गुरुवार, 5 जून 2014

एक बार हुआ यों कि



एक बार हुआ यों कि
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उस दिन भोला बाबू मिल गये। बिल्कुल अचानक। जरा जल्दी में दिखे। मैंने लपक कर पूछ लिया कि भोला बाबू एक चाय हो जाये, बहुत दिन के बाद दिखे हैं। उन्होंने छूटते ही कहा कि जरा जल्दी में हूँ, चाय किसी और दिन के लिए रहने दीजिये। मेरी शंका बिल्कुल सही निकली। अब मेरी उत्सुकता काफी बढ़ चुकी थी कि आखिर इस जल्दी का रहस्य क्या है। इस रहस्य के लिए उनको चाय में उलझाना जरूरी था। मैंने कहा कि अरे भोला बाबू इतने दिनों के बाद तो दिखे हैं। आजकल आप दिखते ही कहाँ हैं! एक चाय हो जाये। फिर चले जाइयेगा। मैं भी जल्दी में ही हूँ, लेकिन आपके साथ चाय के आनंद का लोभ छोड़ नहीं पा रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि चाय भोला बाबू की कमजोरी है। हम बात करते हुए चाय की गुमती तक पहुँच गये थे। मैंने दो प्याली बढ़िया चाय के लिए चाय वाले को कहा। बढ़िया चाय यानी बनी-बनी चाय नहीं, बल्कि अलग से बनाकर दी जानेवाली चाय। गरज यह कि इससे थोड़ा और समय मिल जाता। भोला बाबू ने चाय स्टाल पर रखे पानी के जग को उठाया और पानी पीने के बाद पास के बेंच पर बैठ गये। मैं अब आश्वस्त था कि भोला बाबू जल्दबाजी के दबाव से बाहर निकल आये थे।

