बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

वह बिहार है मालिक

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

माना कि जुर्म है मगर रोजगार है मालिक
जो पढ़ गया हाँ वही अब बेकार है मालिक

उसका भी मन है वह तलबगार है मालिक
कहाँ किस काम का अब जोगार है मालिक

यह दौर! तरुण हाथ में हथियार है मालिक
सन सैंतालीस की आँख! इंतजार है मालिक

हादसा पर भी भाषा में ललकार है मालिक
सम्हलकर गिर जाता वह बिहार है मालिक

लोकसभा, जनसभा कहाँ दरबार है मालिक
आपकी सलामती का ये गुनहगार है मालिक

सुनाई देती नहीं चुप की फटकार है मालिक
भूखा तो क्या हुआ वह खबरदार है मालिक



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Hari Pratap Singh, Manoj Kumarjha, Kailash Kalla और 31 अन्य को यह पसंद है.

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Upadhyaya Pratibha जो पढ़ गया, वही अब बेकार है.
22 घंटे · पसंद · 1


Bal Mukund Pathak बहुत ही उम्दा आलोचनात्मक काव्य ।हिँदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक की कलम से
22 घंटे · पसंद


Kumar Bijay Gupt अच्छा लगा...तीर आर पार हो गया
21 घंटे · पसंद


Dilip Chanchal achi rachna hai badhai
20 घंटे · पसंद


Arti Priya Jha aap ki rchna share krne ka lobh samvarn nai kr pati hu..............gustakhi maf krenge aasha hai.............
14 घंटे · नापसंद · 1


Mrityunjay Tiwari एक उम्दा कविता,जो बिहार की अन्दरूनी तस्वीर दिखा रही है
5 घंटे · पसंद


Manoj Kumarjha वाह...गिरते-गिरते भी बन जाए वो सरकार है मालिक
3 घंटे · पसंद
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