रविवार, 8 जून 2014

शीर्षासन पर सरदार

शीर्षासन पर सरदार

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जी बहुत चतुर होते हैं, हाँ ठग और बटमार।
मीठे वचन हैं बोलते, वायदों की है भरमार।।

लुट-पिटकर घर बैठे, कमजोर और लाचार।
वे तेरे, जब रहती, उनको वोटों की दरकार।।

बड़े धुरंधर, कोई न जाने उनके गुप्त विचार।
बढ़ती जाती है शोषित की लंबी और कतार।।

रोये घर में बैठा देखकर बदला यह व्यवहार।
न लोहा माँगे ना मिट्टी शीर्षासन पर सरदार।।

पहले भी था तू, आज भी है, आसान शिकार।
सूखा, बाढ़ तो तेरी फितरत उनकी सदाबहार।।

धरती के सपूत ये करते देखो कैसे गगनविहार।
तेरे हिस्से में प्यास बहुत, उनके हिस्से कचनार।।

पकड़ में आने लायक नहीं, रहस्यमय किरदार।
उनके पास चेहरों और मुखौटों की, है भरमार।।

पगले समझ न पाया तू, ये अपनी ही सरकार।
न लोहा माँगे ना मिट्टी शीर्षासन पर सरदार।।
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