गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

बाघ था पोसा जिसे, बिलाव समझकर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan


खेल में मुँह नोच डाला नकाब समझकर
मुस्कान को रौंद डाला जवाब समझकर

बाँह चढ़ा वोट डाला इंक्लाब समझकर
भूल जो कर बैठे उसे इंतखाब समझकर

सुलझा ही था छोड़ा उलझाव समझकर
बाघ था पोसा जिसे, बिलाव समझकर

साथ रहा निकटता को दुराव समझकर
जिंदा रहा अब तक, अपनाव समझकर

अँधेरे को स्वीकारा, रखरखाव समझकर
हाँ भूल की जुल्फ का बिखराव समझकर

मंजिल बनी, जहाँ रुका पड़ाव समझकर
जिंदगी ने उसे छोड़ा, बहलाव समझकर

धोखा है, वह खुश है, बदलाव समझकर
दुखी है इन बातों को दोहराव समझकर


खेल में मुँह नोच डाला नकाब समझकर
मुस्कान को रौंद डाला जवाब समझकर


  
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