गांधी और विश्व अहिंसा दिवस

गांधी और विश्व अहिंसा दिवस

: प्रणाम

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सत्य-शक्ति-अहिंसा-शांति — सत्य को शक्ति से, शक्ति को अहिंसा से और अहिंसा को शांति से जोड़ने की पूरी प्रक्रिया का नाम सत्याग्रह है। साधन और साध्य की शुचिता अहिंसा का प्राण है — इसलिए अहिंसा प्रक्रिया भी परिणाम भी है।  सत्ता से मोहित राजनीति के लिए गांधी असुविधाजनक हैं तो सत्ता से पीड़ित जनता ‎के लिए भरोसा हैं। ‎

गांधी जी की अहिंसा यही खास है कि उन के ही जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में चिह्नित किया गया! गांधी इसलिए नहीं चुने गए कि अहिंसा का विचार उन्हीं से शुरू हुआ। उन्हें इसलिए चिह्नित किया गया कि उन्होंने बीसवीं सदी में अहिंसा को व्यक्तिगत व्रत से निकालकर जन-राजनीति की कार्यपद्धति बना दिया। संयुक्त राष्ट्र ने नैतिक और आध्यात्मिक चेतना से राजनीतिक राजनीतिक औजार के रूप में अहिंसा के आविष्कारक को नहीं, उस पद्धति के सबसे प्रभावी प्रयोगकर्ता को याद रखने की जरूरत का तरीका बनाया।

अहिंसा जैन, बौद्ध और वैष्णव परंपरा में बहुत पहले से थी। टॉलस्टॉय और थोरो ने भी सविनय अवज्ञा की नैतिक दलील दी थी। गांधी का अंतर यह था कि उन्होंने उसे सत्याग्रह के नाम से संगठित जन-आंदोलन का साधन बनाया—असहयोग, सविनय अवज्ञा, नमक-सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम।

दावा यह था कि अन्यायपूर्ण सत्ता का उत्तर हिंसा से नहीं, सामूहिक अस्वीकार और नैतिक दबाव से दिया जा सकता है। 1930 का नमक मार्च इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। भारत में इस पद्धति ने औपनिवेशिक राज्य को राजनीतिक रूप से कमजोर किया। बाद में मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे नेताओं ने खुले तौर पर उसी परंपरा का हवाला दिया।

संयुक्त राष्ट्र की भाषा भी यही है। गांधी स्वतंत्रता-आंदोलन के नेता थे और नागरिक अधिकार तथा मुक्ति-संघर्षों की प्रेरणा बने। तिथि और प्रस्ताव दोनों भारत की पहल से आए। 2007 डॉ मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे। जनवरी 2007 में नई दिल्ली में “Peace, Non-Violence and Empowerment” सम्मेलन हुआ था। यह सम्मेलन सत्याग्रह के दक्षिण अफ़्रीकाम शुरुआत की शताब्दी की याद में आयोजित किया गया था। इसी सम्मेलन में विश्व अहिंसा दिवस का प्रस्ताव घोषित हुआ था।

15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने सर्वसम्मति से 02 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाये जाने की मंजूरी दी। भारत ने उसे आगे बढ़ाया, सह-प्रस्तावक लगभग 140 देश थे। पूरी दुनिया 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मानता है। शिक्षा तथा जन-जागरूकता से अहिंसा का संदेश फैलाने का संकल्प लेता है। यह ठीक है कि प्रस्ताव के पाठ में गांधी का नाम नहीं है। जन्मदिन को तिथि चुनकर संबंध स्थापित किया गया।

भारत के विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि व्यापक सह-प्रायोजन गांधी के प्रति सार्वभौमिक सम्मान और उनके दर्शन की प्रासंगिकता दिखाता है। आनंद शर्मा ने गांधी का वाक्य उद्धृत किया — अहिंसा मनुष्य के पास सबसे बड़ा बल है, मनुष्य की बनाई सबसे विनाशकारी आयुध से भी प्रबल।

महात्मा गांधी ने अहिंसा की नैतिक और आध्यात्मिक चेतना  को जोड़कर राजनीतिक राजनीतिक औजार के रूप में उपयोगी बना दिया था। 1857 की क्रांति की पृष्ठ-भूमि और पहले विश्व-युद्ध के आगे-पीछे हिंसा के माहौल में महात्मा गांधी के राजनीतिक राजनीतिक औजार के रूप में अहिंसा आशा विश्व-शांति के लिए नया और चमकदार आधार लेकर उपस्थित हुआ था।  

अहिंसा को साध्य और साधन दोनों माना गया। तर्क यह था कि हिंसक साधन से शांतिपूर्ण समाज नहीं बनता। साथ ही इसे केवल व्यक्तिगत संयम नहीं, सामूहिक कार्रवाई का अनुशासन बनाया गया—भीड़ में भी हिंसा से परहेज, गिरफ्तारी की तैयारी, और विरोध के साथ रचनात्मक काम। बीसवीं सदी की विश्व-राजनीति में यह संयोजन सबसे अधिक गांधी के नाम से जुड़ा।