बात आगे बढ़े इसके पहले भोला बाबू के बारे में थोड़ा बताना जरूरी है। भोला बाबू, हम यानी मुहल्ले को लोग इसी नाम से पुकारते हैं। भोला बाबू अब फूल टाइम साहित्यकार हैं। पहले वे सरकारी दफ्तर में काम करते थे। उस समय भी वे अपने हिसाब से फूल टाइम साहित्यकार ही थे, लेकिन अब तो सच में वे साहित्य के फूलटाइमर हो गये हैं। पतली-सी काया। दरम्याना कद। तितिर-बितिर खिचड़ी दाढ़ी। हाफ कुर्त्ता, फूल पायजामा और कंधे पर झोला। झोला में ढेर सारा लिखा-अधलिखा कागज। हाँ तो, भोला बाबू अपने को फूल टाइमर साहित्यकार मानते थे। हकीकत यह है कि वे जितना लिखने में वक्त लगाते थे उससे ज्यादा वक्त लिखने की योजना तैयार करने में लगाते थे। लिख तो बहुत कम ही पाता थे। जो लिख लेते थे उसे फाइनल रूप नहीं दे पाते थे। वे संपादकों के पास डाक से अपनी रचनाएँ नहीं भेजते थे। इस मामले में वे डाक विभाग पर बिल्कुल ही भरोसा नहीं कर पाते थे। उन्हें लगता था कि इस मामले में डाक विभाग पर बिल्कुल ही भरोसा नहीं किया जा सकता है। संपादकों के पास वे अपनी रचना लेकर खुद जाते थे। वे यह भी चाहते थे कि संपादक उनके सामने ही उनकी रचना को पूरे मनोयोग से बाँच ले। रचना की साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्ता के प्रति पूरी तरह आश्वस्त होकर अपना फैसला भी तत्काल सुना दे। इसके लिए वे संपादक की रुचि के अनुसार पान-सिगरेट साथ लेकर जाते थे। शुरु-शुरू में संपादकों ने उनको उतना महत्त्व नहीं दिया। लेकिन जैसा कि होता है पंद्रह-बीस दिन के फेरे के बाद किसी एक दिन जब संपादक पर दबाव उतना नहीं होता तो उनको मौका मिल जाता। संपादकों ने महसूस किया कि उनकी कहानियाँ चाहे जैसी भी हों, उनकी बातें बहुत रसदार और लच्छेदार होती हैं। भोला बाबू बात रसाने में माहिर बहुत ही मजेदार आदमी हैं। कहानी का पहला पन्ना खोलते ही भोला बाबू संपादक की ओर पान या सिगरेट बढ़ा देते थे। बिना निगाह उठाये संपादक उसे ग्रहण करता। संपादक कहानी पढ़ रहा होता और वे संपादक के चेहरे को। दूसरा पन्ना पलटते-न-पलटते भोला बाबू संपादक के चेहरे पर उभर आये भाव को ताड़ते हुए कह बैठते कि असल में यह फाइनल स्क्रिप्ट नहीं है। अभी इसमें बहुत कुछ जोड़ना घटाना बाकी है। भोला बाबू का इतना कहते ही संपादक कागज को मोड़ देता और भोला बाबू कहानी के जन्म की कहानी सुनाने लगते, एक बार हुआ यों कि। फिर संपादक के पास उपलब्ध समय के अनुसार कहानी के बाहर खड़ी कहानी को संपादक के सामने वे पसारते रहते ▬▬ एक घटना, दूसरी और तीसरी घटना, ना जाने कितनी घटनाएँ जुटती चली जाती। संपादक की भाव-भंगिमा को देखकर वे फिर कहानी के बाहर पसरी कहानी को समेटने लगते। संपादक कहता कि हाँ यह सब तो एक अच्छी कहानी में पिरोयी जा सकती है। इन्हें कहानी में पिरोकर लाइये। फिर देखते हैं कि कहानी कैसी बनती है। भोला बाबू लौटकर कहानी में कहानी के बाहर खड़ी कहानी को पिरोने की योजना बनाते। दो-चार-दस दिन उनके अंदर कहानी के बाहर खड़ी नई-नई कहानियाँ उमड़ती-घुमड़ती रहती। फिर वे एक दिन कागज पर लिखना शुरू कर देते। आधा पन्ना लिख लेने के बाद फिर उसमें काटने-पीटने का और अंत में उसे फाड़े जाने का काम संपन्न होता। फिर शुरू करते। तीन-चार पन्ना उतरते-न-उतरते फिर संपादक के पास। फिर वही सिलसिला, फिर वही कहानी। इसी तरह बहुत ही गंभीरता से भोला बाबू का लेखन चलता रहा है। बताने की बात यह है कि भोला बाबू लेखन को बहुत ही गंभीरता से लेते रहे हैं। शुरू-शुरू में उनकी कुछ रचनाएँ लघुपत्रिकाओं में छपी जरूर थीं, लेकिन जैसा कि होता ही है वे पत्रिकाएँ अपने दूसरे-तीसर अंक के लोकार्पित होते-न-होते अनियतकालीन हो गईं। लेकिन इससे क्या लिखने का काम ब-दस्तूर जारी रहा। संपादकों के साथ उठने-बैठने का सिलसिला जारी रहा। रिटायर करने के बाद इस सिलसिला के और भी जीवंत रूप से जारी रहने तथा बार-बार आने-जाने का सुफल यह हुआ कि पाँच साल के अंदर दो कहानियाँ छपी जरूर। इन कहानियों के छपने के बाद एक नई बीमारी का जन्म उनके अंदर हो गया। बिना जान-पहचान के लोगों की ओर ताकते हुए मुस्कुराने की बीमारी। अब आदमी भले ही अन-जान हो लेकिन किसी को अपनी ओर मुस्कुराते हुए देखे तो उसकी मुस्कान भी उछल ही जाती ही न है। अब इस तरह से अन-जान लोगों की मुस्कान के उछलने के साथ एक और बात शुरू हो गई। शुरू-शुरू में वहम होता था कि सामनेवाला उन्हें पहचान रहा है, उम्मीद भी रहती थी कि पहचान रहा है तो वैसा ही व्यवहार भी करेगा। लेकिन निराशा ही हाथ लगती थी। दो-बार तो ऐसे ही किसी अन-जान महिला की और आदतन मुस्कारते हुए ताकने के चक्कर में पिटते-पिटते बचे। उम्र की दुहाई देकर आस-पास के समझदार लोगों ने पिटने से बचाया। इसके बावजूद वहम तो बना हुआ है अब भी। लेकिन वह जाग्रत होता है जब सामनेवाला मुस्कुराये भले नहीं पर इन्हें मुस्कुराता हुआ दिखे। भोला बाबू के साथ सुविधा यह थी कि आगे न कोई नाथ, न पीछे कोई पगहा ▬▬ परम स्वतंत्र, सिर पर नहिं कोऊ!

अब तक चाय आ चुकी थी और भोला बाबू भी मूड में आ चुके थे। जब भोला बाबू मूड में होते हैं तो लाजिमी तौर पर वही बोलते हैं, बाकी सभी सुनते हैं। मैं भी सुनता ही हूँ। आप भी सुनिये, भोला बाबू के मुँह से▬▬

▬▬▬ अरे, हुआ यूँ कि पिछले दिनों एक कहानी के सिलसिले में मैं शहर से बाहर था। अंजान नंबर से मेरे मोबाइल पर फोन आया ▬▬ हलो मैं रुद्रशंकर बोल रहा हूँ। जी कोलकाता से आप मुझे पहचानेंगे नहीं। क्या मैं आप से थोड़ी देर बात कर सकता हूँ। असल में मैंने आज आपकी एक कहानी पढ़ी है। कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। नीचे आपके घर का पता और फोन नंबर भी छपा है। मैं अपने को रोक नहीं पाया।

