महज इत्तिफाक नहीं

मुफलिस हूँ, सच इतना भी तो खौफनाक नहीं 
नजर-ए-हाजिर में मुकम्मल यह दर्दनाक नहीं


नजरशनाशी है मुझ में हादसा हौलनाक नहीं
तेरी नजर सलामत शहर में अब उश्शाक नहीं


ये कविता है मेरी जान जज्वात का पोशाक नहीं 
जिंदगी अपना सुख दुख खोलती है मजाक नही


गमगीन है कि मादरे-वतन में उसका रज्जाक नहीं 
इल्जाम हमारी पीढ़ी पर वह महज इत्तिफाक नहीं

बेजार रहे कोई, है दिल उसका अब मुश्ताक नहीं
इस चमन की रौशनी, हाल पर उसके अवाक नहीं 
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