गरीबों की गरीबी बनाम गर्वीलों
की गरीबी
गरीबों की गरीबी और गर्वीलों की गरीबी में फर्क होता है। गरीब पहले से कहीं ज्यादा
गरीब हो गया है, गरीब आदमी। आदमी गरीब पैदा नहीं होता बनाया दिया जाता है — जैसे ‘स्त्री’
पैदा नहीं होती है, बना दी जाती है।
पहले अपने किसी-न-किसी गुण और हुनर के कारण गर्वीलों की नजर उस पर बनी रहती
थी। गर्वीले लोग भी गरीब हुआ करते थे। लेकिन गरीब आदमी की गरीबी और गर्वीलों की गरीबी
में फर्क हुआ करता था। गरीब आदमी बिना किसी आनाकानी के अपनी गरीबी से दोस्ती कर लिया
करता था। गरीबों को गरीबी से दोस्ती के लिए कोई मजबूर करे इस के पहले ही गरीब आदमी
आंख-कान पटपटाये बिना अपनी गरीबी से दोस्ती कर लिया करता था। अपने दुख-दर्द को बर्दाश्त
करने और ढक लेने के लिए उस के पास ‘नसीब नाम की चादर’ होती थी। इस चादर को गरीब
आदमी बड़े जतन से इस पुश्तैनी चादर को ओढ़ता था। पुश्त-दर-पुश्त अपने बालबच्चों को
सौंपने के संतोष के साथ लोक से लोकोत्तर हो जाया करता अब वह बात नहीं रही।
आजादी, संविधान, मानवीय गरिमा, वैज्ञानिक चेतना, हक, लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चेतना
जैसे शब्दों में सोये सपनों की टूटी हुई किरिचों से गरीब आदमी की नसीब नाम की पुश्तैनी
चादर को तारतार हो गई — आज गरीब आदमी के साथ और हाथ न नसीब है, न संविधान। और-तो-और
हुगली का पानी पीने के चक्कर में संत भी सत्ता की सतैसा में खो गये — ऐसा है गया खेल,
संत और शैतान में हो गया मेल — उफन रहा अब योगी मॉडल बुलडोजर न्याय।
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