▬▬▬ मेरी कहानी! अच्छा! कौन-सी। ऐसा है कि मैं इस समय मैं शहर से बाहर हूँ। मैं लौटकर आप से बात करता हूँ।

▬▬▬ देखिये, मैं आपका पाठक हूँ। आप मुझे टाल नहीं सकते। मेरी उम्र हो गई है। ठीक से चल फिर नहीं सकता, नहीं मैं आपके घर पर ही दर्शन कर आता।

▬▬▬ नहीं-नहीं टालने जैसी बात बिल्कुल ही नहीं है। मैं लौटकर आप से संपर्क करता हूँ।

चाय की चुस्की लेते हुए भोला बाबू ने कहा कि वे इस बात से इतने खुश हुए कि यात्रा बीच में ही छोड़कर वापस आने पर सोचने लगे। खैर यह तो संभव नहीं हुआ। हाँ आते ही मैं ने उन से संपर्क किया। उनके आग्रह पर उन से मिलने उनके घर पहुँचा। दो बेडरूमवाले मकान में रुद्रशंकर अकेले रहते हैं। लड़का डॉक्टर है, बहू भी। एक पोती भी है, हालाँकि वह बाहर हॉस्टल में रहती है। आठ साल की हो गई है। उसे वे आखिरी बार बहुत पहले जब वह चार साल की रही होगी देखा था। उसके बाद से छुट्टी होने पर उसके माँ-बाप जाकर उसे हॉस्टल में ही मिल लेते हैं। और फिर छुट्टी का मौसम रहा तो उधर से ही उसे लेकर घूमने फिरने निकल जाते हैं। उसे यहाँ लाने का कोई ठोस कारण नहीं है। रुद्रशंकर ने कहा कि के बेटे और बहू बहुत काबिल और नेक हैं। बस साथ नहीं रहते हैं। उनके पेंसन से एक पैसा नहीं लेते। बस साथ नहीं रहते। वैसे यहाँ का सारा इंतजाम कर दिया है। उनको कोई तकलीफ नहीं है। बस एक ही बात है कि बात करनेवाला कोई नहीं है। रुद्रशंकर ने यह भी कहा कि उनका असली नाम कुछ और है। वे इस नाम से लिखते रहे हैं। मैं लेखक हूँ इसलिए उन्होंने अपना लेखकीय नाम ही बताया है। बहुत कहने पर रुद्रशंकर ने छपी हुई कहानी का पन्ना दिखलाया। मैं चौंक गया। कहानी तो लगभग मेरी ही लगती है। वैसे तो, हर कहानी मुझे अपनी ही लगती है और वह कहानी तो बहुत ही खास तौर पर अपनी लग रही थी। लेखक के रूप में नाम किसी और का था, हाँ फोन नंबर जरूर मेरा ही था। अब माजरा समझ में आया। ये मुझे दिवा कहकर क्यों बुलाते हैं। इस छपी हुई कहानी में कहानीकार का नाम तो दिवाकर छपा है। अब मैं रुद्रशंकर से यह कैसे कहूँ कि मैं दिवाकर नहीं हूँ। सो मैं आजकल दिवाकर बना घूम रहा हूँ। वैसे भी बड़े लोगों ने कहा है, नाम में क्या रखा है।

चाय का कुल्हड़ एक तरफ फेकते हुए दिवाकर बन चुके भोला बाबू ने कहा, देर हो गई, चाय के चक्कर में। आजकल मेरा एक टाइम का खाना वहीं होता है। बदले में रुद्रशंकर की एक ही कहानी रोज सुननी पड़ती है। यहाँ तक तो गनीमत है। रुद्रशंकर को कहानी सुनाने का वेग निकास के वेग की तरह आता है। वेग आने पर वह रुक नहीं पाता है। खुद को जरा भी सम्हाल नहीं पाता है। मैं ठहरा बतरस लोभी। देखो न अभी तुम्हारे चक्कर में लेट हो गया। लेकिन एक ही बात है कि उसे भरोसा है कि मेरा संपादकों में बड़ा रसूख है, सो एक दिन उसकी कहानी उसके नाम से जरूर छपेगी। थोड़ा रुककर भोला बाबू ने कहा, जानते हो असल में कहानी तो दूसरों की ही होती है, छपती लेखक के नाम से है। भोला बाबू ने अनुरोध किया कि दिवाकर नाम से कहीं कुछ छपा दिखे तो बताना, उसे देखकर रुद्रशंकर बाबू को अच्छा लगेगा और मेरे प्रति उनका स्नेह थोड़ा और टिकाऊ होगा।

इतना कहकर भोला बाबू तो बस पकड़कर हवा हो गये और मैं चायवाले से चेंज पैसे को लेकर उलझ रहा था। तो बात यूँ है कि कहानी तो हमेशा दूसरों की ही होती है, छपती लेखक के नाम से है।

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