शनिवार, 1 मार्च 2014

हे सखी, सच-सच बतलाओ!

हे सखी, सच-सच बतलाओ!
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चाँदनी ने रात के बिखरे केश को समेटकर
कान में ये हौले से कुछ कहा
रात हँस पड़ी, चाँद मुस्कुरा पड़ा
सितारे उमग कर नाचने लग गये
आसमान दूध से नहा गया
हवा भी मौज में बहकने लगी
धरती ने झोंक में पैर पटकर पूछा --
ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है!
और फिर मन में धीरे से बिहँस पड़ी
हँसी थी कि रोके, न रुकी - न रुकी
और हँसते हुए फूलों से कहा--
सावधान! संचार बहुत तेज है
तेरी नींद में पल रहे सपने की खबर
मेरे आँचल से निकलकर
पूरे आकाश में फैल गई है कि
नींद को विदा कर सपनों को बचा लो
सावधान! संचार बहुत तेज है
हे सखी, सच-सच बतलाओ अब तो --
तुमने फूल से ऐसा क्या कहा कि
बात पूरी दुनिया में फैल गई
और मुझको ही खबर नहीं!
हे सखी, सच-सच बतलाओ!
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