रविवार, 11 अक्तूबर 2015

रचनाधीन

ये दौर नहीं खामियों को गिनने का क्या गजब कि मंजिल-ए-मकसूद अब रास्ते में है
ये जो मुल्क हिंदुस्तान है इसकी रुहानी ताकत से नहीं वाकिफ! यह अभी रास्ते में है

है असह्य वेदना और तुम के पार तुम

रास्ते महफूज सारे और मंजिल गुम

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अंधेरे का कसता मिजाज और चाँद भी अब आता नहीं है 

तेरी जुदाई में भी क्या कहें दिल का जख्म अब गाता नहीं है
आदमी के ख्वाबों में आजादी का लफ्ज अब आता नहीं है
गैर या अपनों का क्या आदमी खुद के काम अब आता नहीं है
बेवफाइयों को कोई नाम दो खुद से जो उसका अब नाता नहीं है
वह तो उड़ान की जगह है मुकम्मल, आसमान आशियाना नहीं होता
समझ नहीं पाता अगर मिजाज-ए-सुर्खरु जरा शायराना नहीं होता
हाय मुंसिफ मिजाजी भी क्या खूब, लेते भी खूब हो
जी चाहता है झुक कर करूँ सलाम लौटाते भी खूब हो
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भावनाओं और विचारों के संघर्ष में हम कई बार यह समझ ही नहीं पाते हैं कि जिसे हम जीत समझ रहे हैं वह दरअस्ल हमारी हार है और जिसे हार समझ रहे हैं उसी के आस-पास कहीं हमारी जीत है। कई बार जब हमें लगता है कि कुछ समझ में नहीं आ रहा तभी हम, कुछ हद तक ही सही, समझ रहे होते हैं और जब लगता है कि पूरी तरह से समझ गया तब कई बार समझने की शुरुआत भी नहीं हुई होती है। इसे समझने में मुझे बहुत वक्त लग गया।

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