'श्वतंत्र' हो जाने में कितनी देर लगती है!! बहुत डर लगता है... भाइयो और बहनो... बहुत डर लगता है...

कोई ठिठक. ठसक और तंज नहीं

रजनी भारद्वाज के काव्य संकलन 'नेह की बारिशें' की कविताएँ पढ़ी। प्रेम भाव की तरह नहीं, स्वभाव की तरह इन कविताओं में अभिव्यक्त हुआ है। यह बड़ी बात है। इस प्रेम स्वभाव का आकाश जितना विस्तृत है, जमीन उतनी दृश्य नहीं है। इस प्रेम स्वभाव में औदात्य इतना है कि किसी अभाव की कोई जगह नहीं है। इस प्रेम स्वभाव की सरिता में गति है, तरंग है, रंग है … कोई ठिठक. ठसक और तंज नहीं। कविताएँ इतनी सहज संवेद्य हैं कि अलग से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है। इन कविताओं में नेह, प्रेम एक भाव है, कर्म है, धर्म है, मर्म है और एक प्रक्रिया भी। यह सब होते हुए, प्रेम सबसे बड़ा मूल्य है और मनुष्य की सर्वोच्च रचना, जी हां सर्वोच्च! कविता से भी ऊँची कृति है प्रेम की प्रकृति। प्रेम की प्रकृति का यह औदात्य जीवन के हर दुख को सहनीय और हर प्रसंग को रमणीय बना देता है। प्रेम की प्रकृति का यह प्रदेश जिसका प्रवेश सहज-सुगम बन जाता है, उसके जीवन का पर्यावरण अपने अनावरण में भी हर प्रदूषण से मुक्त रहता है। इस तरह इस संग्रह की कविताएँ रचने की नहीं जीने की कला के अधिक निकट है। ऐसे स्व-भाव प्रसंग को सफलता से आयत्त करने और सहजता से अभिव्यक्त करने में इन कविताओं का सौंदर्यबोध है। इन्हें निजी तौर पर आयत्त करना और चुपके से अपने भाव-प्रसंग का हिस्सा बना लेना पाठक को अच्छा लगेगा।