शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

आप इसे झूठ ही मानें

आप इसे झूठ ही मानें
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सुबह-शाम एक भिखारी एक खास जगह पर बैठा रहता था। उसे मैं लगभग रोज उसी जगह पर देखता था। कभी मैंने कुछ दिया नहीं। हाँ, देखता रोज ही गौर से था। एक दिन वह अचानक एक ऐसी जगह मिल गया, जहाँ उसके होने की उम्मीद नहीं थी। हमें किसी की प्रतीक्षा थी और हम दो ही थे। समय काटने के लिहाज से मैंने बात-चीत शुरू की, अविकल किंतु परिष्कृत सार संक्षेप इस प्रकार है:-

-- मैं तो आपको लगभग रोज वहाँ देखता हूँ, सुबह-शाम...

-- मैं भी आपको अक्सर देखता हूँ...

-- इस तरह कितना मिल जाता है...

-- कोई ठीक नहीं, ऐसे काम में कोई बंधा-बंधाया तो होता नहीं है..

-- फिर भी...

-- औसतन 60-70 हिट हो जाने से 80-85 रुपया कमा लेता हूँ.. और भी हो सकता है.. समय नहीं दे पाता हूँ...

-- यानी एक रुपया से कम कोई नहीं देता...

-- 50 पैसे के चलन से बाहर हो जाने का यह लाभ है.. कमाई.. दोगुनी तो जरूर हो गई है..

-- सो, तो है.. लेकिन समय क्यों नहीं दे पाते हैं...

-- भाई.. और भी काम करने होते हैं.. पैसा ही सबकुछ नहीं होता है...

-- सही बात... अच्छा यह बताइये कि रोज हिट करनेवाले क्या एक ही होते हैं.. या अलग-अलग..

-- 80% लोग लगभग एक ही होते हैं.. कोई गुरुवार को नहीं देता तो कोई शनिवार को डबल देता है.. अधिकतर लोग आप की तरह देखते हैं.. जैसे ट्रेड सेक्रेट भेदना चाहते हों.. लेकिन कभी हिट नहीं करते..

-- आप हिट कह रहे हैं... या हित...


-- अंगरेजी का हिट कह रहा हूँ.. अब अंगरेजी के हिट के बिना हिंदी का हित कहाँ होता है..

तभी वे आ गये, जिनकी प्रतीक्षा में हम थे। आते ही उन्होंने पहले उन्हें हिट किया और मेरे सामने अभी हिट की प्रतीक्षा बची हुई थी.. आप इसे झूठ ही मानें..

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