शुक्रवार, 13 जून 2014

वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है

वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है
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होता है, बहुत होता है, बस तबादला-ए-खयालात नहीं है।
होता है, बातों में वक्ती जुनून, जिंदगी का जज्वात नहीं है।

तेरी फनो-फिक्र में मिसाइल सारे, असल सवालात नहीं है।
बोलता तो है मगर इत्तेफाक यह कि बातों में बात नहीं है।

सुबह-शाम पूछता खैर, ये क्या कि बातों में खैरात नहीं है।
ये बसर जिंदगी का कभी रोटी नहीं, तो कभी भात नहीं है।

मुहब्बत बहुत है, अभी तक मुल्कियों की मुलाकात नहीं है।
बात अपने जनतंत्र की है, वैसे तो कोई अलग बात नहीं है।

मुखपोथी है, खोल लेता हूँ, मुँह खोलने की औकात नहीं है।
बिजली नहीं है, वरना तू न मानता कि ये क्यों रात नहीं है।

होता है, बहुत होता है, बस तबादला-ए-खयालात नहीं है।
होता है, बातों में वक्ती जुनून, जिंदगी का जज्वात नहीं है।
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