बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

कठिन दौर

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

यह कठिन दौर है। कठिन दौर के कई लक्षण होते हैं। इसका एक मारक लक्षण है कि इसमें एक की विवेकहीनता कई लोगों के विवेक को अपना अधीनस्थ बना लेती है। विवेकवान लोगों का एकाकी विवेक प्रतिपल आहत होता रहता है। आहत विवेक व्यक्तित्व को विघटित करने लगता है। जो लोग व्यक्तित्वहीन रहकर जीवनयापन को साध लेने के अभ्यास में समय के साथ पारंगत हो जाते हैं, वे इस कठिन दौर को नर्म बनाकर फिर भी एक स्तर पर, चाहे जैसे हो, जी लेते हैं। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं, कठिन दौर उनको रौंद देता है। इसलिए कहता हूँ कि इस कठिन दौर को थोड़ा नर्म बनाकर अपने लिए जगह बनाना, भावुक मूर्खता या विचारधारात्मक जड़सूत्रात्मकता का शिकार हो जाने से बेहतर है। जीवन रक्षा मनुष्य के अंतर्विवेक का पहला निदेश है। अंतर्विवेक के पहले निदेश का अनुपालन निःशर्त्त विवेक-संपन्न नैतिक कार्य है।


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Sundar Srijak, Kamlesh Sharma, Kumar Sushant और 16 अन्य को यह पसंद है.

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Dileep Mridul Pashchim bangal me to "kathin samay" ka prabhav to kam hona chahiye,?
ya fir pahale se "abhyas" hoga?
Kya "vichar dhara" bhi kisi "uchch bauddhik" ko itana "sankirn" soch de sakti hai?
3 अक्टूबर को 09:27 अपराह्न बजे · पसंद


प्रफुल्ल कोलख्यान Dileep Mridul ... आपकी बात मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। आप समझ रहे हैं?
3 अक्टूबर को 10:59 अपराह्न बजे · संपादित · पसंद


Harinarayan Thakur यह विचार नहीं, भाव का युग है. भक्ति-भावना और भजन-कीर्तन का युग है. विचारवान बने कि गए. जनता रूप-रस-गंध के चमत्कार में विश्वास करती है, रूखे-सूखे ज्ञान और वचन में नहीं.
3 अक्टूबर को 11:08 अपराह्न बजे · संपादित · नापसंद · 2


Manzar Jameel well spoken@harinarayan thakur.
4 अक्टूबर को 01:02 पूर्वाह्न बजे · पसंद
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