अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत

अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत

पहले होती थी बहुत
अब नहीं होती किसी से कोई शिकायत
न रूबल से, न डॉलर से
हाँ, तुम से भी नहीं और आप से भी नहीं

दिल बहुत बोझिल हो जाता था
पायताना ढीला पड़ जाता था
मन सावे की खाट की तरह
तबेले की झलंगी खाट में बदल जाता था
रीढ़ टेढ़ी हो जाती थी
देह निढाल हो जाता था
पहले बहुत होती थी शिकायत
अब नहीं होती है

इंतजार रहता था बेसब्री से बहुत
और बस मन में दुहराता रहता था
सब्र का फल मीठा होता है
पहले इंतजार रहता था बहुत
अब नहीं रहता किसी आहट का

पहले रहती थी चिंता बहुत कि
अनजाने में कोई द्वार बंद न हो जाये
किसी उत्ताल हवा के बहकावे में आकर
अब नहीं रहती कोई चिंता कि कोई लौट न जाये
चिंता कि दिशाएँ कहीं बंद द्वार में न बदल जाये

जब से माननीय न्यायमूर्त्ति ने मुझे देखकर कलम तोड़ दी
जब से डाक्टर ने अपना सिर झुका लिया
जब से पुलिस ने अपनी टोपी उतार दी
जब से करीबियों ने फूल की बढ़ी कीमत का रोना शुरू किया
तब से नहीं होती किसी से कोई शिकायत

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