रविवार, 8 जून 2014

थे रोये बहुत कबीर

थे रोये बहुत कबीर

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अद्भुत, जो मारे सो मीर कहावे, हारे सो नहीं हीर।
ये आवाम के पग रखी जमीन पर कैसी खींची लकीर।।

जग्गा आया जोगिया आया, आया बड़का संत फकीर।
पेट डेंगाबे घर में बैठ दिन-रैन, खेले बाहर रंग अबीर।।

रोटी पर ना नमक मयस्सर, लेकिन जीवन टेढ़ी खीर।
दिन-रात खटो जी भर, लेकिन खुशहाली बँधी जंजीर।।

हाँ यह सफर कठिन, लिट्टी खाओ, पीओ रेल का नीर।
जी, अस्सी पर आये थे उस दिन, थे रोये बहुत कबीर।।

काशी में भी राम निहोरा, हाँ भैया होना नहीं अधीर।
दुश्मन नहीं, अपनों से लड़े और बचे-बचाये सच्चा वीर।।

अद्भुत, जो मारे सो मीर कहावे, हारे सो नहीं हीर।
ये आवाम के पग रखी जमीन पर कैसी खींची लकीर।।
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