गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

बाजार तो मुझे देखकर ही गुर्राता है

बाजार तो मुझे देखकर ही गुर्राता है
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बाहर के कोलाह हलाहल से ऊब कर मन जब थक जाता है
अपने सरीखे किसी और से बात करने के लिए अकुलाता है

मुश्किल मगर यह कि सरीखा जो कोई मिलता मिलाता है
वह भी अपनी जगह थका, माँदा कि सिर्फ सिर हिलाता है

मन का गह्वर एक खतरानक घाटी में कैसे बदल जाता है
सरल भाषा में कैसे कहूँ कि इंसान कैसे अकेला हो जाता है

खुद को ही रुँधे गले से पुकारता, जी खुद से ही बतियाता है
शाम को जब लौटता है बाजार तो उसे देखकर ही गुर्राता है

हमारे समय का अर्थशास्त्री ना जाने क्या-क्या भुनभुनाता है
कल क्या होगा, क्या-क्या! कहना बहुत मुश्किल हो जाता है

संसद से निकलकर, जनतंत्र खाप पंचायत में गिरगिराता है
मैं सियासी बातें कर रहा, मेरा युवा साथी मुँह बिचकाता है

क्या कहूँ उसको जो घर में ही बैठकर चौक्का-छक्का लगाता है
मुहल्ला के रहनुमा से बात की, इसे मेरा मनोरोग बताता है

आप ही बताइये जब भी मेरा दुखियारा मन कौर उठाता है
थाली में बाजार का अगला पंजा तैरता हुआ नजर आता है

मनोरोग या सियासी बात कहकर वह हमें रोज भरमाता है
बाहर के कोलाह हलाहल से मेरा मन बहुत ही थक जाता है

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