सीमा भी साफ रखनी चाहिए। गांधी अहिंसा के एकमात्र स्रोत नहीं थे। उनके जीवन में अंतर्विरोध भी रहे — प्रथम विश्वयुद्ध में भर्ती का समर्थन, कुछ परिस्थितियों में बल-प्रयोग को लेकर बदलती स्थिति, और व्यक्तिगत प्रयोगों पर विवाद। संयुक्त राष्ट्र ने इन्हें निपटाया नहीं। उसने एक ऐसे सार्वजनिक प्रतीक को चुना जो उपनिवेश-विरोधी राजनीति, नागरिक अधिकार और शांति की भाषा को एक साथ जोड़ता था, और जिस पर 2007 में पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय सहमति बन सकती थी। दिवस गांधी की निर्विवादता की घोषणा नहीं है। वह उस पद्धति की स्मृति है जिसे दुनिया ने सबसे पहले उनके प्रयोग से पहचाना।क्या गांधी का जन्मदिन दिवस बनाने की प्रभावशाली विचारधारा हैप्रभावशाली विचारधारा के अर्थ में हाँ, प्रभावी राजनीतिक कार्यक्रम के अर्थ में बहुत सीमित। जन्मदिन को दिवस बनाना अहिंसा की नई दलील नहीं है। वह एक नाम को अहिंसा का सार्वभौमिक प्रतीक बनाने की संस्थागत कोशिश है।

वैचारिक प्रभाव तीन जगहों पर दिखता है। पहला, अहिंसा को भारतीय धार्मिक व्रत से निकालकर संयुक्त राष्ट्र की भाषा में रख दिया गया—शांति की संस्कृति, सहिष्णुता, शिक्षा। 2007 का प्रस्ताव A/RES/61/271 इसी ढाँचे में है। दूसरा, तिथि चुनकर गांधी को उस भाषा का संदर्भ-पुरुष बना दिया गया। नाम प्रस्ताव में नहीं है, जन्मदिन में है। तीसरा, भारत ने इसे अपनी कूटनीतिक पूँजी बनाया। लगभग 140 देशों का सह-प्रायोजन यह दिखाता है कि 2007 में गांधी ऐसा नाम था जिस पर व्यापक सहमति बन सकती थी, जबकि समकालीन हिंसा—आतंक, युद्ध, सांप्रदायिक संघर्ष—पर सहमति नहीं बनती।

पर प्रभाव की सीमा भी इसी संरचना में है। दिवस अवकाश नहीं है, संधि नहीं है, और किसी राज्य को बाध्य नहीं करता। उसका निर्दिष्ट काम शिक्षा और जन-जागरूकता है। व्यवहार में वह महासचिव का संदेश, कुछ देशों में स्मरण-सभा और भारत में गांधी जयंती का विस्तार बनकर रह जाता है। दुखद है कि गाजा, यूक्रेन या घरेलू दंगे इस तिथि से नहीं रुकते। भारत के लोग इस अहिंसक प्रतिरोध चेतना का उत्तराधिकारी है। लेकिन भारत सरकार का रुख और रवैया अहिंसा को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं दिखता है।

राजनीति में मूर्ति और मूर्ति की राजनीति में कुछ नया नहीं है। सहज जिज्ञासा होती है कि गांधी की मूर्ति कितने देशों में लगी है? यह भी कि सब से अधिक देशों में किस एक व्यक्ति की मूर्तियां लगी हैं? पक्की वैश्विक गणना नहीं है। जो आधिकारिक अंक उपलब्ध है, वह 2019 का है। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) ने एक सूचना-अधिकार उत्तर में कहा था कि 102 देशों में गांधी की प्रतिमाएं हैं — 82 में पूर्ण आकार की मूर्ति और 20 में अर्ध-आकार या बस्ट। इससे पहले विदेश मंत्रालय के आँकड़ों में 84 देश और 110 से अधिक मूर्तियाँ बताई जाती थीं। 2019 के बाद डोमिनिकन गणराज्य, जापान, नाइजीरिया, कनाडा, इंडोनेशिया और ब्राज़ील में और प्रतिमाएँ भेजी गई हैं, इसलिए देश-संख्या 102 के आसपास या उससे कुछ अधिक मानी जा सकती है।

भारत के बाहर सबसे अधिक मूर्तियां अमेरिका में हैं। 2019 तक वहां दो दर्जन से अधिक बताई जाती थीं। जर्मनी, ब्रिटेन, दक्षिण अफ़्रीका और कनाडा में भी एक से अधिक हैं। पाकिस्तान और चीन में भी प्रतिमाएं लगी हैं। इनमें बड़ी संख्या भारत सरकार के उपहार हैं, स्थानीय पहल से बनी मूर्तियां कम।

तुलना श्रेणी पर निर्भर करती है। धार्मिक मूर्तियां गिनी जाएं तो बुद्ध, ईसा और मरियम राजनीतिक व्यक्तियों से कहीं अधिक देशों में हैं। आधुनिक राजनीतिक व्यक्तियों में लेनिन की मूर्तियां सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में बहुत थीं, पर 1991 के बाद बड़ी संख्या में हटा दी गईं। विक्टोरिया, कोलंबस और बोलिवर अपने प्रभाव-क्षेत्रों में सघन हैं, पर देश-विस्तार गांधी जितना बिखरा नहीं।

गांधी की विशेषता संख्या नहीं, वितरण है। वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी प्रतिमा विरोध करने वाले पुराने साम्राज्य की राजधानी (लंदन) से लेकर अफ़्रीका, अमेरिका और एशिया तक, प्रायः भारतीय कूटनीति के उपहार के रूप में, लगी है।

ऐसा माना जा सकता है कि गांधी की प्रतिमा कम से कम सौ देशों में है। सबसे अधिक देशों वाले व्यक्ति की कोई प्रमाणित सूची नहीं है। सत्ता से मोहित राजनीति के लिए गांधी असुविधाजनक हैं तो सत्ता से पीड़ित जनता के लिए भरोसा हैं।hyan